श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 19
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 19
मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः।
परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम्॥ 19।।
जो तप मूढ़तापूर्वक हठ से, मन, वाणी और शरीर की पीड़ा के सहित अथवा दूसरे का अनिष्ट करने के लिए किया जाता है- वह तप तामस कहा गया है।
सात्विक तप में तपस्वी का लक्ष्य साधना द्वारा स्वयं का शुद्धिकरण करना होता है। सात्विक तप में कर्मफल के प्रति कोई आसक्ति नहीं होती है किंतु राजस तप में व्यक्ति साधना के द्वारा स्वयं का मान सम्मान, स्वयं की प्रसिद्धि और स्वयं का प्रभाव लोगों पर बढ़ाना चाहता है सो कर्मफल के प्रति उसकी गहरी आसक्ति होती है। इन सब के विपरीत तामसिक तप में व्यक्ति का उद्देश्य न तो स्वयं का शुद्धिकरण होता है और न ही स्वयं का महत्व बढाने की लालसा बल्कि तामसिक तपस में व्यकि मूर्खतावश स्वयं को कष्ट देता है , मन वचन और शरीर तीनों स्तर पर ताकि वह दूसरे को हानि पहुँचा सके। इस तामसिक तप में व्यक्ति अपने मन , वाणी और शरीर से ऐसे कर्म करता है जो भले श्रम साध्य हों लेकिन वे स्वयं को तो पीड़ा देते ही हैं उनका उद्देश्य दूसरे के साथ छल भाव से उनकी हानि करना होता है। ऐसे तप से किसी का भला नहीं होता है बल्कि सभी का नुकसान ही किया जाता है।
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