श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 14
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्।
विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्॥ 14।।
इस विषय में अर्थात कर्मों की सिद्धि में अधिष्ठान (जिसके आश्रय कर्म किए जाएँ, उसका नाम अधिष्ठान है) और कर्ता तथा भिन्न-भिन्न प्रकार के करण (जिन-जिन इंद्रियादिकों और साधनों द्वारा कर्म किए जाते हैं, उनका नाम करण है) एवं नाना प्रकार की अलग-अलग चेष्टाएँ और वैसे ही पाँचवाँ हेतु दैव (पूर्वकृत शुभाशुभ कर्मों के संस्कारों का नाम दैव है) है।
कर्म किये जाने के लिए जो पाँच कारण हैं उनमें सबसे पहला अधिष्ठान है। अधिष्ठान यानी जिसके आश्रय कर्म किया जा है और यह है शरीर। व्यक्ति के लिए शरीर से परे कोई कर्म नहीं होता है। कर्म होने के लिए पहली अनिवार्य शर्त है कि देहधारी ही कर्म करता है।
लेकिन मात्र शरीर के होने भर से कर्म नहीं होता है इसके लिए कर्ता भाव का होना अनिवार्य है। कर्ता भाव के होने का अर्थ है कि इस शरीर से स्वयं की पहचान स्थापित करना यानी ईगो का होना।
तीसरी अनिवार्य शर्त है करण यानी उन माध्यम का होना जिनसे कर्म किया जाता है। ये माध्यम हैं इन्द्रिय, मन, बुद्धि विवेक । इनके माध्यम से ही व्यक्ति कर्म में प्रवृत्त हो पाता है।
लेकिन ये करण तभी कर्म करते हैं जब विभिन्न चेष्टाएँ होती हैं यानी शरीर में श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 18 परिचय होती है। प्राण के अभाव में न तो कर्ता भाव कुछ कर पाता है न ही करण।
लेकिन इन चारों की उपस्थिति के बावजूद कर्म का होना तब तक सम्भव नहीं होता है जब तक दैव न हो यानी वह शक्ति जो व्यक्ति के अंदर तो नहीं है लेकिन जिसकी उपस्थिति कर्म होने के लिए अनिवार्य है। जैसे शरीर भी है, शरीर में स्वस्थ आँख भी है , लेकिन प्रकाश नहीं है तब व्यक्ति अपनी आँखों से देख नहीं पाता। व्यक्ति के नेत्र स्वतः अपने अंदर से प्रकाश उतपन्न भी नहीं कर सकते है और इसके अभाव में व्यक्ति देखने का कर्म नहीं कर सकता है। दैव न हो तो अन्य चार अंततः निश्चेष्ट और निष्प्रभावी हो जाते हैं। दैव को आप कह सकते हैं कि यह आपका भाग्य है अथवा यह प्रकृति की शक्ति है अथवा सम्पूर्ण कॉसमॉस का प्रभाव है। यानी कर्म होने के लिए लिए सब कुछ व्यक्ति के अंदर ही नहीं है बल्कि कुछ है जो उसके बाहर है जिसकी उपस्थिति में व्यक्ति कर्म कर पाता है। भौतिक रूप से समझें तो व्यक्ति के कर्म उसके परिवेश, उसके समाज, आदि वे बाहरी कारक हैं जो व्यक्ति के कर्म करने की क्षमता को प्रभावित करते हैं अथवा निर्धारित करते हैं जो हमेशा व्यक्ति के वश में नहीं होते हैं। कोई इसे पूर्वजन्म का प्रभाव कहता है तो कोई ग्रहों का फेर। दरअसल जो आपके अंदर , आपके वश से बाहर है वही दैव है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 18
ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना।
करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसङ्ग्रहः॥ 18।।
ज्ञाता (जानने वाले का नाम 'ज्ञाता' है।), ज्ञान (जिसके द्वारा जाना जाए, उसका नाम 'ज्ञान' है। ) और ज्ञेय (जानने में आने वाली वस्तु का नाम 'ज्ञेय' है।)- ये तीनों प्रकार की कर्म-प्रेरणा हैं और कर्ता (कर्म करने वाले का नाम 'कर्ता' है।), करण (जिन साधनों से कर्म किया जाए, उनका नाम 'करण' है।) तथा क्रिया (करने का नाम 'क्रिया' है।)- ये तीनों प्रकार का कर्म-संग्रह है।
जिन पाँच कारकों की चर्चा की गई है अर्थात अधिष्ठान, कर्ता भाव, करण, प्राण और दैव, वे सभी कर्म होने के कारण हैं लेकिन कर्म किसकी प्रेरणा से होता है, यह समझना भी जरूरी है। कर्म के प्रेरणास्रोत हैं ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाता।
अब आइए समझें कि ये तीन क्या हैं,
ज्ञाता -जानने वाले का नाम 'ज्ञाता' है, ज्ञान- जिसके द्वारा जाना जाए, उसका नाम 'ज्ञान' है
ज्ञेय -जानने में आने वाली वस्तु का नाम 'ज्ञेय' है
इनकी समझ व्यक्ति को अपने दायित्वों के निर्वहन में सहायता देता है और व्यक्ति समझ पाता है कि उसे किस प्रकार अपने जीवन में साधना करनी चाहिए। एक ही परिस्थिति में एक ही पदार्थ से बने भिन्न भिन्न मनुष्य भिन्न भिन्न तरह से कर्म करते हैं, भिन्न भिन्न तरह के कर्म करते हैं। ऐसा क्यों होता है?
ज्ञाता आपका अह्महार है। स्वयं से , स्वयं के अवयवों से आपकी पहचान आपको ज्ञाता बनाती है। "मैं देखता हूँ"। यँहा "मैं" ज्ञाता है। मैं अपनी आंखों से अपनी पहचान का तादाम्य बैठाता है। इस प्रकार आपकी इंद्रियां, आपकी बुद्धि, आपका विवेक ज्ञाता की भूमिका में होते हैं। जो देखा जाता है वही ज्ञेय है और देखे जाने की इस प्रक्रिया से जो समझा जाता है वही ज्ञान है। वह सभी जो जाना जाता है, जो जानने योग्य है ज्ञान है वही ज्ञेय है और इस प्रकार सम्पूर्ण संसार और संसार से परे जो कुछ है वह जानने योग्य है जिसे जान लेने पर वही ज्ञान है। जानने की यह प्रक्रिया शरीर से, कर्मेन्द्रियों से, ज्ञानेन्द्रियों से , बुद्धि से और विवेक से सम्पन्न होती है। यह संसार जानने योग्य है और सो यह कर्म की प्रेरणा है।
जो कुछ हम इस संसार और इसके परे जानते हैं वही ज्ञान है, यानी हमारा ज्ञान वही है जितना हम जानते हैं। हम जो जानते हैं , वह हमारे पास लम्बे समय तक बना रहता है। और इसके साथ हमारा ईगो भी होता है जो हमारे व्यक्तित्व, हमारे विवेक और हमारी बुद्धि और इनके साथ हमारे शरीर का तादाम्य भी होता है। हमारा संचित ज्ञान और हमारा ईगो ये दोनों मिलकर हमें ज्ञाता बनाते हैं जो हमारे कर्मों का प्रेरणास्रोत होता है।
इस प्रकार हम समझते हैं कि हमारे द्वारा कर्म होने के पीछे पाँच कारणों(अधिष्ठान, कर्तापन, करण प्राण, और देव) के अतिरिक्त तीन प्रेरक भी होते हैं जो हैं ज्ञान, ज्ञेय, और ज्ञाता। हम जो कर्म करते हैं, उसके पीछे उसे जानने की प्रेरणा होती है, इसके लिए हम अपने पूर्व संचित ज्ञान के आधार पर प्रेरित होते हैं और हम ऐसा इसलिए कर पाते हैं क्योंकि हम स्वयं को अपने ईगो से पहचानते हैं। अगर आग से हाथ जलता है इसका पूर्व संचित ज्ञान हमें नहीं है तो फिर हमारी प्रतिक्रिया यानी हमारा कर्म भिन्न होगा और अगर ये ज्ञान पूर्व से है तो हमारी प्रतिक्रिया यानी हमारा कर्म भिन्न होगा।
इस प्रकार यह संसार, संसार के प्रति हमारी जानकारी और हमारा ईगो(जो पूर्व संचित ज्ञान और शरीर, इन्द्रिय , बुद्धि और विवेक के तादाम्य से बना हुआ) ये सब हमें कर्म करने के लिए प्रेरित करते हैं।
अब समझते हैं कि कर्म के मुख्य अवयव क्या हैं। वैसे तो पाँच कारक मिलकर कर्म होने का के कारण का निर्माण करते हैं लेकिन इनमें से मुख्य रूप से कर्ता, करण और स्वयं कर्म ये तीन को मिलाकर कर्म संग्रह कहते हैं।
अब देखें कि जो कर्म है उनमें सुधार के लिए , उनके परिष्करण के लिए व्यक्ति क्या कर सकता है। इसे दो चरणों में समझें।
पहले चरण में देखे कि कर्मों के होने में जो कारक हैं क्या हम उनमें सुधार कर अपने कर्म में सुधार कर सकते हैं। कर्म संग्रह के तीन में से एक अवयव यानी करण तो सभी में एक हैं, सभी में एक ही ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ है तो फिर उनमें आपका कोई वश नहीं। लेकिन व्यक्ति स्वयं में सुधार कर सकता है और स्वयं कर्म में भी। इस प्रकार यदि व्यक्ति को अपने कर्म परिष्कृत करने हैं तो कर्म होने के पाँच कारणों में से उसे सर्वाधिक स्वयं यानी कर्ता(जो ज्ञाता भी है) को और स्वयं कर्म यानी अपनी क्रियाओं में सुधार लाना होगा।
दूसरे चरण में हम देखें कि कर्म होने
के जो प्रेरक कारण हैं उनमें व्यक्ति क्या सुधार कर सकता है। कर्म होने के जो तीन प्रेरक हैं यानी ज्ञाता(यानी कर्ता), ज्ञेय और ज्ञान उनमें ज्ञेय तो एक ही है और ज्ञाता स्वयं वह व्यक्ति है। ऐसी स्थिति में कर्मों में परिष्करण हेतु ज्ञान में सुधार की अवश्वकता है।
इस प्रकार जब व्यक्ति स्वयं के कर्म को परिष्कृत करने की साधना में प्रवृत्त होता है तो उसे स्वयं यानी कर्ता, स्वयं के ज्ञान और स्वयं क्रिया पर सर्वाधिक ध्यान देना अनिवार्य होता है।
इन तीनों में सुधार हेतु आवश्यक है कि हम इन तीनों यानी ज्ञान, कर्ता और कर्म के भिन्न भिन्न स्वरूपों को समझें।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 19
ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः।
प्रोच्यते गुणसङ्ख्याने यथावच्छ्णु तान्यपि॥ 19।।
गुणों की संख्या करने वाले शास्त्र में ज्ञान और कर्म तथा कर्ता गुणों के भेद से तीन-तीन प्रकार के ही कहे गए हैं, उनको भी तु मुझसे भलीभाँति सुन।
वही व्यक्ति कर्ता है, यानी कर्म करने वाला है, वही ज्ञाता है अर्थात वही ज्ञान को जानता है और वही भोक्ता भी है यानी अपने कर्मों का परिणाम प्राप्त करने वाला है। अर्थात जब एक व्यक्ति स्वयं में उत्थान चाहता है तो उसे स्वयं के ज्ञान में, स्वयं की क्रियाओं में और स्वयं में ही परिवर्तन लाने होते हैं। लेकिन प्रश्न है कि वह कौन सा मार्ग है जिससे वह इनमें परिवर्तन ला सकता है। तो समझना जरूरी है कि संसार के सभी अवयव तीन गुणों से बने हुए हैं जो हैं सात्विक, राजसी और तामसिक। गुणों में परिवर्तन कर व्यक्ति स्वयं के कर्तापन, स्वयं के ज्ञान और स्वयं के परिणामों में उत्थान या पतन जो चाहे ला सकता है। इसके लिए आवश्यक है कि व्यक्ति इन तीन को यानी कर्तापन को ज्ञान को और कर्म को इन गुणों के अनुसार समझे ताकि उनमें वह अपेक्षित सुधार ला सके।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 20
सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते।
अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम्॥ 20।।
जिस ज्ञान से मनुष्य पृथक-पृथक सब भूतों में एक अविनाशी परमात्मभाव को विभागरहित समभाव से स्थित देखता है, उस ज्ञान को तू सात्त्विक जान।
जब व्यक्ति स्वयं के उत्थान की यात्रा पर निकलता है तो उसे निश्चित होना चाहिए कि उसका लक्ष्य है अपने ज्ञान में बढ़ोत्तरी, स्वयं यानी कर्ता के गुण में सुधार और सात्विक कर्म करने की प्रवृत्ति। इसके लिए ज्ञान, कर्ता और कर्म के गुणों के आधार पर उनको समझना पहचानना भी होगा तभी अवांछित से वाँछित की तरफ की यात्रा सफल होती है।
तो आईये, ज्ञान के विषय के समझे कि कौन सा ज्ञान कैसा है जिसे अपनाना चाहिए। अपने गुणों के अनुसार ज्ञान तीन तरह के होते हैं, सात्विक ज्ञान, राजसी ज्ञान और तामसीक ज्ञान।
दरअसल ज्ञान आँखों से परे व्यक्ति के अन्तस् की दृष्टि है, उसका दृष्टिकोण है जिसके अनुसार व्यक्ति स्वयं के साथ, स्वयं का संसार के साथ और स्वयं का ईश्वर के साथ सम्बन्ध देखता है। सभी व्यक्ति एक ही पदार्थ के बने होते हैं किंतु ज्ञान यानी अपने दृष्टिकोण की भिन्नता की वजह से वे एक ही चीज को अलग अलग ढंग से देखते हैं। ज्ञान से दृष्टि प्राप्त होती है और दृष्टि से हम तय करते हैं कि हम स्वयं क्या हैं , संसार के प्रति हम क्या हैं और ईश्वर के साथ हम क्या हैं। कुछ लोग स्वयं को बहुत सामर्थ्यवान समझते हैं तो कुछ स्वयं को बहुत बेचारा। कुछ लोग उत्साह, प्रेम, अनुराग आदि से भरे होते हैं तो कुछ लोग स्वयवकी दृष्टि में हताश, हारे हुए, । यह सब अंतर उस दृष्टि की वजह से है जिससे हम स्वयं का आकलन करते हैं। इसी प्रकार कुछ लोगों के लिए यह संसार मौज मस्ती, धनोपार्जन और बल दिखाने की जगह है तो कुछ लोग इसी संसार में स्वयं की मुक्ति की जगह पा लेते हैं। किसी के लिए यही संसार दुख का सागर है तो कोई इसे अपनी संघर्ष स्थली समझता है। यह अंतर भी स्वयं हमारे ही दृष्टि में अंतर की वजह से है और यह अंतर हमारे अर्जित ज्ञान के गुण के अनुसार ही होता है।
यह सत्य है कि भिन्न भिन्न व्यक्ति, भिन्न भिन्न प्राणी, और निर्जीव भी अलग अलग दिखते हैं। दो व्यक्ति एक से नहीं दिखते जबकि वे एक ही तरह के पदार्थों से बने होते हैं और जैविक रूप से समान होते हैं। भिन्न भिन्न रुप रंग वाले , भिन्न भिन्न पहचान के बावजूद सभी में एक कारक होता है जो सभी में एक ही समान होता है, जिसे विभाजित नहीं किया जा सकता है और यही उसकी आत्मा होती है। जब व्यक्ति की दृष्टि में बाहरी रूप रंग, आकार प्रकार से इतर सभी मानव में मूल अविभाज्य स्वरूप जो उसकी आत्मा है ही आता है और वह व्यक्तियों के इसी मूल स्वरूप के कारण उनमें कोई भेद नहीं करता है और समझता है कि तमाम बाहरी भिन्नताओं के भी सभी एक ही मूल स्वरूप के भिन्न भिन्न अभिव्यक्ति हैं तो उसके ज्ञान को सात्विक ज्ञान कहा जाता है। इसमें मानव, और यँहा तक कि सभी जीवों और निर्जीव में भी भेद भाव नहीं किया जाता है। बल्कि सात्विक ज्ञान तो यही बतलाता है कि सभी एक ही हैं।
भेद देखने के लिए किसी विशेष ज्ञान की आवश्यकता नहीं होती है, वह तो बाहर से दिख ही रहा है कि हर दो चीज, हर दो व्यक्ति भिन्न है लेकिन इस भिन्नता के बावजूद दोनों में अविभाज्यकारी इकाई समान है इसे समझने के लिए सात्विक दृष्टि चाहिये होती है।
जैसे हम समझते हैं कि हम एक राष्ट्र के लोग एक हैं लेकिन जब हमारा ज्ञान और सूक्ष्म तत्व को देखने के योग्य हो जाता है तो हमें लगता है कि चूँकि सभी देशों के निवासी मानव ही हैं सो सभी एक हैं। यह मानवीय दृष्टि है जिसमें हम बाहरी भिन्नता के आधार पर मनुष्यों में भेद नहीं करते हैं। यह मानवीय दृष्टि है।
जब ज्ञान के और सूक्ष्म के स्तर पर हम जाते हैं तो समझते हैं कि मानव और अन्य सभी जीवों में , सभी प्राणियों में जीवन तो एक ही है सो सभी प्राणधारी एक ही हैं । यह जीवनदृष्टि है।
लेकिन और सूक्ष्मतर स्तर पर हम पाते हैं कि जिनमें जीवन है और जिनमें जीवन नहीं है, सभी का अस्तित्व तो है। जीवधारी मनुष्य का भी अस्तित्व है, जीवधारी जानवर का भी अस्तित्व है, जीवधारी पेड़-पौधों का भी अस्तित्व है और निर्जीव नदी , पहाड़, पत्थर आदि का भी अस्तित्व है सो अस्तित्व के स्तर पर सभी में एक हि अविभाजकारी इकाई उपस्थित है और यह दृष्टि अस्तित्व की दृष्टि है।
