श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 , (श्लोकरहित)
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 1 से 12 तक
सन्यास और त्याग क्या है? सन्यास/त्याग कितने प्रकार का होता है?त्याग और कर्म में क्या सम्बन्ध है? क्या कर्मों को छोड़ देना ही मोक्ष का मार्ग है? त्यागी/सन्यासी के लक्षण क्या हैं?
(श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 1 से 12 के आधार पर)
मैं ब्रह्म हूँ।
मैं सर्वोच्च वास्तविकता हूँ।
मैं अनंत हूँ।
मैं इस शरीर से बना हूँ जो पदार्थ है। जब हम गहराई में जाते हैं तो हम पाते हैं कि हम पदार्थ के अतिरिक्त ज्ञान, बुद्धि, विचारों, , भावनाओं आदि से बने हैं। लेकिन यह जागरूकता इस शरीर तक ही सीमित नहीं है। यह हमारे शरीर से परे चला जाता है। यह जागरूकता असीमित है और सर्वव्यापी है जो सम्पूर्ण शरीर, मन, बुद्धि, भावनाओं को आच्छादित करती है। इस असीमित जागरूकता या चेतना को ब्रह्म कहा जाता है। इस प्रकार मैं ब्रह्म हूँ।
लेकिन यह समझना कि मैं ब्रह्म हूँ इतना आसान नहीं है। इस वास्तविकता को समझने के लिए हमें अपने भीतर बहुत यात्रा करनी पड़ती है, स्वयं के साथ बहुत प्रयोग करने पड़ते हैं। तब पता चलता है कि मैं ब्रह्म हूँ। यह सिखाया नहीं जा सकता। लेकिन इस सत्य को स्वयं अनुभव किया जा सकता है और जो प्रयोग करने की आवश्यकता है वह साधना कहलाती है।
श्रीमद्भगवद्गीता इसी यात्रा को करने की प्रयोगविधि है जिसके अंत में व्यक्ति ब्रह्ममय हो जाता है। श्रीमद्भगवद्गीता में कुल अठारह अध्याय हैं।
पहले छह अध्यायों से पता चलता है कि मैं कौन हूं। अपने बारे में ज्ञान की कमी हमें भ्रम, शोक, दुख, अपने कर्तव्य के बारे में समझ की कमी, मोह, माया और जीवन से असंतोष की ओर ले जाती है। यह भ्रांति प्रथम अध्याय में प्रकट हुई है। इस भ्रांति को दूर करने के लिए अध्याय 2 में यह उद्घाटित किया गया है कि मैं यह नश्वर शरीर नहीं अपितु अमर आत्मा या चैतन्य हूँ। लेकिन यह अभी भी भ्रमित करने वाला है। अतः स्वयं को शुद्ध चैतन्य समझने का मार्ग कर्मयोग है जो अध्याय 3, 4 और 5 में प्रकट किया गया है। उपासना का मार्ग, अनुभूति का एक विशेष आध्यात्मिक मार्ग है। यह कर्मयोग अनासक्त होने का मार्ग सिखाता है अर्थात वैराग्य प्राप्त करने का मार्ग जहाँ हम एक साथ इस संसार में रहते हुए अपने संसार से अलग हो जाते हैं। यह अध्याय 6 में पूर्ण होती है जहां ध्यान की कला हमारे सामने प्रकट होती है। इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीता के प्रथम छह अध्यायों में हम जानते हैं कि हम कौन हैं और इसके समझने का मार्ग है आत्मा, कर्मयोग और ध्यान।
दूसरे चरण में हम समझते हैं कि परमात्मा कौन है और यह हम समझते हैं अध्याय 7 से 12 तक में। परम् ब्रह्म अपरा और परा प्रकृति के माद्यम से स्वम् को व्यक्त करता है और हम ब्रह्म को समझने के लिए ज्ञान और अंततः भक्ति का सहारा लेते हैं। अध्याय 12कमें हम भक्ति को समझते हैं जसमें व्यक्ति स्वयं को सम्पूर्ण श्रद्धा और प्रेम के साथ ब्रह्म को समर्पित कर देता है। पहले चरण में "मैं" की अभिव्यक्ति हुई है जिससे हम समझते हैं कि हमारी चेतना सम्पूर्ण जगत में व्याप्त अपरिमित चेतना का ही अंश है और इस प्रकार सम्पूर्ण जगत एक ही ब्रह्म की अभिव्यक्ति है । इस प्रकार एक व्यक्ति ही सभी रूपों में अभिव्यक्त है , कँही कोई भेद नहीं है। इससे जो भेदरहित श्रद्धा और निष्ठा तथा प्रेम प्रस्फूटित होता है वही हमारे समक्ष परम् ब्रह्म को अभिव्यक्त करता है।
अंतिम छह अध्याय जो अध्याय 13 से 18 तक है वहाँ "मैं" "ब्रह्म" में विलीन होता है और इस एकत्व होने का मार्ग है त्याग और सन्यास। त्याग या सन्यास समग्रता के साथ एकत्व प्राप्त करने का अंतिम चरण है। सबको अहंकार है। वह अहंकार "मैं" के अर्थ में परिलक्षित होता है। जब "मैं" की भावना को त्याग दिया जाता है तो सर्वोच्च ब्रह्म के साथ एकत्व का ज्ञान प्राप्त होता है।
पहला सोपान कर्मयोग है। कर्मयोग में हम अपने कर्म को परमात्मा को समर्पित कर देते हैं और इस प्रकार अहंकार की गांठें खुल जाती हैं। भक्ति के माध्यम से हम दूसरों के साथ अपनी पहचान बनाने लगते हैं और "मैं" और कमजोर हो जाता है। ज्ञान के माध्यम से हम समग्रता के साथ एकत्व के महत्व को समझते हैं और ध्यान के चरण में "मैं " का अंतिम त्याग होता है अर्थात अहंकार का समूल नाश होता है। इस प्रकार आत्मज्ञान प्राप्त करने का मार्ग त्याग और सन्यास का मार्ग है जहाँ हम अपने अहंकार को छोड़ते हैं और समग्रता के साथ पहचान करते हैं।
सन्यास या त्याग की यह खोज "मैं " को छोड़ने की यात्रा है जो अहंकार है। अध्याय 13 शुरू होने वाली तीसरी शिक्षा का त्याग अथवा सन्यास की तरफ ली जाती है और 18वें अध्याय में त्याग या सन्यास का विस्तार से वर्णन किया गया है और ऐसा करने में संपूर्ण भागवत गीता का उपदेश सार रूप में दिया गया है।
जब तक अहम यानी ईगो का त्याग नहीं हो जाता है, जीवन का उद्देश्य नहीं प्राप्त होता है। कर्मयोग, जिसमें करने योग्य कर्म बिना फल से बंधे परम् को समर्पित करने से अहम यानी ईगो का बंधन ढीला होते जाता है। भक्ति में हम देखते हैं कि हमारे ही सेल्फ का विस्तार सभी में है, हम सभी एक ही परमात्मा की सामान सभिव्यक्ति भर हैं सो सभी के प्रति हमें प्रेम होता है और परिणामतः अहम या ईगो और कमजोर हो जाता है। ध्यान और भक्ति के योग से मैं और मेरा की भावना समाप्त होती है और यही अहम यानी ईगो की समाप्ति है और ब्रह्म की प्राप्ति है। वस्तुतः हम ब्रह्म को किसी तरह नहीं पा सकते हैं सिवाय एक मार्ग के और वह मार्ग है ईगो का त्याग ।
श्रीमद्भगवद्गीता के अबतक के विवरण से यह तो स्पष्ट हो चुका है कि मानव जीवन का प्राथमिक उद्देश्य वह प्रकाश पाना है जिससे प्रकाशित होकर वह ब्रह्ममय हो जाता है। उसके समस्त अवगुण, दुर्गुण, पाप, असत्य, आदि समाप्त होकर उसके पास दैवी सम्पदा रह जाती है जो उसे पुण्यमयी बनाती है जिस स्थिति में उसमें और ब्रह्म यानी परमात्मा कि स्थिति में कोई फर्क नहीं रह जाता है। इस अवस्था को प्राप्त करने का अंतिम सोपान सन्यास और त्याग है सो यह प्रश्न स्वाभाविक है कि सन्यास और त्याग ठीक ठीक क्या है और इस अवस्था को प्राप्त कैसे किया जा सकता है।
इस प्रश्न का ठीक ठीक उत्तर उसी के पास है जो समस्त संसार को अपनी बाहों में आलिंगन में ले सकता है यानी प्रेममय हो, जिसे इन्द्रियों पर पूर्ण नियन्त्र हो और जो असत्य और अनाचार का नाशक हो। इसी लिए प्रश्नकर्ता अर्जुन ने यह प्रश्न कृष्ण से करते वक़्त वह उन्हीं महाबाहो, ऋषिकेश और केशनिषदन नाम से सम्बोधित करता है। श्रीकृष्ण के ये नाम उनके जैसे गुरु के विशेषणों को अभिव्यक्त करने हेतु ही प्रयुक्त हुए हैं।
सन्यास और त्याग के सम्बंध में तात्कालिक प्रचलित विचारों के अनुसार चार प्रकार के मत बतलाये गए हैं। इनको समझने के पहले कर्मों के प्रकार को एक बार फिर से उनके उपयोगिता के दृष्टि से समझना आवश्यक है। इसके अनुसार
