श्रीमद्भागवद्गीता-  अध्याय 1





         प्रथम श्लोक में युद्ध को लेकर धृतराष्ट्र की उत्सुकता झलकी है । उसे पता होता है कि उसने और उसके पुत्रों ने पांडवो के साथ ढेरों छल किये हैं। इसलिए उसके अंदर एक छटपटाहट भी है। वो बेचैन है, सो सवाल करता है। जब आप गलती किये होते हैं और पीड़ित आपके सामने सीना तानकर आपसे दो दो हाथ करने आ जाता है तो आप नैतिक रूप से कमजोर हो जाते हैं । उस वक़्त आपके अंदर ये जानने की बेचैनी स्वाभाविक रूप से होती है कि जो पीड़ित है वो किस तरह से प्रतिकार करता है। हर चोर की दाढ़ी में तिनका तो होता ही है, वो बात बात पर चिहुँकता जरूर है। यही हाल धृतराष्ट्र का है।
       धृतराष्ट्र जन्मान्ध है। आँखें देखने के काम आती हैं। लेकिन जिसके आँखों पर पर्दा हो वो खुद क्या देखेगा। यही हाल धृतराष्ट्र का भी है। उसे पुत्रमोह है। उस मोह में उसे भला बुरा कुछ नहीं दिखता, वो तो बस मोह में फँसा अपराध ही करते आया है। सच यही है। जिसके आँख पर मोह की पट्टी हो वो सही गलत नहीं समझ पाता है। लेकिन जब उसे लगता है कि उसके अपराधों का फैसला होने वाला है उस वक़्त उसके दिल की धड़कन बढ़ जाती है, वो बार बार उत्सुक होकर लोगों से परिणाम के बारे में पूछता ही है। लेकिन सवाल उठता है कि उसे सही बात बताये तो कौन बताए। सच वही बोल सकता है जिसमें सच बर्दाश्त करने का सयम हो, संजय इसी सयम का प्रतीक है। वो सारथी है सो सवारी  की फिक्र करना उसका फर्ज भी है।
       अब देखिए, युद्ध तो कुरुक्षेत्र में हो रहा है तो फिर धृतराष्ट्र कुरुक्षेत्र को धर्मक्षेत्र क्यों कहता है?  दरअसल जो इंसान पूरी जिंदगी कुकर्म ही करते रहता है उसे भी अंत समय ये भान तो होता ही है कि उसका फैसला तो धर्म के अनुसार ही होगा। बड़ा से बड़ा चोर अपने मन में ये तो समझता ही है कि उसका अंतिम फैसला धर्म के अनुसार ही होगा और उसे दण्ड ही मिलेगा। 
      दरअसल हर इंसान के अंदर अच्छाई और बुराई दोनो ही होते हैं । जब बुराई जोर मारती है तो वो कौरव हो जाता है, और जब अच्छाई भारी पड़ती है तो पांडव। हर घड़ी हम सब के अंदर हमारी ही अच्छाई हमारी बुराई से लड़ रही होती है और यही महाभारत है। लेकिन जब तक हमारे आँख पर मोह की पट्टी बंधी है तब तक हम खुद इस लड़ाई को देखने समझने में असमर्थ होते हैं। तब समझने के लिए हम सारथी का सहारा लेते हैं अर्थात उस इंसान का सहारा लेते हैं जो हमें सत्य बता सके। आप गौर करें कि गीता में पहली बेचैनी धृतराष्ट्र ने दिखाई है और सत्य जानने के लिए उस इंसान का सहारा लिया है जो हमेशा उसे सही रास्तों पर रथ में घुमाया है। उसे स्वाभाविक रूप से संजय पर भरोसा है जो उसे हमेशा रास्तों के कठिनाई से बचा कर यात्रा कराते रहा है। इसीप्रकार गीता में दूसरी बेचैनी अर्जुन की दिखती है और वो भी सत्य के लिए अपने सारथी यानी श्रीकृष्ण की शरण में ही जाता है। बढ़िया सारथी वही है जो मार्ग में आपसे सच बोले भले वो अप्रियकर ही क्यों न हो और जो अपको गन्तव्य तक पहुँचा सके। हम सभी भी तो यही करते हैं, भ्रम होने पर उन्ही से सलाह लेते हैं जो जीवन में हमें सही मार्ग बताते आये हैं। मुजरिम जेल से बचने के लिए जेलर को नहीं खोजता वो तो वकील को खोजता है।
         सच तो यही है कि जीवन भर उल्टा सीधा काम करने वाला, हमेशा गलत का साथ देने वाला अंधा ही होता है लेकिन फैसले की घड़ी में घबड़ा कर उसके पास दौड़ता है जिसपर उसे भरोसा है कि वो उसे सत्य का रास्ता सुझाएगा। और जीवन में लड़ाई का मैदान हमेशा हमारे अंदर होता है। बाहर वही कुछ हमपर प्रभाव डालता है जो हमारे अंदर होता है। सो कुरुक्षेत्र तो हमारा अपना ही शरीर है जिसमें स्थूल काया के साथ साथ हमारी इन्द्रियाँ हैं, मन है, बुद्धि है, चित्त है, हमारे विकार हैं । जब इनसे पार पाना होता है तो हम अपनी अच्छाई को आगे बढ़ाते हैं। उस समय हमारी ही बुराई हमारी अच्छाई पर हमला कर हमारे महाभारत को जन्म देती है। और इस दौरान हमारे अवगुण हमें विचलित करते रहते हैं, हम बार बार घबरा कर उस इंसान से जिसपर हमें भरोसा हो कि वो सत्य कहेगा उससे अपनी ही लड़ाई का परिणाम पूछते हैं।
      यही तथ्य प्रथम अध्याय के प्रथम श्लोक में प्रकाश में आता है।


धृतराष्ट्र के पूछने पर संजय युद्ध का वर्णन प्रारम्भ करते हैं। युद्ध के वर्णन में संजय को जो बात सबसे पहले दिखती है वो है दुर्योधन की बेचैनी। सभी को पता है कि महाभारत का युद्ध दुर्योधन की जिद्द और धृतराष्ट्र की विवशता का परिणाम है। दोनों ही अपने परिजनों के जायज अधिकारों का हनन करने पर तुले हैं। तब अधिकारों से वंचित हुए परिजन भी प्रतिकार करने को विवश होते हैं, तो परिणाम में महाभारत का युद्ध होता है।
       संजय को युद्ध के मैदान में दुर्योधन ही सबसे पहले क्यों दिखता है, ये सवाल तो हम में से किसी के मन में उठना स्वाभाविक है। दरअसल जीवन में जब भी अच्छाई और बुराई के बीच संघर्ष होता है तो शुरुआत में बुराई खुद को बड़ा दिखाने की कोशिश करती है, वो तरह तरह से लोगों का और लोगों की प्रकृति का ध्यान अपनी ओर खींचने का प्रयास करती है ताकि लोगों की नजर में उसे एक स्वीकार्यता और वैधानिकता मिल सके। सो वो ध्यान खींचने के लिए भोंडा प्रदर्शन करती है। बुराई खुद को स्थापित करने के लिए तरह तरह का प्रदर्शन करती है। आप अपने अगले बगल देखिए। जो जितना गलत होगा वो खुद को सही साबित करने के लिए उतने ही जोर जोर से चीख चीख कर लोगों का ध्यान खींचने की कोशिश करेगा । दुर्योधन यही कर रहा है।
     हर गलत प्रवृत्ति को बेचैनी होती है और उसे अच्छी प्रवृत्तियों से हारने का डर भी होता है सो वो बेचैनी में इधर उधर भटकती है और प्रयास करती है कि उसे सामाजिक स्वीकार्यता मिले। कोई ऐसा मिले जिसके पास उसे अपनी बुराइयों को व्यक्त करने में कठिनाई न हो, संकोच न हो। ये बेचैनी उसके इस अहसास का परिणाम होती है कि वो हार जाएगी अच्छाई से। डरा हुआ मन, डरा हुआ इंसान घबराहट में उसके पास दौड़ता है जँहा जाकर उसे सम्बल मिलने की उम्मीद होती है। बुराई को कभी भी खुद पर आत्मविश्वास नही  होता, सो वो किसी भरोसे के इंसान के पास जाकर भरोसा पाना चाहती है। दुर्योधन भी यही कर रहा है। उसे खुद की ताकत पर भरोसा नहीं है, तभी तो वो अपनी सेना की तरफ न देखकर पांडवों की सेना और उनकी व्यूह रचना की तरफ देखता है। बुराई चाहे जितनी भी बड़ी हो वो तो हमेशा अच्छाई से डरी होती है, उसे हमेशा अच्छाई से हार जाने का डर सताता है। जब कोई अपनी बुराई के बल पर आगे बढ़ना चाहता है तो उसे सबसे अधिक डर अच्छाई से लगता है, वो अपना ध्यान अच्छाई को हराने में लगाये उसी पर देखता है भय से सशंकित होकर। जबकि अच्छी प्रवृत्तियाँ हमेशा एक खास तरह से सुसज्जित होकर रहती हैं, उनमें बेचैनी, भय , निराशा, घबराहट नहीं होते । इसलिए अच्छी प्रवृत्तियाँ घोर बुराई के समक्ष भी एक अनुशासित दल की तरह मजबूती से खड़ी रहती हैं। सद्गुणों को दुर्गुणों से भय नहीं होता और उनकी संरचना ऐसी होती है कि ऐसे सद्गुण एक विशेष श्रृंखला में सजे होते हैं। हर एक सद्गुण सभी दुर्गुणों पर भारी होता है। इसीलिए सद्गुण या अच्छी प्रवृत्तियाँ एक खास व्यूहरचना में दिखती हैं।
       संजय ने दुर्योधन के नाम के आगे राजा शब्द लगाया है जो दुर्योधन के गुणों की स्थिति और उनकी शक्ति को इंगित करता है। दुर्योधन मोह है, धृतराष्ट्र उसी मोह में पड़कर अपने छोटे भाई के पुत्रों को मारने तक के लिए उद्दत है। मोह सारी बुराइयों का जड़ है।  जब इंसान  आँख पर मोह की पट्टी  बाँध लेता है तो उसका सारा ज्ञान और विवेक , निष्पक्ष निर्णय लेने की उसकी  क्षमता खत्म हो जाती है और वो धृतराष्ट्र हो जाता है। मोह अज्ञान और अविवेक  को जन्म देता है और फिर अवगुण बढ़ते जाते हैं। इसीलिए मोह सभी अवगुणों , सभी दुर्गुणों का स्वामी है यानी उनका राजा है। हम में से कोई भी जिस किसी परिस्थिति में मोह में पड़ता है हम गलत रास्ते पर चल पड़ते हैं। मोह से ग्रस्त व्यक्ति मोह वश झूठ बोलता है, लड़ता झगड़ता है, हिंसा तक कर डालता है और अन्याय करने से भी पीछे नहीं हटता। सम्पत्ति का मोह, वासना का मोह, प्रमाद का मोह, सत्ता का मोह आदि सभी मोह के मूल भाव के अलग अलग स्वरूप भर होते हैं। मोह में फंस कर हम गलत से गलत काम करने में पीछे नहीं रहते और मोह से अँधी हुई बुद्धि कुछ भी सही समझने के लिए तैयार नहीं होती। दुर्योधन इसी का प्रतीक भर है, सभी मोहग्रसित व्यक्तियों की स्थिति दुर्योधन सी हुई रहती है।
      अब एक सवाल और उठता है। महाभारत के युद्ध में कौरवों के प्रथम सेनापति भीष्म थे तो दुर्योधन सबसे पहले द्रोण के पास क्यों जाता है। जब आपके मन में कोई सवाल होता है तो हम आप उसके निराकरण के योग्य इंसान को खोजते हैं। शंका समाधान जो करता है वही तो गुरु होता है। गलत करने वाला व्यक्ति चाहता है कि उसे कोई ऐसा मिले जो उसकी गलतियों को तार्किकता का जामा पहना सके। भले गलत व्यक्ति सीधे सीधे ये नहीं कहे कि उसके दुर्गुणों को तार्किक वैधानिकता दी जाए, वो अपने और विपक्षी की ताकत का तुलनात्मक विवरण पेश कर गुरु से या गुरु सरीखे किसी और से अपनी शंका का समाधान चाहते हुए उससे अपने अवगुणों की तार्किक वैधानिकता की उम्मीद तो अवश्य करता है। द्रोण की युद्ध भूमि में  उपस्थिति समझाती है कि इक्षित फल प्राप्त करने के लिए दुर्गुणी को भी एक ऐसे व्यक्ति की तलाश तो रहती ही है जिससे वो अपने पक्ष में  कौशल पूर्वक तार्किक वैधानिकता गढ़वा सके।
     इस प्रकार हम देखते हैं कि गीता के प्रथम अध्याय के दूसरे श्लोक में ही गीताकार ने बड़ी सहजता से एक दुर्गुणी के चरित्र को मात्र दो पंक्तियों में उभार दिया है।

