श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18, श्लोक 10
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 10
न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते।
त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः॥ 10।।
जो मनुष्य अकुशल कर्म से तो द्वेष नहीं करता और कुशल कर्म में आसक्त नहीं होता- वह शुद्ध सत्त्वगुण से युक्त पुरुष संशयरहित, बुद्धिमान और सच्चा त्यागी है।
वस्तुतः त्यागी उसे ही कहते हैं जो सात्विक त्याग करता है और ऐसा त्यागी जो कर्मफल की चिंता से पूर्णतः मुक्त होता है वह सत्य रूप में कर्मयोगी कहलाता है। ऐसा व्यक्ति पूर्ण रूप से सत्वगुणी होता है क्योंकि उसके अंदर से सभी प्रकार की अशुद्धियाँ जैसे मोह, माया, क्रोध, लोभ, घृणा, ईर्ष्या आदि का लोप हो चुका होता है। इस स्थिति में व्यक्ति बिना किसी कारण के ही पूरी तरह से प्रसन्नता का अनुभव करता है । उसके मन बुद्धि विविक में से सारी चंचलता समाप्त हो जाती है और वह ज्ञान का अनुभव करता है। शांत मन से व्यक्ति अपने वास्तविक सेल्फ को देख पाता है। सेल्फ के ऊपर पड़े ईगो की परत का जो सभी अशुद्धियों का कारण होता है का विलोपन हो चुका होता है। इस स्थिति में व्यक्ति स्वयं को अपने वास्तविक स्वरूप में देख पाता है। ईगो स्वयं के असत्य स्वरूप को कहते हैं जो हम स्वयं ही गढ़ लिए रहते हैं और उसी के आदि हो चुके होते हैं। इसे छोड़ते ही हमें अपने सत्य का ज्ञान होता है। तब व्यक्ति के मन बुद्धि से सभी शंकाएँ समाप्त हो जाती हैं। इस प्रकार के व्यक्ति को तो नहीं करने योग्य कर्मों से कोई घृणा होती है न ही करने योग्य कर्मों से कोई लगाव ही। वह तो पूरी तरह से कर्मबन्धन से मुक्त होता है। वह तो कर्मों के बंधन से मुक्त होकर कर्म करता है। करने योग्य कर्म उसके स्वभाव में होते हैं। उन्हें वह अच्छा मानकर नहीं करता है । वह स्वभावतः करने योग्य कर्म को करता है। अच्छा बुरा का भाव तब होता है जब वह सीख रहा होता है लेकिन सीख लेने के पश्चात उसके लिए न कुछ अच्छा है न बुरा है बल्कि करने योग्य कर्म तो उसके स्वभाव के अंग बन चुके होते हैं और वह चूँकि कर्म के परिणाम के बंधन से स्वयं को मुक्त कर चुका होता है सो उसके लिए घृणा करना या लगाव रखना सम्भव नहीं रह जाता है। सूर्य के उदाहरण से इसे समझा जा सकता है। जो सूर्य नहीं है, जो सूर्य से अलग से उसे दिन और रात का, प्रकाश और अंधकार का अनुभव होता है। लेकि। सूर्य तो निरन्तर प्रकाश युक्त होता है सो उसके लिए न कभी दिन है और न कभी रात बल्कि उसके लिए तो निरन्तर ही प्रकाश है। यही स्थिति कर्मबन्धन से मुक्त कर्मयोगी की होती है। उसके मन से सारी अशुद्धियाँ समाप्त हो चुकी होती हैं तो उसके लिए क्या अच्छा, क्या बुरा। वह पाप और पुण्य से परे होता है। पाप और पुण्य, अच्छा और बुरा इनको हमारा ईगो पहचानता है। जब तक हममें अपना ईगो है हम अच्छा और बुरा का फर्क करते हैं । लेकिन ईगो से मुक्त होकर व्यक्ति इस फर्क से परे हो जाता है क्योंकि तब कर्म और कर्मफल के बंधन से वह मुक्त होता है। उस स्थिति में उसके अंदर न तो किसी कर्म से घृणा होती है न किसी कर्म से लगाव। सो ऐसा व्यक्ति स्वयं तो स्वभावतः सिर्फ करने योग्य कर्म ही करता है लेकिन इसके लिए उसे कोई अहंकार नहीं रह जाता है और न ही काम्य कर्म यानी कामनाओं के वशीभूत होकर जो कर्म करते हैं उनके प्रति और उनके कर्मों के प्रति उसे कोई दुराव ही होता है। उसके अंदर का मैं और मेरा तो समाप्त हो चुके होते हैं।
ध्यान रहे कि सिद्ध पुरुष के ये गुण उसके अपने होते है। । दूसरा कोई उसका नकल नहीं कर सकता है। सिद्धि की यह स्थिति कर्मयोग के साधना से प्राप्त होती है। यदि कोई अन्य जो इस साधना को नहीं करता है और सिद्ध पुरुष की नकल मात्र करना चाहता है तो औंधे मुँह गिरता है। जिसे इस स्थिति में पहुँचना है उसे स्वयं ही इस साधना को करना होगा, स्वयं ही कर्मयोगी बनना होगा।
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