काम्य कर्म वो होते हैं जनमन में किसी इक्षा पूर्ति की भावना रखकर किये जाते हैं जो स्वभावतः स्वार्थसिद्धि के लिये और अपने ईगो को सन्तुष्ट करने के उद्देश्य से किये जाते हैं। स्त्री, पुत्र और धन आदि प्रिय वस्तुओं की प्राप्ति के लिए तथा रोग-संकटादि की निवृत्ति के लिए जो यज्ञ, दान, तप और उपासना आदि कर्म किए जाते हैं, उनका नाम काम्यकर्म है।
नैमित्य कर्म हैं जो परिस्थितिजन्य होते हैं जैसे शरीर सम्बन्धी कर्म ।
कुछ कर्म निषिद्ध कर्म होते हैं अर्थात जिनका किया जाना निषिद्ध माना जाता है।
अब सन्यास और त्याग के जो तात्कालिक प्रचलित विचार थे उनके अनुसार
1. काम्य कर्मों और निषिद्ध कर्मों को छोड़ना ही सन्यास है।
2. जबकि कर्मफल से सम्बद्धता को छोड़ना त्याग माना गया है।
3.कुछेक विचारकों का मत रहा कि चूँकि कर्मों से मन में किसी न किसी प्रकार दूषित भावना का आगमन होता ही है सो सभी कर्मों को त्याग देना चाहिए।
4.कुछ विचारकों का मत है कि चूँकि यज्ञ, दान और तप ऐसे कर्म हैं जो ब्रह्म की प्राप्ति में सहायक हैं सो उनको नहीं त्यागना चाहिए।
प्रश्न है कि त्याग और सन्यास क्या है। इस प्रश्न का बहुत अधिक महत्व है क्योंकि श्रीमद्भागवद्गीता की शिक्षाओं के अनुसार व्यक्ति को जिन मार्गों से चलकर स्थाई सुख और शांति की प्राप्ति होती है उन मार्गों पर चलने के त्याग और सन्यास का अप्रतिम महत्व कहा जा चुका है। परंतु जैसा कि प्रायः होता है प्रत्येक महत्वपूर्ण विषय पर चिंतकों का विचार भिन्न भिन्न होता है वैसे ही त्याग और सन्यास के सम्बंध में भी तात्कालिक विचारकों के अपने अपने मत थे जिनके विषय में कहा गया है। उन विचारकों के मतों के जानने के पश्चात हम देखते हैं कि योगेश्वर श्रीकृष्ण का मत है।
ध्यान, भक्ति और योग के द्वारा व्यक्ति अपने ईगो का आवरण उतार कर स्वयं को प्राप्त करता है। ध्यान की अवस्था में व्यक्ति स्वयं को पहचानने लगता है । जब ध्यान भक्ति से ओत प्रोत हो तो ध्यान की गहराई बढ़ जाती है और अंत में त्याग के द्वारा व्यक्ति अपने बचे खुचे ईगो को भी तज देता है। स्वार्थपरक इक्षाओं वाली क्रियाओं को तजना ही सन्यास है। कर्म तो करना ही है, कर्मों को छोडना एक निरर्थक सोच है। वस्तुतः व्यक्ति बिना कर्म किये नहीं रह सकता है। प्रत्येक कर्म में मन और बौद्धिकता का योगदान होता ही है। सो जब हम कर्म करते हैं तो हमारा कर्म के परत जो दृष्टिकोण रहता है वह हमें प्रसन्नताआ देता है या दुखी करता है सो कर्म किस दृश्टिकोण से किया जाता है यह अति महत्वपूर्ण है। कर्मफल से न तो हमें खुशी मिलती है और न दुख। दरअसल कर्म करने के पीछे हमारी जो बौद्विकता होती है अथवा जो हमारा दृश्टिकोण होता है उसी से हमें या तो सुख मिलता है या दुख। जो दृष्टिकोण नकारात्मक भाव से कर्म कराते हैं वे ही पाप हैं जबकि जो दृषिकोंण धनात्मक भाव से कर्म कराते हैं वे पूण्य हैं। पाप कर्म मन को उद्वेलित और दुखी करते हैं। सो कर्म ऐसे करना चाहिए जिससे न सिर्फ मनवांछित अच्छे और मनोवांछित परिणाम ही मिले बल्कि जिनको करने से मन में प्रसन्नताआ और सुख और शांति भी हो।
त्याग और सन्यास को समझने के लिए सबसे पहले हमें समझना होता है कि वे कर्म कौन से हैं जिनको करने से और कैसे करने से हम सन्यास के लक्ष्य को प्राप्त कर पाते हैं। त्याग और सन्यास दोनों एक दूसरे से जुड़े हुए हैं।
त्याग से असंबद्धता को त्याग कहते हैं। सर्वप्रथम हम कर्मफल से स्वयं को असम्बद्ध करते हैं और उसके उपरांत स्वार्थपरक इक्षाओं वाले कर्मों को भी तज देते हैं। अंत में स्वयं के कर्ता भाव को भी छोड़ देते हैं जिससे हमारे अंदर "मैं" का ईगो पूर्णतः समाप्त हो जाता है। "मैं" से "मेरा" बना होता है। सो "मैं" के साथ "मेरा" भी समाप्त होता है। जैसे जैसे मेरा समाप्त होता है मैं भी समाप्त होता है।
यज्ञ , दान, और तप को छोड़कर जो भी कर्म हैं वे सभी कर्म कर्म करने वाले के मन में कुछ न कुछ नकारात्मक भाव को उतपन्न करते ही हैं जैसे, लगाव, ईर्ष्या, क्रोध, लोभ, आदि और ऐसे कर्म व्यक्ति और समाज के संरचना में भी उद्वेलन उतपन्न करते ही हैं और ऐसे कर्म निषिद्ध कर्म हैं जिनको त्यागना ही चाहिए, तभी स्वयं के मैं और मेरा से मुक्ति मिल सकती है , अन्यथा नहीं। ये कर्म हमारे मन में और मन के बाहर संसार में दोष पैदा केते हैं।
अतः व्यक्ति को चाहिए कि निषिद्ध और काम्य कर्मों को छोड़कर यज्ञ, दान और तप वाले कर्म जरूर करे क्योंकि यही तीन कर्म व्यक्ति को कर्मबन्धन में कर्म करने के बावजूद बांधते नहीं हैं।
यज्ञ का तातपर्य है भक्ति , यानी श्रद्धा भाव से समर्पण के साथ आने दायित्व वाले कर्मों को जरूर करे। प्रत्येक व्यक्ति की जबाबदेही स्वयं के प्रति, परिवार के प्रति, समाज और देश के प्रति और समस्त संसार के प्रति होती है, सो प्रत्येक व्यक्ति को अपनी जिम्मरदारियों के प्रति सचेत और सचेष्ट होना ही चाहिए। एक के कर्म दूसरों को भी प्रभावित करते हैं सो कर्मफल जो मात्र अपने मनोकुल हों लेकिन अपनी जिम्मेदारियों के प्रति उदासीन या नकारात्मक हों पूरे परिवेश के लिए नुकसानदेह होते हैं। सो व्यक्ति को चाहिए कि स्वयं, परिवार, समाज, राष्ट्र, संसार और समस्त चराचर , दृश्य-अदृश्य जगत के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझकर उनको निष्पादित करे और कर्म यज्ञ कर्म हैं। जब हम कर्म करते हैं लेकिन कर्म करने में भक्ति यानी समर्पण का भाव नहीं हो तो वह कर्म बन्धनकारी होता है। और वह यज्ञ कर्म होता भी नहीं है।
दान का अर्थ है कि जो कुछ हमारे पास भौतिक और बौद्धिक है उसे अपने पास अपनी आवश्यकता भर रखकर अपने परिवेश के साथ साझा कर लेना। दान का भाव मन में लोभ, लालच, ईर्ष्या, मोह आदि भाव नहीं आने देता है। साथ ही इसके द्वारा हम अपने परिवेश के प्रति अपना ऋण भी चुकाते हैं और समाज में सहयोग और सहकारिता का भाव बढ़ता है। एक की प्रगति दूसरे को भी प्रगति के पथ पर ले जाती है।
और जब तन, मन , बुद्धि, विवेक सभी को एकाग्र कर एक ही दिशा में एक ही लक्ष्य को समर्पित कर हम उद्द्यत होते हैं तो वही तप है।
यज्ञ, दान और तप से मन की अशुद्धियाँ दूर होती हैं। अशुद्धियों से तात्पर्य है मन के नकारात्मक भावों का होना । अशुद्धियों को दूर करने से हम अधिक से अधिक शांतिपूर्ण, शांत और खुश होते हैं और फिर हम ध्यान के लिए कुछ खास किए बिना ध्यान के चरण तक पहुंच जाते हैं। इस प्रकार कर्म (यज्ञ, दान और तप) करना हमें ध्यान की ओर ले जाता है जो वर्तमान क्षण में होता है न कि अतीत या भविष्य में। इस प्रकार कर्म करने से हम कर्म करते हुए ध्यान की अवस्था में होते हैं, अन्यथा हम चंचल चित्त वाले, माया, मोह, लोभ, घृणा आदि भावों से घिरे रहकर अस्थिर रहते हैं और इस कारण सभी भौतिक सुविधाओं के बावजूद बेचैन और दुखी रहते हैं।
