श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 1

श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 1

सन्न्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम्‌।
त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन।। 1।।

अर्जुन बोले- हे महाबाहो! हे अन्तर्यामिन्‌! हे वासुदेव! मैं संन्यास और त्याग के तत्व को पृथक्‌-पृथक्‌ जानना चाहता हूँ।

श्रीमद्भगवद्गीता के अबतक के विवरण से यह तो स्पष्ट हो चुका है कि मानव जीवन का प्राथमिक उद्देश्य वह प्रकाश पाना है जिससे प्रकाशित होकर वह ब्रह्ममय हो जाता है। उसके समस्त अवगुण, दुर्गुण, पाप, असत्य, आदि समाप्त होकर उसके पास दैवी सम्पदा रह जाती है जो उसे पुण्यमयी बनाती है जिस स्थिति में उसमें और ब्रह्म यानी परमात्मा कि स्थिति में कोई फर्क नहीं रह जाता है। इस अवस्था को प्राप्त करने का अंतिम सोपान सन्यास और त्याग है सो यह प्रश्न स्वाभाविक है कि सन्यास और त्याग ठीक ठीक क्या है और इस अवस्था को प्राप्त कैसे किया जा सकता है।
   इस प्रश्न का ठीक ठीक उत्तर उसी के पास है जो समस्त संसार को अपनी बाहों में आलिंगन में ले सकता है यानी प्रेममय हो, जिसे इन्द्रियों पर पूर्ण नियन्त्र हो और जो असत्य और अनाचार का नाशक हो। इसी लिए प्रश्नकर्ता अर्जुन ने यह प्रश्न कृष्ण से करते वक़्त वह उन्हीं महाबाहो, ऋषिकेश और केशनिषदन नाम से सम्बोधित करता है। श्रीकृष्ण के ये नाम उनके जैसे गुरु के विशेषणों को अभिव्यक्त करने हेतु ही प्रयुक्त हुए हैं।

Comments

Popular posts from this blog

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 35

Geeta Chapter 3.1

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14. परिचय