श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 2 एवं 3
श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 2 एवं 3
श्रीभगवानुवाच
काम्यानां कर्मणा न्यासं सन्न्यासं कवयो विदुः।
सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः॥ 2।।
त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः।
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे॥ 3।।
श्री भगवान बोले- कितने ही पण्डितजन तो काम्य कर्मों के त्याग को संन्यास समझते हैं तथा दूसरे विचारकुशल पुरुष सब कर्मों के फल के त्याग को (ईश्वर की भक्ति, देवताओं का पूजन, माता-पितादि गुरुजनों की सेवा, यज्ञ, दान और तप तथा वर्णाश्रम के अनुसार आजीविका द्वारा गृहस्थ का निर्वाह एवं शरीर संबंधी खान-पान इत्यादि जितने कर्तव्यकर्म हैं, उन सबमें इस लोक और परलोक की सम्पूर्ण कामनाओं के त्याग का नाम सब कर्मों के फल का त्याग है) त्याग कहते हैं।
कई एक विद्वान ऐसा कहते हैं कि कर्ममात्र दोषयुक्त हैं, इसलिए त्यागने के योग्य हैं और दूसरे विद्वान यह कहते हैं कि यज्ञ, दान और तपरूप कर्म त्यागने योग्य नहीं हैं।
सन्यास और त्याग के सम्बंध में तात्कालिक प्रचलित विचारों के अनुसार चार प्रकार के मत बतलाये गए हैं। इनको समझने के पहले कर्मों के प्रकार को एक बार फिर से उनके उपयोगिता के दृष्टि से समझना आवश्यक है। इसके अनुसार
काम्य कर्म वो होते हैं जनमन में किसी इक्षा पूर्ति की भावना रखकर किये जाते हैं जो स्वभावतः स्वार्थसिद्धि के लिये और अपने ईगो को सन्तुष्ट करने के उद्देश्य से किये जाते हैं। स्त्री, पुत्र और धन आदि प्रिय वस्तुओं की प्राप्ति के लिए तथा रोग-संकटादि की निवृत्ति के लिए जो यज्ञ, दान, तप और उपासना आदि कर्म किए जाते हैं, उनका नाम काम्यकर्म है।
नैमित्य कर्म हैं जो परिस्थितिजन्य होते हैं जैसे शरीर सम्बन्धी कर्म ।
कुछ कर्म निषिद्ध कर्म होते हैं अर्थात जिनका किया जाना निषिद्ध माना जाता है।
अब सन्यास और त्याग के जो तात्कालिक प्रचलित विचार थे उनके अनुसार
1. काम्य कर्मों और निषिद्ध कर्मों को छोड़ना ही सन्यास है।
2. जबकि कर्मफल से सम्बद्धता को छोड़ना त्याग माना गया है।
3.कुछेक विचारकों का मत रहा कि चूँकि कर्मों से मन में किसी न किसी प्रकार दूषित भावना का आगमन होता ही है सो सभी कर्मों को त्याग देना चाहिए।
4.कुछ विचारकों का मत है कि चूँकि यज्ञ, दान और तप ऐसे कर्म हैं जो ब्रह्म की प्राप्ति में सहायक हैं सो उनको नहीं त्यागना चाहिए।
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