इस विविरण से स्पष्ट है कि व्यक्ति को नियत कर्म तो करने हैं लेकिन कर्म फल से असंबद्धता होनी चाहिए। यज्ञ, दान, तप जैसे कर्तव्य कर्म तो करने हैं लेकिन कर्मफल के लिए ये कर्म नहीं करने होते हैं। कर्मफल के त्याग का तातपर्य है कि व्यक्ति को कर्तापन के भाव से मुक्त होकर सिर्फ कर्तव्य निर्वहन के लिए कर्म करने होते हैं। वस्तुतः यह फल त्याग का दृष्टिकोण ही है जो कर्म को यज्ञ, दान और तप में परिवर्तित कर देता है। इसके विपरीत जब व्यक्ति फल से आसक्त होकर कर्म करता है तो उसकी दृष्टि वर्तमान के कर्म पर न होकर भविष्य के फल पर होती है और नतीजा यह निकलता है कि न तो कर्म सही ढंग से हो पाते हैं और न ही फल ही फल की प्राप्ति ही मनोवांछित ढंग से हो पाती है। लेकिन कर्मफल के साथ आसक्ति के त्याग से ध्यान वर्तमान के कर्म पर टिका होता है और कर्म कर्तव्य भाव से होते हैं। जब हम यज्ञ, दान और तप को इस दृष्टिकोण से करते हैं तो मन से मोह, माया, लोभ, क्रोध, ईर्ष्या आदि का विलोपन होता है और कर्म करने के बावजूद यह अहंकार नहीं आता है कि हम कर्म कर रहें हैं और इस वजह से कर्म करके भी व्यक्ति सन्यास के मार्ग पर अग्रसर होता है।
ध्यान रहे कि सन्यास समस्त कर्मों का त्याग नहीं है बल्कि बिना कर्म किये तो सन्यास की प्राप्ति हीं नही हो सकती है। लेकिन कर्म वही करने हैं जिनमें यज्ञ का भाव हो, दान की प्रवृत्ति हो और तप की एकाग्रता हो और यह तभी सम्भव है जब कर्म को कर्तव्य भाव से किया जाय न कि फल के लालच में। कर्म फल के प्रति जागरूक बने रहना एक बात है और उनसे आसक्त होकर उनकी प्राप्ति के लिए ही कर्म करना और बात है। कर्मफल से यह आसक्ति व्यक्ति को मोहपाश में जकड़ती है, उसे उल्टे सीधे, लोभ में पड़कर गलत तरह के कर्मों में प्रवृत्त करती है जो उसे कर्मबन्धन में बाँधते हैं और कर्तापन के भाव से जकड़े रहते हैं। सो कर्म को कर्मफल के लिए नहीं बल्कि कर्म को नैसर्गिक कर्तव्य मानकर करना ही सन्यास का मार्ग खोलता है और यही कर्म अपरिमित सुख और शांति का भी मार्ग देता है।
सन्यास की प्राप्ति के लिए जितना कर्म करना आवश्यक है उतना ही त्याग भी जरूरी है लेकिन प्रश्न उठता है कि कौन सा त्याग किया जाए। कर्म भी अनिवार्य है और त्याग भी। यह स्थिति भ्रम उतपन्न करती है। सो इसे ठीक से समझना जरूरी है कि किस चीज का त्याग किया जाय कि कर्म भी हो और त्याग भी ताकि सन्यास का मार्ग प्राप्त हो और मन-बुद्धि प्रकाशित हो सके। सो क्या त्याज्य है इसे समझना जरूरी है।
कुछ कर्म कर्तव्य कर्म हैं अर्थात नियत हैं जिनमें यज्ञ, दान और तप आते हैं। यदि हम अपने कर्तव्य कर्मों का त्याग करते हैं तो यह अनुचित है और इसी कारण इस प्रकार के त्याग को तामसी त्याग कहा गया है। कर्तव्य कर्म तो हर हालत में करने ही हैं। स्वयं के प्रति, परिवार और समाज, राष्ट्र और संसार और सम्पूर्ण मानवता के प्रति हमारे कर्तव्य नियत हैं जो हमें अपनी स्थिति के अनुसार करने ही हैं। यही हमारा स्वधर्म भी है। यदि हम इसका त्याग करते हैं तो हम सन्यास के मार्ग पर चल ही नहीं सकते हैं। ये तामसी त्याग हैं। दरसल यह त्याग नहीं आलस है, कर्तव्य से भागना है, पलायन है। पलायन और त्याग एक नहीं होते, पलायन और सन्यास विपरीत हैं। और यह होता है कर्मों के प्रति हमारी भ्रामक सोच के कारण।
दूसरी तरफ कई बार कर्तव्य कर्मों के निष्पादन हम इसलिए भी नहीं करते हैं क्योंकि हमें लगता है कि इनके निष्पादन में ढेर सारी कठिनाइयाँ हैं । मन और शरीर को मिलने वाली कठिनाइयों के भय से जब कर्मों का त्याग किया जाता है तो वह राजसी त्याग है। इस त्याग से भी पलायन का ही बोध होता है और इससे कोई आध्यात्मिक प्रकाश नहीं मिलता है, अपितु व्यक्ति और व्यथित और निराश ही होता है। तामसी त्याग की तरह राजसी त्याग भी वरणीय नहीं है।
वस्तुतः मोक्ष यानी कर्मबन्धन से मुक्ति के लिए जिस त्याग और सन्यास के मार्ग की आवश्यकता होती है वह सात्विक त्याग है। तामस और राजस त्याग से व्यक्ति की कोई प्रगति नहीं होती है अपितु उसका भ्रम, मोह और भय ही बढ़ता है। इसके विपरीत सात्वित त्याग व्यक्ति को कर्म करते हुए भी कर्मबन्धन से मुक्ति दिलाता है। दरअसल जब हम अनिवार्य कर्म यानी यज्ञ, दान और तप कर्म करते हैं और कर्म करते हुए कर्मफल की चिंता अथवा लालसा से स्वयं को मुक्त रखते हैं तो वही सात्विक त्याग कहलाता है। सात्विक त्याग का अर्थ है कर्मफल की वासना अथवा लालसा का त्याग। ऐसी स्थिति में व्यक्ति सिर्फ कर्म(यज्ञ, तप, दान) पर केंद्रित रहता है, उसके परिणाम पर नहीं। इस स्थिति में वर्तमान का महत्व होता है और कर्म किसी फल की लालसा में नहीं किये जाते हैं, अपितु कर्म करने किछे कर्म यानी यज्ञ, दान और तप करने का कर्तव्य बोध होता है। कर्तव्य वश कर्म करते करते व्यक्ति बिना फल की कामना के कर्म करने का अभ्यस्त हो जाता है। इस स्थिति में पहुँचने पर व्यक्ति कर्म करता हुआ भी कर्म से मुक्त होता है, उसमें कर्तापन का भाव ही नहीं रह जाता सो न फल की कामना होती है, न ही मोह और मोह जनित माया, अहंकार, लोभ, क्रोध या ईर्ष्या ही शेष रह जाते हैं। कर्म तो करना ही है। तो फिर व्यक्ति को चाहिए कि वह यज्ञ भाव से दान की प्रवृत्ति रखते तप करते हुए कर्म करे और परिणाम से यानी भविष्य की अपेक्षाओं से मुक्त रहे। तब कर्म करते हुए भी व्यक्ति कर्म का त्यागी होता है और सन्यास के मार्ग पर अग्रसर रहता है। यानी कर्मयोग ही सन्यास की तरफ़ ले जाने वाला मार्ग है।
वस्तुतः त्यागी उसे ही कहते हैं जो सात्विक त्याग करता है और ऐसा त्यागी जो कर्मफल की चिंता से पूर्णतः मुक्त होता है वह सत्य रूप में कर्मयोगी कहलाता है। ऐसा व्यक्ति पूर्ण रूप से सत्वगुणी होता है क्योंकि उसके अंदर से सभी प्रकार की अशुद्धियाँ जैसे मोह, माया, क्रोध, लोभ, घृणा, ईर्ष्या आदि का लोप हो चुका होता है। इस स्थिति में व्यक्ति बिना किसी कारण के ही पूरी तरह से प्रसन्नता का अनुभव करता है । उसके मन बुद्धि विविक में से सारी चंचलता समाप्त हो जाती है और वह ज्ञान का अनुभव करता है। शांत मन से व्यक्ति अपने वास्तविक सेल्फ को देख पाता है। सेल्फ के ऊपर पड़े ईगो की परत का जो सभी अशुद्धियों का कारण होता है का विलोपन हो चुका होता है। इस स्थिति में व्यक्ति स्वयं को अपने वास्तविक स्वरूप में देख पाता है। ईगो स्वयं के असत्य स्वरूप को कहते हैं जो हम स्वयं ही गढ़ लिए रहते हैं और उसी के आदि हो चुके होते हैं। इसे छोड़ते ही हमें अपने सत्य का ज्ञान होता है। तब व्यक्ति के मन बुद्धि से सभी शंकाएँ समाप्त हो जाती हैं। इस प्रकार के व्यक्ति को तो नहीं करने योग्य कर्मों से कोई घृणा होती है न ही करने योग्य कर्मों से कोई लगाव ही। वह तो पूरी तरह से कर्मबन्धन से मुक्त होता है। वह तो कर्मों के बंधन से मुक्त होकर कर्म करता है। करने योग्य कर्म उसके स्वभाव में होते हैं। उन्हें वह अच्छा मानकर नहीं करता है । वह स्वभावतः करने योग्य कर्म को करता है। अच्छा बुरा का भाव तब होता है जब वह सीख रहा होता है लेकिन सीख लेने के पश्चात उसके लिए न कुछ अच्छा है न बुरा है बल्कि करने योग्य कर्म तो उसके स्वभाव के अंग बन चुके होते हैं और वह चूँकि कर्म के परिणाम के बंधन से स्वयं को मुक्त कर चुका होता है सो उसके लिए घृणा करना या लगाव रखना सम्भव नहीं रह जाता है। सूर्य के उदाहरण से इसे समझा जा सकता है। जो सूर्य नहीं है, जो सूर्य से अलग से उसे दिन और रात का, प्रकाश और अंधकार का अनुभव होता है। लेकि। सूर्य तो निरन्तर प्रकाश युक्त होता है सो उसके लिए न कभी दिन है और न कभी रात बल्कि उसके लिए तो निरन्तर ही प्रकाश है। यही स्थिति कर्मबन्धन से मुक्त कर्मयोगी की होती है। उसके मन से सारी अशुद्धियाँ समाप्त हो चुकी होती हैं तो उसके लिए क्या अच्छा, क्या बुरा। वह पाप और पुण्य से परे होता है। पाप और पुण्य, अच्छा और बुरा इनको हमारा ईगो पहचानता है। जब तक हममें अपना ईगो है हम अच्छा और बुरा का फर्क करते हैं । लेकिन ईगो से मुक्त होकर व्यक्ति इस फर्क से परे हो जाता है क्योंकि तब कर्म और कर्मफल के बंधन से वह मुक्त होता है। उस स्थिति में उसके अंदर न तो किसी कर्म से घृणा होती है न किसी कर्म से लगाव। सो ऐसा व्यक्ति स्वयं तो स्वभावतः सिर्फ करने योग्य कर्म ही करता है लेकिन इसके लिए उसे कोई अहंकार नहीं रह जाता है और न ही काम्य कर्म यानी कामनाओं के वशीभूत होकर जो कर्म करते हैं उनके प्रति और उनके कर्मों के प्रति उसे कोई दुराव ही होता है। उसके अंदर का मैं और मेरा तो समाप्त हो चुके होते हैं।