दुर्योधन पाण्डव पक्ष के सेनापति सहित अन्य प्रमुख नामों को गुरु द्रोण को  बताता है। ये प्रमुख महारथी हैं-धृष्टद्युम,महेष्वासा, सात्यकि, धृष्टकेतु, चेकितान, काशीराज, पुरुजित, कुन्तिभोज,युधामन्यु, उत्तमौजा, अभिमन्यु, द्रौपदी के पाँचो पुत्र। 
    दुर्योधन जब कहता है कि पांडवों की व्यूहकार भारी सेना जिसमे अर्जुन और भीम सरीखे महारथी हैं, उन्हें देखिए, तो साफ साफ परिलक्षित होता है कि भले उसकी अपनी सेना बहुत विशाल है लेकिन उसके मन में पांडव सेना का और अर्जुन और भीम सरीखे योद्धाओं का डर बैठा हुआ है। ये तब है जब उसकी सेना पांडव सेना से लगभग डेढ़ गुनी बड़ी है।
     सच तो ये है कि जब आपमें बुराई भरी हुई रहती है तो उस बुराई से आप ताकतवर नहीं बनते। बुराई की संख्या चाहे जितनी बड़ी हो वो अच्छाई के सामने छोटी ही होती है और चाहे उस बुराई को जिस संज्ञा या विशेषण से सजा दें उसके अंदर अच्छाई से एक डर बैठा ही रहता है सो वो अपने दूसरे सहयोगियों से वाचाल होकर अपने भय को दबाना चाहता है।
    यँहा ये समझने की बात ये है कि हम चाहे जिस स्थिति में हों अपने अंदर बुराइयों को, उन दुर्गुणों को आने से रोकना चाहिए जिससे हमारे अंदर बुरी प्रवृत्तियों घर कर सकती हो। हमको अच्छी प्रवृतियों पर ध्यान लगाकर उनको अपनाना चाहिए अन्यथा हम सारा जीवन एक अदृश्य डर के साये में बिताएंगे और बार बार अपने मन के भय का प्रदर्शन भी करते रहेंगे। और हम ये बक बक उनके सामने भी करते रहेंगे जिन्हें हमारी अच्छाई और बुराई दोनों के बारे में पता है। 
लेकिन मोह की एक खासियत भी होती है। मोह से बुराई बढ़ती है तो मोह ही जिज्ञासा भी उत्पन्न करता है।यही जिज्ञासा हमें बुराई की तरफ भी ले जाती है और अच्छाई की तरफ भी। और हम एक ऐसे व्यक्ति की खोज करते हैं जो हमारी जिज्ञासा को शांत कर सके। अब हमारा दायित्व है कि हम अपने मोह का इस्तेमाल ऐसे व्यक्ति को खोजने के लिए करें जो हमारे अंदर की अच्छी प्रवृत्तियों को उभार सके। अगर ऐसा गुरु मिल भी जाये तो हमें चाहिए कि उस गुरु से हम उस ज्ञान को लें जिससे हमें अपनी अच्छाई को बढाने की क्षमता मिले। अन्यथा मोहवश हम हमेशा भय के साये में जीने के लिए अभिशप्त रहेंगे।





पाण्डव सेना के महत्वपूर्ण योद्धाओं के नाम गिनाने के पश्चात दुर्योधन अब अपनी सेना की तरफ मुखातिब होता है और गुरु द्रोण को सम्बोधित करते हुए उन्हें #ब्राह्मणों में उत्तम ब्राह्मण से सम्बोधित करते हुए अपनी सेना के प्रमुख नामों को गिनाने चलता है। 
    ध्यान देने वाली बात है कि द्रोण पांडवों के साथ साथ करवों के भी गुरु हैं। फिर उन्हें गुरु से सम्बोधित न कर ब्राह्मण से  दिर्योधन द्वारा सम्बोधित करना कई बातों को स्पष्ट करता है।  महाभारत का युद्ध एक आंतरिक युद्ध है जिसमें अच्छी(दैवी) और बुरी(आसुरी) सम्पदों के बीच युद्ध होता है। जिनमें बुराई ज्यादा है यथा अहंकार भी ज्यादा है, धूर्तता, ईर्षा इत्यादि अवगुण अधिक हैं उनका सामाजिक व्यवहार ऐसा ही घमण्डी और धूर्तता भरा होता है, उनमें शील नाम की कोई चीज नहीं होती।  ऐसे लोग अन्य लोगों का सम्मान करना नहीं जानते और बात बात पर कटाक्ष करते रहते हैं। यही हाल दुर्योधन का है। उसकी बुराइयाँ उसे प्रेरित करती हैं   कि  पांडवों की अच्छाई से वो डरे और डर कर असभ्य व्यवहार करें। पांडव द्रोण के शिष्य हैं। एक तरफ जँहा द्रोण दुर्योधन को उज़के अवगुणों के कारण एकदम पसन्द नहीं करते वंही पांडव उनके प्रिय हैं। सो दुर्योधन को द्रोण की कौरवों के प्रति निष्ठा पर संदेह है । इसलिए वो उनको उनके धर्म की याद दिलाने के लिए ब्राह्मण यानी विवेकी के रूप में उनको अहसास दिलाने के लिए व्यंग में बोलता है। जिस आदमी का अपना कोई धर्म नहीं होता, जो सदा दूसरों के अहित में लगा रहता है उसे अपने हित की रक्षा की बहुत चिंता होती है।
     दूसरी बात की बुराई चाहे लाख बड़ी हो संख्या बल में अच्छाई से हमेशा डरी हुई होती है। दुर्योधन अंदर ही अंदर पांडवों के सदगुणों से पराजित होने के भय में जीता है, सो अपने को सांत्वना देने के लिए वो घबरा कर वाचाल व्यवहार करता है। हर दुर्गुणी जब भी अच्छाई का सामना करता है तो इसी तरह नर्वस व्यवहार करता है। कौन कितना ताकतवर है ये द्रोण से नहीं छुपा। भला गुरु से शिष्य की अच्छाई या बुराई भी छुपती है कँही। लेकिन बुरा इंसान भयभीत होकर अपने बल प्रदर्शन का वाचाल प्रयास करता ही है, जो दुर्योधन कर रहा है और जो बात द्रोण को पता है, वही बात दुर्योधन द्रोण से कहने के लिए बेचैन है। दरअसल बुरा आदमी अपनी ताकत दिखाने के लिए अपनी बुराई का बार बार जोरदार घोषणा करते रहता है। जैसे, मेरे पास ये बन्दूक है, मुझे फलाना से सम्पर्क है, फलाना मेरे चाचा फूफा हैं वैगरह हैं । दुर्योधन यही कर रहा है। पांडव सेना कौरव सेना से संख्या बल में कम है लेकिन उनका नैतिक बल मजबूत है क्योंकि वे जायज हक़ के लिए लड़ने आये हैं। दूसरी तरफ दुर्योधन दूसरे की संपत्ति हड़पने की नीयत से दल बल बाँध कर आया है लड़ने के लिए। उसका उद्देश्य गलत है सो उसका नैतिक बल पतनशील है। इसलिए वो डरा हुआ है। और इसी भय में वो अपने पक्ष के उन लोगों का नाम गिनाने के लिए बेचैन है जिनके बल।पर उसे उम्मीद है कि वो अपने गलत मनसूबे में सफल होगा।
       साथ ही ये भी याद रखने की बात है कि हम जब व्यथित, भयभीत, मोहवश, होकर घबरा उठते हैं तो हम उसे खोजते हैं जिससे हमें उम्मीद होती है। द्रोण उसके गुरु रहें हैं, घर से बाहर वाले हैं सो वो उनके पास दौड़ता है। बुराई जानती है कि कोई भी भला आदमी उसे तवज्जो नही। देगा, तो बुराई उस इंसान का ध्यान खींचने की कोशिश करता है।
     विगत चार श्लोकों और इस श्लोक से भी यही स्पष्ट होता है कि दुर्योधन पांडवों की अच्छाई से डरा एक दम्भी और उद्दण्ड व्यक्ति है जो आसुरी सम्पदा का राजा है क्योंकि वह महाभारत की कथा में मोह का ऐसा प्रतीक है जिस मोह में पड़कर उसका अँधा पिता यानी मोहपाश में जकड़ा अज्ञानी पिता महाभारत का युद्ध होने के परिस्थिति पैदा होने देता है।
    ये श्लोक हमें  ये बताते है  कि एक दुर्गुणी का चरित्र कैसा होता है और वह अहंकार और लोभ में किस तरह का व्यवहार करता है।




अपनी सेना की प्रशंसा करते हुए दुर्योधन कौरव पक्ष के महत्वपूर्ण योद्धाओं के नाम द्रोणाचार्य को बताता है। क्यों बताता है?  क्योंकि मोह का प्रतिरूप दुर्योधन सत्य के प्रतिनिधियों से भयभीत है। सो वो अपने पक्ष के वीरों का नाम गिना कर खुद को भरोसा दिलाता है कि उसके बुराई का पक्ष पांडवों के भलाई और धर्म के पक्ष से अधिक ताकतवर है। हर बुरा आदमी यही करता है। और दुर्योधन भी घबराहट में यही कर रहा है।
      दुर्योधन भीष्म से पहले द्रोण का नाम लेता है। जब एक अधर्मी, बुरा इंसान किसी ऐसे इंसान जिसे अच्छे बुरे का ज्ञान हो उसके सामने शेखी बघारता हो और वो आदमी बिना अभिरुचि लिए चुप हो तो वो वाचाल आदमी सकपका जाता है।  और ऐसी स्थिति में चापलूसी पर उतर आता है। इसी वजह से दुर्योधन भी द्रोण को खुश करने की नीयत से पहले उनका नाम लेता है।
   हमें नहीं भूलना चाहिए कि महाभारत की लड़ाई आंतरिक युद्ध पहले है, फिर बाहरी। आपकी अच्छी(दैवी) और बुरी (आसुरी) प्रवृत्तियों के बीच निरन्तर संघर्ष होता है और ये तब तक होता है जब तक बुराई हार नहीं जाती। इस युद्ध में बुराई/अधर्म/आसुरी शक्तियाँ अन्य आसुरी शक्तियों को याद करती हैं, उनको अपने लिए लामबंद करती हैं। द्रोण द्वैत के, भीष्म भ्रम के,  कर्ण विजातीय कर्म के, कृपाचार्य  कृपा के, अश्वथामा आसक्ति के, विकर्ण विकल्प के , भूरिश्रवा भ्रममयी श्वास के प्रतीक हैं। आंतरिक युद्ध में जब आपको लगता है कि आप ईश्वर से अलग हैं तो आप गुरु के शरण में जाते हैं। लेकिन जब तक भ्रम जीवित रहता है ब्रह्म की प्राप्ति असम्भव होती है। इसको ऐसे समझा जा सकता है कि भ्रम वो मूल है जिससे आसुरी गुण अर्थात दुर्गुण पोषित होते हैं, मोह, आसक्ति , विजातीय कर्म लगे रहते हैं और गलत पर गलत करते जाते हैं। लेकिन मोहवश इंसान को कुछ सूझता नहीं। वो गलती पर गलती किये जाता है। भीष्म के भ्रम में दुर्योधन मोह से आसक्ति से बंध कर विकल्प की उपथिति में भी गलत काम करने के लिए ही प्रवृत्त होता है। एक बात और ध्यान देने की है कि जब आप ईश्वर प्राप्ति के मार्ग में चलते हैं अर्थात अपने दैवी गुणों/सद्गुणों को विकसित करते हैं तो मार्ग में आपको अपनी शक्ति बढ़ने के अहसास भी होते हैं। और आप लगते हैं सोंचने की आप तो किसी का उद्धार कर सकते हैं, आपकी कृपा से चमत्कार हो सकते हैं। आपकी ये लालच रास्ते में ही आपका पतन करा देती है।
      इस श्लोक में गीताकार ने दुर्योधन के माध्यम से हम सब को  आगाह किया है कि दुर्गुणों/अधर्म/आसुरी सम्पद के बढ़ने से हमारा मनोविज्ञान कैसे विकृत हो जाता है जो हमारे अहंकार से भरे भय के माध्यम से दिखाई देता है। अधर्मी शारीरिक बल और संसाधनों की प्रचुरता के बावजूद नैतिक बल की कमी के कारण अच्छाई से डरा हुआ होता है और डर आत्मरक्षा में भ्रम, आसक्ति,इत्यादि का आह्वान कर अपनी रक्षा करना चाहता है।



  दुर्योधन पुनः द्रोण को बताता है कि इन योद्धाओं के अतिरिक्त अन्य अनेक शूरवीर जो विभिन्न अस्त्र शस्त्र में निपुण हैं वो दुर्योधन के लिए प्राण देने के लिए यँहा उसके पक्ष से लड़ने आये हैं।
         पुनः याद दिलाते हुए कहना है कि महाभारत का युद्ध पहले एक आंतरिक युद्ध है। इसमें प्रत्येक इंसान के अपने आसुरी और दैवी गुणों यानी उसकी बुराई और अच्छाई के बीच युद्ध होता है। मोह एक प्राथमिक अवगुण है जिसकी पूर्ति के लिए अन्य बुराइयाँ तरह तरह की शक्ति लेकर उपस्थित रहती हैं। ये बुराइयाँ मोह जनित ईक्षा की पूर्ति के लिए हर बुरा कर्म करने के लिए तैयार रहती हैं, विभिन्न तरह से इंसान की बुद्धि को नष्ट करने की क्षमता रखती हैं और विभिन्न प्रकार से उस मनुष्य की अच्छाई को खत्म करना चाहती हैं। किसी व्यक्ति या वस्तु के प्रति जब मन में मोह उतपन्न होता है तो उस मोह की पूर्ति हेतु हम हर गलत काम करने के लिए तैयार हो उठते हैं जो हमें भ्रष्ट करते जाता है। इसीलिए अधर्म के साथी ढेरों होते हैं। यही  मोह मन में लालच पैदा करता है, उसको पाने के लिए हमको हिंसक बनाता है, झूठ बोलने के लिए उकसाता है, पूर्ति नहीं होने की स्थिति में गुस्सा भी दिलाता है, कहने का मतलब कि ये सब मोह के संगी साथी होते हैं।
      दुर्योधन खुद मानता है कि ये योद्धा उसके लिए मरने के लिए आये हैं। बात साफ है कि जो मोह की पूर्ति के लिए सहायक होता है उसमें वो नैतिक साहस नहीं होता कि वो अच्छाई पर जीत सकने की सोचे भी। वे तो मोह की पूर्ति हेतु मोहपूर्ती की कोशिश करते मारे जाते हैं। किसके हाथों मारे जाते हैं। ये बुराइयाँ मोह को जीता नहीं पाती हैं बल्कि मनुष्य की अच्छाई से हार जाती हैं, वो होती ही हैं अच्छाई के द्वारा खत्म किये जाने के लिए। जो गुण मोह के लिए होता है, जो मोह की शक्ति बढ़ाता है वो अच्छाई से हारता ही है।



