श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 13

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 13

पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे।
साङ्ख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम्‌॥ 13।।
हे महाबाहो! सम्पूर्ण कर्मों की सिद्धि के ये पाँच हेतु कर्मों का अंत करने के लिए उपाय बतलाने वाले सांख्य-शास्त्र में कहे गए हैं, उनको तू मुझसे भलीभाँति जान।


कर्म करना देहधारी मनुष्यों के लिए अनिवार्य है किंतु उनके लिए यह भी आवश्यक है कि वे कर्मों के बंधन से मुक्त हों। सबसे महत्वपूर्ण सत्य यह है कि कर्म के बंधन से मुक्ति कर्म करके ही मिलना सम्भव है, कोई अन्य मार्ग नहीं है। कर्म के बन्धन से मुक्त होने के लिए कर्मफल से मुक्त होना होता है । और कर्मफल से अनासक्त होने के लिए यह आवश्यक है कि हम समझें कि दरअसल हम कर्म करते हीं क्यों हैं। ऐसा क्यों है कि देहधारी को कर्म करना ही पड़ता है। वस्तुतः कर्मों के होने के पाँच कारण बताए जाते हैं। कर्म होने के पाँच कारण सांख्य दर्शन में बताए जाते हैं और ये साँख्य दर्शन उपनिषदों की शिक्षाएँ हैं जिन्हें हम वेदांत भी कहते हैं। यँहा यह समझना अति महत्वपूर्ण है कि कर्म से मुक्ति का अर्थ कर्म नहीं करने से नहीं है बल्कि कर्मबन्धन से मुक्ति का अर्थ है कर्ता भाव से मुक्ति। इसके लिए यह समझना जरूरी है कि सम समझें कि कर्म होते ही क्यों हैं और यह भी समझें कि कर्म होने में व्यक्ति के सेल्फ की कोई भूमिका ही नहीं होती है। जब हम यह समझ लेंगे की व्यक्ति के सेल्फ के कारण नहीं बल्कि अन्य कारण कर्म होने के लिए उत्तरदायी हैं तो कर्तापन के भाव से सेल्फ को मुक्त करना सम्भव हो जाएगा। जैसे ही इस सत्य की वास्तविक अनुभूति होगी कि सेल्फ कर्ता नहीं है कर्म करते हुए भी कर्म के  बन्धन से मुक्ति का मार्ग मिल जाएगा

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