ध्यान रहे कि सिद्ध पुरुष के ये गुण उसके अपने होते है। । दूसरा कोई उसका नकल नहीं कर सकता है। सिद्धि की यह स्थिति कर्मयोग के साधना से प्राप्त होती है। यदि कोई अन्य जो इस साधना को नहीं करता है और सिद्ध पुरुष की नकल मात्र करना चाहता है तो औंधे मुँह गिरता है। जिसे इस स्थिति में पहुँचना है उसे स्वयं ही इस साधना को करना होगा, स्वयं ही कर्मयोगी बनना होगा।
प्रश्न है कि त्याग क्या है। तो यह बहुत ही स्पष्ट है कि शरीर धारण करने वाले के लिए यह सम्भव ही नहीं है वह शरीर सम्बंधित सभी कर्मों का त्याग कर दे। देहधारी जीवन ऐसा नहीं कर सकता है। इस स्थिति में सबसे उत्तम स्थिति यही है कि व्यक्ति कर्म तो करे लेकिन उसके फल के बंधन से मुक्त हो। यही स्थिति शरीरधारी के लिए त्याग की स्थिति है। यही स्थिति कर्म करते हुए भी कर्मों में लिप्त होने से बचाती भी है। सो त्यागी वह है जो करने योग्य कर्मों को करते हुए भी उन कर्मों के कर्मफल से आसक्त हुए बिना कर्म करता है।
कर्म करना व्यक्ति के लिए शरीर रहते अनिवार्य है लेकिन कर्मफल से अनासक्ति सीखनी होती है, इसका अभ्यास करना होता है। अगर व्यक्ति अपने अभ्यास में सफल हो जाता है यानी कर्म को स्वभावतः करते हुए उसके परिणाम के बंधन से नहीं बन्धता है तो कर्मफल उसे प्रभावित भी नहीं कर पाते हैं। किंतु कर्मफल के प्रति आसक्ति रखकर कर्म करने से कर्मों के अनुसार व्यक्ति को कभी अच्छे फल, तो कभी बुरे फल और कभी दोनों का मिला जुला फल मिलता है। इस स्थिति में। व्यक्ति अपनी आसक्ति की वजह से कर्मफल के अनुसार खुश होता है, दुखी होता है और कर्म बन्धन में बंधा रह जाता है। इसके विपरीत अनासक्त भाव से कर्म करते हुए व्यक्ति को उसके कर्म कामना, वासना से बांध नहीं पाते हैं और वह कर्म करते हुए भी कर्म से यानी कर्ता भाव से मुक्त होता है।
*कर्म अकर्म और हिंसा* *(कर्म क्यों करते हैं, कर्म कब अकर्म होता है और हिंसा कब जायज है)*
(अध्याय 18 श्लोक 13 से 17 के आधार पर)
कर्म करना देहधारी मनुष्यों के लिए अनिवार्य है किंतु उनके लिए यह भी आवश्यक है कि वे कर्मों के बंधन से मुक्त हों। सबसे महत्वपूर्ण सत्य यह है कि कर्म के बंधन से मुक्ति कर्म करके ही मिलना सम्भव है, कोई अन्य मार्ग नहीं है। कर्म के बन्धन से मुक्त होने के लिए कर्मफल से मुक्त होना होता है । और कर्मफल से अनासक्त होने के लिए यह आवश्यक है कि हम समझें कि दरअसल हम कर्म करते हीं क्यों हैं। ऐसा क्यों है कि देहधारी को कर्म करना ही पड़ता है। वस्तुतः कर्मों के होने के पाँच कारण बताए जाते हैं। कर्म होने के पाँच कारण सांख्य दर्शन में बताए जाते हैं और ये साँख्य दर्शन उपनिषदों की शिक्षाएँ हैं जिन्हें हम वेदांत भी कहते हैं। यँहा यह समझना अति महत्वपूर्ण है कि कर्म से मुक्ति का अर्थ कर्म नहीं करने से नहीं है बल्कि कर्मबन्धन से मुक्ति का अर्थ है कर्ता भाव से मुक्ति। इसके लिए यह समझना जरूरी है कि हम समझें कि कर्म होते ही क्यों हैं और यह भी समझें कि कर्म होने में व्यक्ति के सेल्फ की कोई भूमिका ही नहीं होती है। जब हम यह समझ लेंगे की व्यक्ति के सेल्फ के कारण नहीं बल्कि अन्य कारण कर्म होने के लिए उत्तरदायी हैं तो कर्तापन के भाव से सेल्फ को मुक्त करना सम्भव हो जाएगा। जैसे ही इस सत्य की वास्तविक अनुभूति होगी कि सेल्फ कर्ता नहीं है कर्म करते हुए भी कर्म के बन्धन से मुक्ति का मार्ग मिल जाएगा।
कर्म किये जाने के लिए जो पाँच कारण हैं उनमें सबसे पहला अधिष्ठान है। अधिष्ठान यानी जिसके आश्रय कर्म किया जा है और यह है शरीर। व्यक्ति के लिए शरीर से परे कोई कर्म नहीं होता है। कर्म होने के लिए पहली अनिवार्य शर्त है कि देहधारी ही कर्म करता है।
लेकिन मात्र शरीर के होने भर से कर्म नहीं होता है इसके लिए कर्ता भाव का होना अनिवार्य है। कर्ता भाव के होने का अर्थ है कि इस शरीर से स्वयं की पहचान स्थापित करना यानी ईगो का होना।
तीसरी अनिवार्य शर्त है करण यानी उन माध्यम का होना जिनसे कर्म किया जाता है। ये माध्यम हैं इन्द्रिय, मन, बुद्धि विवेक । इनके माध्यम से ही व्यक्ति कर्म में प्रवृत्त हो पाता है।
लेकिन ये करण तभी कर्म करते हैं जब विभिन्न चेष्टाएँ होती हैं यानी प्राण का होना जिसके अभाव में न तो कर्ता भाव कुछ कर पाता है न ही करण।
लेकिन इन चारों की उपस्थिति के बावजूद कर्म का होना तब तक सम्भव नहीं होता है जब तक दैव न हो यानी वह शक्ति जो व्यक्ति के अंदर तो नहीं है लेकिन जिसकी उपस्थिति कर्म होने के लिए अनिवार्य है। जैसे शरीर भी है, शरीर में स्वस्थ आँख भी है , लेकिन प्रकाश नहीं है तब व्यक्ति अपनी आँखों से देख नहीं पाता। व्यक्ति के नेत्र स्वतः अपने अंदर से प्रकाश उतपन्न भी नहीं कर सकते है और इसके अभाव में व्यक्ति देखने का कर्म नहीं कर सकता है। दैव न हो तो अन्य चार अंततः निश्चेष्ट और निष्प्रभावी हो जाते हैं। दैव को आप कह सकते हैं कि यह आपका भाग्य है अथवा यह प्रकृति की शक्ति है अथवा सम्पूर्ण कॉसमॉस का प्रभाव है। यानी कर्म होने के लिए लिए सब कुछ व्यक्ति के अंदर ही नहीं है बल्कि कुछ है जो उसके बाहर है जिसकी उपस्थिति में व्यक्ति कर्म कर पाता है। भौतिक रूप से समझें तो व्यक्ति के कर्म उसके परिवेश, उसके समाज, आदि वे बाहरी कारक हैं जो व्यक्ति के कर्म करने की क्षमता को प्रभावित करते हैं अथवा निर्धारित करते हैं जो हमेशा व्यक्ति के वश में नहीं होते हैं। कोई इसे पूर्वजन्म का प्रभाव कहता है तो कोई ग्रहों का फेर। दरअसल जो आपके अंदर , आपके वश से बाहर है वही दैव है।
मनुष्य मन, वाणी और शरीर से शास्त्रानुकूल अथवा विपरीत जो कुछ भी कर्म करता है- उसके ये पाँचों कारण हैं।