दोनो सेनाओं के प्रमुख वीरों का नाम गिनाने के बाद दुर्योधन गुरु द्रोण से कहता है कि भीष्म द्वारा रक्षित  कौरव सेना भीम द्वारा रक्षित पांडव सेना को जीतने में सक्षम है, सो आप सभी लोग अपनी निर्धारित  जगह पर रहकर भीष्म की ही रक्षा करें।
          भीष्म भ्रम के और भीम भाव यानी श्रद्धा के प्रतीक हैं।कौरव दुर्गुणों के प्रतीक हैं। विभिन्न आसुरी समदाओं यानी दुर्गुणों की रक्षा कौन करता है? इन दुर्गुणों यानी माया,  मोह, कामना, क्रोध , अहंकार, हिंसा, असत्य जैसे दुर्गुणों को इंसान का भ्रम ही बचाता है। सो सारे दुर्गुण मिलकर भ्रम की रक्षा करते हैं और भ्रम इन दुर्गुणों को जीवित रखने में सहायक होता है। भ्रम से ईक्षा का जन्म होता है। एक ईक्षा पूरी नहीं हुई कि दूसरी आ धमकती है। इंसान लागातार ईक्षा पर ईक्षा की पूर्ति में लगा रहता है। दरअसल इक्षाएँ यानी कामनाएँ अनंत होती हैं। इसी कारण भीष्म को इक्षामृत्यु  का वरदान है। इन ईक्षों से मोह होता है। जब इंसान को मोह होता है, इक्षाएँ होती हैं तो उनकी पूर्ति की कोशिश भी करता है। पूर्ति होने की स्थिति में नई ईक्षा जन्म लेती हैं। नहीं पूरी होने पर क्रोध उत्पन्न होता है। क्रोध से झूठ और हिंसा की भावना जन्म लेती है। दुर्योधन इसी का प्रतीक है।  इसीलिए सारी बुराइयाँ मिलकर भ्रम को बचाना चाहती  हैं।
    दूसरी ओर जिनमें श्रद्धा होती है वो सदगुणों  की रक्षा करते हैं। वो सत्य, अहिंसा, प्रेम, सद्भाव की बात करते हैं। लेकिन भ्रम में लिप्त दुर्गुण इस अहंकार में होते हैं कि वे सदगुणों को हरा देंगे। हम देखते हैं कि जो दुर्गुणी आपराधिक किस्म के आदमी होते हैं वे हमेशा इसी प्रयास में लगे रहते है कि कैसे किसी को क्षति पहुँचाकर अपना उल्लू सीधा किया जाए। जरूरी नहीं कि ऐसे हर आपराधिक काम कानून की नजर में अपराध ही। हों लेकिन हर बार ये अपराध इंसान की नैतिकता के खिलाफ जरूर होते हैं। ऐसे लोग घर परिवार समाज राजनीति व्यवसाय सब जगह होते हैं। जरा ध्यान से देखिएगा तो पाइयेगा कि हम सभी के अंदर ये प्रवृत्ति होती है। लेकिन जिनमें सदगुणों पर श्रद्धा होती है यानी जो भीम हैं और जिनमें सदगुणों के प्रति अनुराग होता है यानी जो अर्जुन होते हैं वे तो हमेशा सत्य, अहिंसा, प्रेम, के आयुयायी होते हैं। अवगुण ताकत के बल पर इनको हराना चाहते हैं लेकिन अंततः हरा नही पाते क्योंकि एक  इंसान की अच्छाई हमेशा उसकी बुराई से मजबूत साबित होती है। जो सच्चाई को अपना नही।पाते वे अंततः समाप्त हो जाते हैं। ध्यान से देखिएगा तो पाइयेगा की हर काल देश के हर उस इंसान का चरित्र जो दुर्गुणों को बढ़ाता है एक सा ही होता है भले वो किसी भी प्रचलित धार्मिक मान्यता वाला हो। उसी तरह हर सद्गुणी इंसान भी एक ही तरह के गुण रखते हैं। सद्गुण और दुर्गुणों। का कोई पंथ नही होता।




अब तक देख चुके हैं कि जब अच्छाई और बुराई का सीधा आमना सामना होता है तो बुराई का मुख्य किरदार मोह रूपी दुर्योधन किस प्रकार विचलित हुआ रहता है और ऐसा इंसान खुद के बल की प्रसंसा कर खुद को दिलासा देने की कोशिश करते रहता है कि उज़के पास तो तरह तरह के मित्र हैं जैसे भ्रम,असत्य, अहंकार, हिंसा, क्रोध, इत्यादी तो उसे कौन हरा सकता है। लेकिन जब जब उसकी घबराहट सामने आती है तो उसकी रक्षा में सर्वप्रथम, उसी के  भ्रम और कामनाएँ  सामने आती हैं। आदमी के आसुरी सम्पदाओं यानी बुराई के मुख्य पोषक भ्रम और कामनाएँ ही होती हैं। भ्रम इंसान को दिलासा देता है कि तुम्हारे अवगुण ही तुम्हारी ताकत हैं, सो तुम घबराओ मत। इस मानसिकता में इंसान अपनी ही इक्षाओं का गुलाम बनकर अपने अहंकार, क्रोध, असत्य, हिंसा के बल पर प्रेम, सद्भाव, सत्य, विवेक जैसे अपने ही सदगुणों को मारता है। भ्रम में और कामनाओं में उलझे आदमी को सदगुणों से युक्त व्यक्ति ही अपना सबसे बड़ा दुश्मन प्रतीत होता है। यही हाल महाभारत के युद्ध के इस घड़ी हो रहा है। विचलित दुर्योधन को दिलासा देने भीष्म आगे आते हैं, गुरु द्रोण नहीं।  भीष्म शेर जैसी गर्जना कर अपना शंख बजाते हैं ताकि दुर्योधन सहित अन्य कौरव योद्धा उत्साहित हों, उनमें हिम्मत आये और युद्ध के लिए वे मानसिक रूप से मजबूत बन सकें।
     गीताकार के द्वारा जिन शब्दों का चयन किया गया है उनपर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। भीष्म ने शेर जैसी गर्जना की। ध्याम देने योग्य बात है कि शेर की दहाड़ भय पैदा करती है। आसुरी वृत्तियाँ इंसानों के मन में डर ही जगाती हैं और डराकर ही लोगों से काम निकालना आता है उनको। उनसे प्रेम और निडरता नहीं हो पाती।  लेकिन बुराइयों को ऐसा ही बर्ताव करना पसंद है, सो भ्रम मोहवश ऐसा ही करता है। वह अपनी तरह अन्य लोगो को भी ऐसा ही करने के लिए उकसाता है और अन्य बुराइयाँ भी डर पैदा करने वाला कोलाहल ही करती हैं, उनके सुर में कोई लयबद्धता नहीं होती है।
     दूसरी तरफ ये भी ध्यान देने योग्य है कि अच्छाई बुराई पर कभी पहले हमला नहीं करती। युद्ध के लिए दोनों पक्ष की सेनाएँ आमने सामने थीं, लेकिन युद्ध का उद्घोष अहंकार रूपी कौरवों के पक्ष से उनके  भ्रम यानी भीष्म के द्वारा होता है। भीष्म पितामह हैं, भ्रम बुराइयों का पितामह है।



गीता में शब्दों का चयन परिस्थिति के हिसाब से किया गया है। शब्दों का प्रयोग कई विशेषताओं को व्यक्त करने के लिए किया गया है। प्रतेक विषय की अपनी एक खास तरह की शब्दावली होती है । यही बात गीता में भी है। गीताकार ने विशेष परिस्थिति को समझाने के लिए शब्द विशेष का उपयोग किया है और ये सबसे अधिक श्रीकृष्ण और अर्जुन के नामों के सम्बंध में दिखता है। अलग अलग समय पर इन महापुरुषों के अलग अलग गुणों को समझाने के लिए गीताकार ने इनके अलग अलग नाम बताए हैं जो समय विशेष के अनुसार एकदम सटीक बैठते हैं।
      जब अधर्म क्रियाशील हो ही जाता है, जब वो आपकी अच्छाइयों को मिटाना चाहता  है तब एक ही रास्ता बचता है और वो है अधर्म को समूल नष्ट करना। यही से युद्ध के प्रारम्भ का उद्घोष होता है। 
        भीष्म के सिंहनाद और शंख बजाने से कौरव पक्ष में उत्साह का संचार होता है, अधर्मी, अविवेकी, हिंसक, असत्य की रक्षा करने , माया मोह और अतृप्त रहने वाली इक्षाओं को संवारने वाली शक्तियाँ इकट्ठी होने लगती हैं। ऐसी स्थिति में जरूरी है कि इन आसुरी प्रवृत्तियों(दुर्गुणों) का नाश करने के लिए दैवी प्रवृत्तियाँ आगे आएं और इनका नाश करें।
     अब ध्यान दें।  आसुरी प्रवृत्तियाँ यानी दुर्गुणों को कौन नेतृत्व दे रहा है? भीष्म--यानी भ्रम, जिसे इक्षामृत्यु का वरदान है अर्थात अनंत इक्षाएँ जो भ्रम वश आपको आपके दुर्गुणों से बाँधती है वहीं आपके दुगुणों की नेता होती हैं। अब देखिए जब सद्गुण यानी दैवी गुण यानी सत्य, अहिंसा, विवेक, इत्यादि को पांडवों के पक्ष में कौन नियंत्रित कर रहा है? पहला शंख श्रीकृष्ण बजाते हैं। महाभारत के युद्ध में कृष्ण सारथी की भूमिका में हैं। सारथी आपके रथ को आपके गंतव्य तक ले जाने वाला होता है। वो आपके रथ, आपके घोड़ों, घोड़ों के लगाम को नियंत्रित कर आपको सही पथ पर से ले जाकर  आपके गन्तव्य तक पहुंचाता है। 
   ये एक ऐसा अंतर है जिसको समझना बहुत ही जरूरी है। तभी आप अपनी वृत्तियों को अपने विवेक के नियंत्रण में रख सकते हैं। 
        शरीर रथ है, इन्द्रियाँ इस शरीर को चलाने वाले घोड़े हैं
लगाम मन है और मन को नियंत्रित करने वाला सारथी आपका विवेक है, इन्द्रियों के अंग आपके रास्ते हैं और आत्मा रथी है।
विवेक से नियंत्रित मन इन्द्रियों को बहकने नहीं देता बल्कि उनको उनके प्रमाद के विषय से हटाकर सद्पथ पर ले जाता है। मन की भावनाएँ भ्रम से नियंत्रित हो ही नहीं सकती। भ्रम से तो क्रोध, वासना, ईक्षा , हिंसा आदि ही होंगे। विवेक हमारी प्रवृत्तियाँ को अच्छाई के रास्ते ले जाता है। कृष्ण इन्ही प्रवृत्तियों को सही रास्ते को दिखाने के लिए आगे बढ़कर नेतृत्व देते हैं।
      जब आपके अंदर दैवी गुण जग जाते हैं तब वे संगठित हो कर आपके अंदर की बुराइयों का प्रतिकार करने के लिए पूरे उत्साह से एकत्रित हो जाते हैं। यही कारण है कि श्रीकृष्ण के शंखनाद करते ही अर्जुन, भीम, युधिष्ठिर, नकुल, सहदेव, सात्यकि, द्रुपद, शिखण्डी, धृष्टधूम्न, द्रौपदीपुत्र और सुभद्रापुत्र सभी शंखनाद करते हैं। विवेक के नेतृत्व में, विवेक के आह्वान पर हमारे अंदर की अच्छाई जाग उठती है, उनमें उत्साह भर जाता है और वे बुराइयों के खात्मे के लिए तैयार हो जाती हैं।
हमने पहले ही देखा है कि गीताकार ने शब्दों का चयन परिस्थितिविशेष को ध्यान में रखकर किया है। श्रीकृष्ण को माधव यानी लक्ष्मीपति और हृषिकेश यानी इन्द्रियों के स्वामी के नाम से सम्बोधित किया गया है। पहला नाम उनकी समृद्धि को दर्शाता है तो दूसरा उनके विवेकशीलता को। जो समृद्ध तो है लेकिन वो समृद्ध इसीलिए है क्योंकि उसे सपनी इन्द्रियों यानी अपनी प्रवृत्तियों पर पूरा नियंत्रण है। ऐसा ही व्यक्ति अच्छाई का नेता हो सकता है। अर्जुन को धनञ्जय नाम से सम्बोधित किया गया है। अर्जुन के पास भौतिक धन के अतिरिक्त दैवी, और आत्मिक धन भी है, वो विज्ञ है सो धनंजय यानी धन का स्वामी है। भीम जिनके कर्म भयानक हैं अर्थात जो बहुत बलशाली हैं वो वृकोदर हैं अर्थात  ऐसा व्यक्ति जिसकी पाचनशक्ति बहुत अच्छी हो। ये गम5 भीम की शक्ति को निरूपित करते हैं। युधिष्ठिर के लिए राजा और कुंतीपुत्र शब्द आये हैं। युधिष्ठिर इन्द्रपस्थ के तो राजा हैं ही साथ ही साथ सभी अच्छाइयों के स्वामी भी हैं।सो वो राजा हैं। वैसे तो सभी पांडव कुन्तीपुर हैं लेकिन युधिष्ठिर को माँ से विशेष लगाव है। वे कभी भी उनकी बात नहीं काटते, कोई तर्क नही करते माँ से, सो उनके लिए यँहा विशेष रूप से कुंतीपुत्र शब्द आया है। दौपदी के पाँच पुत्रों के लिए पृथ्वीपति यानी पृथ्वी पर राज करने वाले और सुभद्रापुत्र अभिमन्यु को महाबाहु यानी महाशक्तिशाली से सम्बोधित किया गया है। इस प्रकार हम देखते हैं कि देवी सम्पद यानी सद्गुण कितने ताकतवर हैं।
     हम ये भी देखते हैं कि संजय ने अर्जुन के रथ की भव्यता, और महत्वपूर्ण वीरों के शंखों के नाम भी बताए हैं। 
संजय ने  विभिन्न विरो के शंखों के नाम भी कहे हैं जो निम्न प्रकार से हैं
     कृष्ण-पाञ्चजन्य
     अर्जुन-देवदत्त
     भीम-पौंड्र
     युधिष्ठिर--अनंतविजय
     नकुल---सुघोष
     सहदेव---मनीपुष्प
जब दैवी गुण संगठित होकर बुराइयों  का सामना करने के लिए एकजुट हो जाते है तो बुराइयों के अंदर भय का संचार हो जाता है। यही कारण है कि पांडव पक्ष का शंखनाद  जिससे धरती और आसमना भी गुंजायमान हो उठे कौरव पक्ष में डर भर गया।
इस विवरण के पीछे संजय की दो मंशा साफ है। एक तो हम सभी के अंदर अच्छी चीजों की प्रसंसा करने की ललक होती है। हम ऐसी चीजों को जो अच्छी होती हैं उनके बारे में खूब अच्छी अच्छी बातें करते हैं। संजय भी पांडवों से उनके गुणों के कारण प्रभावित है। सो उनके बारे में विस्तार से बताते हैं। दूसरे की सम्भवतः संजय के मन में अभी भी ये आशा बची है कि शायद पांडवों का वैभव जानकर धृतराष्ट्र शायद अब भी युद्ध रोक दें।
       इस विवरण से स्पष्ट है कि जब जब अधर्म, अत्याचार, अनाचार बढ़े और समझाने से भी अधर्मी न समझे और विनाश के लिए तत्पर रहे तब  हमें अपनी अच्छाई पर भरोसा कर पूरे उत्साह से और अपने विवेक के नियंत्रण में रहकर उसका नाश करने के लिए आगे आना चाहिए।


