श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 17

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 17

श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्त्रिविधं नरैः।
अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते॥ 17।।

फल को न चाहने वाले योगी पुरुषों द्वारा परम श्रद्धा से किए हुए उस पूर्वोक्त तीन प्रकार के तप को सात्त्विक कहते हैं।

ये जो तीन तरह के तप हैं, शारीरिक, वाचिक और मानसिक ये अलग अलग नहीं किये जाते हैं बल्कि तीनों एक दूसरे के पूरक हैं और जब व्यक्ति तप के लिए स्वयं को प्रस्तुत करता है तो इसका अर्थ है कि वह तीनों तप एक साथ कर रहा है। यदि इनमें से कोई एक नहीं किया जाता है तो फिर वह तप होता ही नहीं है। 
       तप की इस प्रक्रिया में व्यक्ति को श्रद्धा और अटूट विश्वास का होना जरूरी है। यदि यह भरोसा नहीं है कि मन, वाणी और शरीर को नियत तरीके से तपाना है तब तप नहीं हो सकता है क्योंकि तब तप के लिए जो भी श्रम किया जाता है वह निरर्थक होता है।
    और जब  व्यक्ति स्वभावतः और कर्तव्य के अधीन होकर बिना किसी फलाफल की इक्षा के तप में प्रवृत्त होता है यानी तप में प्रवृत्त व्यक्ति के मन में तप की क्रिया के प्रति कोई आसक्ति नहीं होती है बल्कि कर्तव्य भाव होता है यानी उसे प्रतीत होता है कि उसे अपने जीवन में तप कर ही आगे जाना है और इसके पीछे फल के प्रति कोई लोभ या आसक्ति नहीं होती है तो वह तप सात्विक तप कहलाता है। यानी जब तप कर्मयोग के भाव से होता है तो वह सात्विक तप होता है।

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