और इस प्रकार हम समझते हैं कि यह समस्त ज्ञात और अज्ञात ब्रह्माण्ड एक ही इकाई से आच्छादित है जो दृश्य तो नहीं है लेकिन ज्ञेय है जिसे हम भिन्न भिन्न नाम देते हैं और वही ब्रह्म है जो सबों में , सभी कालों में मूल रूप से और पूर्ण रूप से उपस्थित है। यही सत्य है। यही ज्ञान , यही दृष्टि सात्विक है।
और इस प्रकार भेद की समझ से एक कि समझ की यात्रा ही सात्विक ज्ञान की प्राप्ति की यात्रा है। और यह ज्ञान अपने ईगो को त्यागने से आता है। भेद हम अपने ईगो से बनाते हैं जो कृत्रिम है जबकि सार्वभौमिक एकात्मकता स्वाभाविक सत्य है।
इस ज्ञान की प्राप्ति के साथ ही व्यक्ति के अंदर का अंधकार समाप्त हो जाता है और व्यक्ति पूर्ण प्रकाशित रहता है और यही उसका वास्तविक मोक्ष होता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 21
पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान्।
वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम्॥ 21।।
किन्तु जो ज्ञान अर्थात जिस ज्ञान के द्वारा मनुष्य सम्पूर्ण भूतों में भिन्न-भिन्न प्रकार के नाना भावों को अलग-अलग जानता है, उस ज्ञान को तू राजस जान।
सभी सजीव और निर्जीव में एक मूल कारक, ब्रह्म की उपस्थिति को समझकर भेद नहीं करने का ज्ञान सात्विक कहलाता है लेकिन जब व्यक्ति जीव जीव में , जीव निर्जीव में भेद करता है तो वह यह नहीं समझ पाता है कि सभी में एक ब्रह्म ही अवस्थित है। ऐसे में व्यक्ति अपने काँशसनेस को दूसरे से भिन्न समझता है। उसे लगता है कि हर दो भिन्न हैं। वह यह नहीं समझ पाता कि आकार प्रकार की भिन्नता मात्र बाहरी है जो हमें जैविक आंखों से दिखती है। ऐसे व्यक्ति की जैविक और बौद्धिक आँखें एक हो जाती हैं और वह जो देखता है उसी को परम् सत्य समझ लेता है। ऐसा नहीं है कि ऐसा व्यक्ति अपने व्यवहार और आचरण से गलत ही हो लेकिन दो में भिन्नता समझने वाले व्यक्ति में भेद भाव, लोभ लालच, क्रोध, मद, अहंकार आदि का प्रवेश हो जाता है। तब वह किसी को हीन और किसी को उच्च समझ कर , किसी को कीमती तो किसी को मूल्यहीन समझकर अपनी समझ के अनुसार अपनी पसंद बनाकर उसके पीछे भागने लगता है। तब उसके अंदर असंख्य कामनाएँ जन्म लेती रहती हैं जिनकी वजह से उसका चित्त चंचल बना रहता है। यह स्थिति व्यक्ति को शांत, और ब्रह्म के साथ एकाकार होने से रोकती है। यही राजसी ज्ञान कहलाता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 22
यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम्।
अतत्त्वार्थवदल्पंच तत्तामसमुदाहृतम्॥ 22।।
परन्तु जो ज्ञान एक कार्यरूप शरीर में ही सम्पूर्ण के सदृश आसक्त है तथा जो बिना युक्तिवाला, तात्त्विक अर्थ से रहित और तुच्छ है- वह तामस कहा गया है।
सभी में एक समान समरूपता देखने और बाहरी अंतर के कारण भेद नहीं करने वाले ज्ञान को सत्वविक ज्ञान कहते हैं जो सभी सजीव और निर्जीव में एक ब्रह्म की उपस्थिति से भिज्ञ होता है। राजस ज्ञान के कारण व्यक्ति चेतना के एकात्मक स्वरूप को नहीं पहचान पाता है जिसकी वजह से भिन्न भिन्न स्वरूपों को एक सूत्र में पिरोने वाले सार्वभौमिक सत्य ब्रह्म को नहीं देख पाता है।
लेकिन जब व्यक्ति सम्पूर्णता के अस्तित्व से ही अनभिज्ञ हो और मात्र किसी एक ही पक्ष को देखे तो इस दृष्टिकोण को तामसी ज्ञान कहते हैं। एकांगी होने की वजह से यह ज्ञान व्यक्ति को कट्टर, उग्र, व्यसनभोगी और हिंसक बना देता है और यह ज्ञान बुद्धि विवेक और तर्क को हर लेता है। इसी एकांगी दृष्टि की वजह से कोई सिर्फ पैसे के पीछे भागता है तो किसी को नशे की लत लग जाती है तो कोई सत्ता को ही सर्वस्व समझ बैठता है तो कोई दिन रात वासना के व्यसन में ही डूबा रहता है। इस तामस ज्ञान की वजह से व्यक्ति सत्य को नहीं देख पाता है और ब्रह्म की समझ तो सिरे से लुप्त रहती है। इस दृष्टि में न कोई तर्क होता है, न ही विवेक। धार्मिक अंधविश्वास और कट्टरता भी इसी की उपज हैं। किसी को लगता है कि मात्र उसी का धर्म श्रेष्ठ है शेष सभी का निकृष्ट है। तब ऐसी स्थिति में उस व्यक्ति में स्वयं की मान्यताओं के प्रति कट्टरता भर जाती है और दूसरों की मान्यताओं के प्रति घृणा। यह उसे हिंसा तक लेकर चली जाती है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 23
नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम।
अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते॥ 23।।
जो कर्म शास्त्रविधि से नियत किया हुआ और कर्तापन के अभिमान से रहित हो तथा फल न चाहने वाले पुरुष द्वारा बिना राग-द्वेष के किया गया हो- वह सात्त्विक कहा जाता है।
व्यक्ति के द्वारा कर्म किया जाना अवश्यम्भावी होता है क्योंकि उसका कर्म हीं व्यक्ति के स्वयं, संसार और ब्रह्म के साथ के सम्बन्धों को परिभाषित करता है। लेकिन व्यक्ति के कर्म उसकी दृष्टि, उसकी समझ और उसके ज्ञान पर आधारित होती है। अर्थात जैसी व्यक्ति की दृष्टि वैसा उसका कर्म। यही वजह है कि एक ही परिस्थिति में भिन्न भिन्न मनुष्यों के कर्म भिन्न भिन्न होते हैं। चूँकि व्यक्ति के कर्म उसकी दृष्टि यानी ज्ञान पर आधारित होते हैं सो जिस स्तर का ज्ञान व्यक्ति प्राप्त किये रहता है, उसी स्तर के उसके कर्म भी होते हैं। अगर व्यक्ति का ज्ञान सात्विक स्तर का है तो उसके कर्म भी सात्विक हीं होते हैं।
सात्विक ज्ञान के सम्बंध में हम समझते हैं कि जब व्यक्ति की दृष्टि में बाहरी रूप रंग, आकार प्रकार से इतर सभी मानव में मूल अविभाज्य स्वरूप जो उसकी आत्मा है ही आता है और वह व्यक्तियों के इसी मूल स्वरूप के कारण उनमें कोई भेद नहीं करता है और समझता है कि तमाम बाहरी भिन्नताओं के भी सभी एक ही मूल स्वरूप के भिन्न भिन्न अभिव्यक्ति हैं तो उसके ज्ञान को सात्विक ज्ञान कहा जाता है। इसमें मानव, और यँहा तक कि सभी जीवों और निर्जीव में भी भेद भाव नहीं किया जाता है। बल्कि सात्विक ज्ञान तो यही बतलाता है कि सभी एक ही हैं।
इस दृष्टि से लैस व्यक्ति नित्य-नैमित्य कर्म ही करता है न कि काम्य(कामना आधारित) और न ही निषिद्ध कर्म(नहीं करने योग्य कर्म)।व्यक्ति कर्म तो करता है लेकिन कर्म करने के पीछे कोई मंशा, कोई लाभ, कोई कामना पूर्ति के भाव नहीं होते हैं। वह तो सिर्फ अपने स्वभाव के अनुसार, अपनी स्थिति के अनुसार किये जा सकने वाले कर्म को ही करता है। कर्म करने के पीछे कोई एजेंडा नहीं होता है, कर्म करना उसका स्वभाव है सो कर रहा है।
इसके साथ ही सात्विक दृष्टि से उसे यह भी समझ होती है कि कर्मफल से उसे कोई लेना देना नहीं है। चूँकि वह तो कर्म ही स्वभावतः कर रहा है तो फिर कर्मफल से क्यों लगाव हो। जो भी कर्मफल हो उसे उसकी परवाह नहीं होती है।
इसका तातपर्य है कि सात्विक ज्ञान से युक्त कर्ता कर्म और कर्मफल में बिना आसक्त हुए आने स्वभाव(स्वधर्म) के अनुसार कर्म किये जाता है और इस प्रकार स्वार्थरहित भाव से बिना कर्मफल से आसक्त हुए किये जाने वाले कर्म सात्विक कर्म होते हैं।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 24
यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुनः।
क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम्॥ 24।।
परन्तु जो कर्म बहुत परिश्रम से युक्त होता है तथा भोगों को चाहने वाले पुरुष द्वारा या अहंकारयुक्त पुरुष द्वारा किया जाता है, वह कर्म राजस कहा गया है।
जब कर्म को बिना कर्ता भाव के, बिना कामना पूर्ति के उद्देश्य से मात्र सही और गलत के अनुसार कर्तव्य समझ कर किया जाता है तब वह कर्म सात्विक कर्म कहलाता है जो सबसे उच्च श्रेणी का कर्म है जो व्यक्ति को कर्मबन्धन से मुक्ति दिलाता है और उसे ब्रह्मलीन करता है।
लेकिन जब वही कर्म कामनावश होकर किया जाए, और इसलिए नहीं किया जाए कि वह सही है बल्कि उसे करने के पीछे व्यक्तिगत पसन्द नापसन्द के भाव हों तो ऐसा कर्म अहंकारयुक्त होता है, कर्तापन का अहंकार होता है उसे करने में और चूँकि वह कर्म कामना पूर्ति के लिए किया जाता है सो उसे करने में बहुत श्रम भी लगाया जाता है। इस स्थिति में कर्म और कर्मफल दोनों में घोर आसक्ति होती है और कर्मफल की प्राप्ति के लोभ में व्यक्ति सही और गलत को भूलकर मात्र अपनी इक्षापूर्ती की लालसा और अहंकार वश कर्म करता है। यह राजस कर्म है जो राजस ज्ञान से संचालित होता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 25
अनुबन्धं क्षयं हिंसामनवेक्ष्य च पौरुषम्।
मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते॥ 25।।
जो कर्म परिणाम, हानि, हिंसा और सामर्थ्य को न विचारकर केवल अज्ञान से आरंभ किया जाता है, वह तामस कहा जाता है।
सात्विक कर्म सही गलत को पहचान कर स्वभावतः किये जाते हैं, तो राजसी कर्म पसन्द-नापसन्द के अनुसार लाभ और लोभ वश, कामना पूर्ति के उद्देश्य से किये जाते हैं। लेकिन कई बार कर्म बिना किसी सोच विचार के , बिना किसी बुद्धि और विवेक के बिना परिणाम को तौले सिर्फ और सिर्फ मोह और भ्रम के अधीन होकर किये जाते हैं जिनमें न तो सही गलत की चिंता होती है, न ही पसन्द नापसन्द की गणना ही होती है बल्कि तैश में आकर किये जाते हैं उन्हें तामसी कर्म कहते हैं। ये कर्म क्रोध, घृणा, हिंसा , अविवेक और मूर्खता से ओतप्रोत होते हैं जिनसे करने वाले को भी क्षति होती है और जो लोग उस कर्म की परिधि में आते हैं उनकी भी क्षति होती है। करने वाले को ज्ञात ही नहीं होता है कि जो वह कर्म कर रहा है उसे करने की क्षमता भी है या नहीं उसमें। तामसी कर्म करने में पूरी तरह से अज्ञानता ही हावी होती है जिसके कारण इसके परिणाम सदा विध्वंसकारी ही होते हैं।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 26
मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः।
सिद्धयसिद्धयोर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते॥ 26।।
जो कर्ता संगरहित, अहंकार के वचन न बोलने वाला, धैर्य और उत्साह से युक्त तथा कार्य के सिद्ध होने और न होने में हर्ष -शोकादि विकारों से रहित है- वह सात्त्विक कहा जाता है।
ज्ञान और कर्म का प्रकार समझने के उपरांत व्यक्ति अपने ज्ञान और अपने कर्मों के अनुसार स्वयं का आकलन कर सकता है कि वह स्वयं किस प्रकार का कर्ता यानी व्यक्ति है। ज्ञान और कर्म के तीन तीन प्रकारों के अनुसार व्यक्ति कर्ता यानी कर्म करने वाले के रूप में भी तीन प्रकार का होता है।
पहले हम सात्विक कर्ता के लक्षणों को समझें। सात्विक कर्ता के निम्न प्रकार के लक्षण होते हैं-
(1) सात्विक दृष्टि वाला व्यक्ति सात्विक भाव से ही कर्म करता है। वह कर्म करते हुए भी उस कर्म से बन्धता नहीं है, उससे आसक्त नहीं होता है। वह इसलिए कर्म नहीं करता है कि फलाना कर्म करने से उसे लाभ होगा या हानि बल्कि वह कर्म इसलिए करता है क्योकि उसे अपनी दृष्टि में लगता है कि वह कर्म उसकी स्वाभाविक क्रिया है और क्योंकि वही कर्म सही है। कर्म करने की उसकी प्रेरणा उसे कर्म के सही और गलत होने से मिलती है। वह अपनी पसंद और नापसन्द से आसक्त होकर कर्म नहीं करता है।
(2) कर्म से अनासक्त व्यक्ति जब कर्म करता है तो उसे बस सही और गलत से मतलब रहता है, कर्तव्य और अकर्तव्य से मतलब रहता है। उसका ध्यान कर्म के गुण दोष पर रहता है। इस कारण प्रयोजन से वह बन्धता नहीं है। मान लीजिये कि आप किसी से प्रेम करते हैं। आपका प्रेम एक कर्म है जो आप किसी के प्रति करते हैं। यदि आप उस व्यक्ति से जिसे प्रेम करते हैं उससे आसक्त होकर कर्म करते हैं तो फिर आप उस व्यक्ति के अस्तित्व को नकार कर उसमें भी अपना ही अस्तित्व जड़ देते हैं। आप चाहते हैं कि वह व्यक्ति जिसे आप प्रेम करते हैं आप ही के अनुसार रहे, और इस प्रकार आप उस व्यक्ति की स्वतंत्रता को समाप्त कर उसपर स्वयं को लाद देते हैं। इस प्रकार का प्रेम(कर्म) आपको बन्धन में बाँध देता है, मुक्त नहीं होने देता है। लेकिन यदि आप उसे प्रेम इसलिए करते हैं क्योंकि प्रेम करना ही सही है, तब आप प्रेम के महत्व को स्वीकार कर उस व्यक्ति को फलने फूलने का मौका देते हैं और आप उससे प्रेम करते हुए भी बन्धते नहीं हैं।
(3) जब व्यक्ति सही गलत से प्रेरित होकर कर्म करता है तो उसमें कर्त्तापन का अभिमान नहीं आता है और इस प्रकार वह अहंकार से मुक्त होता है।
(4) कर्म से नहीं बंधकर कर्ता भाव से मुक्त होकर जो कर्म करता है उसे कर्म की गुणवत्ता में दृढ़ अभिरुचि होती है। चूँकि वह सही और गलत से प्रेरित है सो वह अपने कर्म को इस प्रकार से करने की कोशिश करता है कि उससे गलत नहीं हो और इस प्रयास की वजह से वह बहुत दृढ़ता, धैर्य और उत्साह से अपने कर्म को करता है।
(5) जब व्यक्ति कर्म करने में ही अपना दायित्व समझता है, अपने पसन्द और नापसन्द से ऊपर सही और गलत को स्थान देता है तो फिर इस अवस्था में कर्म के परिणाम क्या होंगे इससे उसे कोई फर्क नहीं पड़ता है। वह कर्म करने से मतलब रखता है और कर्मफल को नियति कब हवाले छोड़ देता है।
इस प्रकार से कर्म करने वाले कर्ता के मन में कर्म और फल से अनासक्ति के कारण उसे शांति प्राप्त होती है, शांति से सुख मिलता है और सुख से प्रसन्नता आती है सो बिना कुछ की आशा रखे हए भी वह प्रसन्न होते रहता है। उसकी खुशी बिना किसी शर्त के होती है। इस प्रकार के व्यक्ति को सात्विक कर्ता कहते हैं।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 27
रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः।
हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः॥ 27।।
जो कर्ता आसक्ति से युक्त कर्मों के फल को चाहने वाला और लोभी है तथा दूसरों को कष्ट देने के स्वभाववाला, अशुद्धाचारी और हर्ष-शोक से लिप्त है वह राजस कहा गया है।
सात्विक कर्ता से भिन्न राजस दृष्टि रखने वाले व्यक्ति के द्वारा राजसी कर्म किये जाते हैं सो इस प्रकार के व्यक्ति को राजसी कर्ता कहते हैं। राजसी कर्ता के लक्षण निम्न प्रकार के होते हैं-