शंखनाद के पश्चात वास्तविक युद्ध के पूर्व अर्जुन युद्ध हेतु अपना आकलन करने हेतु दोनों पक्षों की सेनाओं का स्वयम निरीक्षण कर लेना चाहता है। दरअसल कोई भी समझदार व्यक्ति जब किसी समस्या का हल करना चाहेगा, अथवा जब भी किसी परिस्थिति से मुकाबला करना चाहेगा तो सबसे पहले क्या करेगा? सबसे पहले वह समस्या के हर पहलू को परखेगा, हर पहलू के ताकत और कमजोरी का आकलन कर लेना चाहेगा। उसी के बाद अपनी रणनीति तय करेगा। बिना समस्या को समझे सीधे जाकर सिर भिड़ा देना निरी मूर्खता के अतिरिक्त कुछ और नहीं होता। बड़ी से बड़ी समस्या, बड़े से बड़े ताकतवर का कोई कमजोर पक्ष भी होता है, जिससे निपट कर इंसान उस बड़ी से बड़ी समस्या या बड़े से बड़े ताकतवर आदमी को हरा सकता है, हरा भी देता है। अर्जुन युद्ध के लिए तटपर है, लेकिन वो इस पक्ष का जिससे उसे लड़ना है उसकी समग्र ताकत को तौल लेना चाहता है ताकि उसे युद्ध करने में सुविधा हो। अपने विरोधी के संगी साथियों की भी पहचान कर लेना जरूरी होता है ताकि ये पता रहे कि आपके वैरी कौन और किस तरह के लोग हैं। इसी प्रकार जब आप कोई बड़ी समस्या सुलझाने चलते हैं तो आपको मालूम होना चाहिए कि किस किस तरह की अन्य समस्याएँ आपके रास्ते आ सकती हैं। सो अर्जुन विरोधी के हर पक्ष को जान समझ लेने के लिए उत्सुक है। सच तो ये है कि यदि आप सही में प्रयास करना चाहते हैं तो आपकी रणनीति में ये बातें शामिल होनी ही चाहिए। और ये बात जीवन के हर पहलू पर लागू होती हैं।
           और ये भी सच है कि जब आपकी ही बुराई, आपके ही दुर्गुण, आपको घेरने लगे तो सावधानी पूर्वक आपको पहचान करनी होती है कि वो कौन से दुर्गुण हैं जो आपको घेर रहें हैं। तभी आप उनसे छुटकारा पाने का , उनसे पार पाने का रास्ता भी निकालेंगे। दवा करने के पहले मरीज के हर मर्ज की जाँच करना जरूरी है। ध्यान रखना चाहिए कि दुर्गुण हमेशा झुण्ड में आपको घेरते हैं , वो अकेले अकेले कभी नहीं आते।
       अब देखिए , यँहा अर्जुन के लिए कपिध्वज शब्द का इस्तेमाल किया गया है। युद्ध की कथा के अनुसार हनुमान जी अर्जुन के रथ पर रहते हैं। हनुमान सम्पूर्ण कथा संसार में सबसे बुद्धिमान और शक्तिशाली किरदार माने गए हैं। साथ ही सबसे शीलवान भी। मतलब साफ है कि जब आप बड़ी समस्याओं से निपटने चलते हैं तो आपका शरीर स्वास्थ्य रहे, आपकी बुद्धि उत्कृष्ट स्तर की हो और चरित्र साफ सुथरा हो। इन तीन महत्वपूर्ण कारकों के अभाव में  आपके प्रयास विफल हो जाएंगे। ये तीनों आपको अपराजेय शक्ति देते हैं।  
     इसीप्रकार हम देखते हैं कि कृष्ण के लिए अच्युत सम्बोधन का प्रयोग  हुआ है और ये प्रयोग अर्जुन के द्वारा किया गया है। रथी अपने सारथी को अच्युत कह रहा है अर्थात जिसका पतन नहीं हो सकता हो। श्रीकृष्ण अर्जुन के फ्रेंड, फिलॉस्फर और गाइड की भूमिका में हैं और अर्जुन को उनपर इतना भरोसा है कि वो मानता है कि श्रीकृष्ण का पतन नहीं हो सकता अर्थात श्रीकृष्ण उसे कभी गलत सलाह नही। दे सकते। जीवन में। हम सभी को ऐसे ही मित्र होने चाहिए जो हर परिस्थिति में हमें सही सलाह दे सकें और जिनपर हमें भरोसा भी हो और जिनके प्रति हमारे मन में सम्मान भी हो।  कठिन  समय में इस तरह के मित्र की जरूरत ज्यादा होती है। बुरे व्यक्ति के मित्र भी बुरे ही होते हैं जबकि अच्छे व्यक्ति के मित्र अच्छे होते हैं।



श्रीकृष्ण अर्जुन के कहे अनुसार रथ को दोनों सेनाओं के मध्य ले आकर खड़ा करते हैं। अर्जुन को गीताकार ने गुडाकेश नाम से सम्बोधित किया है। गुडाकेश का अर्थ है जिसने निंद्रा पर विजय प्राप्त कर लिया हो। यह वर्णन युद्ध क्षेत्र का है सो युद्ध के अनुरूप अर्जुन के जो गुण हैं उनका वर्णन गीताकार के द्वारा यथा स्थान किया गया है। निंद्रा को कठोर परिश्रम से ही जीता जा सकता है। निंद्रा अंधकार का प्रतीक है, मन मस्तिष्क के सुप्तास्था का परिचायक है । निंद्रा के समय हमें बोध नहीं होता, हम सचेत नहीं होते। लेकिन युद्ध क्षेत्र में निरन्तर सजग और सावधान रहने की जरूरत होती है। यह तभी सम्भव है जब हम निंद्रा पर जीत हासिल कर पाएं हों। कभी भी , कँही भी जब हम बड़ी चुनौती से आपने सामने होते हैं तब हमारी सजगता अति उच्च स्तर की होनी ही चाहिए। थोड़ी भी शिथिलता मंहगी पड़ सकती है, समस्या किसी भी कोने से अचानक आकर हमें घेर ले सकती है, सो हम निशिन्त होकर आरामतलबी होने का जोखिम नहीं ले सकते। सो इन तरह की स्थितियों में हमें गुडाकेश ही होना होगा। बड़ी चुनौती से हम तभी निपट सकते हैं जब हमारा परिश्रम, हमारी सजगता अति उच्च स्तर की हो।
          निंद्रा यानी चेतना का अभाव तब भी होता है जब हमारी बुराइयाँ हमारी अच्छाइयों को ढँक लेती हैं और हम अपने दुर्गुणों के व्यसन में डूब अच्छे बुरे के भान से अनजान बन जाते हैं। इसके उलट यदि हम अपनी अच्छाइयों के बल पर हैं तो फिर हमारे सद्गुण हमें हमेशा सजग रखते हैं कि हम कँही भी , कभी भी अपनी अच्छाई से गिर कर दुर्गुणों के अंधकार में न चलें जाएँ। यहॉ सजगता हमें हमारे महान उद्देश्य में सफल बनाती है। 
     अर्जुन वीर होने के साथ साथ विवेकी और सच्चरित्र भी है, उसे अपने दुर्गुणों को काट कर अपने सदगुणों को बढाने आता है। इस दृष्टि से भी अर्जुन गुडाकेश है। हमें भी इस प्रकार निंद्रा विजयी यानी दुर्गुणों का विजेता होना चाहिए। 
     अब देखिए श्रीकृष्ण अर्जुन के रथ को कँहा ले आकर खड़ा करते हैं। दोनों पक्षों के बीच ठीक भीष्म और द्रोण के समक्ष।  यदि कृष्ण चाहते तो रथ दुर्योधन के सम्मुख भी खड़ा कर सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। वे सीधे भीष्म और द्रोण के सामने अर्जुन को ले आये।  यदि सामने दुर्योधन रहता तो कदाचित गीता वाचन का अवसर भी नहीं आता और सीधे युद्ध प्रारम्भ हो जाता। दुर्योधन और अर्जुन दोनों के मन में एक दूसरे के प्रति घोर वैर था। दुर्योधन ही वह प्रमुख कारक था जिसके कारण पांडवों को इतने कष्ट उठाने पड़े थे। लेकिन तब जो युद्ध होता उसमें धर्म का कोई स्थान नहीं होता। वह युद्ध दुर्योधन के लालच रूपी अधर्म और अर्जुन के बदले की भावना  रूपी अधर्म के बीच होता जिसमें मूल्यों का कोई स्थान नहीं होता। तब बुराई से अच्छाई नहीं लड़ रही होती बल्कि एक बुराई दूसरे बुराई से लड़ रही होती। इसके परिणाम स्वरूप बुराई ही अंत परिणाम के रूप में सामने आती। हम एक कि बुराई को दूसरे की बुराई से नहीं हरा सकते, क्योंकि कोई भी बुराई का परिणाम अच्छाई नहीं होती। तब एक कि बुराई दूसरे की बुराई से बस स्थान्तरित हो जाती है। एक अधर्म का स्थान दूसरा अधर्म ले लेता है। लालच और बदले की भावना में क्या हो जाता यदि एक का लालच हार ही जाता तो। बस यही होता कि बदले की भावना जीत कर प्रतिशोध का साम्राज्य कायम कर देती। तब वैमस्य का कँहा अंत होता। तब ये युद्ध धर्म युद्ध होता ही नहीं। हमें कभी भी एक बुराई को हराने के लिए दूसरे बुराई का सहारा नहीं लेना चाहिए।
    सो कृष्ण अर्जुन को भीष्म और द्रोण के समक्ष ले जाते हैं। यँहा दोनों के बीच कोई वैमस्य नहीं है। यँहा एक सम्भावना है कि अर्जुन को अपने आदरणीय अंग्रजो को देख कर अपनी  करुण भावनाओं , अपने मोह से संघर्ष करना पड़े।  जब हमारे स्वजन, हमारे आदरणीय  गलती करते हैं तो हम मोह वश उनकी गलतियों से आँख मोड़ना चाहते हैं। लेकिन ऐसा कर हम बुराइयों को प्रश्रय ही देते हैं। एक प्रकार से अधर्म के बढ़ोतरी में सहायक ही होते हैं। सो जब हमारे अंदर अच्छाई और बुराई का संघर्ष हो तो हमारी समझ इतनी होनी चाहिए कि हम बुराई का साथ न दें। यही बात हमारे कार्यक्षेत्र में भी लागू होती है। जो गलत  के रास्ते पर है  या  जो अधर्म के रास्ते पर है,  भले ऐसा करने वाला हमारा कितना भी प्यारा क्यों न हो, भले हमारा अपना ही अंग क्यों न हो, हमें अपनी मानसिक अवस्था इतनी मजबूत रखनी चाहिए की हम उसके बुराइयों का प्रतिवाद और प्रतिकार कर सकें।
  भीष्म भ्रम और द्रोण गुरु होने के नाते द्वैत के प्रतीक हैं। अच्छे और बुरे के संघर्ष में अच्छाई का पहला सामना भ्रम से होता है। यह भ्रम अच्छाई को अपने मोह पाश में लेकर उसकी मति मारना चाहता है। तरह तरह के तर्क देता है, भय, लालच, अहंकार,  असत्य , हिंसा इत्यादि को जन्म देता है। दूसरी तरफ गुरु हमें इस बात का भान दिलाता है कि यदि हमें  जीत हासिल करनी है तो हमें सन्मार्ग पर बढ़ने का रास्ता चुनना होगा। जब भी हम बड़ी चुनौतियों से दो चार होते हैं  तो सबसे पहले हमें अपने भ्रम को मारना होता है। हमारा लक्ष्य स्पष्ट होना चाहिए। अच्छाई के प्रति, सही के प्रति हमारी परतबढता अटूट होनी चाहिए। श्रीकृष्ण अर्जुन को एक मौका देते है कि भीष्म यानी भ्रम के बहाने अर्जुन मोह से दूर होकर सत्य के प्रति परिबद्ध हो सके। अर्जुन का रथ भीष , द्रोण और पृत्वी के समस्त राजाओं के मध्य खड़ा है। हमारे सामने अभी अच्छी और बुरी प्रवृत्तियाँ  खड़ी हैं । जरूरी है कि हम अपनी प्रतिबद्धता अच्छाई के प्रति साबित कर सकें। हर बड़ी चुनौती सामबे आने पर हम सभी के सामने ऐसी हो परिस्थिति रहती है। यदि हम सत्य के मार्ग पर चलना चाहते हैं तो हमारी मानसिक स्थिति भ्रम को काटने वाली होंनी ही चाहिए। किंकर्तव्यविमूढ़ता को हराये बिना हमारी नजर साफ ही नही हो पाती। श्रीकृष्ण अर्जुन को अच्छाई और बुराई के इस महाभारत में बुराई से लड़ने के लिए उज़के गुणों से तैयार करना चाहते हैं। हमें बुराई को हराने के लिए, अनीति को हराने के लिए सिर्फ शरीर से ही नहीं विवेक से भी मजबूत होना होता है और ये तभी होता है जब हम बुराई के बतरंजाल से उससे सीधे सीधे उलझ कर बाहर आते हैं।
       अर्जुन के लिए पार्थ सम्बोधन श्रीकृष्ण प्रयोग में लाते हैं। कुंती का एक नाम पृथा भी है, अर्जुन को उसके माँ के नाम से जोड़कर श्रीकृष्ण सम्बोधित करते हैं। यानी माँ कुंती के सारे गुण अर्जुन में भी हैं ये इस तथ्य का प्रतीक है। पृथा पार्थिव का भी द्योतक है यानी जो मिट्टी का बना है अर्थात जो नाशवान है। मतलब जब जब हम अपने इस मिट्टी के नाशवान शरीर को ही बुराई से लड़ने का साधन बना लेते हैं तब हम पार्थ हैं। हमारा शरीर ही वो रथ है जिसपर सवार होकर हम सन्मार्ग पर चलते हैं।
      अब देखें, अर्जुन को ये प्रेरणा कौन दे रहा है। ये प्रेरणा हृषिकेश दे रहे हैं यानी जो इन्द्रियों के स्वामी दे रहें हैं। मतलब की हमारी प्रेरणा का मूल स्रोत हमारा विवेक ही है। यही बतलताता है कि हमे क्या करना है, कैसे करना है, कब करना है।
     फिर श्री कृष्ण कहते हैं,  युद्ध के लिए जूट हुए इन कौरवों को देख पार्थ। यानी अर्जुन को देखने का निर्देश  श्रीकृष्ण दे रहें हैं। हमने पूर्व में देखा है कि कौरव पक्ष में ये निर्देश दुर्योधन देता है। वह अहंकार और बेचैनी में गुरु द्रोण को पांडवों वीरों को देखने के लिए कहता है। लेकिन इसके विपरीत यँहा हम देखते हैं कि श्रीकृष्ण जो इन्द्रियों के स्वामी हृषिकेश हैं, विवेकी हैं वो अर्जुन को कह रहे है समस्त कुरुओं यानी कौरव और पांडव दोनो। को देखने के लिए कहते हैं। कौरव और पांडव दोनों ही कुरुवंशी ही हैं।  श्री कृष्ण दुर्योधन की तरह योद्धा विशेष का नाम नहीं गिनाते। विवेक स्वाभाविक रुक से इंसान को यही समझाता है कि कोई भी कार्य करने के पूर्व उससे  जुड़ी अच्छाई और बुराई, उससे जुड़े सद्गुण और दुर्गुण, उससे जुड़े सही और गलत दोनों को देखे। यदि हम कुछ करने जा रहें हैं तो हमें ठहर कर हर पक्ष का ठीक से अवलोकन कर लेना चाहिए।  अन्यथा हम सही और गलत का निर्णय नहीं कर सकते और ऐसी स्थिति में सफलता के लिए कुछ भी गलत सही करने के लिए तैयार  तैयार हो जाएंगे जिसके कारण बहुत ही विनाशकारी परिणाम भी हो सकते हैं। श्रीकृष्ण का निर्देश विवेक का निर्देश ही तो है।



