श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 4 एवं 5

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 4 एवं 5

निश्चयं श्रृणु में तत्र त्यागे भरतसत्तम।
त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः॥ 4।।

यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्‌।
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्‌॥ 5।।

हे पुरुषश्रेष्ठ अर्जुन ! संन्यास और त्याग, इन दोनों में से पहले त्याग के विषय में तू मेरा निश्चय सुन। क्योंकि त्याग सात्विक, राजस और तामस भेद से तीन प्रकार का कहा गया है।

यज्ञ, दान और तपरूप कर्म त्याग करने के योग्य नहीं है, बल्कि वह तो अवश्य कर्तव्य है, क्योंकि यज्ञ, दान और तप -ये तीनों ही कर्म बुद्धिमान पुरुषों को (वह मनुष्य बुद्धिमान है, जो फल और आसक्ति को त्याग कर केवल भगवदर्थ कर्म करता है।) पवित्र करने वाले हैं।

प्रश्न है कि त्याग और सन्यास क्या है। इस प्रश्न का बहुत अधिक महत्व है क्योंकि श्रीमद्भागवद्गीता की शिक्षाओं के अनुसार व्यक्ति को जिन मार्गों से चलकर स्थाई सुख और शांति की प्राप्ति होती है उन मार्गों पर चलने के त्याग और सन्यास का अप्रतिम महत्व कहा जा चुका है। परंतु जैसा कि प्रायः होता है प्रत्येक महत्वपूर्ण विषय पर चिंतकों का विचार भिन्न भिन्न होता है वैसे ही त्याग और सन्यास के सम्बंध में भी तात्कालिक विचारकों के अपने अपने मत थे जिनके विषय में कहा गया है। उन विचारकों के मतों के जानने के पश्चात हम देखते हैं कि योगेश्वर श्रीकृष्ण का मत है। 
     ध्यान, भक्ति  और योग के द्वारा व्यक्ति अपने ईगो का आवरण उतार कर स्वयं को प्राप्त करता है। ध्यान की अवस्था में व्यक्ति स्वयं को पहचानने लगता है । जब ध्यान भक्ति से ओत प्रोत हो तो ध्यान की गहराई बढ़ जाती है और अंत में त्याग के द्वारा व्यक्ति अपने बचे खुचे ईगो को भी तज देता है। स्वार्थपरक इक्षाओं वाली क्रियाओं को तजना ही सन्यास है। कर्म तो करना ही है, कर्मों को छोडना एक निरर्थक सोच है। वस्तुतः व्यक्ति बिना कर्म किये नहीं रह सकता है। प्रत्येक कर्म में मन और बौद्धिकता का योगदान होता ही है। सो जब हम कर्म करते हैं तो हमारा कर्म के प्रति जो दृष्टिकोण रहता है वह हमें प्रसन्नताआ देता है या दुखी करता है सो कर्म किस दृश्टिकोण से किया जाता है यह अति महत्वपूर्ण है। कर्मफल से न तो हमें खुशी मिलती है और न दुख। दरअसल कर्म करने के पीछे हमारी जो बौद्विकता होती है अथवा जो हमारा दृश्टिकोण होता है उसी से हमें या तो सुख मिलता है या दुख। जो दृष्टिकोण नकारात्मक भाव से कर्म कराते हैं वे ही पाप हैं जबकि जो दृषिकोंण धनात्मक भाव से कर्म कराते हैं वे पूण्य हैं। पाप कर्म मन को उद्वेलित और दुखी करते हैं। सो कर्म ऐसे करना चाहिए जिससे न सिर्फ मनवांछित अच्छे और मनोवांछित परिणाम ही मिले बल्कि जिनको करने से मन में प्रसन्नताआ और सुख और शांति भी हो।
       त्याग और सन्यास को समझने के लिए सबसे पहले हमें समझना होता है कि वे कर्म कौन से हैं जिनको करने से और कैसे करने से हम सन्यास के लक्ष्य को प्राप्त कर पाते हैं। त्याग और सन्यास दोनों एक दूसरे से जुड़े हुए हैं।
         असंबद्धता को त्याग कहते हैं। सर्वप्रथम हम कर्मफल से स्वयं को असम्बद्ध करते हैं और उसके उपरांत स्वार्थपरक इक्षाओं वाले कर्मों को  भी तज देते हैं। अंत में स्वयं के कर्ता भाव को भी छोड़ देते हैं जिससे हमारे अंदर  "मैं" का ईगो पूर्णतः समाप्त हो जाता है। "मैं" से "मेरा" बना होता है। सो "मैं" के साथ  "मेरा" भी समाप्त होता है। जैसे जैसे मेरा समाप्त होता है मैं भी समाप्त होता है।
   यज्ञ , दान, और तप को छोड़कर जो भी कर्म हैं वे सभी कर्म कर्म करने वाले के मन में कुछ न कुछ नकारात्मक भाव को उतपन्न करते ही हैं जैसे, लगाव, ईर्ष्या, क्रोध, लोभ, आदि और ऐसे कर्म व्यक्ति और समाज के संरचना में भी उद्वेलन उतपन्न करते ही हैं और ऐसे कर्म निषिद्ध कर्म हैं जिनको त्यागना ही चाहिए, तभी स्वयं के मैं और मेरा से मुक्ति मिल सकती है , अन्यथा नहीं। ये कर्म हमारे मन में और मन के बाहर संसार में दोष पैदा केते हैं।
  अतः व्यक्ति को चाहिए कि निषिद्ध और काम्य कर्मों को छोड़कर यज्ञ, दान और तप वाले कर्म जरूर करे क्योंकि यही तीन कर्म व्यक्ति को कर्मबन्धन में कर्म करने के बावजूद बांधते नहीं हैं। 
    यज्ञ का तातपर्य है भक्ति  , यानी श्रद्धा भाव से  समर्पण के साथ आने दायित्व वाले कर्मों को जरूर करे। प्रत्येक व्यक्ति की जबाबदेही स्वयं के प्रति, परिवार के प्रति, समाज और देश के प्रति और समस्त संसार के प्रति होती है, सो प्रत्येक व्यक्ति को अपनी जिम्मरदारियों के प्रति सचेत और सचेष्ट होना ही चाहिए। एक के कर्म दूसरों को भी प्रभावित करते हैं सो  कर्मफल जो मात्र  अपने मनोकुल हों लेकिन अपनी जिम्मेदारियों के प्रति उदासीन या नकारात्मक हों पूरे परिवेश के लिए नुकसानदेह होते हैं। सो व्यक्ति को चाहिए कि स्वयं, परिवार, समाज, राष्ट्र, संसार और समस्त चराचर , दृश्य-अदृश्य जगत के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझकर उनको निष्पादित करे और कर्म यज्ञ कर्म हैं। जब हम कर्म करते हैं लेकिन कर्म करने में भक्ति यानी समर्पण का भाव नहीं हो तो वह कर्म बन्धनकारी होता है। और वह यज्ञ कर्म होता भी नहीं है।

