श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 7

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 7

आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः।
यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं श्रृणु॥ 7।।

भोजन भी सबको अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार तीन प्रकार का प्रिय होता है। और वैसे ही यज्ञ, तप और दान भी तीन-तीन प्रकार के होते हैं। उनके इस पृथक्‌-पृथक्‌ भेद को तू मुझ से सुन।

साधना के क्रमशः चार सोपान होते हैं-
    1.आहार
    2.यज्ञ
    3.तप
    4.दान
और ये चारों व्यक्ति के स्वभाव के अनुसार तीन तीन प्रकार के होते हैं यानी सात्विक, राजसी और तामसिक।
      अर्थात व्यक्ति की तीन प्रकार की प्रवृत्तियों के अनुसार ये चारों सोपान होते हैं। इस प्रकार हम व्यक्ति के आहार, यज्ञ, तप और दान से समझ सकते हैं कि व्यक्ति किस प्रकार के साधना वाला है। इन चारों सोपानों को क्रमशः सात्विक प्रवृत्ति का कर हम साधना के चरम पर पहुँच सकते हैं।
      दरअसल ये चार सोपान वे मार्ग हैं जिनके माध्यम से हम अपने अन्तःकरण की शुद्धि कर उत्तम से उत्तम हो सकते हैं। आहार, यज्ञ, तप और दान के मार्ग से चलकर व्यक्ति अपने परम लक्ष्य को हासिल कर सकता है। ये वे व्यवहारिक साधन हैं जिनके द्वारा हम मोक्ष के लक्ष्य को प्राप्त करते हैं। जैसे जैसे हम अपने इन चार साधनाओं को परिमार्जित कर सात्विक बनाते जाते हैं वैसे वैसे हम स्वयं को प्राप्त करने के लक्ष्य के समीप पहुँचते जाते हैं।
     सो यह आवश्यक है कि व्यक्ति इन चार सोपानों के अनुसार अपनी प्रवृत्ति को पहचान कर अपने में सुधार कर सके।
    तो इसके लिए आवश्यक है कि हम इन चारों सोपानों के जो तीन तीन प्रकार हैं , सात्विक, राजसी और तामसिक उनके लक्षणों को समझें।

Comments

Popular posts from this blog

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 35

Geeta Chapter 3.1

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14. परिचय