श्रीकृष्ण ने अर्जुन के रथ को अर्जुन के कहे अनुसार लेजाकर दोनों पक्षों की सेनाओं के मध्य खड़ा कर दिया ताकि अर्जुन दोनों पक्ष की सेनाओं का निरीक्षण कर सके और अपने ही कहे अनुसार यह देख सके कि दुर्बुद्धि दुर्योधन का साथ देने के लिए कौन कौन लोग आए हैं। उद्देश्य स्पष्ट है कि अर्जुन वास्तविक युद्ध शुरू होने के पहले मित्र और शत्रु के बल का वस्तुनिष्ठ आकलन कर लेना चाहता है । श्रीकृष्ण रथ खड़ा कर उसे निदेश भी देते हैं कि देखो यानी आकलन करो। और अर्जुन क्या आकलन कर लेता है ? अर्जुन को शत्रु सेना में अपने परिजन और मित्र दिखते हैं।
      यह एक वास्तविक मानसिक स्थिति होती है जिससे हम सभी गुजरते हैं, प्रतिदिन गुजरते हैं। हम सिद्धान्त तौर पर गलत को गलत कहते ही हैं लेकिन जब उस गलत को खत्म करने की हमारी बारी आती है तो हम कन्नी काटने लगते हैं कि फलाना गलत कार्य, फलाना अपराध तो मेरे अपने व्यक्ति ने किया है तो अब मैं क्या करूँ। अपनों की आड़ लेकर हम न्याय से , सत्य से भागते हैं। तरह तरह के तर्क गढ़ते हैं जैसा कि अर्जुन आगे के श्लोकों में गढ़ता है। अपराध या गलत अपराध या गलत ही होता है, कौन किया अपने किये कि पराये ये मायने नहीं रखता। लेकिन हमारा मन मोह में फंसा अपने और पराये के भेद में उलझ जाता है। न्याय की हमारी सैद्धान्तिक समझ वास्तविकता के धरातल पर आकर अपने और पराये कर्ता के आधार पर भेद करने लगती है। और तब हम न्याय का , सत्य का, धर्म का पक्ष नहीं ले कर पलायन करने लगते हैं। नतीजा कि अन्याय तो बढ़ता ही है हमारी अपनी नैतिक स्थिति , हमारा न्याय का पक्षधर होने की अपना नैतिक बल कमजोर होने लगता है।
     जब हम मोहवश अनिर्णय की स्थिति में होते हैं तो कार्य प्रारम्भ करने से डरते हैं , सो अर्जुन की तरह हम भी भयभीत और विषादग्रस्त हो जाते हैं। हमें पता होता है कि सामने वाले ने गलत किया है, लेकिन ये भी सोचते हैं कि गलत करने वाला तो मेरा अपना ही है तो फिर उसे दण्डित कैसे करें। हम अधर्म , अन्याय, गलत, दुर्गुण, बुराई के और उसके दुष्परिणाम के बारे में भूल जाते हैं और उसे करने वाले के यानी उस अधर्मी, अन्यायी, गलत, दुर्गुणी,और बुरे व्यक्ति के जिसे हम अपना ही समझते हैं उसके कल्याण के बारे में सोचने लगते हैं। परिणाम ये होता है कि अधर्म, दुर्गुण, बुराई, गलत  ये सब और मजबूत होते जाते हैं। और हम अनिर्णय के कारण अपने सद्गुणों को अपने ही मोह से मारकर हताश , निराश , व्यथित, दुखी हो कर बैठ जाते हैं, अक्रियाशील हो जाते हैं। व्यवहार का सिद्धांत से विलगाव निराशा का जन्मदाता होता है।
      हमारे अंदर अच्छी और बुरी दोनों प्रवृत्तियाँ होती हैं। जब हम चुनौती स्वीकारते हैं तो दोनों हमें प्रभावित करना चाहती हैं। जैसे ही हमपर भ्रम और भ्रम जनित मोह हावी होता है हम सत्य, अच्छाई के मार्ग से हट जाते हैं। अगर वस्तुतः हम अच्छी सोच के व्यक्ति हैं और मोहवश गलत के फेरे में पड़ जाते हैं तो मानसिक रूप से यानी आत्मिक तौर पर तार तार हो जाते हैं। ये हमपर ही निर्भर करता है कि हम गलत करने का साथ देंगे सिर्फ इस आधार पर कि वो मेरा अपना है , उसे दंडित करने से मेरा धर्म भ्रष्ट हो जाएगा या गलत का विरोध कर उससे संघर्ष करेंगे। 
    हर चुनौती के समय ये प्रश्न विकराल रूप में हमारे सामने आता है । भ्रम वश मोह में उलझ कर अवगुणी व्यक्ति भी अपने अवगुण के कारण हमारा शत्रु न लग कर हमसे अपने सम्बन्ध के कारण हमारा मित्र अथवा अपना स्वजन लगने लगता है।
     तो क्या हम आप किसी अपराधी को सिर्फ इसलिए माफ कर दें कि अपराध की प्रकृति चाहे जो हो चूँकि अवराधि मेरा अपना है सो उसका विरोध नहीं किया जाए।  तब तो खत्म हो गए सारे अधर्म, अपराध, अवगुण, असत्य, और दुर्गुण।
        अब हम पुनः इस मूल श्लोक पर लौटते हैं थोड़े फ्लैशबैक के साथ। अर्जुन हाथ में धनुष उठाये हुए है और श्रीकृष्ण से अपने रथ को दोनों सेनाओं के मध्य लेकर चलने को कहता है ताकि वो दुर्योधन और उसके मूर्ख मित्रों को देख सके। श्रीकृष्ण ऐसा करते भी हैं। स्पष्ट है कि अर्जुन युद्ध के लिए तैयार है, उसके मन में कोई संशय नहीं है, कोई असमंजस नहीं है। लेकिन जैसे ही वह शत्रु पक्ष को देखता है उसे शत्रु पक्ष सेना की तरह नहीं स्वजनों के समूह की तरह लगता है। जब भी हम भ्रम में पड़ते हैं मोह का जन्म होता है, मोह से माया उतपन्न होती ही है जिसके परिणाम में अपने और पराये का बोध होता है। 
    तो फिर दुर्योधन को ऐसा क्यों नहीं हुआ? वह भी तो पांडव पक्ष को देख रहा था लेकिन उसे तो पांडवों में अपने शत्रु ही दिखे, परिजन नहीं। वस्तुतः ये हमारे गुणों के स्तर और उससे प्राप्त ज्ञान में फर्क के कारण है।
     दुर्योधन के अंदर हमेशा ही आसुरी गुण यानी क्रोध, अहंकार, लालच, असत्य, हिंसा के भाव रहते हैं। इस तरह के व्यक्ति के अंदर सत्य के अन्वेषण की प्रवृत्ति नहीं होती। तभी तो युद्ध के मैदान भी वही अपने गुरु को निर्देश दे रहा है। जिसे सत्य की कामना ही नहीं वो भला सत्य के मार्ग में आने वाली कठिनाई की चिंता क्यों करें। यदि अज्ञानी को अपने अज्ञान पर ही अहंकार हो तो फिर उसे मार्गदर्शक, या सलाहकार की क्या जरूरत। उसके विपरीत अर्जुन वीर होने के साथ ज्ञानी भी है। उसे लगता है कि स्वजनों से अपने हित पूर्ति के लिए लड़ना स्वार्थ परक हिंसा है। सो वो भ्रमित होता है और सेना में उसे स्वजन और मित्र दिखते हैं। ये और बात है कि उसका ज्ञान अधूरा है। जब हम सत्य के मार्ग पर बढ़ते हैं तभी हमारे दुर्गुण हमपर हमला कर हमें भ्रमित करने की कोशिश करते हैं। जो हमेशा भ्रमित और अवगुणों के सहारे है वो फिर भला कभी सोच भी सकता है क्या?
यही वो मनःस्थिति होती है जब गीता के ज्ञान की आवश्यकता शिद्दत से महसूस होनी शुरू होती है। लेकिन ज्ञान उसी को मिलता है जिसे इसकी चाह होती है। आगे देखेंगे अर्जुन को चाह थी सो गीता का सानिध्य मिला। हमें होगी तो हमें भी मिलेगा, अन्यथा हम भी दुर्योधन ही बने बने समाप्त हो जाएंगे।



         आप  कोई कार्य प्रारम्भ करने वाले हों , उसी समय उस उस कार्य के प्रति आपको भ्रम हो जाये, तो आपकी मानसिक स्थिति कैसी हो सकती है?  यदि आप उत्साह से  भरकर  अपराधी को दण्डित करने वाले हों उसी समय आपको ज्ञात हो/आभास हो कि ये अपराधी तो आपके ही परिवार के सदस्य हैं तो आपकी मानसिक स्थिति क्या होगी? 
           युद्धक्षेत्र के बीच खड़ा अर्जुन इसी तरह की स्थिति में फँस गया पाता है अपने आपको। विपक्ष उसे शत्रु के रूप में नहीं दिख रहा है। कँहा तो वो युद्ध में शत्रुओं को हराकर अपना राज्य वापस पाने चला था गांडीव थामे और कँहा उसे विरोधी के रूप में स्वजन और मित्रगण ही दिख रहे हैं।  जब अपराधी में स्वजन और मित्र दिखने लगे, जब गलत और दुर्गुणी व्यक्ति के दुर्गुण नहीं दिखे, उनका अधर्म और अपराध नहीं दिखे बल्कि इसके बदले सम्बन्ध दिखने लगे तो क्या हम में से कोई वस्तुनिष्ठ हो सकता है, क्या हमसे आपसे न्याय की उम्मीद की जा सकती है?  चेहरा देख कर, अपना पराया के आधार पर , मित्रता शत्रुता के अनुसार धर्म, सद्गुण,न्याय का पक्ष नहीं लिया जा सकता है। किसी का अवगुण, किसी का अपराध, किसी का अधर्म, किसी का अन्याय सिर्फ इसलिए क्षम्य कैसे हो जा सकता है कि वो व्यक्ति हमारा मित्र या परिवार का है? तब तो न कुछ धर्म होगा न अधर्म। 
         लेकिन अर्जुन इसी का शिकार हो जाता है युद्ध के मैदान में।उसे अधर्मी ,अन्यायी, अपराधी में अपने स्वजन और मित्र दिखते हैं। जब हमें सत्य की   समझ पूरी तरह से नहीं हो, जब हमारा ज्ञान अधूरा हो, जब विवेक का जोर नहीं चल रहा हो तब ऐसा वयक्ति भ्रम में पड़ता ही है।
     सत्य धारण करने का दम्भ भरते भरते जब हम अधर्म के मार्ग पर बढ़ जाते हैं तो हमारा बल, हमारी शक्ति क्षीण होने लगती है, पहले मन मस्तिष्क साथ छोड़ता है, फिर शरीर भी शिथिल होने लगता है। अभी तो अर्जुन कौरवों से युद्ध करने के लिए उत्साहित हो कर सैन्य निरीक्षण पर निकला था कि उसके अंदर अपना पराया का भ्रम आ गया। इस भ्रम बे उसकी बुद्धि को भ्रष्ट किया। हर जगह यही होता है। जैसे ही सत्य के प्रति भ्रम होता है, सबसे पहले बुद्धि और विवेक का पतन होता है। इससे मन के अंदर डर जन्म लेता है। ये डर खुद के अंदर होता है न कि बाहर। अर्जुन अपने युग का महानतम योद्धाओं में शामिल था लेकिन सत्य के प्रति जैसे ही उसे भ्रम होता है उसकी शक्ति क्षण भर में क्षीण हो जाती है। शक्ति सत्य में होता है, शरीर में नहीं। निडरता तभी तक साथ देती है जब तक हम सत्य के साथ खड़े होते हैं। दैनिक जीवन के किसी भी उदाहरण को उठा कर देख लीजिए, जब कभी आप झूठ का सहारा लेते हैं, जब कभी आप अन्याय का साथ देते हैं , जब कभी आप गलत काम का समर्थन करते हैं आप खुद को अपने ही अंदर कमजोर पाते हैं, मन ही मन डरे हुए होते हैं, आपका आत्मविश्वास डिगा रहता है।
  सच जानने वाला यदि सच से मुँह मोड़ता है तो उसका पतन उस आदमी से भी अधिक होता है जो शुरू से ही असत्य के साथ है। जो शुरू से असत्य, अन्याय, अधर्म, और अवगुण यानी आसुरी शक्तियों के साथ है उसका भला क्या पतन होगा, गिरा हुआ कँहा गिरेगा, सो दुर्योधन को भला क्या अज्ञान का डर होता। लेकिन जिसने हमेशा असत्य, अन्याय, अधर्म, अवगुण का विरोध किया हो वो अगर भ्रमवश सत्य से  विचलित होता है तो वो तो गिरेगा हीं, निश्चित गिरेगा, उसके भी हाथ पैर काँपने लगेंगे, मुँह सूखने लगेगा, दिमाग सुन्न पड़ने लगेगा। यही तो अर्जुन को हो रहा है। उसकी  माया, उसके मोह उसकी शक्ति को खाय जा रहें हैं। इसी स्थिति में इंसान मनोरोगी की तरह व्यवहार करने लगता है। और अज्ञान को ही ज्ञान बताकर विरोधाभाषी तर्क करना प्रारम्भ कर देता है यानी कुतर्क पर उतर आता है। वह भोग और सन्यास को एकसाथ भोगना चाहता है। इस स्थिति में गिरा आदमी चाहता है कि उसे कोई कार्य होने का जिम्मेदार भी न माने और उसे उस कार्य का फल भी भोगने को मिल जाये। उसका अपना कोई अधर्म, अन्याय करे तो उसे वो दंडित न करे लेकिन उसे ही धर्म और सत्य का मीठा फल भी मिल जाये। वाह! ऐसा सोचने वाला पतनशील नही  तो क्या कहलायेगा भला!
   अर्जुन की हालत मनोरोगी की हो रही है। जब  भी धर्म, न्याय, देवी गुणों, (सद्गुण) और सत्य  के रास्ते चलने वाला किसी परिस्थिति विशेष में ज्ञान के अभाव में सत्य ,  धर्म , न्याय के प्रति भ्रम में पड़ता है किसी कारण वश तो विवेक और बुद्धि और उन्ही से नियंत्रित शरीर भी भय से व्याकुल हो उठते हैं।