इससे स्पष्ट है कि व्यक्ति के द्वारा कर्म किये जाने के लिए ये पाँच कारक ही उत्तरदायी हैं। आत्मा यानी व्यक्ति की विशुद्ध चेतना का व्यक्ति के द्वारा कर्मों को किये जाने में कोई योगदान नहीं होता है हालांकि सत्य यह है कि उसकी विशुद्ध चेतना यानी आत्मा उसके कर्मों का द्रष्टा मात्र है,। आत्मा के द्वारा कार्य किये जाने का भ्रम हमारी अज्ञानता का परिचायक होता है। शरीर, इन्द्रिय, कर्ता भाव , प्राण और दैव के द्वारा कर्म सम्पादित होते हैं लेकिन व्यक्ति को लगता है कि उसकी शुद्ध चेतना कर्म कर रही है, वह स्वयं के अस्तित्व को कर्म में लिप्त पाता है और ऐसा उसके अपने कर्त्तापन के भाव की वजह से होता है। जबकि सत्य यह है कि उसकी विशुद्ध चेतना अर्थात उसके आत्मा का उसके कर्मों के होने से कोई लेना देना नहीं होता है। लेकिन उसे लगता है कि गति उसके चेतना में है। उसका भ्रम उसके अंदर सापेक्षता के भ्रम के कारण होता है। करता कोई है लेकिन उसे लगता है कि यह तो वही है जो कर रहा है। और जो कर्ता है वह हमारे तीन गुणों-सत्व, राजस और तमो गुण के कारण है। ऐसा भ्रम कर्म होने के पाँच कारणों से हमारी अज्ञानता के कारण है। कर्म तो इन पाँच के कारण हो रहें है लेकिन व्यक्ति की अज्ञानता और भ्रम उसे अहसास दिलाते हैं कि व्यक्ति ही कर्ता है।
यह भ्रम इसलिए होता है क्योंकि व्यक्ति स्वयं को अपने शरीर, अपनी बुद्धि, अपने इन्द्रिय और आने दैव से स्वयं को पहचानता है । लेकिन जैसे जैसे व्यक्ति इन सब से स्वयं को अलग करते जाता है अर्थात अपनी पहचान को अपने शरीर, इन्द्रिय और बुद्धि-विवेक से अलग करता है उसे ज्ञात होते जाता है कि वस्तुतः वह जो कर्म करता है उसका कर्ता वह यानी उसकी विशुद्ध चेतना यानी आत्मा नहीं है । कर्म होने के लिए तो ये पाँच जबाबदेह हैं लेकिन भ्रमवश व्यक्ति इन पाँच की भूमिका से अनजान होकर यही समझता है कि उसकी आत्मा ही उसके कर्मों का कर्ता है, वही सब कुछ कर रहा है। कर्तापन के इसी भ्रम की वजह से व्यक्ति कर्म और कर्मफल के बंधन से बँधा रह जाता है। ध्यान रहे कि जो भी कर्म करता है वह गतिशील है, और सो परिवर्तनशील भी है और इसी कारण से सत्य नहीं है बल्कि परिवर्तनीय है। यदि कोई परिवर्तन को देखना समझना चाहे तो उसे उस परिवर्तन के सापेक्ष अपरिवर्तनीय होना होता है। गति को गति में आकर नहीं अनुभव किया जाता है बल्कि गति को वही जानता है जो स्थिर है। सो आत्मा अपरिवर्तनीय है, गतिहीन है और सो वह व्यक्ति के द्वारा किये जाने वाले परिवर्तनीय, गतिशील कर्मों का द्रष्टा बना रहता है। यदि आत्मा ही कर्म में लिप्त हो जाये तो वह परिवर्तनीय और अस्थिर हो जाता है । फिर वह क्षयशील हो जाता । लेकिन सत्य तो यह है कि आत्मा अपरिवर्तनीय और अक्षय है औए इसी कारण से वह कर्ता नहीं मात्र द्रष्टा है।
जब व्यक्ति को ज्ञान की प्राप्ति होती है तो उसका अहंकार समाप्त हो जाता है। अहंकार का अर्थ है स्वयं को कर्ता समझना, समझना कि वही कर रहा है । कर्तापन के इस भाव की वजह से व्यक्ति "मैं" के साथ संयुक्त हो जाता है। मैं ही कर्ता हूँ। इस भाव, इस समझ के कारण व्यक्ति को लगता है कि जो कर्म हो रहें हैं उन सब को वही कर रहा है। बस तब क्या, व्यक्ति कर्म और कर्मफल के प्रति आसक्त हो जाता है और ताउम्र कर्म और उसके फल से बंधा हुआ रहता है। लेकिन जब व्यक्ति में कर्तापन का यह भाव नहीं होता है अर्थात जब वह अपने अहंकार से मुक्त जाता है तब कर्म करते हुए भी वह कर्मों से और उनके फलों से आसक्त नहीं होता है।
कर्ता भाव से मुक्त व्यक्ति अपने क्षयशील और असत्य बाहरी पहचानों को छोड़ देता है। वह समझता है कि वह मात्र शरीर भर नहीं है , बल्कि वह पदार्थ निर्मित देह और इन्द्रिय संचालित बुद्धि और भावना से अधिक है। वह मात्र अपना नाम, अपना गोत्र, अपनी जाति और सम्प्रदाय में सीमित नहीं है, और न हीं समय की परिधि में बंधा उम्र की गिनती भर है। वह इन सब से परे है , वही ब्रह्म है, अपरिमित है, सम्पूर्णता का द्योतक है। व्यक्ति समझ जाता है वह सीमित नहीं है बल्कि अविभाज्यकारी ब्रह्म है जो अपरिमित है। उसे ज्ञान हो जाता है कि वह मात्र ज्ञानेन्द्रियाँ नहीं है, वह मात्र कर्मेन्द्रीय नहीं है। तो फिर क्या है? वह समझता है कि वह तो विशुद्ध चेतना है, वही अंतिम सत्य है, वही अंतिम बिना शर्त प्रसन्नता है जो अक्षय है। वही ब्रह्म है।
यह पढ़ने और रटने का ज्ञान नहीं है। बल्कि यह तो केवल और केवल अनुभव से ही प्राप्त होता है जो कर्म करते हुए कर्म और कर्मफल से अनासक्ति से आता है। व्यक्ति की यह अनुभूति उसके बुद्धि को भी साफ करती है। उसकी बुद्धि को भी यह समझ आ जाता है कि व्यक्ति कोई परिमित, सीमित जीव मात्र नहीं है और वह कर्ता नहीं है। सो इस व्यक्ति की बुद्गी भी सीमित लाभ और लोभ, सीमित पहचान में नहीं अटकी रहती है बल्कि उसकी बुद्धि को भी समझ में आ जाता है कि व्यक्ति सीमित पहचान से आगे असीमित सम्पूर्णता का ही द्योतक है। सो इस व्यक्ति की बुद्धि भी कर्म और उसके फल से लिप्त नहीं होती है।
इस प्रकार एक दिव्य और ज्ञानी व्यक्ति भले ही संसार के प्रति जागरूक होता है लेकिन वह स्वयं की पहचान को इस संसार से जोड़कर नहीं समझता है।पहचान तो तब स्थापित होती है जब व्यक्ति स्वयं के प्रति जागरूक होता है और अपने महत्व को, अपने अस्तित्व को स्वयं के बाहर के तत्वों से परिभाषित करता है। वैसी स्थिति तभी तक होती है जब तक उसका "मैं" और "मेरा" शेष रहते हैं। जैसे जैसे मैं और मेरा समाप्त होते जाते हैं बाहरी संसार से व्यक्ति की पहचान भी समाप्त होते जाती है। जैसे जब तक मैं और मेरा है व्यक्ति स्वयं को अपने शरीर के रूप में देखता है, उसे लगता है कि यही शरीर उसकी पहचान है, उसके आस पड़ोस, उसकी सांसारिक छवि ही उसे उसकी पहचान है। कर्तापन के भाव से मुक्त हुआ व्यक्ति कर्म करता हुआ भी कर्म से नहीं आसक्त होता है क्योंकि वह शरीर से कर्म कर रहा होता है और स्वयं को शरीर के रूप में नहीं स्थापित करता है। ऐसी स्थिति में यदि ऐसा व्यक्ति कल्याणार्थ हिंसा भी करता है तो उस हिंसा करने में उसकी कोई आसक्ति नहीं होती है बल्कि मन , बुद्धि और दैव से कल्याणार्थ प्रेरित होकर ही वह हिंसा करता है प्राण और शरीर के द्वारा लेकिन अलिप्त होने के कारण उसके सेल्फ यानी उसके विशुद्ध चेतना को उस हिंसा से कोई आसक्ति नहीं होती है, वह उससे बन्धता नहीं है। ऐसा व्यक्ति स्वयं के शारीरिक स्वरूप और अपने संसार के प्रति जागरूक तो होता है किंतु स्वयं को न तो अपने शरीर से और न हीं अपने संसार से पहचानता है क्योंकि वह इन सब से मुक्त हुआ स्वयं को मात्र अपनी आत्मा से जानता पहचानता है।
उत्थान के मार्ग की समझ
(श्रीमद्भागवद्गीता के अध्याय 18 के श्लोक 18 और 19 पर आधारित)
जिन पाँच कारकों की चर्चा की गई है अर्थात अधिष्ठान, कर्ता भाव, करण, प्राण और दैव, वे सभी कर्म होने के कारण हैं लेकिन कर्म किसकी प्रेरणा से होता है, यह समझना भी जरूरी है। कर्म के प्रेरणास्रोत हैं ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाता।
अब आइए समझें कि ये तीन क्या हैं,
ज्ञाता -जानने वाले का नाम 'ज्ञाता' है,
ज्ञान- जिसके द्वारा जाना जाए, उसका नाम 'ज्ञान' है
ज्ञेय -जानने में आने वाली वस्तु का नाम 'ज्ञेय' है
इनकी समझ व्यक्ति को अपने दायित्वों के निर्वहन में सहायता देता है और व्यक्ति समझ पाता है कि उसे किस प्रकार अपने जीवन में साधना करनी चाहिए। एक ही परिस्थिति में एक ही पदार्थ से बने भिन्न भिन्न मनुष्य भिन्न भिन्न तरह से कर्म करते हैं, भिन्न भिन्न तरह के कर्म करते हैं। ऐसा क्यों होता है?