दान का अर्थ है कि जो कुछ हमारे पास भौतिक और बौद्धिक है उसे  अपने पास अपनी आवश्यकता भर रखकर अपने परिवेश के साथ साझा कर लेना। दान का भाव मन में लोभ, लालच, ईर्ष्या, मोह आदि भाव नहीं आने देता है। साथ ही इसके द्वारा हम अपने परिवेश के प्रति अपना ऋण भी चुकाते हैं और समाज में सहयोग और सहकारिता का भाव बढ़ता है। एक की प्रगति दूसरे को भी प्रगति के पथ पर ले जाती है।
       और जब तन,  मन , बुद्धि, विवेक सभी को एकाग्र कर एक ही दिशा में एक ही लक्ष्य को समर्पित कर हम उद्द्यत होते हैं तो वही तप है।
        यज्ञ, दान और तप से मन की अशुद्धियाँ दूर होती हैं। अशुद्धियों से तात्पर्य है मन के नकारात्मक भावों का  होना । अशुद्धियों को दूर करने से हम अधिक से अधिक शांतिपूर्ण, शांत और खुश होते हैं और फिर हम ध्यान के लिए कुछ खास किए बिना ध्यान के चरण तक पहुंच जाते हैं। इस प्रकार कर्म (यज्ञ, दान और तप) करना हमें ध्यान की ओर ले जाता है जो वर्तमान क्षण में होता है न कि अतीत या भविष्य में। इस प्रकार कर्म करने से हम कर्म करते हुए ध्यान की अवस्था में होते हैं, अन्यथा हम चंचल चित्त वाले, माया, मोह, लोभ, घृणा आदि भावों से घिरे रहकर अस्थिर रहते हैं और इस कारण सभी भौतिक सुविधाओं के बावजूद बेचैन और दुखी रहते हैं।
     

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