(1) व्यक्ति कर्म को उसके सही या गलत होने के कारण नहीं करता है बल्कि कर्म करने की प्रेरणा व्यक्ति को अपनी पसंद और नापसन्द से मिलता है। वह वही कर्म करने के लिए प्रेरित होता है जो उसे पसन्द होते हैं और सो कर्म करते हुए वह कर्मों में लिप्त रहता है।
(2) जब व्यक्ति कर्म को अपनी पसंद और नापसन्द के अनुरूप करता है तो तय है कि उसे कर्मफल की भी चिंता रहती है । वह इस बात में अभिरुचि रखता है कि उसके कर्मों के फल क्या मिलते हैं। सो ऐसा व्यक्ति कर्म से तो बन्धता ही है, अपने कर्मफल से भी बन्धा होता है।
(3) जब व्यक्ति कर्मफल से आसक्त होता है तो तय है कि जिस कर्मफल में उसे लाभ दिखता है , उसके प्रति उसे लोभ होता है और तब उस फल की प्राप्ति हेतु जो भी प्रयोजन उससे बन पड़ता है जैसे किसी को हानि करना, किसी से द्वेष करना, किसी से लोभ वश लगाव रखना, किसी पर क्रोध करना, किसी के प्रति हिंसा करना आदि उसके स्वाभाविक गुण हो जाते हैं। परिणाम से चिंतित व्यक्ति परिणाम के प्रति लोभ के कारण हर तरह के अनाचार और व्यभिचार को अपना लेता है।
(4) चूँकि ऐसा व्यक्ति फल के प्रति आसक्त होकर सिर्फ अपने पसन्द का ही परिणाम चाहता है सो इसकी पूर्ति नहीं होने पर क्रोध, निराशा, विषाद, द्वेष जैसे भाव उसके मन में आते हैं । इसी प्रकार यदि मनोकुल परिणाम उसे मिलता है तो उस परिणाम को पा कर उसे हर्ष होता है, उसके अंदर अहंकार जगता है, और फल मिल जाए इसके लिए लाभ होता है।
सो कर्म और कर्मफल से बंधे व्यक्ति को जीवन में कभी शांति नहीं मिलती है। शांति के अभाव में उसे सुख नहीं मिल पाता है भले ही उसे कितना भी प्राप्त हो जाये वह और की इक्षा से अशांत और दुखी बना रह जाता है और इस कारण उसे जीवन भी खुशी नहीं मिलती भले उसकी कितनी भी इक्षाएँ क्यों नहीं पूरी हो जाएं। इस प्रकार उसकी खुशी सशर्त होती है और क्षणभंगुर होती हैं। इक्षाएँ उसे शीघ्र अशांत कर देती हैं और वह फिर दुखी हो जाता है। इस प्रकार के व्यक्ति को राजसी कर्ता कहते हैं।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 28
आयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठोनैष्कृतिकोऽलसः।
विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते॥ 28।।
जो कर्ता अयुक्त, शिक्षा से रहित घमंडी, धूर्त और दूसरों की जीविका का नाश करने वाला तथा शोक करने वाला, आलसी और दीर्घसूत्री (दीर्घसूत्री उसको कहा जाता है कि जो थोड़े काल में होने लायक साधारण कार्य को भी फिर कर लेंगे, ऐसी आशा से बहुत काल तक नहीं पूरा करता। ) है वह तामस कहा जाता है
कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जिनके मन , बुद्धि, विवेक, भावना और शरीर की क्रियाओं में कोई तालमेल ही नहीं होता है। ऐसे व्यक्ति तामस कर्ता कहे जाते हैं। चूँकि इस तरह के व्यकि की भावना और विवेक में कोई तालमेल नहीं होता है सो ऐसे व्यक्ति के अंदर न तो अपनी भावना को लेकर समझदारी होती है और न ही अपनी बुद्धि और विवेक के प्रति। इस समझदारी के अभाव में उस व्यक्ति क्रियाएँ भी बुद्धि रहित होती हैं।
इस अयुक्त व्यक्तित्व के कारण व्यक्ति समझ नहीं पाता है कि किस परिस्थिति में उसे किस तरह के कर्म करने चाहिए। सो ऐसा व्यक्ति हठी और अहंकारी होता है, समय , काल परिस्थिति के अनुसार स्वयं में अपेक्षित बदलाव भी नहीं ला पाता है। अपने लाभ के लिए ऐसा तामस व्यक्ति दूसरों के साथ बेईमानी करने से भी नहीं चूकता है और दूसरों के लिए और स्वयं के लिए बराबर समस्या खड़ी करने वाला होता है।
तामस व्यक्ति निराशावादी होता है और हर चीज का मात्र निराशावादी पहलू ही देखता है।
इन अवगुणों के कारण ऐसा कर्ता न केवल अलसी होता है बल्कि कार्य को टालते रहने वाला भी होता है। उत्साह और समझदारी से अनभिज्ञ तामस व्यक्ति समय पर कोई काम नहीं करता है और समय बीतने पर हड़बड़ी में कार्य करने का उपक्रम करता है जिससे उसके कर्म दोषपूर्ण होते हैं।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 29
बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं श्रृणु।
प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनंजय॥ 29।।
हे धनंजय ! अब तू बुद्धि का और धृति का भी गुणों के अनुसार तीन प्रकार का भेद मेरे द्वारा सम्पूर्णता से विभागपूर्वक कहा जाने वाला सुन।
प्रत्येक व्यक्ति बाहरी उत्प्रेरकों के प्रति भावना व्यक्त करता है। इस भावना को समझ कर, उसकी जाँच पड़ताल कर उसपर अपनी समझ विकसित करता है और इसप्रकार समझदारी प्राप्त करता है।
बाहरी उत्प्रेरकों से मन में जो भावनाएँ उतपन्न होती हैं उनके प्रति जो समझदारी विकसित करता है वही बुद्धि है और जो समझदारी विकसित होती है वह ज्ञान है। इसप्रकार बुद्धि के अनुरूप ही ज्ञान होता है। मान लीजिए कि किसी ने आपको गाली दी। गाली एक बाहरी उत्प्रेरक है । अब उस गाली के प्रति हमारी भावना में प्रतिक्रिया स्वरूप हिंसक भाव आ सकता है अथवा क्षमा कर देने का भाव आ सकता है या फिर उसे नजरअंदाज करने का भी भाव आ सकता है। इन तीनों में हम कौन सा भाव अपनाते हैं यह हमारे बुद्धि और विवेक पर निर्भर करता है। और इस बुद्धि के अनुरूप हम जो निर्णय लेते हैं वही हमारे ज्ञान को प्रदर्शित करता है। इस प्रकार बुद्धि मन और ज्ञान के बीच की कड़ी है। बुद्धि के कारण ही व्यक्ति चीजों में भेद कर उनके प्रकार और व्यवहार को समझता है। बुद्धि ही समझदारी की जननी है। बुद्धि व्यक्ति के मन को, उसके इंद्रियों को प्रभावित करती है , अपने अनुरूप बना लेती है सो बुद्धि से बाहर जाना सम्भव नहीं होता है। बुद्धि ही वह लगाम है जो मन को साध कर सही ज्ञान के रास्ते पर ले जाता है। यदि बुद्धि भ्रष्ट है तो मन पर लगाम कमजोर होगा और व्यक्ति का ज्ञान भी निम्न स्तर का होगा। नतीजा में उसके कर्म भी निम्न श्रेणी के होंगें और वह उसी के अनुरूप का कर्ता भी कहलायेगा।
बुद्धि सही दिशा में हो तो ज्ञान की दिशा सही होगी और कर्म की भी। लेकिन बुद्धि हो जाने से कर्म होंगे ही या व्यक्ति कर्म करेगा ही कोई जरूरी नहीं है। सो एक अन्य महत्वपूर्ण कारक है और वह है धृति या धैर्य (perserverance ) जिसके कारण व्यक्ति बुद्धि द्वारा निर्धारित मार्ग पर अंतिम तक चलने के लिए स्वयं को प्रतिबद्ध कर पाता है।
इसके आलोक में बुद्धि और धृति के प्रकार को समझने की आवश्यकता है ताकि कर्म और कर्ता को और साफ ढंग से समझा जा सके।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 30
प्रवत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये।
बन्धं मोक्षं च या वेति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी॥ 30।।
हे पार्थ ! जो बुद्धि प्रवृत्तिमार्ग (गृहस्थ में रहते हुए फल और आसक्ति को त्यागकर भगवदर्पण बुद्धि से केवल लोकशिक्षा के लिए बरतने का नाम 'प्रवृत्तिमार्ग' है।) और निवृत्ति मार्ग को (देहाभिमान को त्यागकर केवल सच्चिदानंदघन परमात्मा में एकीभाव स्थित हुए संसार से उपराम होकर विचरने का नाम 'निवृत्तिमार्ग' है।), कर्तव्य और अकर्तव्य को, भय और अभय को तथा बंधन और मोक्ष को यथार्थ जानती है- वह बुद्धि सात्त्विकी है।
सात्विक ज्ञान की समझ सात्विक बुद्धि ही कराती है जिसके कारण व्यक्ति सात्विक कर्म में प्रवृत्त होता है और सात्विक कर्ता कहलाता है। सात्विक बुद्धि के कुछ लक्षण निम्नवत हैं-
सन्सार में दो तरह के लोग होते हैं। एक जो सांसारिक कर्मो में लगे रहते हैं। ऐसे लोग सांसारिक जीवन में प्रवृत्त कहे जाते हैं। दूसरी तरफ वे लोग हैं जो रहते तो संसार में ही हैं लेकिन वे सांसारिकता से बन्धते नहीं हैं। ऐसे लोग संसार से निवृत्त कहे जाते हैं।
संसार में रहकर व्यक्ति को कर्म तो करने ही होते हैं, लेकिन जब व्यक्ति की बुद्धि उसे संसार के मोह और बन्धन से मुक्त होकर कर्म करने के लिए प्रेरित करती है तो वह व्यक्ति कर्म करते हुए भी कर्म और कर्मफल से आसक्त नहीं होता है । इस प्रकार उसकी बुद्धि उसे हर सांसारिक कर्म बन्धन और कर्म के परिणाम से मुक्त करती है भले उस व्यक्ति के कर्म संसार से सम्बंधित क्यों न होते हों। जो बुद्धि कर्म से युक्त व्यक्ति को कर्म और कर्मफल से मुक्त रखती है वही सात्विक बुद्धि कही जाती है।
ऐसा व्यक्ति कैसे कर्म करता है? ऐसा कर्म करते हुए अपनी पसंद और नापसन्द के अनुसार नहीं करता है बल्कि उस कर्म के सही और गलत का भेद समझकर सही के लिए करता है। वह स्वधर्म से प्रेरित होता है। सो उसका कर्म लोक कल्याणार्थ होता है न कि अपनी किसी स्वार्थ सिद्धि के लिए। प्रत्येक व्यक्ति का अपने , परिवार , समाज, देश, राष्ट्र, संसार, सजीव और निर्जीव के प्रति कुछ दायित्व होते हैं जिनके निर्वहन से वह सभी का कल्याण कर पाता है। यही कराने वाली बुद्धि सात्विक है। उसकी बुद्धि चूँकि स्वधर्मवश होकर रहती है सो उसे भी नही। होता है। उसके अंदर स्वार्थ पूर्ति की कामना नहीं होती है और न हीं कर्मफल के प्रति उसकी कोई लिप्सा होती है, सो ऐसा व्यक्ति निर्भय होता है। भय तो तब आता है जब कर्म करने के कोई विशेष फल की लालसा होती है जिसकी पूर्ति नहीं होने से उसे कुछ खोने का डर सताता है। लेकिन जब कर्म कर्तव्य वश किये जाते हैं, सिर्फ यह समझ कर किये जाते हैं कि उसकी स्थिति वशेष में वही कर्म श्रेयष्कर है सभी के लिए तो कर्म करने में व्यक्तिगत पसन्द और नापसन्द की बात ही खत्म हो जाती है। इसी कारण से व्यक्ति के अंदर कर्मफल के प्रति आसक्ति नहीं होती है बल्कि इस प्रकार से कर्म करने वाले को तो इसी से सुख और शांति मिलती है कि उससे जो कर्म हो रहें हैं वही उसकी स्थिति के अनुसार सबके कल्याणार्थ सही हैं। इसी कारण से ऐसी बुद्धि बन्धन से मुक्त करती है और मोक्ष दायिनी होती है। सो इस बुद्धि से युक्त व्यक्ति सभी सांसारिक कर्म करके भी संसार से निवृत्त होता है और मोक्ष गामी होता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 31
यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च।
अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी॥ 31।।
हे पार्थ! मनुष्य जिस बुद्धि के द्वारा धर्म और अधर्म को तथा कर्तव्य और अकर्तव्य को भी यथार्थ नहीं जानता, वह बुद्धि राजसी है।
राजसिक बुद्धि को जुनून की विशेषता है, जिससे भ्रम और त्रुटि हो सकती है। जब बुद्धि राजसिक है, तो सही और गलत, धर्म और अधर्म के बीच ठीक से अंतर करने में असमर्थ होती है। ऐसे में व्यक्ति ऐसा निर्णय ले सकता है जो स्वयं या दूसरों के लिए हानिकारक हैं। उदाहरण के लिए, राजसिक बुद्धि वाले व्यक्ति को आगे बढ़ने के लिए धोखा देने या चोरी करने का प्रलोभन दिया जा सकता है। उनके हिंसा या अन्य विनाशकारी व्यवहारों में संलग्न होने की अधिक संभावना हो सकती है। राजसिक बुद्धि से सम्मोहन या भ्रम पैदा हो सकता है। जब बुद्धि भ्रमित होती है, तो यह स्पष्ट निर्णय लेने में असमर्थ होती है। इससे व्यक्ति गलतियाँ कर सकता है कि बाद में पछतावा हो सकता है। सात्विक बुद्धि का महत्व यह कहता है कि सात्विक बुद्धि सबसे अच्छी बुद्धि है। सात्विक बुद्धि स्पष्टता, ज्ञान और भेदभाव की विशेषता है। जब बुद्धि सात्विक है, तो यह सही और गलत, धर्म और अधर्म के बीच ठीक से अंतर करने में सक्षम है। यह लोगों को बुद्धिमान निर्णय लेने योग्य बनाता है जो उनके सर्वोत्तम हित में हैं और दूसरों के सर्वोत्तम हित में होते हैं। यदि आप जीवन में बुद्धिमान निर्णय लेना चाहते हैं, तो एक सात्विक बुद्धि के अनुसार कर्म करना महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ है योग, ध्यान और अन्य आध्यात्मिक विषयों का अभ्यास करना जो मन को शुद्ध करने में मदद कर सकते हैं। इसका अर्थ उन गतिविधियों से बचना है जो मन को बादल सकते हैं, जैसे कि भोजन, लिंग और शराब में अत्यधिक भोग। सात्विक बुद्धि से व्यक्ति अधिक स्पष्टता, ज्ञान और भेदभाव प्राप्त कर सकता हैं। यह बुद्धिमान निर्णय लेने की अनुमति देगा जो एक अधिक पूर्ण और सार्थक जीवन का नेतृत्व करेगा।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 32
अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता।
सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी॥ 32।।
हे अर्जुन! जो तमोगुण से घिरी हुई बुद्धि अधर्म को भी 'यह धर्म है' ऐसा मान लेती है तथा इसी प्रकार अन्य संपूर्ण पदार्थों को भी विपरीत मान लेती है, वह बुद्धि तामसी है।
लेकिन ऐसे व्यक्ति भी होते हैं जिनकी बुद्धि न तो समझने की स्थिति में होती है और न ही समझ के भ्रम से सही और गलत में स्पष्ट अंतर कर पाती है बल्कि उनकी बुद्धि मान्यताओं पर आधारित होती है जिसके कारण वे सही को भी गलत ही मानते रहते हैं और इसके विपरीत गलत को सही मानते हैं। उनमें तर्कशीलता नहीं होती है, बस उनकी मान्यता होती है। जैसे किसी हत्यारे को हत्या करनी है तो वह उस हत्या के पीछे किसी तर्क को नहीं देखता बल्कि उसको यही लगता है कि हत्या कर देना ही उचित है तो वह हत्या कर देता है। तर्कशीलता के अभाव में इस प्रकार की बुद्धि रूढ़ होती है। जैसे उसकी मान्यता हो कि सिर्फ उसी के देवता पूजनीय हैं तो वह अन्य सभी के आस्थाओं का सिर्फ विरोध ही करेगा।
इस प्रकार के तर्कशून्य, सिर्फ मान्यता पर आधारित बुद्धि तामसिक बुद्धि कहलाती है जिसके कारण व्यक्ति सही , गलत, झूठ-सच, उचित-अनुचित का भेद कर पाने में असमर्थ होता है और सदा अपनी और दूसरों की हानि ही करता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 33
धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः।
योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी॥ 33।।
हे पार्थ! जिस अव्यभिचारिणी धारण शक्ति (भगवद्विषय के सिवाय अन्य सांसारिक विषयों को धारण करना ही व्यभिचार दोष है, उस दोष से जो रहित है वह 'अव्यभिचारिणी धारणा' है।) से मनुष्य ध्यान योग के द्वारा मन, प्राण और इंद्रियों की क्रियाओं ( मन, प्राण और इंद्रियों को भगवत्प्राप्ति के लिए भजन, ध्यान और निष्काम कर्मों में लगाने का नाम 'उनकी क्रियाओं को धारण करना' है।) को धारण करता है, वह धृति सात्त्विकी।
