श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 6
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 6
कर्तव्यानीति में पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम्॥ 6।।
इसलिए हे पार्थ! इन यज्ञ, दान और तपरूप कर्मों को तथा और भी सम्पूर्ण कर्तव्यकर्मों को आसक्ति और फलों का त्याग करके अवश्य करना चाहिए, यह मेरा निश्चय किया हुआ उत्तम मत है।
इस विविरण से स्पष्ट है कि व्यक्ति को नियत कर्म तो करने हैं लेकिन कर्म फल से असंबद्धता होनी चाहिए। यज्ञ, दान, तप जैसे कर्तव्य कर्म तो करने हैं लेकिन कर्मफल के लिए ये कर्म नहीं करने होते हैं। कर्मफल के त्याग का तातपर्य है कि व्यक्ति को कर्तापन के भाव से मुक्त होकर सिर्फ कर्तव्य निर्वहन के लिए कर्म करने होते हैं। वस्तुतः यह फल त्याग का दृष्टिकोण ही है जो कर्म को यज्ञ, दान और तप में परिवर्तित कर देता है। इसके विपरीत जब व्यक्ति फल से आसक्त होकर कर्म करता है तो उसकी दृष्टि वर्तमान के कर्म पर न होकर भविष्य के फल पर होती है और नतीजा यह निकलता है कि न तो कर्म सही ढंग से हो पाते हैं और न ही फल ही फल की प्राप्ति ही मनोवांछित ढंग से हो पाती है। लेकिन कर्मफल के साथ आसक्ति के त्याग से ध्यान वर्तमान के कर्म पर टिका होता है और कर्म कर्तव्य भाव से होते हैं। जब हम यज्ञ, दान और तप को इस दृष्टिकोण से करते हैं तो मन से मोह, माया, लोभ, क्रोध, ईर्ष्या आदि का विलोपन होता है और कर्म करने के बावजूद यह अहंकार नहीं आता है कि हम कर्म कर रहें हैं और इस वजह से कर्म करके भी व्यक्ति सन्यास के मार्ग पर अग्रसर होता है।
ध्यान रहे कि सन्यास समस्त कर्मों का त्याग नहीं है बल्कि बिना कर्म किये तो सन्यास की प्राप्ति हीं नही हो सकती है। लेकिन कर्म वही करने हैं जिनमें यज्ञ का भाव हो, दान की प्रवृत्ति हो और तप की एकाग्रता हो और यह तभी सम्भव है जब कर्म को कर्तव्य भाव से किया जाय न कि फल के लालच में। कर्म फल के प्रति जागरूक बने रहना एक बात है और उनसे आसक्त होकर उनकी प्राप्ति के लिए ही कर्म करना और बात है। कर्मफल से यह आसक्ति व्यक्ति को मोहपाश में जकड़ती है, उसे उल्टे सीधे, लोभ में पड़कर गलत तरह के कर्मों में प्रवृत्त करती है जो उसे कर्मबन्धन में बाँधते हैं और कर्तापन के भाव से जकड़े रहते हैं। सो कर्म को कर्मफल के लिए नहीं बल्कि कर्म को नैसर्गिक कर्तव्य मानकर करना ही सन्यास का मार्ग खोलता है और यही कर्म अपरिमित सुख और शांति का भी मार्ग देता है।
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