मोह से पीड़ित व्यक्ति की मानसिक स्थिति बिगड़ती जाती है, वो अधीर, चंचल, अस्थिर, व्याकुल होकर शक्तिहीन हो जाता है। ऐसी स्थिति में उसमें शारीरिक बल भी नहीं रह जाता। मन से कमजोर इंसान शरीर से भी प्रतिकार करने लायक नहीं रह जाता। यही कारण है कि हर प्रतिद्वंद्विता और प्रतिस्पर्द्धा में पहले विरोधी के मानसिक बल को तोड़ने की रणनीति बनाई जाती है और माना जाता है कि यदि आप प्रतिद्वंद्वी को मानसिक स्तर पर हरा देते हैं तो फिर शारीरिक स्तर पर हराना मात्र औपचारिकता भर होता है। दुर्गुण यानी आसुरी शक्तियाँ भी दैवी गुणों(सद्गुणों) के साथ की लड़ाई में यही करती हैं। आसुरी गुण यानी दुर्गुण झुण्ड में व्यक्ति के बुद्धि विवेक पर आक्रमण करती हैं। भ्रम, मोह, माया, क्रोध, निराशा, अहंकार ये सभी एक साथ हमारे विवेक को घेरती हैं, नतीजा ये निकलता है कि यदि हमारे सद्गुण कमजोर पड़े तो हम हतोत्साहित होकर मानसिक रोगी की तरह आचरण करने लगते हैं। तब हम अपनी स्थिति को सही ठहराने के लिए अपने ही विवेक से कुतर्क करना शुरू कर देते हैं। सत्य से भागा हुआ मन सामाजिक रूप से ये तो नहीं स्वीकारता कि वो असत्य और अन्याय का साथ दे रहा है किंतु उसके तर्क घुमा फिरा कर यही कहते हैं।
     मोह से विचलित अर्जुन की भी यही स्थिति है। अपराध , असत्य, अन्याय को सिर्फ इस आधार पर माफी देने का मोह कि दोषी उसके परिवार के और मित्रगण हैं को अर्जुन सीधे सीधे नहीं स्वीकारता बल्कि कई तरह के कुतर्क देता है। उसे ज्ञान नहीं है लेकिन वह दिखाना चाहता है कि वह बड़ा ज्ञानी है।
   अर्जुन के तर्कों का सारांश यही है कि जिनसे युद्ध करना है वो सभी उसके स्वजन हैं , मित्र हैं जिन्हें मारना उचित नहीं है। वह यह तर्क भी देता है कि यदि स्वजनों को गँवा कर राज्य मिल भी जाय तो ऐसे राज्य के भोग का वह क्या आनंद उठा पायेगा। उसे लगता है कि सुख और आनंद बाँटने के लिए उसके स्वजन और मित्र ही न हो तो फिर राज्य जीतने का क्या लोभ। इससे अच्छा तो उन्हें नहीं मारना है भले वे अर्जुन को मार डालें। अर्जुन यँहा तक कह जाता है कि उसके ये स्वजन भले ही आतताई हों लेकिन उन्हें मारने से तो अपने ही कुल का नाश होगा जिससे सुख नही मिलेगा। सो अर्जुन युद्ध से इनकार करता है।
    इस प्रकार अर्जुन तर्क पर तर्क दिए जा रहा है और कृष्ण कुछ बोल ही नहीं रहें हैं। अर्जुन के इन तर्कों का यदि परीक्षण करें तो कई तथ्य खुलकर सामने आते हैं।
         अर्जुन की नजर में अपराध से ज्यादा महत्व अपराधी का  है। यदि अपराधी अपने कुल परिवार का है तो उसके सारे खून माफ कर दिए जाने चाहिए। यँहा तक कि यदि अपने कुटुम्ब के लोग आतताई भी हों अर्थात ऐसे लोग जो अपने स्वार्थ के लिए दूसरों के साथ अन्याय पूर्वक हिंसा करते हों तब भी उन्हें सिर्फ इसलिए छोड़ देना चाहिए कि वे अपने परिवार के हैं, अपने मित्र, दोस्त, सम्बन्धी हैं। इस प्रकार अर्जुन एक ऐसी व्यस्था का समर्थन करने में लगा है जँहा न्याय पीड़ित को नहीं पीड़ा देने वाले को दिए जाने का सिद्धांत होता है।  यदि कोई अपराधी आपके पिता की हत्या कर देता है और वो हत्यारा किसी मजबूत का कोई सम्बन्धी है तो उसे सजा नहीं दी जाय। ईद प्रकार लगातार अपराध की श्रृंखला तैयार होती जाएगी। लेकिन सम्बन्धों के मोह में पड़ा व्यक्ति निर्लज्जता से इस तर्क के पक्ष में खड़ा मिलता है।  अर्जुन शासक वर्ग से आता है जिसे दण्ड देने का अधिकार है। यदि शासक ही ऐसा मानेगा तो प्रजा का क्या हाल होगा आप खुद अनुमान कर लें। लेकिन मोह से घिरा मन इस  अनीति इस अन्याय को नहीं समझ कर इसे ही नीति का नाम दे देता है। राजनीति की ये धारा आज भी है क्योंकि मोह तो आज भी जिंदा है। जँहा मोह होगा वंही अन्याय का वास भी होगा। ऐसी स्थिति से समाज में अनाचार का प्रभुत्व बढ़ेगा, अपराध और अन्याय बढ़ेगा। हम सभी अपने अपने मोह में यही करते रहते हैं। अपनी अपनी स्थिति, अपने अपने हैसियत के अनुसार अपने परिजनों और मित्रों के कुकर्मों को नजरअंदाज करते रहते हैं। नतीजा में एक ऐसी भ्रष्ट व्यवस्था का निर्माण होता है जिसमें बेखौफ अपराधियों का भाई भतीजेवाद के बल पर प्रभुत्व कायम रहता है और सामान्य जन इन चंद लोगों के रहमो करम पर रहने के लिए विवश होते हैं। इस सोच से घोर अस्मांतावादी समाज बनता है जिसमें ताकतवर के सभी दोष सिर्फ इसलिए माफ कर दिए जाते हैं क्योंकि उसका सम्बन्ध सत्ता में बैठे लोगों से होता है। परिणामतः समाज में हर तरह के अपराध, अन्याय, असत्य अवगुण का राज स्थापित हो जाता है। अनीति को, अन्याय को , अत्याचार को बर्दाश्त करने की सीख अर्जुन दे रहे होते हैं। जब हम अन्याय, अनाचार , अत्याचार को बर्दाश्त करते हैं तो हम उनको बढ़ावा दे रहें होते हैं।  अन्याय के प्रति सहनशीलता समाज में अराजकता को जन्म देती है। सो ये जरूरी होता है कि अन्याय, अत्याचार , अधर्म और अनीति को बर्दाश्त नही कर उनका सक्रिय प्रतिकार किया जाए ताकि समाज में नीति का राज और शांति की व्यवस्था कायम की जा सके।
    दूसरी बात कि मोह से घिरा मन चालाकी से अपने अज्ञान को ही ज्ञान बताकर प्रचारित करता है। अर्जुन राज्य त्याग की बात कर ये दिखाता है कि वह तो महान त्याग परम्परा का सन्त है जिसे राज पाट से कुछ लेना देना नहीं है बल्कि उसके अंदर तो सन्यास भाव है। हम में से कई लोग , विशेषकर समाज के ताकतवर लोग इस तरह का ढोंग खूब करते हैं और खुद को साधु, सन्त, फकीर कहते नही  अघाते और गीताज्ञान से वंचित जनता उनके बहकावे में आकर उनपर भरोसा कर उनको पूजने भी लगती है। दरअसल ध्यान देने की बात है कि अर्जुन क्या तर्क दे रहा है। उसका कहना है कि बन्धु, बाँधवों, मित्रों को गंवाकर प्राप्त राज्य का वह क्या करेगा जब उसका सुख भोगने के लिए ये बंधु बाँधव मित्र ही न हो उसके साथ। मतलब साफ है कि अर्जुन को राज पाट तो चाहिए लेकिन दुर्गुणों से भरे दोस्त मित्र और सम्बन्धी भी चाहिए। या यूं समझें कि अर्जुन को राज पाट सब चाहिए बस उसके माथे इन इष्ट मित्रों परिजनों की हत्या का दोष न लगे। मतलब साफ है। गुड़ खाये, गुलगुले से परहेज करें! यह भला कौन सा सन्यास है जो सुविधा की शर्त पर टिका हुआ है। आज भी ऐसे ढोंगी सन्यासी खूब मिलते हैं जो इसी तर्क के बल पर समाज के औराधियो को संरक्षण देकर उसकी कीमत में भौतिक सुख सुविधा और सत्ता का सुख उनसे लेते हैं। 
      अर्जुन के इन तर्कों से समाज में अपराध और सत्ता के गठबंधन की नींव पड़ती है।
  महाभारत का युद्ध आंतरिक युद्ध पहले है, बाहरी युद्ध बाद में है। हमारे अंदर की बुरी प्रवृत्तियाँ जब अच्छी प्रवृत्तियों पर हावी होती हैं तो भ्रम उनका अगुआ होता है जो मोह को हमारे विवेक के ऊपर छोड़ता है। अगर मोह हावी हुआ तो बुद्धि और विवेक अपना प्रभाव खो देते हैं। ऐसी स्थिति में इंसान का व्यवहार ठीक शब्दसः वही होता है जो अबतक हम अर्जुन का देख रहें हैं। उसकी मानसिक हालत और उसके कुतर्क भी वही होते हैं। ऐसा नहीं कि इसका प्रभाव सिर्फ युद्ध जैसी स्थिति में ही होता है। जीवन के हर मोर्चे पर हमारे अंदर हमारी ही बुराई हमारी ही अच्छाई से लड़ रही होती है और जब जब बुराई हावी होती है हम भी इसी मानसिक शारीरिक बौद्धिक स्थिति में गिर जाते हैं और कुतर्कों का जाल बुनने लगते हैं खुद को सही ठहराने के लिए।
      श्रीकृष्ण अभी तक चुप हैं। उनका चुप रहना एक मनोवैज्ञानिक योजना का अंग है। जब एक अच्छा भला इंसान किसी वजह से विवेक खो दे तो उसे पहले जी भर कुतर्क कर लेने दें ताकि वो अपनी बात कह कर खुद को मानसिक रूप से हल्का कर सके। तब ही उसे समझाना उचित होता है, अन्यथा वह आदमी अनावश्यक वाद विवाद में पड़ा रहेगा और आपको भी खींचता रहेगा।