कर्म को सफलतापूर्वक करने के लिए कर्ता को बुद्धि और ज्ञान का होना ही पर्याप्त नहीं होता है बल्कि उसके अंदर कर्म सम्पादन का दृढ़ निश्चय और धीरज भी होना अनिवार्य है। आपको पता है, आपको एक जगह पहुँचना है, आपको यह भी पता है कि जाने का मार्ग क्या है लेकिन इतने भर से आप अपने गंतव्य पर पहुँचते तो नहीं हैं। बल्कि आपको गंतव्य तक पहुँचने के लिए
1.चलना होता है,
2.नियमित चलना होता है,
3.बिना दिग्भर्मित हुए चलना होता है, और
4.तब तक चलना होता है जब तक गंतव्य पर पंहुँच न जाएं।
यही धृति है, धीरज है, धैर्य है। जब व्यक्ति अपनी सात्विकी बुद्धि और ज्ञान से अपनी स्थिति को समझकर कर्म करता है तो उसके लिए आवश्यक है कि
1.वह कर्म में प्रवृत्त रहे,
2. निर्धारित कर्म को नियमित करे,
3.कर्म करने से उसका ध्यान भटके नहीं, कई तरह के लाभ, लोभ, लालच, भय, क्रोध, घृणा, आदि नकारात्मक भाव से बचे रहकर अपने अंतिम लक्ष्य के प्रति ध्यानमग्न हो कर कर्म करे, और
4.जो कर्म करे उसके परम् लक्ष्य को प्राप्त करने के पूर्व रुके नहीं।
जब व्यक्ति कर्म में प्रवृत्त रहता है तो उसके लिए आवश्यक है कि उसका लक्ष्य से ध्यान न भटके। ध्यान और एकाग्रता में फर्क है, उसे भी समझना चाहिए। एकाग्रता में व्यक्ति एक लक्ष्य पर ध्यान टिकाता है, उस लक्ष्य से जुड़े शेष तथ्यों से अनजान बना रहता है। लेकिन जब व्यक्ति अपने लक्ष्य के प्रति ध्यानमग्न होता है तो लक्ष्य के प्रति तो एकाग्र होता हीं है, उसके साथ साथ लक्ष्य के प्रति जागरूक भी रहता है, सो लक्ष्य से जुड़े, और उसको प्राप्त करने के मार्ग में किये जाने वाले कर्मो के प्रति भी और उनमें आ सकने वाली बाधाओं के प्रति भी जागरूक बना रहता है। सो व्यक्ति का कर्म अनवरत लक्ष्य की तरफ निर्बाध जारी रहता है। इस स्थिति में व्यक्ति मन, प्राण और इंद्रियों को अन्य विषयों में नहीं लगने देता है बल्कि उसकी चेतना की समष्ट चेष्टाएँ कर्म के प्रति ही समर्पित रहती हैं।
यही धृति सात्विक धृति कही जाती है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 34
यया तु धर्मकामार्थान्धत्या धारयतेऽर्जुन।
प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी॥ 34।।
परंतु हे पृथापुत्र अर्जुन! फल की इच्छावाला मनुष्य जिस धारण शक्ति के द्वारा अत्यंत आसक्ति से धर्म, अर्थ और कामों को धारण करता है, वह धारण शक्ति राजसी है।
कई व्यक्ति ऐसे होते हैं जिनमें कर्मफल की प्राप्ति की इक्षा अति तीव्र होती है। ऐसे लोग वही कर्म करते हैं जिनसे उनको मनवांछित फल की प्राप्ति हो और इसलिए इक्षित फल की प्राप्ति के लिए ही उनकी धृति होती है। सो इस प्रकार के व्यक्ति फल और अर्थ( धन) में मन को लगाए कर्म करने वाले होते हैं और इक्षित फलों की प्राप्ति के लिए वे सांसारिक रूप से आवश्यक धर्म कर्म में प्रवृत्त होते हैं। ऐसी धृति या धैर्य धारण की वृत्ति को राजसी धृति कहा जाता है। लेकिन इस प्रकार की धृति सही और गलत पर आधारित न हो कर पसन्द और नापसन्द पर आधारित होती है और मात्र फल प्राप्ति की इक्षा से होती है जिसके कारण ऐसे व्यक्ति घोर कामी होते हैं और निरन्तर संसार के बंधन में बंधे होते हैं। ऐसे लोग बिना थके बराबर फल की प्राप्ति और धन कमाने में लगे रहते हैं। और इसके लिए लोभ, क्रोध, ईर्ष्या, आदि भावों में डूबे हुए रहते हैं जिसके कारण वे निरन्तर कर्मबन्धन में बंधे रहते हैं।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 35
यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च।
न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी॥ 35।।
हे पार्थ! दुष्ट बुद्धिवाला मनुष्य जिस धारण शक्ति के द्वारा निद्रा, भय, चिंता और दु:ख को तथा उन्मत्तता को भी नहीं छोड़ता अर्थात धारण किए रहता है- वह धारण शक्ति तामसी है।
तामसी वृत्ति के व्यक्ति हमेशा काल्पनिक चीजों में उलझे रहते हैं और हमेशा सच्चाई से मुँह चुराते भागते रहते हैं। वे निरन्तर भय में जीते हैं, ऐसे भय में जिसका कोई कारण नहीं होता है, बल्कि जो उनकी कल्पना की उपज होता है। ये लोग धर्म कर्म भी न तो श्रद्धा से करते हैं और न लोभ से बल्कि वे यह भी भय से ग्रस्त होकर ही करते हैं। ये लोग बराबर दुख और विषाद में लगे रहते हैं, दुख और विषाद उनकी स्थाई प्रवृत्ति होती है। सो वे हमेशा इस भावना से ग्रस्त होते हैं कि उन्हींने कुछ खो दिया है और इसके दुख में ही लगे रहते हैं जिसके कारण अवसाद उनका स्थाई भाव बन जाता है। और ऐसे लोग अपने अहंकार में ही चूर रहते हैं और बारम्बार स्वयं को अवमानित महसूस करते हैं
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 36-37
सुखं त्विदानीं त्रिविधं श्रृणु मे भरतर्षभ।
अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति॥ 36।।
यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम्।
तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम्॥ 37।।
हे भरतश्रेष्ठ! अब तीन प्रकार के सुख को भी तू मुझसे सुन। जिस सुख में साधक मनुष्य भजन, ध्यान और सेवादि के अभ्यास से रमण करता है और जिससे दुःखों के अंत को प्राप्त हो जाता है, जो ऐसा सुख है, वह आरंभकाल में यद्यपि विष के तुल्य प्रतीत (जैसे खेल में आसक्ति वाले बालक को विद्या का अभ्यास मूढ़ता के कारण प्रथम विष के तुल्य भासता है वैसे ही विषयों में आसक्ति वाले पुरुष को भगवद्भजन, ध्यान, सेवा आदि साधनाओं का अभ्यास मर्म न जानने के कारण प्रथम 'विष के तुल्य प्रतीत होता' है) होता है, परन्तु परिणाम में अमृत के तुल्य है, इसलिए वह परमात्मविषयक बुद्धि के प्रसाद से उत्पन्न होने वाला सुख सात्त्विक कहा गया है।
संसार को व्यक्ति अपने मन के भाव यानी अपने विचारों के अनुसार समझता है। व्यक्ति के समस्त कर्मो का उद्देश्य सुख और शांति की प्राप्ति है सो जैसे मन के विचार होते हैं उसे उसी के अनुसार सुख और शांति की प्राप्ति होती है। ऐसी स्थिति में आवश्यक है कि सुख और शांति की प्राप्ति हेतु व्यक्ति अपनी सोच को सही रास्ते पर रखे।
लेकिन ऐसा सम्भव कैसे है? मन के भावों को और विचारों को दुखों की अनुभूति से दूर रखने के कई मार्ग हो सकते हैं लेकिन सर्वोत्तम मार्ग है दुख को समाप्त करना। दुख को सदा सदा के लिए समाप्त करना ही स्थाई सुख और स्थाई शांति का मार्ग है । दुख की अनुभूति भूत के प्रति मोह, भविष्य के प्रति आशंका और वर्तमान के प्रति उत्तेजना से होती है। मन के भाव और विचार बारम्बार अतीत और भविष्य में भागते हैं और वर्तमान में टिकते भी हैं तो वर्तमान से उद्वेलित होते रहते हैं। ऐसी स्थिति में मन काफी चंचल बना रहता है सो व्यक्ति को सुख का मार्ग नहीं मिलता है। ऐसा इसलिए हो पाता है क्योंकि हमें अपने कर्मों और कर्मफल से मोह के कारण लगाव बना रहता है। सो यदि दुख को सदा सदा के लिए समाप्त करना है तो स्वयं के अंदर की यात्रा करनी होगी न कि सुख के लिए बाहरी तत्वों पर निर्भर रहना होगा।मन अपनी स्थिति के अनुसार परिस्थितियों और चीजों का मूल्यांकन करता है और यह मन ऐसा मन में उठने वाले विचारों के कारण करता है। जब तक मन बाहरी तत्वों से प्रभावित होते रहता है यानी सम्बद्धता की स्थिति में रहता है तब तक मन उद्वेलित रहता है और इस कारण व्यक्ति अपने अंदर की यात्रा नहीं कर पाता है। सो मन को , उसके विचारों को भूत, भविष्य और वर्तमान से असम्बद्ध कर उसे शांत किये बिना स्थाई सुख और शांति नहीं मिल सकती है। ऐसा न तो पढ़कर किया जा सकता है और न सुनकर। मन को स्थाई रूप से दुखों से मुक्त करने लिए अभ्यास की आवश्यकता है। शुरू शुरू में यह प्रयास विषतुल्य लगता है लेकिन बारम्बार अभ्यास से मन स्वयं को बाहरी कारकों पर से अपनी निर्भरता को खत्म कर स्थाई सुख और शांति के अनुसार निवास करता है।
व्यक्ति की सारी चेष्टाएँ सुख और शांति प्राप्त करने के लिए होती हैं। सो सुख को जानना समझना आवश्यक है। सुख भी तीन प्रकार के कहे जाते हैं, सात्विक, राजसी और तामसिक सुख।
सात्विक सुख में दुखों का स्थायी रूप से अंत हो जाता है, राजस सुख में दुख से बाहरी चीजों से सम्पर्क कर कुछ समय के लिए स्वयं को अलग किया जाता है, जबकि तामसिक सुख की प्राप्ति के लिए दुख को निंद्रा आदि से दाबने, कुछ देर भूलने से होता है। इस प्रकार सात्विक सुख में दुख सदा के लिए समाप्त कर दिया जाता है । दुख उतपन्न करने वाले कारक रहते तो हैं लेकिन वे दुख नहीं दे पाते हैं। जबकिं राजस और तामस सुख की प्राप्ति दुखों को थोड़े समय के लिए भुला कर या उनको दाब कर होता है।
अब प्रश्न है कि सात्विक सुख कब और कैसे मिलता है। तो सात्विक सुख की प्राप्ति तब होती है जब व्यक्ति की बुद्धि अपने ही आत्मा में लगी रहती है, बाहरी कारकों में उसका मन नहीं भटकता है। जब उसकी बुद्धि, उसका मन चारो ओर से खींचकर उसके सेल्फ में ही अवस्थित होता है। तब न तो उसे सुख के लिए किसी बाहरी उत्प्रेरक पर निर्भर होना पड़ता है और न ही स्वयं को दुखों के कारणों से भुलाने की कोशिश करनी होती है।
यह सब सम्भव कैसे होता है। तो सात्विक सुख यानी स्थाई सुख को प्राप्त करने क्रमिक मार्ग है, जो कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग से होते हुए व्यक्ति को ध्यान तक ले जाता है जिसमें मन समस्त बाहरी भटकाव से मुक्त होकर आत्मवस्थित हुए रहता है। निश्चित ही इस मार्ग पर चलने पर प्रारम्भ में बहुत कष्ट हो रहा है ऐसा लगता है लेकिन बारम्बार अभ्यास से व्यक्ति कर्म, ज्ञान, भक्ति और ध्यान के माध्यम से असंबद्धता की स्थिति को पाता है जिसके बाद दुखों के स्थाई निवारण के कारण जो स्थाई सुख मिलता है वह अप्रतिम है।
श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 38
विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम्।
परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम्॥ 38।।
जो सुख विषय और इंद्रियों के संयोग से होता है, वह पहले- भोगकाल में अमृत के तुल्य प्रतीत होने पर भी परिणाम में विष के तुल्य (बल, वीर्य, बुद्धि, धन, उत्साह और परलोक का नाश होने से विषय और इंद्रियों के संयोग से होने वाले सुख को 'परिणाम में विष के तुल्य' कहा है) है इसलिए वह सुख राजस कहा गया है।
लेकिन व्यक्ति कई बार इन्द्रीयजनित सुखों को ही परम मान लेता है। जब व्यक्ति को लगता है कि उसकी इंद्रियों से जो सुख मिल रहा है वही एकमात्र सुख है तब वह ऐसी संवेदनाएं अधिक से अधिक चाहता है। उसका सुख इंद्रियों से मिलने वाली सम्वेदनाओं पर आधारित होता है सो वह स्वयं से बाहर की चीजों और व्यक्तियों से सूखी होना चाहता है। लेकिन ये बाहरी उत्प्रेरक हमेशा के लिए उसके साथ सम्बद्ध तो रह नहीं सकते सो उनका साथ छूटने पर उसे दुख ही मिलता है। साथ ही जिस उत्प्रेरक से उसे अपनी इंद्रियों के कारण सुख का अनुभव होता है वे समय के साथ पुरानी पड़ जाती है और उनसे उनकी सम्बद्धता पूर्व की भांति इन्द्रिय सुख नहीं दे पाती हैं।सो प्रारम्भ में तो इन्द्रिय जनित सुख बहुत अच्छे लगते हैं लेकिन कुछ समय व्यतीत होने पर या उनका साथ छूट जाने पर व्यक्ति पुनः दुख की अवस्था में चला जाता है और तब उनकी और अधिक इक्षा उसके मन में होती है, परिणाम स्वरूप उनकी प्राप्ति के लिए उसे अपने सही और गलत का भान ही नहीं रह जाता है। ऐसा सुख जो क्षणिक इन्द्रिय संयोग से उतपन्न होता है वह राजसी सुख कहलाता है।
श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 39
यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः।
निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम्॥ 39।।
जो सुख भोगकाल में तथा परिणाम में भी आत्मा को मोहित करने वाला है, वह निद्रा, आलस्य और प्रमाद से उत्पन्न सुख तामस कहा गया है।
अंग्रेजी में एक कहावत है ignorance is a bliss. जब व्यक्ति को ज्ञान, जानकारी, समझदारी और जागरूकता का अभाव होता है तो वह परम प्रसन्नता का अनुभव करता है। इस अज्ञानता की वजह से वह भरम में रहता है, उसे पता ही नहीं कि सही क्या है, गलत क्या है, उचित और अनुचित क्या है, कौन सा कर्म वांछित है और कौन अवांछित है। उसकी स्मृति भी भ्रमित होती है। उसका मन मोह की अवस्था में पड़ा रहता है। यह अवस्था निंद्रा, आलस, प्रमाद की होती है जिसमें व्यक्ति स्वयं के प्रति, अपने कर्मों के प्रति, उनके परिणामों के प्रति किसी भी जागरूकता से रिक्त होता है। इस अवस्था में उसे जो सुख मिलता है वह तामसिक सुख कहलाता है। इस सुख का कारण अज्ञानता, जागरूकता का अभाव, मोह, भ्रम और भ्रांति होती है। इनके कारण व्यक्ति कर्म करते हुए भी और उनका परिणाम भोगते हुए भी मोह की अवस्था में पड़ा रहता है। सो वह विस्मृति की अवस्था में रहते हुए स्वयं को सुखी महसूस करता है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति पुरुषार्थ कर्म में -अर्थात ज्ञान अर्जन, अर्थ अर्जन, दायित्वों के निर्वहन, और ध्यान में रहने की क्षमता से रहित होता है क्योंकि ऐसा व्यक्ति अक्षम होता है। उसे अपनी अक्षमता से ही सुख मिलता है।
श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 40
न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः।
सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिःस्यात्त्रिभिर्गुणैः॥ 40।।
पृथ्वी में या आकाश में अथवा देवताओं में तथा इनके सिवा और कहीं भी ऐसा कोई भी सत्त्व नहीं है, जो प्रकृति से उत्पन्न इन तीनों गुणों से रहित हो।
यह सम्पूर्ण सृष्टि, सभी दृश्य और अदृश्य जो भी इस प्रकृति में है सभी कुछ इन तीन गुणों-सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण से बने हुए हुए हैं। एक ही गुण हो किसी में यह सम्भव नहीं है, हाँ यह अवश्य है कि कोई एक गुण किसी भी सर्वाधिक हो और अन्य दो कम हों लेकिन तीनों गुण होंगे हीं।
श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 41
