श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 3
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 3
सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत।
श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः॥ 3।।
हे भारत! सभी मनुष्यों की श्रद्धा उनके अन्तःकरण के अनुरूप होती है। यह पुरुष श्रद्धामय है, इसलिए जो पुरुष जैसी श्रद्धावाला है, वह स्वयं भी वही है।
प्रतेक व्यक्ति की एक आस्था होती है यानी प्रतेक व्यक्ति का अपना कुछ विश्वास होता ही है जो उसके स्वभाव के अनुसार ही होता है। यँहा आस्था अथवा विश्वास का सम्बंध किसी धर्म, पन्थ या सम्प्रदाय से नहीं है बल्कि उसके दृष्टिकोण और उसकी मान्यताओं से इसका सम्बन्ध है। ऐसा नहीं है कि हर बात के लिए हर व्यक्ति प्रमाण ही खोजे। कई ऐसी चीजें होती हैं जो व्यक्ति अपने स्वभावगत आस्था के कारण उसे सही या गलत मान लेता है। यह स्वभावगत आस्था उसकी मूल प्रवृत्ति के अनुरूप होती है जो स्वयं तीन गुणों के परस्पर अनुपात पर निर्भर करती है। श्रद्धा और स्वभाव एक दूसरे पर निर्भर करते हैं और दोनों ही एक दूसरे को प्रभावित करते हैं। और यही दोनों मिलकर व्यक्ति के व्यवहार को निरूपित भी करते हैं। फिर चाहे धर्म के मार्ग का अनुसरण हो या कुछ अन्य।
लेकिन हमें ध्यान रखना चाहिए कि मनुष्य जीवन में स्वभाव और उसके अनुरूप की श्रद्धा अथवा आस्था और श्रद्धा के अनुरूप स्वभाव यह परिवर्तनीय भी है क्योंकि जीवन के अनुभव, शास्त्रों का अध्ययन और सत्पुरुषों की संगत से इनमें परिवर्तन भी होता है।
Comments
Post a Comment