 अर्जुन कृष्ण के मौन से परेशान सा हुआ लगता है। जब हम तर्क देते हैं तो चाहते हैं कि सामने वाला हमारे तर्क को समर्थन दे, बोलकर नहीं तो अपने हाव भाव से ही सही। लेकिन जब सामने वाला एकदम से कोई प्रतिक्रिया ही न दे तो हम क्या करते हैं? यदि हम थोड़े पढ़े लिखे हैं , थोड़ा बहुत अनुभव भी है तो खुद को बड़ा ज्ञानी साबित करने में लग जाते हैं और लगते हैं तर्क पर तर्क करने भले ही हमारा तर्क कुतर्क ही क्यों न हो।कम ज्ञान की भरपाई हम अधिक बोलकर, कुछ ऊँची आवाज में बोलकर, कुछ आलंकारिक भाषा में बोलकर पूरा करने की कोशिश करते हैं। कुरुक्षेत्र में हू  ब बहू यही हो रहा है। अर्जुन लागातार तर्क पर तर्क दिए जा रहा है। अब वो क्या तर्क कर सकता है, इसे भी समझें। मन में भ्रम है, अत्याचारी, अधर्मी, अनाचारी, अन्यायी सम्बन्धियों के लिए मोह है, उनके प्राणों का मोह है,  खुद अपने मन में सम्बन्धियों सहित राज पाट भोगने की लालसा है तब सोचिये कि अर्जुन क्या तर्क कर रहा होगा। 
      वह वही कह रहा है जो इस अवस्था में पड़ा इंसान करेगा। वो अपने तर्कों की शृंखला को आगे बढ़ाते हुए कहता है कि सम्बन्धियों की मृत्यु से उसके कुल का विनाश हो जाएगा, और कुल नाश का पाप उसे लगेगा। मित्रों से युद्ध मित्रों से घात करना होगा। कुल का नाश होने से कुलधर्म खत्म हो जाएगा और सम्पूर्ण कुल में पाप का प्रभुत्व हो जाएगा। अर्जुन का मानना है कि सम्बन्धी चाहे आतताई ही क्यों न हों उनकी रक्षा होनी ही चाहिए ताकि कुल/परिवार चलता रहे। अर्जुन का धर्म सिखाता है कि अधर्म करने वाला अगर सम्बन्धी है तो उसी अधर्मी के बल पर कुल धर्म की रक्षा की जा सकती है। आप देख रहें हैं कि मोहग्रस्त अर्जुन जिसके पास अपने पक्ष में कोई तर्क नही है किस प्रकार निर्भीक हो कर कुतर्क कर रहा है। अर्जुन के अनुसार कुलधर्म ही सनातन धर्म होता है। सनातन धर्म की उसकी समझ उसे बताता है कि हमारा कुलधर्म ही सनातन है अर्थात ऐसा धर्म जिसका न कोई प्रारम्भ है न ही अंत।  उसके अनुसार पारिवारिक परम्पराएँ ही धर्म कहलाती हैं, सनातन धर्म। अर्थात सनातन धर्म वही कुछ है जो  हमारा परिवार हमें  सिखाता है।
     अर्जुन ये मानता है कि कुलधर्म के नाश और परिणामस्वरुप सनातन धर्म के नाश से पाप का प्रसार होता है। वह अधर्मी, अनाचारी , अत्याचारी, आतताई  को दंडित करने को अधर्म मानता है और  उनके नाश से सनातन धर्म के नाश का डर है उसे। उसे डर है कि आतताई के दाण्डित होने से पाप का प्रसार होगा!
       आखिर अर्जुन जैसा शिक्षित, दीक्षित, सदाचारी, वीर इस तरह का कुतर्क क्यों करने पर उतारू हो चला है। दरअसल युद्ध तो हम सबके अंदर है,अर्जुन के भी अंदर  है। वह स्वाभावतः वीर है सो शत्रु दल की सम्मलित शक्ति भी उसके वीरोचित शौर्य को नहीं हिला सकी थी। हम देखते हैं कि अर्जुन विरोधियों के बल से तनिक भी नहीं डरा है। लेकिन मन के अंदर चलने वाले अच्छे बुरे के संघर्ष में वह हारता हुआ दिखता है। मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।  वह कमजोर पड़ रहा है तो मन के कारण। उसके अंदर की बुराई उसकी अच्छाई पर  भारी पड़ रही है। हम सभी के अंदर दैवी गुण(सद्गुण) और आसुरी गुण ( अवगुण) होते हैं। इन गुणों की विस्तृत व्याख्या श्रीकृष्ण सोलहवें अध्याय में करते हैं लेकिन इनकी चर्चा दूसरे अध्याय से ही शुरू कर देते हैं। भ्रम, माया, मोह, क्रोध, असत्य, लोभ, वासना, हिंसा, कामना, भोग , भय इत्यादि आसुरी गुण हैं जबकि सत्य, अहिंसा, प्रेम, सद्भाव, अभयता, दया, क्षमा, कामना का त्याग आदि दैवी गुण हैं। जब दुर्गुण सद्गुण पर भारी पड़ते हैं तो सही निर्णय ले पाने की , सत्य को देख समझ पाने की हमारी क्षमता खत्म हो जाती है और हम भयभीत होकर आत्म रक्षा के लिए अनाचार, अत्याचार , का रास्ता पकड़ लेते हैं और इसी अवगुण से उपजे तर्क को ज्ञान समझने की भूल कर बैठते हैं। ठीक यही अर्जुन के साथ हो रहा है। तभी तो वह धर्म को पारिवारिक परम्परा भर समझता है और इसी पारिवारिक परम्परा को अनंत काल से चलने वाला सनातन धर्म समझकर इसकी रक्षा में पल्याणवादी हो जाता है। जिस वीर अर्जुन को समस्त कौरव सेना मिलकर नहीं डरा सकी उसी वीर अर्जुन की वीरता उसीके भ्रम, मोह, अज्ञान से धाराशायी होकर तार तार जाती है। इतनी कि उसका मुख्य शस्त्र तक उससे नहीं उठ पा रहा है, जिससे उसने समस्त भारत भूमि के वीरों को धूल चटाया था। अर्जुन भ्रम में पड़कर इस तरह लाचार हो चला है। यही हाल हर उस व्यक्ति का होता है जिसे हो सकता है कि ज्ञान  बहुत हो लेकिन उसे मुठ्ठी भर भ्रम और मोह मिल जाये तो सारा ज्ञान मटियामेट होकर रह जाता है। मन के युद्ध में आसुरी शक्तियों के विजय में ही जीवन की हार बसती है।
       ध्यान देने की बात है कि अर्जुन का चरित्र दुर्योधन से भिन्न है। दुर्योधन को ज्ञान है ही नहीं , उसे अहंकार ही है। उसे सही गलत का भान तक नहीं सो वह तर्क नहीं कर पाता सीधे युद्ध पर उतरता है। दूसरी तरफ अर्जुन को ये तो ज्ञात है ही कि उसे क्या करना चाहिए क्या नहीं सो जब उसपर भ्रम हावी होता है तो वह युद्ध नही करने के नतीजे पर पहुँचने के लिए तर्क का सहारा लेता है। हाँ, उसके तर्क बेतुके और खतरनाक हैं क्योंकि ये तर्क  कि वअधर्म , अनाचार, अत्याचार, अन्याय, असत्य को खत्म करने के स्थान पर उनकी रक्षा की दलील दिया जाय अत्यंत ही खतरनाक और समाज विरोधी  है क्योंकि परिणाम में तो अधर्म और अन्याय ही जीतेगा न।
     अभी अर्जुन थका नहीं है। आगे के श्लोकों में अभी वो और तर्क देगा।




अर्जुन श्रीकृष्ण की तरफ से कोई समर्थन न पाकर विचलित होता दिखाई दे रहा है। लेकिन उसके पास श्रीकृष्ण को समझाने का कोई और उपाय नही  रह गया है। सो वो अपने पिछले तर्क को ही नए तरह से धर्म की आड़ लेकर फिर से कहता है। जब दो जनों में वाद विवाद होता है और जब एक के पास समझ और तर्क खत्म होने लगते हैं लेकिन वो हार मानने के लिए तैयार नही  होता तो फिर से अपने पुराने तर्कों को ही नए ढंग से कहने का प्रयास करता है।  सत्य को स्वीकारने के लिए जिसमें  न तो साहस हो न ही ज्ञान वो असत्य के समर्थन में कोई न कोई  नया तर्क खोजेगा ही। इसी कारण अब अर्जुन अपने तर्क को नई भाषा देता है कि युद्ध में अगिनत लोगों के मारे जाने से समाज में स्त्रियों का चरित्र गिरेगा, जिससे वर्णसंकर पैदा होंगे। इससे पारिवारिक परम्परा का लोप होगा, पिंडोत्तक क्रिया समाप्त होगी,  पितर रुष्ट होंगे, और परिणाम में सनातन धर्म और जाति धर्म नष्ट होंगे। अर्जुन के तर्क प्रथम दृष्टया बहुत सही लगते भी हैं। लगता है अर्जुन हिंसा का घोर विरोधी है।आगे चलकर श्रीकृष्ण अर्जुन के इन तर्कों पर गहरा प्रहार करते हैं। अर्जुन का तर्क है कि जो पारिवारिक परम्परा है, उसमें किसी भी प्रकार का परिवर्तन धर्म भ्रष्ट करता है। कुल ही धर्म का रक्षक है, वाहक है। उसके तर्कों के अनुसार यदि कुल में दुष्ट, अत्याचारी हों तो कुल की परम्परा, यानी कुलधर्म यानी सनातन धर्म को हानि नहीं होती बल्कि हानि तब होती है जब ऐसे दुष्ट, अनाचारी लोगों का अंत होगा क्योंकि इससे कुल की स्त्रियाँ भ्रष्ट हो जाती हैं और एक जाति की स्त्रियों का दूसरी जाति के पुरुष से सन्तान जन्म लेते हैं जो वर्ण संकर कहलाते हैं जिनमें किसी कुल की परंपरा नहीं होती। है न विचित्र तर्क ये!
   इसी प्रकार अर्जुन जन्म आधारित वर्णव्यस्था का समर्थन भी करता है और स्पष्ट रूप से जन्म आधारित जाति व्यस्था, स्त्रियों की शुद्धता जैसी चीजों के समर्थन में खुलकर आता है। उसकी समझ है कि यदि कुल भ्रष्ट होता तो सन्तानें भी भ्रष्ट होंगी जिससे पूर्वजों द्वारा संचित की गई कीर्ति भ्रष्ट हो जाएगी। अर्जुन की नजर में स्त्रियों के शारीरिक रूप से भ्रष्ट होने से  जाति और वर्ण की व्यवस्था समाप्त होती है जबकि पुरुषों के आतताई, अनाचारी, अन्यायी  होने से कुल भ्रष्ट नहीं होता। साफ साफ दिखाई दे  रहा है कि अर्जुन कुतर्क करने पर अमादा है। उसकी अहिंसा में अत्याचारी और अधर्मी की तो चिंता है लेकिन धर्म और आचार विचार की रक्षा की चिंता नहीं है। वह बार बार धर्म के भ्रष्ट होने की दुहाई तो दे रहा है लेकिन उसका धर्म विचित्र है जिसमें अधर्मी के नष्ट होने से धर्म खतरे में पड़ता दिखता है, कुल की परंपरा नष्ट होते दिखती है लेकिन अधर्म अनाचार के खात्मे के लिए क्या किया जाना उचित होगा, ऐसा क्या किया जाना जरूरी है जिससे समाज से आसुरी शक्तियो का प्रभुत्व खत्म हो इसके बारे में कोई तर्क नहीं है। बार बार स्त्री की शुद्धता और जाति की शुद्धता का ही तर्क है उसके पास। इस प्रकार उसकी अहिंसा में अनाचारी के हिंसा के प्रतिकार का कोई रास्ता नहीं है, बल्कि उसके सामने समर्पण की वकालत ही उसका तर्क है। 
    इसी प्रकार अर्जुन की नजर बृहत्तर समाज के बृहत कल्याण पर नहीं है बल्कि उसे कुल की रक्षा समाज की रक्षा से ज्यादा जरूरी लग रहा है।
       यही हाल हर उस व्यक्ति का होता है जो स्वार्थ के अधीन होकर सिर्फ और सिर्फ अपना, अपने परिवार के कल्याण के बारे में सोचता है भले कुल की कीमत पर समाज को हानि ही क्यों न उठानी पड़े।