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप।
कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः॥ 41।।
हे परंतप! ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों के तथा शूद्रों के कर्म स्वभाव से उत्पन्न गुणों द्वारा विभक्त किए गए हैं।
हरेक व्यक्ति में तीनो गुण -सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण होते हैं, किंतु कोई एक गुण सबसे अधिक होता है। एक गुण सबसे अधिक होता है, और उसपर अन्य दो गुणों का कितना प्रभाव पड़ता है इसके आधार पर व्यक्तियों की चार कोटियाँ मानी गई है, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। यह विभाजन स्पष्टतः व्यक्तियों के स्वभाव जनित गुणों के अनुसार हैं ।
श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 42
शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्॥ 42।।
अंतःकरण का निग्रह करना, इंद्रियों का दमन करना, धर्मपालन के लिए कष्ट सहना, बाहर-भीतर से शुद्ध (गीता अध्याय 13 श्लोक 7 की टिप्पणी में देखना चाहिए) रहना, दूसरों के अपराधों को क्षमा करना, मन, इंद्रिय और शरीर को सरल रखना, वेद, शास्त्र, ईश्वर और परलोक आदि में श्रद्धा रखना, वेद-शास्त्रों का अध्ययन-अध्यापन करना और परमात्मा के तत्त्व का अनुभव करना- ये सब-के-सब ही ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म हैं।
वैसे तो किसी भी व्यक्ति में तीनों गुण यानी सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण होते हैं लेकिन जब सत्वगुण सर्वाधिक होता है और रजोगुण उससे कम और तमोगुण अत्यल्प होता है तो उसे ब्राह्मण कहा जाता है। यह व्यक्ति भी तमोगुण और रजोगुण के प्रभाव से उतपन्न स्वभाव प्रदर्शित करता है किंतु उसका स्वभाविक आचरण सबसे अधिक प्रभावी सत्वगुण के अनुसार ही होता है।
अब देखते समझते हैं कि ब्राह्मण का कर्म सत्वविक वृत्ति के अनुसार कैसा होना चाहिए।
1.मन शांत और उद्वेगरहित होता है क्योंकि मन पर इंद्रियों का वश नहीं होता है बल्कि इन्द्रियाँ मन के वश में होती हैं।
2. जब इन्द्रियाँ मन के वश में होती हैं तो इस कारण इस व्यक्ति के मन में कोई नकारात्मक विचार नहीं उठते हैं।
3.यह व्यक्ति अपने इन्द्रिय जनित सम्वेदनाओं पर नियन्त्र रखता है सो इसकी प्रतिक्रिया भी संयमित ढंग से करता है और उन सम्वेदनाओं से प्रभावित भी नहीं होता है।
4. इस प्रकार के व्यक्ति के मन के अंदर और बाहर एक ही भाव होता है जिसमें नकारत्मकता का नितांत अभाव होता है सो यह व्यक्ति अंदर और बाहर एज समान पवित्रता पर केंद्रित होता है।
5. ऐसा व्यक्ति अपनी ऊर्जा को बेकार ही खर्च नहीं करता है बल्कि उनको संचित कर उच्च आदर्शों (उच्चतर लक्ष्य यानी परमात्मा) की प्राप्ति के लिए लगाता है।
6. ऐसा व्यक्ति अपने स्वभाव से ही क्षमाशील होता है।
7. ऐसे व्यक्ति के मन , बुद्धि, विवेक , ज्ञान और कर्म में समन्वय और तारतम्य होता है जिस कारण इस व्यक्ति का व्यवहार हमेशा ही सीधा, स्पष्ट और सरल होता है।
8. ऐसा व्यक्ति सिर्फ ज्ञान जानता ही नहीं है बल्कि हमेशा ज्ञान के मार्ग पर प्रवृत्त भी होता है जिस कारण उसका ज्ञान उसके व्यवहारिक अनुभवों में भी प्रकट होता है ।
9. इस व्यक्ति को हमेशा ज्ञात होता है कि वह तो एक छोटी इकाई भर है और दरअसल सर्वोच्च सत्य का एक अंश है सो वह परम सत्य की तरफ अग्रसर होता है।
फिर व्यक्ति चाहे जो कुछ हो लेकिन यदि उसके कर्म इन गुणों से संचालित होते हों तो वह व्यक्ति कर्म से ब्राह्मण कहलाता है।
श्रीमदमागवादगीता अद्याय 18 श्लोक 43
शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्।
दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्॥ 43।।
शूरवीरता, तेज, धैर्य, चतुरता और युद्ध में न भागना, दान देना और स्वामिभाव- ये सब-के-सब ही क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म हैं।
रजो गुण की अधिकता , और अल्प मात्रा में सत्वगुण और अत्यल्प मात्रा में तमोगुण धारी व्यक्ति स्वभाव से क्षत्रिय स्वभाव वाला होता है। ऐसा व्यक्ति मुख्य रूप से क्षत्रिय होता है भले ही उसमे कुछ हद तक ब्राह्मण और बहुत कम तक बैश्य और शूद्र के भी लक्षण विद्यमान होते हैं। ऐसे क्षत्रिय स्वभाव वाले व्यक्ति के ज्ञान, बुद्धि और कर्म पूर्व पठित ज्ञान के अनुसार निम्नवत कर्म होते हैं
1. क्षत्रिय स्वभाव वाला व्यक्ति अपने स्वभाव से शूरवीर होता है अर्थात अपने समक्ष उपस्थित चुनौतियों और बदलाव का सामना करने के लिए ततपर रहता है न कि उनसे भागता है।यह गुण उसमें नेतृत्व क्षमता को दर्शाता है।
2. ऐसा व्यक्ति अपने स्वभाव से ही ज्ञान की इक्षा रखने वाला होता है। ज्ञान और साहस मिलकर उसमें तेज प्रकट करते हैं जिसके कारण वह निडर होता है और चीजों के प्रति हमेशा सावधान रहता है।
3. क्षत्रिय स्वभाव युक्त व्यक्ति में कार्यों को सम्पन्न करने का दृढ़ संकल्प होता है और वह किसी भी स्थिति में अपने संकल्प से विचलित नहीं होता है।
4. अपने सम्मुख आये समस्या, चुनौती और परिवर्तन का सामना शांत चित्त से बिना भयभीत हए करने को ततपर रहता है।
5. अपने इन स्वभावों के कारण क्षत्रिय स्वभाव वाला व्यक्ति अति विपरीत और कठिन समय आने पर भी कभी भी पीठ नहीं दिखाता है बल्कि उनका सामना करता है।
6. इस तरह के व्यक्ति में स्वाभाविक विशेषता होती है कि जो कुछ उसके पास है, धन, ऐश्वर्य आदि उनको वह अन्य लोगों के साथ, विशेषकर जरूरतमंदों के साथ साझा करता है।
7.ऐसा व्यक्ति अधिकारी स्वभाव वाला होता है अर्थात परिस्थितियों के अधीन नहीं बल्कि परिस्थितियों का स्वामी बनकर , उनको नियंत्रित कर के रहना चाहता है।
ये कुछेक मूल्य-कर्म हैं जो मुख्य रूप से क्षत्रिय स्वभाव वाले व्यक्ति के साथ होते हैं।
श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 44
कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्।
परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्॥ 44।।
खेती, गोपालन और क्रय-विक्रय रूप सत्य व्यवहार (वस्तुओं के खरीदने और बेचने में तौल, नाप और गिनती आदि से कम देना अथवा अधिक लेना एवं वस्तु को बदलकर या एक वस्तु में दूसरी या खराब वस्तु मिलाकर दे देना अथवा अच्छी ले लेना तथा नफा, आढ़त और दलाली ठहराकर उससे अधिक दाम लेना या कम देना तथा झूठ, कपट, चोरी और जबरदस्ती से अथवा अन्य किसी प्रकार से दूसरों के हक को ग्रहण कर लेना इत्यादि दोषों से रहित जो सत्यतापूर्वक पवित्र वस्तुओं का व्यापार है उसका नाम 'सत्य व्यवहार' है।) ये वैश्य के स्वाभाविक कर्म हैं तथा सब वर्णों की सेवा करना शूद्र का भी स्वाभाविक कर्म है।
रजोगुण की अधिकता और साथ में क्रमश तमोगुणी और सत्वगुणी व्यक्ति वैश्य कहलाता है जबकि तमोगुण की अधिकता वाले को शुद्र कहते हैं
बैश्य के स्वाभाविक गुण निम्नवत हैं।
1.वैश्य स्वभाव वाला व्यक्ति स्वभाव से ही उत्पादक होता है अर्थात वह संसाधनों से उपभोग किये जा सकने वाले सम्पदा को पैदा करता है।
2. संसाधनों की सुरक्षा यानी उनका संयमित उपयोग करना भी वैश्य का स्वाभाविक कर्म हैं। इस स्वभाव का व्यक्ति संसाधनों का उपयोग इस प्रकार करता है ताकि संसाधनों की क्षति न हो अर्थात आज की भाषा में इसे sustainable development कहते हैं।
3.संसाधनो और उपयोग की जा सकने वाली निर्मित या उत्पादित वस्तु का यदि एक ही जगह संग्रहण हो तो वे समाज के लिए न केवल निरर्थक हो जाते हैं बल्कि उसने लोभ, लालच, घमंड के विकार भी जन्म लेते हैं और दूसरे विपन्न हो सकते हैं , सो वैश्य स्वभाव वाला व्यक्ति उनके लेन देन यानी उनका व्यापार भी करता है।
जब तमोगुण की अधिकता होती है और रजोगुण और सत्वगुण कमशः बहुत कम होते हैं तो व्यक्ति में निम्न प्रकार के ज्ञान, बुद्धि, धृति होते हैं।
सो इस प्रकार का व्यक्ति अपने स्वभाव से सेवा करने वाला होता है और उसे शुद्र कहते हैं।
श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 45
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः।
स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥ 45।।
अपने-अपने स्वाभाविक कर्मों में तत्परता से लगा हुआ मनुष्य भगवत्प्राप्ति रूप परमसिद्धि को प्राप्त हो जाता है। अपने स्वाभाविक कर्म में लगा हुआ मनुष्य जिस प्रकार से कर्म करके परमसिद्धि को प्राप्त होता है, उस विधि को तू सुन।
जब व्यक्ति ऊँचे शिखर की यात्रा करना चाहता है, जब वह स्वयं के उद्धार के मार्ग पर चलना चाहता है तो उसके लिए सबसे जरूरी होता है कि वह अपने नैसर्गिक स्वभाव की पहचान करे ताकि उसे ज्ञात हो सके कि उसे यह यात्रा कँहा से प्रारम्भ करनी है। प्रत्येक व्यक्ति तीनों गुणों, सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण से लैस होता है और इन तीनों गुणों के आपसी अनुपात के अनुसार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के स्वभाव वाला होता है।
1. जब सत्वगुण प्रचुर मात्रा में हो और रजोगुण और तमोगुण अत्यल्प हों तो व्यक्तिग ब्राह्मण स्वभाव वाला होता है।
2.जब व्यक्ति में सत्वगुण प्रभावी हो किंतु साथ में रजोगुण भी पर्याप्त हो किंतु तमोगुण अत्यल्प हो तो व्यक्ति क्षत्रिय स्वभाव वाला होता है।
3.जब व्यक्ति में रजोगुण प्रभावी होबोर सत्वगुण भी हो और तमोगुण कम हो तो व्यक्ति वैश्य स्वभाव का होता है।
4. जब व्यक्ति में तमोगुण अत्यंत प्रभावी हो और अन्य अत्यल्प हों तो व्यक्ति शुद्र स्वभाव का होता है।
व्यक्ति के कर्म उसके स्वभाव से नियंत्रित होते हैं, यानी जैसा उसका स्वभाव वैसा ही उसका कर्म।
ध्यान रहे इस विभाजन का कोई सम्बन्ध व्यक्ति के सांसारिक कर्मों से नहीं होता है। आप संसार में जो भी कर्म करते हैं सो तो होता ही है जिसका सम्बन्ध उसके स्वभावगत विभाजन से नही होता है। सांसारिक रूप से एक ही कोटि के कर्म अलग अलग व्यक्ति अलग अलग दृष्टिकोण से करते हैं, जैसे एक सैनिक बहादुर भी हो सकता है और डरपोक भी। यह इस पर निर्भर करता है कि उसका नैसर्गिक स्वभाव किस कोटि का है। बहादुर सैनिक क्षत्रिय कोटि का होता है जबकि डरपोक सैनिक शुद्र कोटि का। इसी प्रकार एक सैनिक और एक डाकू का भी उदाहरण ले सकते हैं। एक सैनिक क्ष्ट्रीय स्वभाव का होता है लेकिन जब उसकी बहादुरी दुसरो का धन लूटने के लिए उपयोग में आती है तो वह क्षत्रिय न होकर शुद्र कोटि का होता है।
इसलिये यह जरूरी है कि हम व्यक्ति के सांसारिक कर्मों से उसके नैसर्गिकि वर्गीकरण को न समझकर उसके स्वभाव जनित वर्गीकरण से समझें।
जब व्यक्ति अपना स्वमूल्यांकन अपने स्वाभाविक प्रवृत्ति को समझ लेता है तो फिर साधना के माध्यम से आगे के ऊपर की स्थिति में लग पाता है। यदि कोई व्यक्ति अपने स्वाभाविक कोटि को नहीं समझ कर दूसरों की नकल शुरू कर देता है तब उसका ह्रास होने लगता है। अतः साधना की यात्रा में सबसे जरूरी है कि हम अपने स्वाभाविक स्थिति को जानकर आगे बढने हेतु कर्म में प्रवृत्त हों भले संसार में सांसारिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु कोई भी कार्य करते हों
श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 46
यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्।
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः॥ 46।।
जिस परमेश्वर से संपूर्ण प्राणियों की उत्पत्ति हुई है और जिससे यह समस्त जगत् व्याप्त है उस परमेश्वर की अपने स्वाभाविक कर्मों द्वारा पूजा करके मनुष्य परमसिद्धि को प्राप्त हो जाता है।
हर तरह के प्राणी को अपने स्वाभाव जनित कर्म ही करना चाहिए भले उसके सांसारिक कर्म कोई भी हों। लेकिन ये तो मात्र कर्म हुए । इन कर्मों को करें कैसे कि ये कर्म कर्मतोग के अनुसार हो पाएं? तो कर्मों को करने में कुछ बातों को ध्यान में रखना अनिवार्य हैं।
इस संसार की गति सर्वोच्च सत्य से ही निर्धारित होती है। सर्वोच्च सत्य ही विभिन्न नामों से जाना जाता है, जैसे ईश्वर, भगवान, परमात्मा, आदि। यही हमारी परम् चेतना है। सभी कुछ इसे से उतपन्न होता है और अपने अंत में फिर उसी में समाहित हो जाता है। इसे एक उदाहरण से समझते हैं। सागर की लहरें सागर के जल से निकलती हैं, उसी में उनका अस्तिव दिखता है और फिर उसी में वे विलीन हो जाती हैं। सागर की लहरों के लिए सागर का जल ही सर्वोच्च सत्य है। इसी प्रकार संसार के सारे सजीव और निर्जीव का परम सत्य एक हीं है और वही सभी में सामान भाव से उपस्थित भी है और सब कुछ अपनी उतपत्ति से अंत तक उसी के सहारे हैं।
सो व्यक्ति जब भी कर्म करे, जो भी कर्म करे उसे अपने कर्मों को उसी परम् सत्य को साक्षी समझ कर उसी को अर्पित कर करना चाहिए। इससे व्यक्ति का कर्ता भाव अभ्यासवश धीरे धीरे समाप्त हो जाता है और वह कर्म को प्रयास वश न कर स्वाभाविक गति से करने लगता है। जब वह इसका अभ्यास प्रारम्भ करता है तो उसे लगता है कि वह स्वयं उन कर्मों को कर रहा है। किंतु जब वह अपने कर्मों को ईश्वर पर समर्पित कर करने का बारम्बार अभ्यास करता है तो धीरे धीरे उसे अहसास होने लगता है कि यह तो ईश्वर की इक्षा से कर रहा है और उसी को समर्पित कर कर रहा है। इस कारण उसे शुद्ध ढंग से , शुद्ध भाव से बिना किसी फल के लालच के कर्म करने का अभ्यास होते जाता है। इस प्रकार से न केवल कर्मों के सफलता पूर्वक करने का अभ्यास होता है बल्कि वह त्रुटिपूर्ण, लालकग वश कर्म करने की प्रवृत्ति से बचता भी है और वही कर रहा है यह कर्ता भाव भी समाप्त हो जाता है। यही कर्तापन से मुक्ति उसे अहंकार मुक्त, लोभ मुक्त कर्म करने के लिए प्रेरित करता है जिस कारण वह सत्य और परम सिद्धि के मार्ग पर अग्रसर हो पाता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 47
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्॥ 47।।
अच्छी प्रकार आचरण किए हुए दूसरे के धर्म से गुणरहित भी अपना धर्म श्रेष्ठ है, क्योंकि स्वभाव से नियत किए हुए स्वधर्मरूप कर्म को करता हुआ मनुष्य पाप को नहीं प्राप्त होता।