ज्ञाता आपका अह्महार है। स्वयं से , स्वयं के अवयवों से आपकी पहचान आपको ज्ञाता बनाती है। "मैं देखता हूँ"। यँहा "मैं" ज्ञाता है। मैं अपनी आंखों से अपनी पहचान का तादाम्य बैठाता है। इस प्रकार आपकी इंद्रियां, आपकी बुद्धि, आपका विवेक ज्ञाता की भूमिका में होते हैं। जो देखा जाता है वही ज्ञेय है और देखे जाने की इस प्रक्रिया से जो समझा जाता है वही ज्ञान है। वह सभी जो जाना जाता है, जो जानने योग्य है ज्ञान है वही ज्ञेय है और इस प्रकार सम्पूर्ण संसार और संसार से परे जो कुछ है वह जानने योग्य है जिसे जान लेने पर वही ज्ञान है। जानने की यह प्रक्रिया शरीर से, कर्मेन्द्रियों से, ज्ञानेन्द्रियों से , बुद्धि से और विवेक से सम्पन्न होती है। यह संसार जानने योग्य है और सो यह कर्म की प्रेरणा है।
जो कुछ हम इस संसार और इसके परे जानते हैं वही ज्ञान है, यानी हमारा ज्ञान वही है जितना हम जानते हैं। हम जो जानते हैं , वह हमारे पास लम्बे समय तक बना रहता है। और इसके साथ हमारा ईगो भी होता है जो हमारे व्यक्तित्व, हमारे विवेक और हमारी बुद्धि और इनके साथ हमारे शरीर का तादाम्य भी होता है। हमारा संचित ज्ञान और हमारा ईगो ये दोनों मिलकर हमें ज्ञाता बनाते हैं जो हमारे कर्मों का प्रेरणास्रोत होता है।
इस प्रकार हम समझते हैं कि हमारे द्वारा कर्म होने के पीछे पाँच कारणों(अधिष्ठान, कर्तापन, करण प्राण, और देव) के अतिरिक्त तीन प्रेरक भी होते हैं जो हैं ज्ञान, ज्ञेय, और ज्ञाता। हम जो कर्म करते हैं, उसके पीछे उसे जानने की प्रेरणा होती है, इसके लिए हम अपने पूर्व संचित ज्ञान के आधार पर प्रेरित होते हैं और हम ऐसा इसलिए कर पाते हैं क्योंकि हम स्वयं को अपने ईगो से पहचानते हैं। अगर आग से हाथ जलता है इसका पूर्व संचित ज्ञान हमें नहीं है तो फिर हमारी प्रतिक्रिया यानी हमारा कर्म भिन्न होगा और अगर ये ज्ञान पूर्व से है तो हमारी प्रतिक्रिया यानी हमारा कर्म भिन्न होगा।
इस प्रकार यह संसार, संसार के प्रति हमारी जानकारी और हमारा ईगो(जो पूर्व संचित ज्ञान और शरीर, इन्द्रिय , बुद्धि और विवेक के तादाम्य से बना हुआ) ये सब हमें कर्म करने के लिए प्रेरित करते हैं।
अब समझते हैं कि कर्म के मुख्य अवयव क्या हैं। वैसे तो पाँच कारक मिलकर कर्म होने का के कारण का निर्माण करते हैं लेकिन इनमें से मुख्य रूप से कर्ता, करण और स्वयं कर्म ये तीन को मिलाकर कर्म संग्रह कहते हैं।
अब देखें कि जो कर्म है उनमें सुधार के लिए , उनके परिष्करण के लिए व्यक्ति क्या कर सकता है। इसे दो चरणों में समझें।
पहले चरण में देखे कि कर्मों के होने में जो कारक हैं क्या हम उनमें सुधार कर अपने कर्म में सुधार कर सकते हैं। कर्म संग्रह के तीन में से एक अवयव यानी करण तो सभी में एक हैं, सभी में एक ही ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ है तो फिर उनमें आपका कोई वश नहीं। लेकिन व्यक्ति स्वयं में सुधार कर सकता है और स्वयं कर्म में भी। इस प्रकार यदि व्यक्ति को अपने कर्म परिष्कृत करने हैं तो कर्म होने के पाँच कारणों में से उसे सर्वाधिक स्वयं यानी कर्ता(जो ज्ञाता भी है) को और स्वयं कर्म यानी अपनी क्रियाओं में सुधार लाना होगा।
दूसरे चरण में हम देखें कि कर्म होने
के जो प्रेरक कारण हैं उनमें व्यक्ति क्या सुधार कर सकता है। कर्म होने के जो तीन प्रेरक हैं यानी ज्ञाता(यानी कर्ता), ज्ञेय और ज्ञान उनमें ज्ञेय तो एक ही है और ज्ञाता स्वयं वह व्यक्ति है। ऐसी स्थिति में कर्मों में परिष्करण हेतु ज्ञान में सुधार की अवश्वकता है।
इस प्रकार जब व्यक्ति स्वयं के कर्म को परिष्कृत करने की साधना में प्रवृत्त होता है तो उसे स्वयं यानी कर्ता, स्वयं के ज्ञान और स्वयं क्रिया पर सर्वाधिक ध्यान देना अनिवार्य होता है।
इन तीनों में सुधार हेतु आवश्यक है कि हम इन तीनों यानी ज्ञान, कर्ता और कर्म के भिन्न भिन्न स्वरूपों को समझें।
वही व्यक्ति कर्ता है, यानी कर्म करने वाला है, वही ज्ञाता है अर्थात वही ज्ञान को जानता है और वही भोक्ता भी है यानी अपने कर्मों का परिणाम प्राप्त करने वाला है। अर्थात जब एक व्यक्ति स्वयं में उत्थान चाहता है तो उसे स्वयं के ज्ञान में, स्वयं की क्रियाओं में और स्वयं में ही परिवर्तन लाने होते हैं। लेकिन प्रश्न है कि वह कौन सा मार्ग है जिससे वह इनमें परिवर्तन ला सकता है। तो समझना जरूरी है कि संसार के सभी अवयव तीन गुणों से बने हुए हैं जो हैं सात्विक, राजसी और तामसिक। गुणों में परिवर्तन कर व्यक्ति स्वयं के कर्तापन, स्वयं के ज्ञान और स्वयं के परिणामों में उत्थान या पतन जो चाहे ला सकता है। इसके लिए आवश्यक है कि व्यक्ति इन तीन को यानी कर्तापन को ज्ञान को और कर्म को इन गुणों के अनुसार समझे ताकि उनमें वह अपेक्षित सुधार ला सके।
ज्ञान के प्रकार क्या हैं?
(श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 20 से 22 के आधार पर)
जब व्यक्ति स्वयं के उत्थान की यात्रा पर निकलता है तो उसे निश्चित होना चाहिए कि उसका लक्ष्य है अपने ज्ञान में बढ़ोत्तरी, स्वयं यानी कर्ता के गुण में सुधार और सात्विक कर्म करने की प्रवृत्ति। इसके लिए ज्ञान, कर्ता और कर्म के गुणों के आधार पर उनको समझना पहचानना भी होगा तभी अवांछित से वाँछित की तरफ की यात्रा सफल होती है।
तो आईये, ज्ञान के विषय के समझे कि कौन सा ज्ञान कैसा है जिसे अपनाना चाहिए। अपने गुणों के अनुसार ज्ञान तीन तरह के होते हैं, सात्विक ज्ञान, राजसी ज्ञान और तामसीक ज्ञान।
दरअसल ज्ञान आँखों से परे व्यक्ति के अन्तस् की दृष्टि है, उसका दृष्टिकोण है जिसके अनुसार व्यक्ति स्वयं के साथ, स्वयं का संसार के साथ और स्वयं का ईश्वर के साथ सम्बन्ध देखता है। सभी व्यक्ति एक ही पदार्थ के बने होते हैं किंतु ज्ञान यानी अपने दृष्टिकोण की भिन्नता की वजह से वे एक ही चीज को अलग अलग ढंग से देखते हैं। ज्ञान से दृष्टि प्राप्त होती है और दृष्टि से हम तय करते हैं कि हम स्वयं क्या हैं , संसार के प्रति हम क्या हैं और ईश्वर के साथ हम क्या हैं। कुछ लोग स्वयं को बहुत सामर्थ्यवान समझते हैं तो कुछ स्वयं को बहुत बेचारा। कुछ लोग उत्साह, प्रेम, अनुराग आदि से भरे होते हैं तो कुछ लोग स्वयवकी दृष्टि में हताश, हारे हुए, । यह सब अंतर उस दृष्टि की वजह से है जिससे हम स्वयं का आकलन करते हैं। इसी प्रकार कुछ लोगों के लिए यह संसार मौज मस्ती, धनोपार्जन और बल दिखाने की जगह है तो कुछ लोग इसी संसार में स्वयं की मुक्ति की जगह पा लेते हैं। किसी के लिए यही संसार दुख का सागर है तो कोई इसे अपनी संघर्ष स्थली समझता है। यह अंतर भी स्वयं हमारे ही दृष्टि में अंतर की वजह से है और यह अंतर हमारे अर्जित ज्ञान के गुण के अनुसार ही होता है।
यह सत्य है कि भिन्न भिन्न व्यक्ति, भिन्न भिन्न प्राणी, और निर्जीव भी अलग अलग दिखते हैं। दो व्यक्ति एक से नहीं दिखते जबकि वे एक ही तरह के पदार्थों से बने होते हैं और जैविक रूप से समान होते हैं। भिन्न भिन्न रुप रंग वाले , भिन्न भिन्न पहचान के बावजूद सभी में एक कारक होता है जो सभी में एक ही समान होता है, जिसे विभाजित नहीं किया जा सकता है और यही उसकी आत्मा होती है। जब व्यक्ति की दृष्टि में बाहरी रूप रंग, आकार प्रकार से इतर सभी मानव में मूल अविभाज्य स्वरूप जो उसकी आत्मा है ही आता है और वह व्यक्तियों के इसी मूल स्वरूप के कारण उनमें कोई भेद नहीं करता है और समझता है कि तमाम बाहरी भिन्नताओं के भी सभी एक ही मूल स्वरूप के भिन्न भिन्न अभिव्यक्ति हैं तो उसके ज्ञान को सात्विक ज्ञान कहा जाता है। इसमें मानव, और यँहा तक कि सभी जीवों और निर्जीव में भी भेद भाव नहीं किया जाता है। बल्कि सात्विक ज्ञान तो यही बतलाता है कि सभी एक ही हैं।
भेद देखने के लिए किसी विशेष ज्ञान की आवश्यकता नहीं होती है, वह तो बाहर से दिख ही रहा है कि हर दो चीज, हर दो व्यक्ति भिन्न है लेकिन इस भिन्नता के बावजूद दोनों में अविभाज्यकारी इकाई समान है इसे समझने के लिए सात्विक दृष्टि चाहिये होती है।
जैसे हम समझते हैं कि हम एक राष्ट्र के लोग एक हैं लेकिन जब हमारा ज्ञान और सूक्ष्म तत्व को देखने के योग्य हो जाता है तो हमें लगता है कि चूँकि सभी देशों के निवासी मानव ही हैं सो सभी एक हैं। यह मानवीय दृष्टि है जिसमें हम बाहरी भिन्नता के आधार पर मनुष्यों में भेद नहीं करते हैं। यह मानवीय दृष्टि है।
