श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 10
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 10
यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत्।
उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम्॥ 10।।
जो भोजन अधपका, रसरहित, दुर्गन्धयुक्त, बासी और उच्छिष्ट है तथा जो अपवित्र भी है, वह भोजन तामस पुरुष को प्रिय होता है।
तामसी प्रवृत्ति के लोग ज्ञान रहित, अलसी और क्रोध, मोह, निराशा युक्त होते हैं। ऐसे व्यक्ति उन्हीं चीजों को ग्रहण करना चाहते हैं जो उनके इन तामसिक वृत्तियों को बढ़ाता हो। यह बात उनके लिए भोज्य पदार्थों के साथ साथ अन्य सभी ग्राह्य चीजों पर लागू होती है यथा, बोली, विचार, गंध आदि।
सो तामसी वृत्ति के व्यक्ति वैसा भोजन पसन्द करते हैं जो अधपका, रसरहित, दुर्गन्धयुक्त, बासी और उच्छिष्ट है तथा जो अपवित्र भी है। इस प्रकार का भोजन आलस, प्रमाद, रुग्णता, को जन्म देने वाला होता है।
आहार स्वभाव के अनुसार होता है, जैसी जिसकी प्रवृत्ति होती है उसी के अनुसार उसका आहार भी होता है। यँहा आहार में भोज्य/पेय पदार्थों के साथ साथ वे सभी चीजें जैसे आचार, व्यवहार, विचार, सोच, विवेक आदि से जुड़ी सभी चीजें सम्मिलित होती हैं जिनको हम ग्रहण करते हैं। सो साधना के पहले चरण में व्यक्ति अपने आहार के अनुसार अपनी प्रवृत्ति को पहचान कर अपनी प्रवृति में सुधार करता है। तामसी से राजसी और राजसी से सात्विक प्रवृति की तरफ खुद को ले जा सकता है। यह व्यक्ति के अपने वश में होता है कि वह तामसी/राजसी गुणों से स्वयं को निकाल कर सात्विक गुणों से परिपूर्ण करे और मोक्ष के रास्ते बढ़े।
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