श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 5

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 5

अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः।
दम्भाहङ्‍कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः॥ 5।।

जो मनुष्य शास्त्र विधि से रहित केवल मनःकल्पित घोर तप को तपते हैं तथा दम्भ और अहंकार से युक्त एवं कामना, आसक्ति और बल के अभिमान से भी युक्त हैं।

        व्यक्ति की श्रद्धा उसके कर्म से परिलक्षित होती है। जिसकी जैसी श्रद्धा होती है उसका कर्म भी वैसा ही होता है। 
      श्रद्धा के अनुरूप ही मन में विचारों का जन्म होता है और वे विचार जो मन में जन्म लेते हैं कर्मों में रूपांतरित होकर सामने आते हैं।
       जिस व्यक्ति की श्रद्धा राजसी -तामसिक प्रवृत्ति वाली होती है उसके मन में दम्भ, अहंकार, इक्षाएँ और लगाव के भाव तीव्र होते हैं। इनके कारण उनमें घोर आसक्ति के भाव होते हैं और इनके प्रभाव में ऐसे व्यक्ति बिना सही गलत की चिंता किये , बिना नियम कायदों की फिक्र किये मात्र अपनी इक्षा की पूर्ति पर केंद्रित रहते हैं और इसके लिए ही अपनी पूरी एकाग्रता से कर्म करते हैं। ऐसे लोगों के मन में मात्र अपनी कामना पूर्ति ही प्रबल होती है जिसके सम्मुख उनके लिए सभी नियम, सभी तौर तरीके गौण होते है । ऐसे लोग अपनी आसक्ति से बंधे होकर इस दम्भ और अहंकार में होते हैं कि वे जो मान्यता रखते हैं मात्र वही सही है और इसकी पूर्ति के लिए वे घोर प्रयास वही करते हैं जबकि शास्त्र विधि युक्त कर्मों के लिए उनके मन में तनिक भी श्रद्धा नहीं होती है। उनके समस्त गम्भीर और मेहनती प्रयास मात्र और मात्र अपनी आसक्ति के भावों से उतपन्न इक्षाओं की पूर्ति के लिए होती है , भले इसके लिए शास्त्र विधान का उल्लंघन हो या अन्य का नुकसान हो।

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