जब ज्ञान के और सूक्ष्म के स्तर पर हम जाते हैं तो समझते हैं कि मानव और अन्य सभी जीवों में , सभी प्राणियों में जीवन तो एक ही है सो सभी प्राणधारी एक ही हैं । यह जीवनदृष्टि है।
लेकिन और सूक्ष्मतर स्तर पर हम पाते हैं कि जिनमें जीवन है और जिनमें जीवन नहीं है, सभी का अस्तित्व तो है। जीवधारी मनुष्य का भी अस्तित्व है, जीवधारी जानवर का भी अस्तित्व है, जीवधारी पेड़-पौधों का भी अस्तित्व है और निर्जीव नदी , पहाड़, पत्थर आदि का भी अस्तित्व है सो अस्तित्व के स्तर पर सभी में एक हि अविभाजकारी इकाई उपस्थित है और यह दृष्टि अस्तित्व की दृष्टि है।
और इस प्रकार हम समझते हैं कि यह समस्त ज्ञात और अज्ञात ब्रह्माण्ड एक ही इकाई से आच्छादित है जो दृश्य तो नहीं है लेकिन ज्ञेय है जिसे हम भिन्न भिन्न नाम देते हैं और वही ब्रह्म है जो सबों में , सभी कालों में मूल रूप से और पूर्ण रूप से उपस्थित है। यही सत्य है। यही ज्ञान , यही दृष्टि सात्विक है।
और इस प्रकार भेद की समझ से एक कि समझ की यात्रा ही सात्विक ज्ञान की प्राप्ति की यात्रा है। और यह ज्ञान अपने ईगो को त्यागने से आता है। भेद हम अपने ईगो से बनाते हैं जो कृत्रिम है जबकि सार्वभौमिक एकात्मकता स्वाभाविक सत्य है।
इस ज्ञान की प्राप्ति के साथ ही व्यक्ति के अंदर का अंधकार समाप्त हो जाता है और व्यक्ति पूर्ण प्रकाशित रहता है और यही उसका वास्तविक मोक्ष होता है।
सभी सजीव और निर्जीव में एक मूल कारक, ब्रह्म की उपस्थिति को समझकर भेद नहीं करने का ज्ञान सात्विक कहलाता है लेकिन जब व्यक्ति जीव जीव में , जीव निर्जीव में भेद करता है तो वह यह नहीं समझ पाता है कि सभी में एक ब्रह्म ही अवस्थित है। ऐसे में व्यक्ति अपने काँशसनेस को दूसरे से भिन्न समझता है। उसे लगता है कि हर दो भिन्न हैं। वह यह नहीं समझ पाता कि आकार प्रकार की भिन्नता मात्र बाहरी है जो हमें जैविक आंखों से दिखती है। ऐसे व्यक्ति की जैविक और बौद्धिक आँखें एक हो जाती हैं और वह जो देखता है उसी को परम् सत्य समझ लेता है। ऐसा नहीं है कि ऐसा व्यक्ति अपने व्यवहार और आचरण से गलत ही हो लेकिन दो में भिन्नता समझने वाले व्यक्ति में भेद भाव, लोभ लालच, क्रोध, मद, अहंकार आदि का प्रवेश हो जाता है। तब वह किसी को हीन और किसी को उच्च समझ कर , किसी को कीमती तो किसी को मूल्यहीन समझकर अपनी समझ के अनुसार अपनी पसंद बनाकर उसके पीछे भागने लगता है। तब उसके अंदर असंख्य कामनाएँ जन्म लेती रहती हैं जिनकी वजह से उसका चित्त चंचल बना रहता है। यह स्थिति व्यक्ति को शांत, और ब्रह्म के साथ एकाकार होने से रोकती है। यही राजसी ज्ञान कहलाता है।
सभी में एक समान समरूपता देखने और बाहरी अंतर के कारण भेद नहीं करने वाले ज्ञान को सत्वविक ज्ञान कहते हैं जो सभी सजीव और निर्जीव में एक ब्रह्म की उपस्थिति से भिज्ञ होता है। राजस ज्ञान के कारण व्यक्ति चेतना के एकात्मक स्वरूप को नहीं पहचान पाता है जिसकी वजह से भिन्न भिन्न स्वरूपों को एक सूत्र में पिरोने वाले सार्वभौमिक सत्य ब्रह्म को नहीं देख पाता है।
लेकिन जब व्यक्ति सम्पूर्णता के अस्तित्व से ही अनभिज्ञ हो और मात्र किसी एक ही पक्ष को देखे तो इस दृष्टिकोण को तामसी ज्ञान कहते हैं। एकांगी होने की वजह से यह ज्ञान व्यक्ति को कट्टर, उग्र, व्यसनभोगी और हिंसक बना देता है और यह ज्ञान बुद्धि विवेक और तर्क को हर लेता है। इसी एकांगी दृष्टि की वजह से कोई सिर्फ पैसे के पीछे भागता है तो किसी को नशे की लत लग जाती है तो कोई सत्ता को ही सर्वस्व समझ बैठता है तो कोई दिन रात वासना के व्यसन में ही डूबा रहता है। इस तामस ज्ञान की वजह से व्यक्ति सत्य को नहीं देख पाता है और ब्रह्म की समझ तो सिरे से लुप्त रहती है। इस दृष्टि में न कोई तर्क होता है, न ही विवेक। धार्मिक अंधविश्वास और कट्टरता भी इसी की उपज हैं। किसी को लगता है कि मात्र उसी का धर्म श्रेष्ठ है शेष सभी का निकृष्ट है। तब ऐसी स्थिति में उस व्यक्ति में स्वयं की मान्यताओं के प्रति कट्टरता भर जाती है और दूसरों की मान्यताओं के प्रति घृणा। यह उसे हिंसा तक लेकर चली जाती है।
कर्म के प्रकार क्या हैं?
(श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 23 से 25 के आधार पर)
व्यक्ति के द्वारा कर्म किया जाना अवश्यम्भावी होता है क्योंकि उसका कर्म हीं व्यक्ति के स्वयं, संसार और ब्रह्म के साथ के सम्बन्धों को परिभाषित करता है। लेकिन व्यक्ति के कर्म उसकी दृष्टि, उसकी समझ और उसके ज्ञान पर आधारित होती है। अर्थात जैसी व्यक्ति की दृष्टि वैसा उसका कर्म। यही वजह है कि एक ही परिस्थिति में भिन्न भिन्न मनुष्यों के कर्म भिन्न भिन्न होते हैं। चूँकि व्यक्ति के कर्म उसकी दृष्टि यानी ज्ञान पर आधारित होते हैं सो जिस स्तर का ज्ञान व्यक्ति प्राप्त किये रहता है, उसी स्तर के उसके कर्म भी होते हैं। अगर व्यक्ति का ज्ञान सात्विक स्तर का है तो उसके कर्म भी सात्विक हीं होते हैं।
सात्विक ज्ञान के सम्बंध में हम समझते हैं कि जब व्यक्ति की दृष्टि में बाहरी रूप रंग, आकार प्रकार से इतर सभी मानव में मूल अविभाज्य स्वरूप जो उसकी आत्मा है ही आता है और वह व्यक्तियों के इसी मूल स्वरूप के कारण उनमें कोई भेद नहीं करता है और समझता है कि तमाम बाहरी भिन्नताओं के भी सभी एक ही मूल स्वरूप के भिन्न भिन्न अभिव्यक्ति हैं तो उसके ज्ञान को सात्विक ज्ञान कहा जाता है। इसमें मानव, और यँहा तक कि सभी जीवों और निर्जीव में भी भेद भाव नहीं किया जाता है। बल्कि सात्विक ज्ञान तो यही बतलाता है कि सभी एक ही हैं।
इस दृष्टि से लैस व्यक्ति नित्य-नैमित्य कर्म ही करता है न कि काम्य(कामना आधारित) और न ही निषिद्ध कर्म(नहीं करने योग्य कर्म)।व्यक्ति कर्म तो करता है लेकिन कर्म करने के पीछे कोई मंशा, कोई लाभ, कोई कामना पूर्ति के भाव नहीं होते हैं। वह तो सिर्फ अपने स्वभाव के अनुसार, अपनी स्थिति के अनुसार किये जा सकने वाले कर्म को ही करता है। कर्म करने के पीछे कोई एजेंडा नहीं होता है, कर्म करना उसका स्वभाव है सो कर रहा है।
इसके साथ ही सात्विक दृष्टि से उसे यह भी समझ होती है कि कर्मफल से उसे कोई लेना देना नहीं है। चूँकि वह तो कर्म ही स्वभावतः कर रहा है तो फिर कर्मफल से क्यों लगाव हो। जो भी कर्मफल हो उसे उसकी परवाह नहीं होती है।
इसका तातपर्य है कि सात्विक ज्ञान से युक्त कर्ता कर्म और कर्मफल में बिना आसक्त हुए आने स्वभाव(स्वधर्म) के अनुसार कर्म किये जाता है और इस प्रकार स्वार्थरहित भाव से बिना कर्मफल से आसक्त हुए किये जाने वाले कर्म सात्विक कर्म होते हैं।
जब कर्म को बिना कर्ता भाव के, बिना कामना पूर्ति के उद्देश्य से मात्र सही और गलत के अनुसार कर्तव्य समझ कर किया जाता है तब वह कर्म सात्विक कर्म कहलाता है जो सबसे उच्च श्रेणी का कर्म है जो व्यक्ति को कर्मबन्धन से मुक्ति दिलाता है और उसे ब्रह्मलीन करता है।
लेकिन जब वही कर्म कामनावश होकर किया जाए, और इसलिए नहीं किया जाए कि वह सही है बल्कि उसे करने के पीछे व्यक्तिगत पसन्द नापसन्द के भाव हों तो ऐसा कर्म अहंकारयुक्त होता है, कर्तापन का अहंकार होता है उसे करने में और चूँकि वह कर्म कामना पूर्ति के लिए किया जाता है सो उसे करने में बहुत श्रम भी लगाया जाता है। इस स्थिति में कर्म और कर्मफल दोनों में घोर आसक्ति होती है और कर्मफल की प्राप्ति के लोभ में व्यक्ति सही और गलत को भूलकर मात्र अपनी इक्षापूर्ती की लालसा और अहंकार वश कर्म करता है। यह राजस कर्म है जो राजस ज्ञान से संचालित होता है।
सात्विक कर्म सही गलत को पहचान कर स्वभावतः किये जाते हैं, तो राजसी कर्म पसन्द-नापसन्द के अनुसार लाभ और लोभ वश, कामना पूर्ति के उद्देश्य से किये जाते हैं। लेकिन कई बार कर्म बिना किसी सोच विचार के , बिना किसी बुद्धि और विवेक के बिना परिणाम को तौले सिर्फ और सिर्फ मोह और भ्रम के अधीन होकर किये जाते हैं जिनमें न तो सही गलत की चिंता होती है, न ही पसन्द नापसन्द की गणना ही होती है बल्कि तैश में आकर किये जाते हैं उन्हें तामसी कर्म कहते हैं। ये कर्म क्रोध, घृणा, हिंसा , अविवेक और मूर्खता से ओतप्रोत होते हैं जिनसे करने वाले को भी क्षति होती है और जो लोग उस कर्म की परिधि में आते हैं उनकी भी क्षति होती है। करने वाले को ज्ञात ही नहीं होता है कि जो वह कर्म कर रहा है उसे करने की क्षमता भी है या नहीं उसमें। तामसी कर्म करने में पूरी तरह से अज्ञानता ही हावी होती है जिसके कारण इसके परिणाम सदा विध्वंसकारी ही होते हैं।
कर्ता के प्रकार क्या हैं?