व्यक्ति बिना कर्म किये तो रह नहीं सकता है और कर्म जब कर्मयोग के मार्ग से किया जाता है तो वही कर्म कर्मबन्धन से मुक्त हो पाता है। कर्मों को त्यागने से कोई किसी का कल्याण सम्भव ही नहीं है। कर्म को कर्मयोग से करने की एक अन्य विशेषता है कि व्यक्ति को उसी भाव से कर्म करना चाहिए जिस भाव से उसका स्वभाव निर्मित है। प्रत्येक व्यक्ति सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण के भिन्न भिन्न मात्रा के अनुपात से उसका स्वभाव बनता है। जो गुण सबसे प्रभावी है स्वभाव में उसी के अनुसार कर्म करना चगये। प्रत्येक भाव से ईश्वर की प्राप्ति सम्भव है जब उस भाव से कर्म किया जाए। यदि किसी व्यक्ति में क्षत्रिय का गुण सर्वाधिक है और वह ब्राह्मण के स्वभाव का कर्म करना चाहता है तो वह न अपने स्वाभाविक कर्म को कर पाता है और न वह ब्राह्मण की नकल ही कर पाता है। इस कारण उसे निरन्तर निराशा, क्षोभ जैसे नकारात्मक भावों से गुजरना पड़ता है। लेकिन व्यक्ति अपने स्वभाविक गुणों के अनुसार कर्म करता है और उसे सकारात्मक भाव से उस गुण की विशेषता के साथ कर्म करता है तो एक तरफ तो वह स्वयं को कर्तापन के अहंकार से मुक्त कर कर्म कर पाता है और दूसरी तरफ अपनी स्वाभाविक दक्षता की वजह से समस्त मानवता की यथोचित सेवा भी कर पाता है। अति सरल भाषा में समझें तो हम समझते हैं कि व्यक्ति को अपनी स्वाभाविक अभिरुचि के अनुसार उस अभिरुचि के लिए आवश्यक विशेषताओं को पूरा करते हुए ही कर्म करना चाहिए तभी वह अपना शत प्रतिशत औचित्य सिद्ध कर पाता है।
श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 48
सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्।
सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः॥ 48।।
अतएव हे कुन्तीपुत्र! दोषयुक्त होने पर भी सहज कर्म नहीं त्यागना चाहिए, क्योंकि धूएँ से अग्नि की भाँति सभी कर्म किसी-न-किसी दोष से युक्त हैं।
प्रत्येक व्यक्ति के कर्म उसके गुणों से आते हैं और यही तीनो गुणों से प्रकृति बनती है। जब तक व्यक्ति अपने स्वाभाविक प्रभावकारी गुणों में अभ्यास पूर्वक बदलाव नहीं लाता है तब तक उसके कर्म उसके तत्समय प्रभावी गुण के अनुसार ही होते हैं और इसी गुण के अनुसार किया जाने वाला कर्म व्यक्ति के द्वारा निपुणता और दक्षता के साथ किया जा सकता है। जो कर्म उसके सहज नहीं है उसमें उसकी निपुणता और दक्षता भी नहीं होती है या फिर निम्न कोटि की होती है और तब ऐसा कर्म किया जाए तो न तो कर्म ढंग से सम्पादित होगा और न हीं अभीष्ट की प्राप्ति ही होगी।
इसी लिए व्यक्ति को चाहिए कि सब अपना स्वाभाविक कर्म ही करे, नकल न करे किसी की।जब तक कोई अन्य गुण साधना से आत्मसात कर उसे अपने स्वभाव में नहीं ढाल लें तब तक कोई प्रयास न करें क्योंकि तब वह प्रयास नकल भर रहेगा और आपको अपने स्थान से गिरा देगा, आपके अपयश का कारण बनेगा और दूसरों के लिए समस्या बनेगा।
श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 49
असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः।
नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां सन्न्यासेनाधिगच्छति॥ 49।।
सर्वत्र आसक्तिरहित बुद्धिवाला, स्पृहारहित और जीते हुए अंतःकरण वाला पुरुष सांख्ययोग के द्वारा उस परम नैष्कर्म्यसिद्धि को प्राप्त होता है।
व्यक्ति बिना कर्म किये तो रह नहीं सकता है तो फिर वह कौन सा मार्ग है, वह कौन सी समझ है जिसके अनुसार वह अपना स्वाभाविक कर्म करे कि कर्म करते हुए भी कर्म बन्धन में नहीं पड़े।
तो इसके लिए आवश्यक है कि व्यक्ति अपना स्वाभाविक कर्म तो करे किंतु उस कर्म और उसके फल से बंधे नहीं। यानी उसे कर्म सहज रूप में करने होते है और कर्म मैं कर रहा हूँ इस भाव से उसे मुक्त होना चाहिए। यह तभी हो सकता है जब कर्म करते हुए भी कर्म करने में उसे स्वयं न दिखे बल्कि उसे लगे कि यही तो करना है। कर्म में मैं कर रहा हूँ और यह मेरा कर्म है इससे मुक्त हो। जैसे ही लगता है कि मैं ही कर रहा हूँ उसी समय उस कर्म के साथ व्यक्ति का मोह, लोभ, अहंकार, घृणा , वासना आदि जुड़ जाते हैं और वह कर्म फल से बन्धते जाता है और उसकी आसक्ति कर्म में बढ़ जाती है, सो वह कर्म बन्धन में बंध जाता है।
और यह तभी सम्भव हो पाता है जब व्यक्ति को अपनी इंद्रियों पर , अपनी सोच पर पूरा नियंत्रण होता है और कर्म करने में उसे इसलिए रुचि नहीं होती है कि इससे उसकी कामनाएँ पूरी होंगी।
और इस कर्म को करने में उसे कर्तापन का अहंकार नहीं होता है अर्थात वह कर्म तो करता है लेकिन कर्म करने वाला वह नहीं है बल्कि कर्म तो उसकी सहज वृत्ति है। अर्थात कर्म करने में कर्तापन का त्याग हो।
इस समझ से अपना सहज कर्म करने वाला ही कर्म करते हुए कर्म बन्धन से मुक्त होता है।
श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 50
सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे।
समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा॥ 50।।
जो कि ज्ञान योग की परानिष्ठा है, उस नैष्कर्म्य सिद्धि को जिस प्रकार से प्राप्त होकर मनुष्य ब्रह्म को प्राप्त होता है, उस प्रकार को हे कुन्तीपुत्र! तू संक्षेप में ही मुझसे समझ।
कर्मयोग से कर्म करते हुए व्यक्ति का मन स्वक्ष होते जाता है। मन की स्वक्षता का अर्थ है कि उसे राग-द्वेष, हर्ष-विषाद, काम, क्रोध, लोभ मद ,अज्ञानता, आदि से मुक्ति। इस अवस्था में जब मन आ जाता है तो उसे शुद्ध और स्वक्ष मन की अवस्था कहते हैं। मन की इस अवस्था में मन सदा प्रसन्न और सुखी रहता है, उसकी प्रसन्नता और उसके सुख के लिए कोई पूर्व शर्त नहीं होती है।
वस्तुतः व्यक्ति स्वयं ही ब्रह्म है लेकिन वह स्वयं ही इस सत्य से अनजान होता है और ईश्वर की प्राप्ति, स्थाई शांति और सुख की प्राप्ति के लिए बाहरी अवयवो को खोजते रहता है। जो आपके अंदर है वह भला बाहर कंहा मिलेगा, सो उसके सारे प्रयास निरर्थक हो जाते हैं।
लेकिन जब व्यक्ति कर्मयोग के अनुसार कर्म करने में दक्षता प्राप्त कर लेता है, कर्मयोग उसका स्वभाव बन जाता है तब उसके मन से विकार दूर हो जाते हैं। विकारों से स्वक्ष मन दर्पण की तरह होता है जिसमें वह स्वयं के वास्तविक स्वरूप यानी स्वयं को ब्रह्मयुक्त देख पाता है।
इस स्वयं को ब्रह्म समझने के लिए इस ज्ञान के प्रति विशेष निष्ठा की आवश्यकता होती है। कर्मयोग से स्वक्ष मन इस ज्ञान की प्राप्ति के लिए निश्चित निष्ठा की प्राप्ति से मन स्वयं में अपना ईश्वरत्व प्राप्त कर पाता है।
श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 51, 52 एवं 53
बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च।
शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च॥ 51।।
विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानस।
ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः॥ 52।।
अहङकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्।
विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते॥ 53।।
विशुद्ध बुद्धि से युक्त तथा हलका, सात्त्विक और नियमित भोजन करने वाला, शब्दादि विषयों का त्याग करके एकांत और शुद्ध देश का सेवन करने वाला, सात्त्विक धारण शक्ति के (इसी अध्याय के श्लोक 33 में जिसका विस्तार है) द्वारा अंतःकरण और इंद्रियों का संयम करके मन, वाणी और शरीर को वश में कर लेने वाला, राग-द्वेष को सर्वथा नष्ट करके भलीभाँति दृढ़ वैराग्य का आश्रय लेने वाला तथा अहंकार, बल, घमंड, काम, क्रोध और परिग्रह का त्याग करके निरंतर ध्यान योग के परायण रहने वाला, ममतारहित और शांतियुक्त पुरुष सच्चिदानन्दघन ब्रह्म में अभिन्नभाव से स्थित होने का पात्र होता है।
कर्मयोग के मार्ग पर चलने से व्यक्ति की बुद्धि और अंतःकरण शुद्ध होते हैं और तब वह आत्मसाक्षातकार की तरफ बढ़ता है जँहा वह स्वयं को ब्रह्म में विलीन हुआ पाता है। इस स्थिति तक पहुँचने के लिए कुछ पूर्व शर्तें हैं जिन्हें पहले तो समझाया ही गया है विस्तार से, फिर से उनको संक्षेप में बताया जा रहा है।
1.उस व्यक्ति की बुद्धि सूक्ष्म और शुद्ध होनी चाहिए । हो सकता है कि सांसारिक विषयों को समझने हेतु व्यक्ति की बुद्धि तीक्ष्ण हो परन्तु अध्यात्म की समझ के लिए, आत्मा और अनात्मा की समझ के लिए, स्व और जो स्व नहीं है उसके भेद को समझने के लिए व्यक्ति की बुद्धि सूक्ष्म होना अनिवार्य है। जैसे कुल्हाड़ी से पेड़ तो काटा जा सकता है किंतु दाढ़ी नहीं बनाई जा सकती है वैसे ही सांसारिक बुद्धि से संसार का ज्ञान तो हासिल किया जा सकता है किंतु अपनी आत्मा को नहीं समझा जा सकता है।
2.बुद्धि को न केवल सूक्ष्म होना चाहिए बल्कि शुद्ध भी होना चाहिए यानी बुद्धि का संग उच्च स्तर के मूल्यों यथा सत्य, अहिंसा, परोपकार, क्षमा आदि के साथ होना चाहिए।
3.इस सूक्ष्म और शुद्ध बुद्धि का परिणाम तभी आता है जब धृति यानी मन और शरीर दृढ़ प्रतिज्ञ हो उद्देश्य की प्राप्ति के लिए न कि वह बार बार भटकने वाली हो।
4.मन और बुद्धि में संगदोष नहीं होना चाहिए यानी व्यक्ति की बुद्धि और विवेक पसन्द और नापसन्द से प्रभावित न होकर निर्विकार भाव से एकाग्र होने चाहिये।
5.व्यक्ति का मन, बुद्धि और विवेक ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों से प्रभावित नहीं होने चाहिए बल्कि अपनी इंद्रियों पर उसका अपना प्रभुत्व होना चाहिए ताकि मन, बुद्धि और विवेक अर्थात उसका ध्यान शब्द, रस, स्पर्श, गन्ध से प्रभावित न होकर आत्म चिंतन में हीं लीन हो।
6.इंद्रियों के प्रभाव से मुक्त होकर व्यक्ति को संगदोष से मुक्त होना चाहिए ताकि न त उसकी मन बुद्धि में कोई आसक्ति हो और न ही किसी से कोई बैर हो।
7.क्रियात्मक स्तर पर व्यक्ति में निम्न विष्टताओं का होना अनिवार्य है
1.एकांत
2.कम खाने वाला
3.बहुत कम बोलने वाला, मन में भी बहुत कम बोलना
4.शरीर को ढीला छोड़ देना
5.बाहर की कोई आवाज नहीं सुनना
6. जिव्हा पर नियंत्रण(शब्द, स्वाद, स्पर्श पर नियंत्रण)
7.आत्म चिंतन एवं आत्म केंद्रित
संसार से अपना ध्यान हटाकर आत्म केंद्रित होना। जो सेल्फ नही है(जो संसार है) उससे अपना ध्याय हटाकर आत्म पर केंद्रीत होना।
यह वैराग्य के सहयोग से सम्पन्न होता है। सभी तरह के द्वैत से मुक्त होना।
व्यक्ति एकान्त में रहता है ताकि वह सांसारिक विचलनों से दूर रह सके। वह कम भोजन करता है ताकि वह अपने मन को आध्यात्मिक मामलों पर केंद्रित कर सके। वह अपनी वाणी, शरीर और मन को नियंत्रित करता है ताकि वह ऐसे कार्यों में शामिल न हो जो स्वयं या दूसरों को नुकसान पहुंचाते हैं। वह ध्यान और एकाग्रता में निरंतर लगा रहता है ताकि वह अपने मन को शुद्ध कर सके और ईश्वरीय एकता प्राप्त कर सके।
इस श्लोक में, भगवान श्रीकृष्ण वैराग्य के महत्व पर भी जोर देते हैं। वैराग्य का अर्थ है सांसारिक वस्तुओं और आसक्तियों से अलग होना। यह यह समझना है कि संसार में सब कुछ नश्वर और अंततः अवास्तविक है। वैरागी व्यक्ति अपने पास के सामान, अपने संबंधों या अपने शरीर से जुड़ा हुआ नहीं होता है। वह उन इच्छाओं और भय से मुक्त होता है जो हमें भौतिक दुनिया में बांधते हैं।
इस श्लोक में वर्णित गुणों को विकसित करना आसान नहीं है। इसके लिए अनुशासन, समर्पण और निरंतर अभ्यास की आवश्यकता होती है। हालांकि, मोक्ष प्राप्त करने के लिए ये गुण आवश्यक हैं। इन गुणों का पालन करके, हम अपने मन और हृदय को शुद्ध कर सकते हैं और ईश्वर के करीब पहुंच सकते हैं।
8.ब्रह्म प्राप्ति यानी जीवन और मरण के चक्र से मुक्ति के लिए क्रियात्मक स्तर पर उक्त विशिष्टताओं के अतिरिक्त व्यक्ति में उसकी बुद्धि के स्तर पर भी निम्न विशिष्टताओं का होना जरूरी है ताकि वह स्वयं के वास्तविक स्वरूप को पहचान कर प्राप्त कर सके।
अहंकार का अंत--
व्यक्ति का अहंकार उसका छद्म ईगो होता है। यह स्वयं के बारे एक धारणा है जैसे कि आदमी हूँ, मेरा नाम फलाना है, मैं पुरुष हूँ, स्त्री हूँ, विद्यार्थी हूँ, हिन्दू हूँ, ईसाई हूँ आदि आदि। दरअसल हम इस संसार में स्वयं को जैसे देखते हैं वही हमारा ईगो है जो हमारी सोच, हमारे विचार आदि अमूर्त धारणाओं से बना होता है जो समय, काल, परिवेश आदि के सापेक्ष होता है । व्यक्ति अपना अहंकार, अपना ईगो, अपना छद्म व्यक्तित्व इस संसार में व्याप्त सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण से गढ़ता है।
परन्तु गुणों से मुक्ति हमें अपने अहंकार से मुक्ति का रास्ता देती है। व्यक्तित्व यानी छद्म ईगो यानी व्यक्ति का अहंकार परिवर्तनीय है और अंततः त्याग करने योग्य है। इसके त्याग करने से हमें अपने ऊपर चढ़े आवरण से मुक्ति मिलती है जिसके बाद हम स्वयं को वास्तविक स्वरुप में देखते हैं जब हम परमब्रह्म में स्वयं को विलीन पाते हैं। अहंकार का त्याग कोई शारीरिक क्रिया नहीं है बल्कि यह एक मानसिक प्रक्रिया है जो हमें अपने तीनों गुणों की मुक्ति से मिलती है और जो कर्मयोग और ज्ञानयोग से युक्त होकर ध्यानयोग की अवस्था में मिलती है।
बल से -बल के त्याग का अर्थ शरीर के बल से नहीं है। दरअसल हमारे अंदर अपनी इक्षाओं और कामनाओं के प्रति जबरदस्त लगाव होता है जिसके कारण हम संसार के भौतिक चीजों से इतने बन्ध जाते हैं कि संसार की भौतिकता हमें तरह तरह के गलत कामों के लिए उकसाती रहती है। सो हमारे अंदर काम और काम से सम्बद्धता की जो शक्ति है उसका त्याग करने पर ही उच्चतर मार्ग पर आरूढ़ हो पाते हैं।
दर्प से मुक्ति -हमें अपने सांसारिक उपलब्धियों के प्रति जो गौरव होता है उसकी वहज से हमसभी कई तरह के गलत गतिविधोयों में सलङ्गल रहते हैं । सो व्यक्ति को अपने धन-बल, नाम, पहुँच आदि पर घमंड को त्याग देना चाहिए।
काम से मुक्ति-संसार और इसके ऐश्वर्य के बन्धन से हीं सभी मोह उतपन्न होते हैं जो समस्त बुराइयों का जड़ है सो हर तरह की सांसारिक और बाहरी इक्षाओं का त्याग करने पर ही व्यक्ति के लिए आगे का मार्ग प्रशस्त होता है।