अर्जुन अपना सब तर्क देकर दुख के साथ अपना विचार प्रकट करता है कि--
    एक कि वो बुद्धिमान है, दूसरे कि बुद्धिमान होकर भी राज पाट के लोभ और सुख के लोभ में वे लोग अपने ही कुटुम्बियों और मित्रों को मारने पर उतारू हो गए हैं, और अंत में तीसरा और अंतिम की बुद्धिमान होकर भी इन लोभों के कारण बहुत भारी पाप करने जा रहें हैं।
     निश्चित रूप से बुद्धिमान को इस प्रकार के लोभ नहीं ही करने चाहिए और यदि इसप्रकार के लोभ के फेरे में कोई पड़ता है तो वह पाप ही करता है जो उसे नहीं करना चाहिए।  अब सवाल उठता है कि अर्जुन किस तरह से तय कर लेता है कि वो बुद्धिमान है ही। अब तक तो श्रीकृष्ण जिनको वो अपना ज्ञान दे रहा है एकदम चुप हैं, सिर्फ उसकी सुन रहें हैं। तो क्या यदि हमारे तर्क को कोई सुन भर ले तो हम बुद्धिमान हो जाएंगे? तय है कि नहीं। फिर भी अर्जुन को अपनी बुद्धि के बारे में ये गलतफहमी हो गई है। जब हम कुछ जानते ही नहीं तो बड़ा ज्ञानी होने का दम्भ भरने से बाज नहीं आते। जब तर्क खत्म हो जाता है तो सिर्फ गाल बजाना ही बाकी रह जाता है कि हम तो बुद्ध हो गए हैं, हमसे कोई क्या बात करेगा हम तो ज्ञान के भंडार है।  
          अब देखते हैं कि अर्जुन को क्या गलत लगता है। उसे लगता है कि युद्ध में कौरव और पांडव दोनों पक्ष सिर्फ राज पाट हथियाने के लिए लड़ने कटने आ गए हैं। उसे युद्ध का लक्ष्य  सम्पत्ति और सुख प्राप्ति ही लगता है, उसे कौरव पक्ष और पांडव पक्ष के उद्देश्य एक से लगते हैं। निश्चित रूप से ये एक भ्रम की स्थिति है। जब हम खुद के अंदर की अच्छाई और बुराई में फर्क नहीं कर पाएं तो तय है कि हम दिग्भ्रमित हो गए हैं और   भ्रम के असर से सही और गलत, न्याय और अन्याय के फर्क को समझना भूल जाते हैं। इस अवस्था में कोई भी आदमी जब होता है, चाहे वो अर्जुन ही क्यों न हो उसे यही नहीं पता चलता कि उसका दायित्व क्या है, उसकी अपनी भूमिका क्या है, उसे क्या करना और क्या नहीं करना है। तब ऐसा इंसान मूर्खता पर उतर आता है। लेकिन कोई भला अपने को मूर्ख क्यों मान ले, सो खुद को बुद्धिमान ही कहता फिरता है। आये दिन हम अपने समाज में देखते हैं कि लोग ऐसी बेवकूफियाँ करते ही हैं। जब हम आप खुद के अंदर के गुण अवगुण को नहीं समझ पाएंगे तो निश्चित है कि इसी तरह से व्यवहार करेंगे। 
पाप और पुण्य को समझने के पूर्व कर्म के पीछे की मंशा को ध्यान में रखा जाना जरूरी है। एक स्त्री हरण रावण ने किया, एक स्त्रिहरण खुद अर्जुन ने भी किया, और एक स्त्रिहरण श्रीकृष्ण ने भी किया। अब यदि मात्र स्त्री हरण की बात की जाए तो तीनों का दोष एक समान लगेगा। लेकिन तीनों के इन क्रियाओं के पीछे की परिस्थिति पर विचार करेंगे तो भिन्न भिन्न स्थिति पाएंगे।  इस बात को समझने के लिए अच्छे बुरे की समझ की आवश्यकता होती है। युद्ध या कोई भी अन्य कार्य जरूरी भी हो सकता है और गैर जरूरी भी।  लेकिन देखने समझने की बात है कि वास्तव में हम किस गुण या अवगुण से प्रेरित होकर उस क्रिया विशेष को करते हैं। अर्जुन ने अपने युद्ध को जिन कारणों से गलत और पापयुक्त कहा है, उन कारणों को स्वीकारने में किसी को भी दिक्कत है। जैसे अर्जुन के मुख्य तर्क हैं
  1.कुल की रक्षा अनिवार्य है।
   2.कुल की रक्षा के लिए कुल के  आतताई सदस्यों को भी हानि नहीं पहुंचाना चाहिए।
   3. कुल के नाश से स्त्री शारीरिक रूप से दूषित होती है जिससे वर्णसंकर पैदा होते हैं।
   4. वर्णसंकर कुल के नाश के कारण होते हैं
   5. इससे जाति व्यवस्था टूटती है।
    6. कुल के नाश से कुलधर्म का नाश हो जाता है।
    7.कुलधर्म ही सनातन धर्म है, और इस कारण युद्ध से सनातन धर्म नष्ट हो जाएगा।
   अब युद्ध के विरुद्ध इतने बेसिर पैर के तर्क को देकर अर्जुन खुद को बुद्धिमान भी घोषित कर देता है।
      हर जगह, लोग मूर्खता को ज्ञान और अनाचार को धर्म का नाम देकर ही ढकने की कोशिश करते हैं और एक अति अज्ञानी और दम्भी इंसान का आचरण का उदाहरण है अर्जुन का व्यवहार।


      भ्रमित और अज्ञानी के  सारे तर्कों से जब काम नहीं चलता तो अंत में तीन तर्क बचते हैं, एक धर्म की आड़ में अधर्म की राह चुनना, आदर्श की आड़ में अनाचार की रक्षा करना और अंत में अहिंसा के नाम पर आत्महन्ता बन जाना। पहले दो तर्क तो अर्जुन आजमा चुका है लेकिन श्रीकृष्ण पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है। तब उस बच्चे की तरह जो अपना मनमाफिक खिलौना नहीं मिलने पर फर्श पर ही अपना सिर पीटने लगता है, अब अर्जुन उसी हरकत पर उतर आता है। अभी तक तो वह धर्म की दुहाई कर दुर्योधन से लड़ने से इनकार कर रहा था। अब एक कदम आगे बढ़कर अहिंसा की प्रतिमूर्ति बनने का स्वांग करता हुआ कहता है कि यदि कौरव पक्ष के लोग उस निहत्थे अर्जुन को मार भी देंगे तो भी अर्जुन यही मानेगा कि युद्ध के मुकाबले ये ज्यादा कल्याणकारी है।
      हम सब के मन में जीतने की ईक्षा होती है। यह प्रसंग युद्ध का है लेकिन हर प्रसंग में हम जीतना चाहते हैं। लेकिन जीत के लिए जब हम वास्तविक कर्म के मैदान में उतरते हैं तब हमें पता चलता है कि इस अपेक्षित और इक्षित जीत के लिए तकनीकी जानकारी के अतिरिक्त भी कुछ अन्य कौशल की जरूरत होती है। अगर वो कौशल नहीं है तो आप तमाम तकनीकी जानकारियों के भी सफलता नहीं प्राप्त कर पाते। हो सकता है कि किसी लक्ष्य को पाने की तमाम तकनीकी जानकारी तो है आपके पास लेकिन जो मानसिक और आत्मिक कौशल चाहिए , जो साहस और सूझ बुझ चाहिए वह नहीं है तो जीतने और लक्ष्य को पाने की बात तो दूर ,आप वह कार्य शुरू ही नहीं कर पाएँ। 
     जब आप ऐसा नहीं कर पाते तब आपको अपनी झेंप मिटानी होती है। आपको दिखाना होता है कि आपके तकनीकी गुण पूर्ण हैं , आपमें किसी भी मानसिक कौशल का अभाव भी नहीं है लेकिन आप मानवता की सेवा के लिए ये सब त्याग देना चाहते हैं, कर्म छोड़कर मृत्यु की वरण करना उचित समझते हैं।  युद्ध की स्थिति या युद्ध जैसी स्थिति में आप इसे अहिंसा का नाम देते हैं। आप दिखाना चाहते हैं कि आप किसी का रक्त नहीं बहाना चाहते क्योंकि यह आपके धर्म के विपरीत है , मानवता के विरुद्ध है सो आप अपनी जान देकर चाहते हैं कि आप युद्ध रोकने का प्रयास कर अमर बन जाएं। 
     ये सोच भले ही समाज और व्यक्ति दोनों के लिए खतरनाक होती है किंतु भ्रम से भ्रष्ट बुद्धि समस्या का निराकरण करने में जब असमर्थ होती है तो व्यक्तिअपनी असमर्थता छुपाने वास्ते  आत्मबलिदान की मिसाल देने का ढोंग करता है। अपनी असफलता, अपने भ्रम से ऐसा इंसान जो क्षति समाज को पहुँचाता है वो इतना बड़ा होता है कि उसका आकलन करना भी मुश्किल होता है। अर्जुन के पास अब कुछ भी ऐसा सार्थक नहीं है जो वह कह सके सो आत्म बलिदान की या सही कहें हो आत्महत्या की बात करता है ताकि श्रीकृष्ण अब भी पिघल जाएं और उसे मानव इतिहास का सबसे बड़ा अपराधी होने से बचा लें।
        ध्यान दें अब तक के पूरे प्रसंग में अर्जुन शत्रु पक्ष की शक्ति से कँही भी डरा हुआ नहीं दिखता। वो डरता है तो धर्म की  अपनी गलत समझ से। जब हम सही और गलत को नहीं समझ पाते, जब हमारी बुराई हमारी अच्छाई पर भारी पड़ने लगती है तो विवेक नष्ट होने लगता है। ऐसी स्थिति में हम ये  नहीं समझ पाते कि न्याय, धर्म, सत्य और अहिंसा अन्याय, अधर्म, असत्य और हिंसा से किस प्रकार भिन्न है। सो दिग्भ्रमित मन कमजोर पड़ जाता है, आत्मविश्वास डीग जाता है, और मन व्यथित और व्याकुल होकर अनर्गल निर्णय लेने लगता है। महाभारत का युद्ध बाहरी तो बहुत बाद का है, मानसिक और आत्मिक बहुत पहले से है। मन और आत्मा के स्तर पर जो इस युद्ध को जीतेगा बाहरी मैदान भी वही जीतेगा। किसी भी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए उस लक्ष्य के अनुरूप तकनीकी ज्ञान तो अनिवार्य है लेकिन वह तकनीकी ज्ञान तभी परिणाम देगा जब आत्मिक बल मजबूत है और आत्मिक बल तभी मजबूत होगा जब आपके अंदर आपके दैवी गुण उत्कृष्ट अवस्था में हैं।



प्रथम अध्याय का अंत आते आते अर्जुन बिना मैदान में लड़े थक कर शस्त्र रखकर शोक से बैठ जाता है। आपने अपना कर्तव्य अभी शुरू ही नहीं किया और हारे हारे से हो गए। ऐसा होता ही है। जीवन में कई अवसर ऐसे आते हैं जब आपको कुछ करना होता है, लेकिन जब आप उस काम पर निकलने वाले हैं तभी आपके मन में उस कार्य को लेकर संशय हो जाता है, आप समझ नहीं पाते कि उस कार्य को करें या न करें। आप तय नहीं कर पाते कि आपका कर्तव्य क्या है। आप अपनी भूमिका समझने से चूकने लगते हैं। मन उद्विग्न हो जाता, खिन्न हो जाता है। आप तो सभी को बता कर निकले थे कि मैं फलाना कार्य पर जा रहा हूँ और आप फँस गए अपने ही मानसिक और आत्मिक द्वंद्व में। अब आप निर्णय नहीं ले पा रहें हैं कि क्या करें। फिर आपको लगता है कि आपसे ये कार्य नहीं होगा। लेकिन इस स्थिति का सामना कैसे कीजियेगा क्योंकि आप तो चले थे कि इस कार्य को कर ही देंगे। तब आप सहारा लेते हैं झूठ का, झूठ से ओतप्रोत तर्को का। नतीजा होता है कि आप टूटकर बिखरने लगते हैं। 
   आखिर ऐसा क्यों होता है। स्पष्ट है कि या तो आपको सामर्थ्य नहीं है , बस आपका जोश बिना कौशल का है। या फिर सामर्थ्य तो है, कार्य निष्पादन की विद्या भी है लेकिन उस कार्य को करने के लिए जिन आत्मिक कौशल या गुणों को होना चाहिए वो नहीं है। हर इंसान के अंदर दो तरह की प्रवृत्तियाँ हमेशा रहती हैं, अच्छी(दैवी) और बुरी(आसुरी)। और ये कभी विश्राम की अवस्था में नहीं रहतीं। हमेशा आपस में लड़ती रहती हैं। एक महाभारत हमेशा आपके हृदय में चलते रहता है इनके बीच। जब जब बुरी प्रवृत्तियाँ मजबूत पड़ती हैं भ्रम तेज हो उठता है, उससे मोह का प्रताप बढ़ता है। नतीजा में बुद्धि और विवेक का ह्रास होने लगता है और धर्म, न्याय, सदाचार, और सत्य के अनुरूप निर्णय लेने की क्षमता खत्म हो जाती है। तब आसुरी निर्णय ही होते हैं। परिणाम में आदमी मन से थकने लग जाता है। आखिर अर्जुन अपने समय का सर्वक्षेष्ठ योद्धा है। उसके रणकौशल के बराबर कोई दूसरा नहीं है। एक बार तो उसने अकेले ही विराट के युद्ध में समस्त कौरव सेना को पराजित भी कर दिया था। अब जबकि वह अपनी विशाल सेना और श्रीकृष्ण के साथ कौरवों के विरुद्ध युद्ध के मैदान में खड़ा होकर शँख बजाकर युद्ध लड़ने की ईक्षा को जाहिर कर चुका है अचानक परिवार मोह में पड़ जाता है और फिर तो शुरू कर देता है युद्ध के विरुद्ध कुतर्क करना। लेकिन उसे अपने कुतर्को के प्रति श्रीकृष्ण का समर्थन नहीं मिल पाता। सो अपनी आसुरी प्रवृत्तियों के बोझ से वो थक जाता है। वह जो भी तर्क देता है खुद उन्हीं से संतुष्ट भी नहीं होता है। नतीजा शोक में डूब जाता है और शस्त्र छोड़कर बैठ जाता है।  जब भी इंसान की आसुरी शक्तियाँ मजबूत होती हैं इंसान खुद की अच्छाई को गंवा कर खुद से हार कर शोकाकुल हो मूर्क्षित सा हो जाता है। आप ही देखिए जिस अर्जुन को कभी भी युद्ध में कोई नहीं हरा सका था आज अपनी बुराई के सामबे  बिना लड़े लड़ाई के  कल्पित परिणामों से डर कर युद्ध छोड़कर भाग रहा है। जब भी आपको अपने कर्तव्य के उद्देश्य के बारे में भ्रम होगा आप कर्तव्य पूरा कर ही नहीं सकते। ये अकाट्य सत्य है जो सार्वभौमिक है। जँहा आप अपने कर्तव्य के परिणामों के चक्कर में पड़े, सम्बावित परिणामों के भय से आप जी हीं नहीं पाएंगे। अर्जुन को  युद्ध का उद्देश्य स्पष्ट  नहीं हो पा रहा है और  परिणाम की चिंता खाये जा रही है। नतीजा है बिना लड़े पराजय। "मन के हारे हार है मन के जीते जीत, करता चल पुरुषार्थ तू काहे है भयभीत।" 
    इस प्रकार श्रीमद्भागवद गीता का प्रथम अध्याय अर्जुन की निराशा पर आकर खत्म होता है। और यंही से प्रारंभ होती है गीता की यात्रा, योगेश्वर श्रीकृष्ण की वो शिक्षा जो आपको अद्भुत शक्ति प्रदान करती है, आप खोज पाते हैं कि आप कौन हैं, आपका क्या कर्तव्य है, उस कर्तव्य को कैसे पूरा करना है, स्वयं और समाज के प्रति आपकी क्या भूमिका है , उसे कैसे निभाना है और आपका अंतिम लक्ष्य क्या है। आप समझ पाते हैं कि बिना परिणाम  की चिंता किये अपना कर्तव्य कैसे पूरा करेंगे। 
         श्रीमद्भगवद गीता आपको धर्म के मार्ग पर चलकर कर्तव्य निर्वाहन का क्रियात्मक प्रशिक्षण देती है।




ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादेऽर्जुनविषादयोगो नाम प्रथमोऽध्यायः। 

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