(श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 26 से 28 के आधार पर)
ज्ञान और कर्म का प्रकार समझने के उपरांत व्यक्ति अपने ज्ञान और अपने कर्मों के अनुसार स्वयं का आकलन कर सकता है कि वह स्वयं किस प्रकार का कर्ता यानी व्यक्ति है। ज्ञान और कर्म के तीन तीन प्रकारों के अनुसार व्यक्ति कर्ता यानी कर्म करने वाले के रूप में भी तीन प्रकार का होता है।
पहले हम सात्विक कर्ता के लक्षणों को समझें। सात्विक कर्ता के निम्न प्रकार के लक्षण होते हैं-
(1) सात्विक दृष्टि वाला व्यक्ति सात्विक भाव से ही कर्म करता है। वह कर्म करते हुए भी उस कर्म से बन्धता नहीं है, उससे आसक्त नहीं होता है। वह इसलिए कर्म नहीं करता है कि फलाना कर्म करने से उसे लाभ होगा या हानि बल्कि वह कर्म इसलिए करता है क्योकि उसे अपनी दृष्टि में लगता है कि वह कर्म उसकी स्वाभाविक क्रिया है और क्योंकि वही कर्म सही है। कर्म करने की उसकी प्रेरणा उसे कर्म के सही और गलत होने से मिलती है। वह अपनी पसंद और नापसन्द से आसक्त होकर कर्म नहीं करता है।
(2) कर्म से अनासक्त व्यक्ति जब कर्म करता है तो उसे बस सही और गलत से मतलब रहता है, कर्तव्य और अकर्तव्य से मतलब रहता है। उसका ध्यान कर्म के गुण दोष पर रहता है। इस कारण प्रयोजन से वह बन्धता नहीं है। मान लीजिये कि आप किसी से प्रेम करते हैं। आपका प्रेम एक कर्म है जो आप किसी के प्रति करते हैं। यदि आप उस व्यक्ति से जिसे प्रेम करते हैं उससे आसक्त होकर कर्म करते हैं तो फिर आप उस व्यक्ति के अस्तित्व को नकार कर उसमें भी अपना ही अस्तित्व जड़ देते हैं। आप चाहते हैं कि वह व्यक्ति जिसे आप प्रेम करते हैं आप ही के अनुसार रहे, और इस प्रकार आप उस व्यक्ति की स्वतंत्रता को समाप्त कर उसपर स्वयं को लाद देते हैं। इस प्रकार का प्रेम(कर्म) आपको बन्धन में बाँध देता है, मुक्त नहीं होने देता है। लेकिन यदि आप उसे प्रेम इसलिए करते हैं क्योंकि प्रेम करना ही सही है, तब आप प्रेम के महत्व को स्वीकार कर उस व्यक्ति को फलने फूलने का मौका देते हैं और आप उससे प्रेम करते हुए भी बन्धते नहीं हैं।
(3) जब व्यक्ति सही गलत से प्रेरित होकर कर्म करता है तो उसमें कर्त्तापन का अभिमान नहीं आता है और इस प्रकार वह अहंकार से मुक्त होता है।
(4) कर्म से नहीं बंधकर कर्ता भाव से मुक्त होकर जो कर्म करता है उसे कर्म की गुणवत्ता में दृढ़ अभिरुचि होती है। चूँकि वह सही और गलत से प्रेरित है सो वह अपने कर्म को इस प्रकार से करने की कोशिश करता है कि उससे गलत नहीं हो और इस प्रयास की वजह से वह बहुत दृढ़ता, धैर्य और उत्साह से अपने कर्म को करता है।
(5) जब व्यक्ति कर्म करने में ही अपना दायित्व समझता है, अपने पसन्द और नापसन्द से ऊपर सही और गलत को स्थान देता है तो फिर इस अवस्था में कर्म के परिणाम क्या होंगे इससे उसे कोई फर्क नहीं पड़ता है। वह कर्म करने से मतलब रखता है और कर्मफल को नियति कब हवाले छोड़ देता है।
इस प्रकार से कर्म करने वाले कर्ता के मन में कर्म और फल से अनासक्ति के कारण उसे शांति प्राप्त होती है, शांति से सुख मिलता है और सुख से प्रसन्नता आती है सो बिना कुछ की आशा रखे हए भी वह प्रसन्न होते रहता है। उसकी खुशी बिना किसी शर्त के होती है। इस प्रकार के व्यक्ति को सात्विक कर्ता कहते हैं।
सात्विक कर्ता से भिन्न राजस दृष्टि रखने वाले व्यक्ति के द्वारा राजसी कर्म किये जाते हैं सो इस प्रकार के व्यक्ति को राजसी कर्ता कहते हैं। राजसी कर्ता के लक्षण निम्न प्रकार के होते हैं-
(1) व्यक्ति कर्म को उसके सही या गलत होने के कारण नहीं करता है बल्कि कर्म करने की प्रेरणा व्यक्ति को अपनी पसंद और नापसन्द से मिलता है। वह वही कर्म करने के लिए प्रेरित होता है जो उसे पसन्द होते हैं और सो कर्म करते हुए वह कर्मों में लिप्त रहता है।
(2) जब व्यक्ति कर्म को अपनी पसंद और नापसन्द के अनुरूप करता है तो तय है कि उसे कर्मफल की भी चिंता रहती है । वह इस बात में अभिरुचि रखता है कि उसके कर्मों के फल क्या मिलते हैं। सो ऐसा व्यक्ति कर्म से तो बन्धता ही है, अपने कर्मफल से भी बन्धा होता है।
(3) जब व्यक्ति कर्मफल से आसक्त होता है तो तय है कि जिस कर्मफल में उसे लाभ दिखता है , उसके प्रति उसे लोभ होता है और तब उस फल की प्राप्ति हेतु जो भी प्रयोजन उससे बन पड़ता है जैसे किसी को हानि करना, किसी से द्वेष करना, किसी से लोभ वश लगाव रखना, किसी पर क्रोध करना, किसी के प्रति हिंसा करना आदि उसके स्वाभाविक गुण हो जाते हैं। परिणाम से चिंतित व्यक्ति परिणाम के प्रति लोभ के कारण हर तरह के अनाचार और व्यभिचार को अपना लेता है।
(4) चूँकि ऐसा व्यक्ति फल के प्रति आसक्त होकर सिर्फ अपने पसन्द का ही परिणाम चाहता है सो इसकी पूर्ति नहीं होने पर क्रोध, निराशा, विषाद, द्वेष जैसे भाव उसके मन में आते हैं । इसी प्रकार यदि मनोकुल परिणाम उसे मिलता है तो उस परिणाम को पा कर उसे हर्ष होता है, उसके अंदर अहंकार जगता है, और फल मिल जाए इसके लिए लाभ होता है।
सो कर्म और कर्मफल से बंधे व्यक्ति को जीवन में कभी शांति नहीं मिलती है। शांति के अभाव में उसे सुख नहीं मिल पाता है भले ही उसे कितना भी प्राप्त हो जाये वह और की इक्षा से अशांत और दुखी बना रह जाता है और इस कारण उसे जीवन भी खुशी नहीं मिलती भले उसकी कितनी भी इक्षाएँ क्यों नहीं पूरी हो जाएं। इस प्रकार उसकी खुशी सशर्त होती है और क्षणभंगुर होती हैं। इक्षाएँ उसे शीघ्र अशांत कर देती हैं और वह फिर दुखी हो जाता है। इस प्रकार के व्यक्ति को राजसी कर्ता कहते हैं।
कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जिनके मन , बुद्धि, विवेक, भावना और शरीर की क्रियाओं में कोई तालमेल ही नहीं होता है। ऐसे व्यक्ति तामस कर्ता कहे जाते हैं। चूँकि इस तरह के व्यकि की भावना और विवेक में कोई तालमेल नहीं होता है सो ऐसे व्यक्ति के अंदर न तो अपनी भावना को लेकर समझदारी होती है और न ही अपनी बुद्धि और विवेक के प्रति। इस समझदारी के अभाव में उस व्यक्ति क्रियाएँ भी बुद्धि रहित होती हैं।
इस अयुक्त व्यक्तित्व के कारण व्यक्ति समझ नहीं पाता है कि किस परिस्थिति में उसे किस तरह के कर्म करने चाहिए। सो ऐसा व्यक्ति हठी और अहंकारी होता है, समय , काल परिस्थिति के अनुसार स्वयं में अपेक्षित बदलाव भी नहीं ला पाता है। अपने लाभ के लिए ऐसा तामस व्यक्ति दूसरों के साथ बेईमानी करने से भी नहीं चूकता है और दूसरों के लिए और स्वयं के लिए बराबर समस्या खड़ी करने वाला होता है।
तामस व्यक्ति निराशावादी होता है और हर चीज का मात्र निराशावादी पहलू ही देखता है।
इन अवगुणों के कारण ऐसा कर्ता न केवल अलसी होता है बल्कि कार्य को टालते रहने वाला भी होता है। उत्साह और समझदारी से अनभिज्ञ तामस व्यक्ति समय पर कोई काम नहीं करता है और समय बीतने पर हड़बड़ी में कार्य करने का उपक्रम करता है जिससे उसके कर्म दोषपूर्ण होते हैं।
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