क्रोध से मुक्ति-कामनाओं की पूर्ति की बाधा से क्रोध का जन्म होता है जो हमसे अनाचार, व्यभिचार, अत्याचार, हिंसा ,शत्रुता जैसे अवांछित कर्म कराता है सो इसका त्याग ही सरोपरी है।
परिग्रह से मुक्ति--सांसारिक वस्तुओं का संग्रहण उन वस्तुओं से मोह वश हमें बांधता है सो उसका भी त्याग करना चाहिए।
ममत्व से मुक्ति-मैं और मेरा के त्याग से मोह का नाश होता है जिसकी वजह से ममत्व का नाश होता है।
इन सभी का नाश ही शांति की अवस्था को लाता है जो हमारे वास्तविक सेल्फ का परिचायक है। इसी अवस्था में व्यक्ति ब्रह्म की अवस्था को प्राप्त होता है।
यही परम् ज्ञान और परम् प्राप्ति है।
श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 54
ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति।
समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्॥ 54।।
फिर वह सच्चिदानन्दघन ब्रह्म में एकीभाव से स्थित, प्रसन्न मनवाला योगी न तो किसी के लिए शोक करता है और न किसी की आकांक्षा ही करता है। ऐसा समस्त प्राणियों में समभाव वाला (गीता अध्याय 6 श्लोक 29 में देखना चाहिए) योगी मेरी पराभक्ति को ( जो तत्त्व ज्ञान की पराकाष्ठा है तथा जिसको प्राप्त होकर और कुछ जानना बाकी नहीं रहता वही यहाँ पराभक्ति, ज्ञान की परानिष्ठा, परम नैष्कर्म्यसिद्धि और परमसिद्धि इत्यादि नामों से कही गई है) प्राप्त हो जाता है।
और जब व्यक्ति उक्त कहे ढंग से यानी कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्ति योग और ध्यान योग के माध्यम से परम् सुख और परम् शांति कि अवस्था को प्राप्त होता है तब वह ब्रहम्मय हो जाता है। यही उसकी परम् प्राप्ति जिसे मोक्ष भी कहते हैं कि अवस्था होती है जब उसको किसी के लिए न तो शोक रह जाता है और न ही उसे किसी की कोई कामना रह जाती है बल्कि वह तो इन सभी से मुक्त स्व में अवस्थित सभी को समान रूप से देखता है। वह स्वयं को दूसरों से अलग नहीं देखता है बल्कि को स्वभावतः एक समान ही पाता है और इस प्रकार वह स्वयं को जगत के हर भाग में स्वयं को पाता है और समस्त जग को भी स्वयं के अंदर ही पाता है।
यही परा भक्ति है, यही मुक्ति है, यही मोक्ष है और यही ब्रह्म की अवस्था है। भगवान, भक्ति और भक्त सभी एक में हीं एकाकार होते हैं।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 55
भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः।
ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्॥ 55।।
उस पराभक्ति के द्वारा वह मुझ परमात्मा को, मैं जो हूँ और जितना हूँ, ठीक वैसा-का-वैसा तत्त्व से जान लेता है तथा उस भक्ति से मुझको तत्त्व से जानकर तत्काल ही मुझमें प्रविष्ट हो जाता है।
जब व्यक्ति के अंदर कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग और ध्यानयोग से अपने वास्तविक सत्य की प्राप्ति होती है यानी इस प्रकार से वह अपनी ही आत्मा को, आत्मस्वरूप को जानता है तो इसी को पराभक्ति या परम् ज्ञान कहते हैं जिसके माध्यम से वह ईश्वर को उसके समस्त तत्वों से पहचान कर उन्हीं में विलीन हो जाता है। वह ईश्वर को उनके निर्गुण स्वरूप को सगुन स्वरूप को प्राप्त होता है।
जब तक आप अपने "मैं" और मेरा को ढोते हैं तब तक आप इस स्तर पर नहीं पहुँचते हैं और तब तक आपको कर्म, ज्ञान,भक्ति और ध्यान योग के रास्ते चलना ही होता है।
मैं और मेरा के त्याग का एकमात्र मार्ग यही योग है जिसपर चलकर आप ईश्वरत्व को प्राप्त कर उसी ब्रह्म से एकाकार हो परम् शांति को प्राप्त होते हैं।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 56 57
सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः।
मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्॥ 56।।
चेतसा सर्वकर्माणि मयि सन्न्यस्य मत्परः।
बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव॥ 57।।
मेरे परायण हुआ कर्मयोगी तो संपूर्ण कर्मों को सदा करता हुआ भी मेरी कृपा से सनातन अविनाशी परमपद को प्राप्त हो जाता है।
सब कर्मों को मन से मुझमें अर्पण करके (गीता अध्याय 9 श्लोक 27 में जिसकी विधि कही है) तथा समबुद्धि रूप योग को अवलंबन करके मेरे परायण और निरंतर मुझमें चित्तवाला हो
परम् गति मोक्ष को कहते हैं और मोक्ष वह अवस्था है जब कर्म के बंधन से मुक्ति मिल जाता है। तो क्या मोक्ष प्राप्ति के बाद कर्म नहीं करना होता है? नहीं ये तात्पर्य नहीं है। जीवन पर्यंत कर्म तो करना ही है लेकिन मोक्ष के पूर्व हमारे कर्म गुणों से प्रभावित होते हैं और उस अवस्था में हम कर्म करते हुए कर्म के बन्धन से बंधे होते हैं। लेकिन परम् सिद्धि की अवस्था आते ही हमारे कर्म हमारे गुणों से पूरी तरह मुक्त हो जाते हैं और फिर हमारे कर्म हमें बाँधते नहीं है।
लेकिन इस अवस्था तक पहुँचते कैसे हैं? हमने देखा है कि कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग्ग और ध्यानयोग के मार्ग से चलकर व्यक्ति परम् नैष्कर्म्य की मोक्ष की स्थिति को प्राप्त होता है। इस मार्ग के व्यवहारिक पक्ष को भी हमने समझा है जिसके अनुसार व्यक्ति को प्रारम्भ कर्मयोग से करना होता है जिसके अवयव हैं
अपने स्वभाव /अपनी स्थिति के अनुसार कर्म करना।
कर्म करने में कर्म के कारण से स्वयं को असम्बद्ध रहना।
कर्म के परिणाम से स्वयं को असम्बद्ध रखना।
कर्म को ईश्वर यानी उच्चतम स्तर के सत्य के प्रति समर्पित होकर करना।
कर्म के उपरांत प्राप्त फल को प्रसाद सदृश्य ग्रहण करना।
कर्मयोग बीज है जिससे मोक्ष का फल मिलना ही है। जब हम अपने समस्त कर्मों को ईश्वर के प्रति समर्पित कर मात्र कर्तव्य वश कर्म करने लगते हैं तो कर्म के कारण, कर्म के परिणाम, सभी से मुक्त हो जाते हैं। तब हम में कर्म करने का कर्ता भाव भी नहीं रहता है और न कर्म करने के पीछे हमारे कोई गुण ही सक्रिय होते हैं। इस स्थिति में कर्म में ही भक्ति जागृत हो जाती है और स्वयं में, कर्म में और कर्मो के परम उद्देश्य यानी ईश्वर में भी कोई भेद नहीं करते और हमारे सभी कर्म मात्र दैवी कर्म ही रह जाते हैं। इस कर्मयोग में व्यक्ति को कोई विशेष कर्म नहीं करना है बल्कि सभी कर्म एक विशेष भाव यानी कर्मयोग के भाव से करना होता है जिसमें समस्त बुद्धि, विवेक, ज्ञान, भक्ति सभी कुछ सतत ही अपने लक्ष्य यानी परम् सत्य परमात्मा में लगा रहता है।
इसी स्थिति को मोक्ष कहते हैं जब कर्म तो होता है लेकिन सभी कर्म के निमित्त और उद्देश्य परम आत्म स्वरूप परमात्मा ही होते हैं। बाहर से तो यही लगता है कि यह व्यक्ति कर्म ही तो कर रहा है लेकिन कर्म करने वाले के लिए ये कर्म नहीं बल्कि अपने समस्त अस्तित्व का अपने परम सत्य को समर्पण मात्र ही होता है। इस स्थिति में व्यक्ति को उसका उद्देश्य यानी उसका आत्मस्वरूप परमसत्य ही उसे मार्ग भी दिखाता है और उसका स्वयं में वरण भी कर लेता है।
श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 58
मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।
अथ चेत्वमहाङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि॥ 58।।
उपर्युक्त प्रकार से मुझमें चित्तवाला होकर तू मेरी कृपा से समस्त संकटों को अनायास ही पार कर जाएगा और यदि अहंकार के कारण मेरे वचनों को न सुनेगा तो नष्ट हो जाएगा अर्थात परमार्थ से भ्रष्ट हो जाएगा।
संसार में रहकर कर्म करना अनिवार्य है। और जीवन पर्यन्त व्यक्ति को कर्म करना ही होता है। व्यक्ति सांसारिक जीवन के लिए चाहे जो भी कर्म करता हो उसके करने का रास्ता यही वो मार्ग है जिसे हमने अब तक के विवेचना में समझा है। यदि इस मार्ग पर हम चलते हैं तो हमारे जीवन में आ सकने वाली सारी कठिनाइयाँ दूर होती जाती हैं।
लेकिन यदि अहंकार वश हम इस सुझाव को नहीं मानते हैं और संसार के मोह बन्धन में बंधकर कर्म करते हैं तो फिर तय है कि हम चाहे जो सांसारिक उपलब्धि हासिल करते हों हम विफल हो कर रह जाते हैं।
श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 59
यदहङ्कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे।
मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति॥ 59।।
जो तू अहंकार का आश्रय लेकर यह मान रहा है कि 'मैं युद्ध नहीं करूँगा' तो तेरा यह निश्चय मिथ्या है, क्योंकि तेरा स्वभाव तुझे जबर्दस्ती युद्ध में लगा देगा।
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि अगर वह अहंकार के कारण युद्ध से बचने का प्रयास करेगा, तो भी उसका स्वभाव उसे युद्ध में खींच लेगा। क्योंकि अर्जुन एक क्षत्रिय हैं, और उनका स्वभाव युद्ध करना है।
अर्जुन को युद्ध से बचने के लिए जो कारण लग रहे हैं, वे सभी झूठे हैं। युद्ध करना उसका कर्तव्य है, और उससे बचने से उसे कोई लाभ नहीं होगा। बल्कि, इससे वह पाप का भागी बनेगा।
इस श्लोक से हमें यह सीख मिलती है कि हमें अपने स्वभाव के अनुसार ही कर्म करना चाहिए। अगर हम अपने स्वभाव के विरुद्ध कर्म करने का प्रयास करेंगे, तो हमें सफलता नहीं मिलेगी।
इस श्लोक का आध्यात्मिक अर्थ है। हमारे मन में जो भी विचार आते हैं, वे हमारे स्वभाव के अनुसार ही आते हैं। अगर हमारे मन में अहंकार है, तो हम केवल अपने बारे में ही सोचेंगे। हम दूसरों की परवाह नहीं करेंगे, और हम अपने स्वार्थ के लिए कर्म करेंगे।
यदि व्यक्ति अपने स्वभाव के अनुसार कर्म न कर अपने अहंकार से यह निर्णय लेता है कि वह स्वभागत कर्म नहीं करेगा तो भी उसका स्वभाव उसे वही स्वभावगत कर्म करने के लिए बाध्य करता है और जब वह विवश होकर कर्म करता है तो उसके कर्मो में विकृति आती है। लेकिन जब वह स्वभावगत ढंग से कर्म करता है तो फिर उसमें कर्म को स्वभावगत ढंग से परिष्कृत करने की संभावना बनी रहती है।
जब हम अहंकार को त्याग देते हैं, तो हमारे मन में दूसरों के लिए भी जगह बनती है। हम दूसरों की मदद करने के लिए कर्म करने लगते हैं। और जब हम कर्मफल की इच्छा को भी त्याग देते हैं, तो हम निष्काम कर्म करने लगते हैं।
अगर हम अपने स्वभाव के अनुसार कर्म करते हैं, तो हम आत्मसाक्षात्कार की ओर बढ़ सकते हैं।
श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 60
स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा।
कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत्॥ 60।।
हे कुन्तीपुत्र! जिस कर्म को तू मोह के कारण करना नहीं चाहता, उसको भी अपने पूर्वकृत स्वाभाविक कर्म से बँधा हुआ परवश होकर करेगा।
व्यक्ति अपने स्वभाव से बन्धा होता है, उसी के अधीन होता है। सो व्यक्ति को चाहिये कि वह गूढ़ता से अपने स्वभाव को समझे और उसका विरोध नहीं करे बल्कि उसी को परिष्कृत कर उत्थान की तरफ बढ़े। यदि स्वभाब के विपरीत जाते हैं तो सारी ऊर्जा निष्फल जाती है । मन विचलित रहता है। लेकिन स्वभाब की अच्छाई और कमियों को समझ कर उसमें लगे रहकर उसीमें आवश्यकता अनुसार परिष्करण करते हैं तो सिद्धि का मार्ग खुलता है। दूसरे की नकल करने से पतन ही होता है। शेर लोमड़ी की तरह और लोमड़ी शेर की तरह व्यवहार करने की कोशिश करे तो दोनों असफल हो जाते हैं। स्वभाव को पहचान लेने से अपने कर्मों को करने का सही तरीका भी हमें मिलता है।
श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 61
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽजुर्न तिष्ठति।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारुढानि मायया॥ 61।।
हे अर्जुन! शरीर रूप यंत्र में आरूढ़ हुए संपूर्ण प्राणियों को अन्तर्यामी परमेश्वर अपनी माया से उनके कर्मों के अनुसार भ्रमण कराता हुआ सब प्राणियों के हृदय में स्थित है।
श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 62
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्॥ 62।।
हे भारत! तू सब प्रकार से उस परमेश्वर की ही शरण में (लज्जा, भय, मान, बड़ाई और आसक्ति को त्यागकर एवं शरीर और संसार में अहंता, ममता से रहित होकर एक परमात्मा को ही परम आश्रय, परम गति और सर्वस्व समझना तथा अनन्य भाव से अतिशय श्रद्धा, भक्ति और प्रेमपूर्वक निरंतर भगवान के नाम, गुण, प्रभाव और स्वरूप का चिंतन करते रहना एवं भगवान का भजन, स्मरण करते हुए ही उनके आज्ञा अनुसार कर्तव्य कर्मों का निःस्वार्थ भाव से केवल परमेश्वर के लिए आचरण करना यह 'सब प्रकार से परमात्मा के ही शरण' होना है) जा। उस परमात्मा की कृपा से ही तू परम शांति को तथा सनातन परमधाम को प्राप्त होगा।
श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 63
इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया।
विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु॥ 63।।
इस प्रकार यह गोपनीय से भी अति गोपनीय ज्ञान मैंने तुमसे कह दिया। अब तू इस रहस्ययुक्त ज्ञान को पूर्णतया भलीभाँति विचार कर, जैसे चाहता है वैसे ही कर।
सँसार में जीवन जीने की कला ही श्रीमदमागवादगीता की शिक्षा है। और इस शिक्षा का व्यवहार में अनुसरण कर हम जीवन में उस परम सुख और शांति को प्राप्त करते हैं जिसके लिए हम सब लालियत रहा करते हैं।
यह ज्ञान अति गुप्त कहा गया है। दरअसल महाभारत की कहानी में श्रीकृष्ण अर्जुन को यह ज्ञान दे रहें हैं उसका मोह छिन्न भिन्न करने के लिए। यह गान लगता है कि अर्जुन से बाहर खड़े श्रीकृष्ण दे रहें हैं लेकिन सत्य तो यह है कि यह ज्ञान अर्जुन के भीतर, हम सब के भीतर पूर्व से मौजूद है। लेकिन अपने हठ, अपने अहंकार में हम उसे देख समझ नहीं पाते हैं। लेकिन जब हम यह ज्ञान सुनते हैं, जमते हैं तो हमें ध्यान आता है कि यह हमारे भीतर पहले से मौजूद है।
जब गीता की समझदारी देना श्रीकृष्ण शुरू करते हैं उसके पूर्व अर्जुन मोहित होकर हताश हुए रहते हैं और श्रीकृष्ण की शरण में जाते हैं। उस समय श्रीकृष्ण यह नहीं कहते कि जो इक्षा हो सो करो। उस समय तो श्रीकृष्ण अनुरागपूर्वक अर्जुन को समझदारी और ज्ञान की बातें कहते हैं। और जब कह लेते हैं तब कहते हैं कि इसपर विचार मंथन करो और फिर जो चाहते हो वह करो। श्रीकृष्ण यह क्यों नहीं कहते हैं कि मेरी बातों का अनुसरण करो?
