श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 7 एवं 8
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 7 एवं 8
नियतस्य तु सन्न्यासः कर्मणो नोपपद्यते।
मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः॥ 7।।
दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत्।
स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत्॥ 8।।
(निषिद्ध और काम्य कर्मों का तो स्वरूप से त्याग करना उचित ही है) परन्तु नियत कर्म का (इसी अध्याय के श्लोक 48 की टिप्पणी में इसका अर्थ देखना चाहिए।) स्वरूप से त्याग करना उचित नहीं है। इसलिए मोह के कारण उसका त्याग कर देना तामस त्याग कहा गया है।
जो कुछ कर्म है वह सब दुःखरूप ही है- ऐसा समझकर यदि कोई शारीरिक क्लेश के भय से कर्तव्य-कर्मों का त्याग कर दे, तो वह ऐसा राजस त्याग करके त्याग के फल को किसी प्रकार भी नहीं पाता।
सन्यास की प्राप्ति के लिए जितना कर्म करना आवश्यक है उतना ही त्याग भी जरूरी है लेकिन प्रश्न उठता है कि कौन सा त्याग किया जाए। कर्म भी अनिवार्य है और त्याग भी। यह स्थिति भ्रम उतपन्न करती है। सो इसे ठीक से समझना जरूरी है कि किस चीज का त्याग किया जाय कि कर्म भी हो और त्याग भी ताकि सन्यास का मार्ग प्राप्त हो और मन-बुद्धि प्रकाशित हो सके। सो क्या त्याज्य है इसे समझना जरूरी है।
कुछ कर्म कर्तव्य कर्म हैं अर्थात नियत हैं जिनमें यज्ञ, दान और तप आते हैं। यदि हम अपने कर्तव्य कर्मों का त्याग करते हैं तो यह अनुचित है और इसी कारण इस प्रकार के त्याग को तामसी त्याग कहा गया है। कर्तव्य कर्म तो हर हालत में करने ही हैं। स्वयं के प्रति, परिवार और समाज, राष्ट्र और संसार और सम्पूर्ण मानवता के प्रति हमारे कर्तव्य नियत हैं जो हमें अपनी स्थिति के अनुसार करने ही हैं। यही हमारा स्वधर्म भी है। यदि हम इसका त्याग करते हैं तो हम सन्यास के मार्ग पर चल ही नहीं सकते हैं। ये तामसी त्याग हैं। दरसल यह त्याग नहीं आलस है, कर्तव्य से भागना है, पलायन है। पलायन और त्याग एक नहीं होते, पलायन और सन्यास विपरीत हैं। और यह होता है कर्मों के प्रति हमारी भ्रामक सोच के कारण।
दूसरी तरफ कई बार कर्तव्य कर्मों के निष्पादन हम इसलिए भी नहीं करते हैं क्योंकि हमें लगता है कि इनके निष्पादन में ढेर सारी कठिनाइयाँ हैं । मन और शरीर को मिलने वाली कठिनाइयों के भय से जब कर्मों का त्याग किया जाता है तो वह राजसी त्याग है। इस त्याग से भी पलायन का ही बोध होता है और इससे कोई आध्यात्मिक प्रकाश नहीं मिलता है, अपितु व्यक्ति और व्यथित और निराश ही होता है। तामसी त्याग की तरह राजसी त्याग भी वरणीय नहीं है।
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