श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 28

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 28

आयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठोनैष्कृतिकोऽलसः।
विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते॥ 28।।

जो कर्ता अयुक्त, शिक्षा से रहित घमंडी, धूर्त और दूसरों की जीविका का नाश करने वाला तथा शोक करने वाला, आलसी और दीर्घसूत्री (दीर्घसूत्री उसको कहा जाता है कि जो थोड़े काल में होने लायक साधारण कार्य को भी फिर कर लेंगे, ऐसी आशा से बहुत काल तक नहीं पूरा करता। ) है वह तामस कहा जाता है

कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जिनके मन , बुद्धि, विवेक, भावना और शरीर की क्रियाओं में कोई तालमेल ही नहीं होता है। ऐसे व्यक्ति तामस कर्ता कहे जाते हैं। चूँकि इस तरह के व्यकि की भावना और विवेक में कोई तालमेल नहीं होता है सो ऐसे व्यक्ति के अंदर न तो अपनी भावना को लेकर समझदारी होती है और न ही अपनी बुद्धि और विवेक के प्रति। इस समझदारी के अभाव में उस व्यक्ति क्रियाएँ भी बुद्धि रहित होती हैं।
इस अयुक्त व्यक्तित्व के कारण व्यक्ति समझ नहीं पाता है कि किस परिस्थिति में उसे किस तरह के कर्म करने चाहिए। सो ऐसा व्यक्ति हठी और अहंकारी होता है, समय , काल परिस्थिति के अनुसार स्वयं में अपेक्षित बदलाव भी नहीं ला पाता है। अपने लाभ के लिए ऐसा तामस व्यक्ति दूसरों के साथ बेईमानी करने से भी नहीं चूकता है और दूसरों के लिए और स्वयं के लिए बराबर समस्या खड़ी करने वाला होता है।
   तामस व्यक्ति निराशावादी होता है और हर चीज का मात्र निराशावादी पहलू ही देखता है।
      इन अवगुणों के कारण ऐसा कर्ता न केवल अलसी होता है बल्कि कार्य को टालते रहने वाला भी होता है। उत्साह और समझदारी से अनभिज्ञ तामस व्यक्ति समय पर कोई काम नहीं करता है और समय बीतने पर हड़बड़ी में कार्य करने का उपक्रम करता है जिससे उसके कर्म दोषपूर्ण होते हैं।
    

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