दरअसल जब अर्जुन प्रारम्भ में अपना मोह व्यक्त करते हैं तो स्पष्ट हो जाता है कि अर्जुन को उस समय अपनी अवस्था, अपने ज्ञान, अपने कर्तव्य आदि के प्रति भ्रम उतपन्न हो चुका है। भ्रम में पड़े व्यक्ति से स्वतः निर्णय लेने के लिए कहना कदापि उचित नहीं होता है क्योंकि उस समय वह व्यक्ति स्थिर चित्त से कोई निर्णय लेने में सक्षम ही नहीं होता है। परंतु जब उसी व्यक्ति को उसकी स्थिति, उसके कर्तव्य आदि की जानकारी हो जाती है तब वह निर्णय ले सकता है।
इसी लिए कर्म, भक्ति, ज्ञान और ध्यान तथा जीवन के अंतिम लक्ष्य की चर्चा कर देने के पश्चात ही श्रीकृष्ण अर्जुन से स्वयं निर्णय लेने की सलाह देते हैं।
श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 64
सर्वगुह्यतमं भूतः श्रृणु मे परमं वचः।इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्॥ 64।।
संपूर्ण गोपनीयों से अति गोपनीय मेरे परम रहस्ययुक्त वचन को तू फिर भी सुन। तू मेरा अतिशय प्रिय है, इससे यह परम हितकारक वचन मैं तुझसे कहूँगा
मोह क्यों होता है, मोह उतपन्न होने पर व्यक्ति के अंदर किस प्रकार की भावनाएँ आती हैं, उससे व्यक्ति की निर्णय क्षमता कैसे प्रभावित होती है और उसका निराकरण कैसे किया जाता है और जीवन का परम लक्ष्य क्या है इसे पूरी तरह समझा चुकने के बाद अब बारी आती है उन अति महत्वपूर्ण मर्म बातों को समझने की जिससे हमारा भला होता है। सारी बातों का निचोड़ क्या है अगर हम इस पर ध्याय केंद्रित कर पाएं तो हमारी समझ पूरी होती है। इन्हीं मर्म को समझने के लिए अति संक्षेप में हम निचोड़ को समझते हैं अब।
श्रीमदमागवादगीता अध्ययय 18 श्लोक 65
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे॥ 65।।
हे अर्जुन! तू मुझमें मनवाला हो, मेरा भक्त बन, मेरा पूजन करने वाला हो और मुझको प्रणाम कर। ऐसा करने से तू मुझे ही प्राप्त होगा, यह मैं तुझसे सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ क्योंकि तू मेरा अत्यंत प्रिय है।
जब व्यक्ति कर्मयोग, भक्तियोग, ज्ञानयोग और ध्यानयोग को एक साथ अनुसरण करता हुआ कर्मों में प्रवृत्त जीवन व्यतीत करता है तो उस परिणामतः वह कर्मों को करता हुआ भी कर्म और उनके फल को ईश्वर का अनुग्रह ही समझता है और उन्हीं पर आश्रित हुआ कर्मों को करता है। इसका व्यवहारिक प्रदर्शन होता है कि
1.व्यक्ति ईश्वर में ही अपने चित्त को लगाए अपने सभी कर्मों को करे। प्रत्येक कर्म और उसके परिणाम को मात्र ईश्वर का अनुग्रह ही माने।
2. व्यक्ति की सारी चेष्टाएँ ईश्वर के प्रति श्रद्धा, विश्वास और प्रेम को व्यक्त करती रहें।
3. वह ईश्वर को ही साक्षी समझ कर अपने कर्म करे।
4. वह अपने हर कर्म के साथ ही ईश्वर के प्रति अपने अनुग्रह को व्यक्त करते रहे।
ऐसा करने वाला ही ईश्वर के साथ एकाकार होने में सक्षम होता है।
श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 66
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥ 66।।
संपूर्ण धर्मों को अर्थात संपूर्ण कर्तव्य कर्मों को मुझमें त्यागकर तू केवल एक मुझ सर्वशक्तिमान, सर्वाधार परमेश्वर की ही शरण (इसी अध्याय के श्लोक 62 की टिप्पणी में शरण का भाव देखना चाहिए।) में आ जा। मैं तुझे संपूर्ण पापों से मुक्त कर दूँगा, तू शोक मत कर।
श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 67
इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन।
न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति॥ 67।।
तुझे यह गीत रूप रहस्यमय उपदेश किसी भी काल में न तो तपरहित मनुष्य से कहना चाहिए, न भक्ति-(वेद, शास्त्र और परमेश्वर तथा महात्मा और गुरुजनों में श्रद्धा, प्रेम और पूज्य भाव का नाम 'भक्ति' है।)-रहित से और न बिना सुनने की इच्छा वाले से ही कहना चाहिए तथा जो मुझमें दोषदृष्टि रखता है, उससे तो कभी भी नहीं कहना चाहिए।
गीता की शिक्षा पूरी हो चुकी है किंतु प्रश्न उठता है कि वे कौन से लोग हैं जिनके लिए यह शिक्षा उपयोगी है और जिनको इस शिक्षा का लाभ दिया जाना चाहिए।
तो यह समझें कि गीता की शिक्षा उन्हीं के लिए है जो अपने मन , भाव और शारीरिक चेष्टाओं से एकाग्र हैं और जो इस शिक्षा को प्राप्त करने के लिए अपनी ऊर्जा को एकत्रित और एकाग्र रखने के लिए ततपर हैं। साथ ही इक्षुक व्यक्ति के अंदर इस शिक्षा और ईश्वर के प्रति अनुराग और विश्वास भी होना अनिवार्य है। अगर हम शिक्षा प्राप्त करना चाहते हैं लेकिन उस शिक्षा, शिक्षक के प्रति कोई विश्वास न हो तो फिर उसे शिक्षा को प्राप्त करने का कोई अधिकार नहीं है। इसके अतिरिक्त इस शिक्षा के छात्र को एकाग्रचित्त होकर सुनने का धीरज भी होना चाहिए ताकि वह इसे सुनकर इसपर मनन चिंतन कर इसे आत्मसात कर सके। जो सुनता हीं नहीं उसे सुनाकर आप क्या समझा पाएंगे।
जब हम शिक्षा ग्रहण करते हैं और उसी शिक्षा और शिक्षक की आलोचना करते रहते हैं तो फिर इस व्यक्ति को शिक्षा को देने से क्या औचित्य क्योंकि जिसे शिक्षा चाहिए उसे शिक्षक और और शिक्षा पर भरोसा ही नहीं तो वह क्या शिक्षा को ग्रहण कर पायेगा।
सो ऐसे लोगों को गीता की शिक्षा देने का प्रयास निर्थक और व्यर्थ होता है।
श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 68 से 71
य इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति।
भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः॥ 68।।
न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः।
भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि॥ 69।।
अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः।
ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः॥ 70।।
श्रद्धावाननसूयश्च श्रृणुयादपि यो नरः।
सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम्॥ 71।।
जो पुरुष मुझमें परम प्रेम करके इस परम रहस्ययुक्त गीताशास्त्र को मेरे भक्तों में कहेगा, वह मुझको ही प्राप्त होगा- इसमें कोई संदेह नहीं है।
उससे बढ़कर मेरा प्रिय कार्य करने वाला मनुष्यों में कोई भी नहीं है तथा पृथ्वीभर में उससे बढ़कर मेरा प्रिय दूसरा कोई भविष्य में होगा भी नहीं।
जो पुरुष इस धर्ममय हम दोनों के संवाद रूप गीताशास्त्र को पढ़ेगा, उसके द्वारा भी मैं ज्ञानयज्ञ से पूजित होऊँगा- ऐसा मेरा मत है।
जो मनुष्य श्रद्धायुक्त और दोषदृष्टि से रहित होकर इस गीताशास्त्र का श्रवण भी करेगा, वह भी पापों से मुक्त होकर उत्तम कर्म करने वालों के श्रेष्ठ लोकों को प्राप्त होगा।
गीता ज्ञान की वह शिक्षा है जिसे जानकर समझकर और आत्मसात कर व्यक्ति इस संसार में रहकर सभी कर्मों को करता हुआ भी सभी कर्मों के बंधन से मुक्त हो जाता है। लेकिन इस शास्त्र को पढ़ने,कहने ,सुनने और अपनाने की शर्त यही है कि पढ़ने वाला, कहने वाला, सुनने वाला और इसका अनुसरण करने वाला व्यक्ति शिक्षक कृष्ण पर उनकी शिक्षा गीता पर पूर्ण विश्वास रखे, प्रेम और श्रद्धा रखे, और उसी में लीन रहे। इसी लिए श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते भी हैं कि जो भी प्रेम से , श्रद्धा से इस शास्त्र को उनको कहेगा जिनको इसपर और श्रीकृष्ण पर श्रद्धा है , जो सुनेगा और जो इनका अनुसरण करेगा वही कर्म, भक्ति, ज्ञान और ध्यान से युक्त हुआ प्रभु का प्रिय होगा अर्थात उसे कर्म बन्धन से मुक्ति और परम् सुख और शांति स्वरूप भगवत्प्राति होगी।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 72
कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा।
कच्चिदज्ञानसम्मोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय॥ 72।।
हे पार्थ! क्या इस (गीताशास्त्र) को तूने एकाग्रचित्त से श्रवण किया? और हे धनञ्जय! क्या तेरा अज्ञानजनित मोह नष्ट हो गया?
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 73
अर्जुन उवाच
नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वप्रसादान्मयाच्युत।
स्थितोऽस्मि गतसंदेहः करिष्ये वचनं तव॥ 73।।
अर्जुन बोले- हे अच्युत! आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया और मैंने स्मृति प्राप्त कर ली है, अब मैं संशयरहित होकर स्थिर हूँ, अतः आपकी आज्ञा का पालन करूँगा।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 74
संजय उवाच
इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः।
संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम्॥ 74।।
संजय बोले- इस प्रकार मैंने श्री वासुदेव के और महात्मा अर्जुन के इस अद्भुत रहस्ययुक्त, रोमांचकारक संवाद को सुना।
मोह को भंग कर व्यक्ति को चेतन अवस्था में लाने वाले इस ज्ञान को समझाने के उपरांत श्रीकृष्ण एक समर्थ गुरु की भाँति अर्जुन से पूछते हैं कि क्या उसने एकाग्रचित्त होकर इस ज्ञान को ग्रहण किया और क्या इससे उसका मोह भंग हुआ? श्रीकृष्ण की शिक्षा अर्जुन के मोह के प्रदर्शन के साथ शुरू हुई थी। इतना सब कुछ समझाने के उपरांत श्रीकृष्ण का प्रश्न करना स्वाभाविक है।
ज्ञान का महत्व तभी है जब उसे ग्रहण किया जाए। अर्थात उसे जानकर उसपर मनन और चिंतन कर उसपर अमल किया जाए, अन्यथा ज्ञान का प्रभाव निरर्थक ही चला जाता है।
दूसरी बात कि गीता के श्रवण/अध्ययन का उद्देश्य ही है कि व्यक्ति के अंदर से मोह का विसर्जन हो क्योंकि मोह में पड़े व्यक्ति से हम सार्थक कर्म की उम्मीद नहीं कर सकते हैं और मोह जनित कर्म व्यक्ति के प्रगति और उसके निर्णय लेने की क्षमता को निष्प्रभावी बना देते हैं।
अर्जुन का उत्तर सकारात्मक है अर्थात उसपर इस ज्ञान का प्रभाव यह हुआ है कि उसका मोह और मोह जनित भ्रम दूर हुआ है और उसे ज्ञात हो पाया है कि उसके कर्म क्या हैं।
यही तो उद्देश्य है। पुस्तकों में कहने के बजाए कर्मभूमि में जब मन में विषाद के समय रास्ता दिखता है तो व्यक्ति के ऊपर उसका चिरस्थाई प्रभाव पड़ता है और वह ज्ञान को व्यवहारिक जीवन के मसलों से जोड़ कर समझ पाता है।
ज्ञान किसी एक व्यक्ति विशेष के लिए नहीं होता है। ठीक है कि अर्जुन मोह और भ्रम से उतपन्न संकट में पड़ा है और उसे इससे बाहर निकालने के लिए श्रीकृष्ण ने ये सारी बातें यानी गीता के ज्ञान को समझाया है किंतु यह ज्ञान तो सबके लिये है। हर व्यक्ति के अंदर मोह है और उससे जनित भ्रम है जिसके जाल में पड़ा वह निकलने का मार्ग नहीं ढूंढ पाता है। अधिकांशतः तो वह यही नहीं समझता कि उसकी समझदारी मात्र और मात्र मोह और भ्रम है और वह इन्हीं मोह और भ्रम को अपना ज्ञान समझ कर उलटे पुल्टे निर्णय लेता है और और गहरी समस्या में फँसते जाता है। किंतु इस ज्ञान और समझदारी से लैस व्यक्ति मोह और भ्रम से बाहर निकल कर सही मार्ग पर चल पड़ता है जिससे उसका कल्याण सम्भव होता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 75 से 77
व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम्।
योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम्॥ 75।।
राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम्।
केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः॥ 76।।
तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः।
विस्मयो मे महान् राजन्हृष्यामि च पुनः पुनः॥ 77।।
श्री व्यासजी की कृपा से दिव्य दृष्टि पाकर मैंने इस परम गोपनीय योग को अर्जुन के प्रति कहते हुए स्वयं योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण से प्रत्यक्ष सुना।
हे राजन! भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के इस रहस्ययुक्त, कल्याणकारक और अद्भुत संवाद को पुनः-पुनः स्मरण करके मैं बार-बार हर्षित हो रहा हूँ।
हे राजन्! श्रीहरि (जिसका स्मरण करने से पापों का नाश होता है उसका नाम 'हरि' है) के उस अत्यंत विलक्षण रूप को भी पुनः-पुनः स्मरण करके मेरे चित्त में महान आश्चर्य होता है और मैं बार-बार हर्षित हो रहा हूँ।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 78
संजय उवाच
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥ 78।।
हे राजन! जहाँ योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण हैं और जहाँ गाण्डीव-धनुषधारी अर्जुन है, वहीं पर श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है- ऐसा मेरा मत है।
सम्पूर्ण गीता की शिक्षा का निचोड़ है श्रीमद्भागवद्गीता का अंतिम श्लोक। अर्जुन की हताशा , निराशा और पलायन मनोवृत्ति को दूर करने के लिए श्रीकृष्ण के द्वारा प्रारम्भ की गई शिक्षा की समाप्ति के उपरांत इस प्रसंग को सुनने और सुनाने वाले संजय का मत है कि जब योगेश्वर श्रीकृष्ण और धनुर्धर अर्जुन एक साथ हों वंही विजय, समृद्धि और नीति भी होती है।
कहने का तातपर्य क्या है आखिर? अर्जुन संसार की प्रकृति पक्ष के द्योतक हैं यानी उसके भौतिक प्रगति के प्रतीक हैं तो दूसरी तरफ श्रीकृष्ण उस प्रकृति के संचालक, सारथी अध्यात्म हैं। नीति युक्त धर्म के साथ विजय और शांति का निवास वंही होता है जँहा भौतिक विकास को दिशा देने वाला अध्यात्म रूपी सारथी होता है। अध्यात्म की अनुपस्थिति में प्राप्त किया गया बल और भौतिक समृद्धि आतताई होती है जिसे सही गलत की समझ भी नहीं होती और परिणाम में अराजकता, विध्वंश, हिंसा, अनाचार आदि हर तरह की बुरी प्रवृत्तियाँ हावी हो जाती हैं। लेकिन जब यह बल और यह प्रकृति अध्यात्म के साथ, नीति के साथ जुड़ जाती है तो फिर वही बल और समृद्धि सभी के लिए लाभदायक होती है और सभी के न्याय हित में काम करने लगती है। व्यक्ति का बल किसी को प्रताड़ित करने के लिए नहीं बल्कि उसे प्रताड़ना से बाहर निकालने के लिए उपयोग में आता है और समृद्धि सभी के लिए होती है, व्यक्ति विशेष के लिए नहीं। इसी प्रकार समृद्धि और बल से योग युक्त जीवन जीने की जमीन तैयार होती है। अभाव ग्रस्त आदमी नीति और धर्म को नहीं समझ पाता है किंतु जब अभाव दूर होता है तो फिर उसे योगयुक्त जीवन जीने का आसरा मिलता है।
सो जीवन के लिए नीति, धर्म और धन सभी की जरूरत होती है और उनका सदुपयोग तभी होता है जब मन, वचन और कर्म से व्यक्ति योगयुक्त यानी कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग और ध्यान-सन्यास योग युक्त होकर जीवन जीता है। इसी प्रकार जँहा यह योगयुक्त नीति और धर्म रहता है वंही वह विजय और समृद्धि भी आती है जिससे सभी का कल्याण हो पाता है।
अतः जीवन में भौतिकता और योगयुक्त अध्यात्म का संयोग ही सही रूप से इस संसार में जीवन जीने योग्य बनाता है। धर्म के बिना पुरुषार्थ और पुरुषार्थ के बिना धर्म दोनो ही स्थिति उपयुक्त नहीं होती है।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे मोक्षसन्न्यासयोगो नामाष्टादशोऽध्यायः
Comments
Post a Comment