श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 6
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 6
कर्शयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः।
मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान्॥ 6।।
जो शरीर रूप से स्थित भूत समुदाय को और अन्तःकरण में स्थित मुझ परमात्मा को भी कृश करने वाले हैं उन अज्ञानियों को तू आसुर स्वभाव वाले जान।
जब व्यक्ति के अंदर तामसी गुणों की प्रचुरता होती है तब उसका स्वभाव आसुरी प्रवृत्ति वाला होता है। ऐसा व्यक्ति हिंसा, असत्य, अत्याचार, अनाचार, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या आदि से युक्त स्वभाव वाला होता है और अपने इस स्वभाव से दूसरे लोगों को पीड़ा देता है।
लेकिन यँहा ध्यान देने वाली बात यह है कि इस प्रकार के स्वभाव वाला व्यक्ति भले दूसरों को नुकसान पहुँचाने की नीयत से कर्म करता है, लेकिन वह पहले अपना नुकसान करता है और तब दूसरों का नुकसान कर पाता है। बिना स्वयं को नुकसान दिए, बिना स्वयं को पीड़ा दिए कोई भी व्यक्ति दूसरों का नुकसान नहीं कर सकता है, दूसरों को पीड़ा नहीं दे सकता है। जब भी आसुरी स्वभाव वाला व्यक्ति किसी दुसरे की हानि करना चाहता है तो इसकी अनिवार्यता है कि वह पहले अपनी हानि कर ले।
मान लें कि एक व्यक्ति किसी अन्य की हत्या कर देता है। यह कैसे सम्भव होता है? पहले तो उस व्यक्ति के मन में दूसरे के लिए क्रोध और घृणा युक्त भाव होता है। ये भाव उसके मन को अस्थिर कर देते हैं, उसकी प्रेम , दया और क्षमा जैसी भावनाओं को समाप्त कर देते हैं, उसकी बुद्धि और उसके विवेक को हत्या जैसे कृत्य के दुष्परिणामों के लिए सोचने समझने से रोक देते हैं। ऐसे में क्रोध युक्त व्यक्ति का विवेक, उसकी बुद्धि पहले नष्ट होती है और तभी वह दूसरे व्यक्ति की हत्या के लिए उद्यत हो पाता है।
इस प्रकार आसुरी स्वभाव का व्यक्ति स्वयं को भी कष्ट देता है। अब हम इस सत्य को भी ध्यान में रखें कि सभी व्यक्ति एक ही परम सत्ता के स्वरूप हैं यानी सभी में एक ही परमात्मा है। इस प्रकार किसी को दिया जाने वाला कष्ट उस परमात्मा को दिया जाने वाला ही कष्ट है। इस प्रकार आसुरी व्यक्ति न सिर्फ स्वयं को और दूसरों को बल्कि परम् पिता परमेश्वर को भी कष्ट देता है अपने आचरण से।
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