श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 16
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 16
मनः प्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः।
भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते॥ 16।।
मन की प्रसन्नता, शान्तभाव, भगवच्चिन्तन करने का स्वभाव, मन का निग्रह और अन्तःकरण के भावों की भलीभाँति पवित्रता, इस प्रकार यह मन सम्बन्धी तप कहा जाता है।
मन के शुद्धिकरण की प्रक्रिया को मानसिक तप कहते हैं। तप यानी तपाना अथवा तपना अर्थात ऊष्मा का संचरण करना। इस संचरण से मन का शुद्धिकरण होता है। यह कैसे होता है?
मन सम्बन्धी तप का तातपर्य है कि मन में प्रसन्नता हो, साम्य स्थिति हो, गूढनेस का भाव हो, मन का निग्रह हो यानी मन पर इन्द्रियों का अधिपत्य न हो, दृष्टिकोण में कोई पतित भाव न हो।
मन शांत हो, प्रसन्न हो। यह कैसे होगा? यह सम्भव होता है स्वध्याय से, भले लोगों की संगति से, उनकी बातों के अनुसरण से, स्वचिन्तन से। प्रत्येक व्यक्ति अपने मन की अवस्था के लिए स्वयं उत्तरदायी होता है। यदि मन हर बाहरी कारकों से प्रभावित होता रहे तो फिर मन की चंचलता मन को शांत, सौम्य और प्रसन्न नहीं बनने दे सकती है। मन का बहुत ही महत्व है क्योंकि हमारा संसार हमारे मब से हीं हमें समझ में आता है। मन हीं वह महान सारथी है जो हमें सही रास्ते पर भी ले जाता है और वही हमें गलत रास्ते पर भी ले जाता है। मन के हारे हार है, मन के जीते जीत। सो मन को वश में रखना सबसे जरूरी है। मन से हीं सद्विचार निकलते हैं और दुर्विचार भी। यदि मन नियंत्रित है तो सद्विचारों का आगमन मन में होता है और यदि अनियंत्रित है तो फिर दुर्विचार हमें गलत रास्ते पर ले कर चले जाते हैं। हर विचार कर्म में उतरने के पहले मन में आता है। सो यदि मन में अच्छे विचार आएं तो कर्म भी अच्छा होगा हीं और यदि मन में गलत विचार आते हैं तो कर्म भी गलत हीं होंगे। जैसे ही मन में कोई बुरा विचार आता है, मन उद्वेलित हो उठता है, ऐसा लगता है मानो कोई तूफान सा चल रहा हो मन में। बेचैनी का जन्म होता है और मन चंचल भी हो उठता है। क्रोध, लोभ, ईर्ष्या, हिंसा, बदले की भावना, अनाचार, वासना आदि ऐसे ही विचार हैं जो मन को उद्वेलित कर देते हैं। जिन विचारों से मन उद्वेलित होता है वे विचार मन को अशांत कर देते हैं, और उस स्थिति में हमारे कर्म भी उत्तेजना वाले ही होते हैं। इसके विपरीत ऐसे विचार भी होते हैं जिनसे मन में प्रसन्नता, प्रफुल्लता, शांति की स्थिति आती है और तब मन से संचालित हमारे कर्म भी संयत होते हैं। सो यदि कर्मों को बांधना है, सद्कर्म के मार्ग पर चलना है तो सबसे पहले मन को काबू में करना सीखें।
प्रसन्नता का कोई कारण नहीं होना चाहिए। मात्र कर्म को कर्मयोग के माध्यम से करने से मन को प्रसन्नता मिलती है। इस मन की प्रसन्नता की कोई शर्त नहीं होती। सो कर्मों को करने के भाव को कर्मयोग में अधिष्ठापित रखें।
मन की यह अवस्था में उद्वेग नहीं होता, उत्तेजना नहीं होती बल्कि इसमें असीम शांति होती है जो ध्यान की अवस्था से आती है।
मन में अच्छे विचारों का प्रवाह मन को सौम्य बनाते हैं। इसके लिए सचेत होकर विचारों का चयन करना होता है। इसकी झलक व्यक्ति के वाह्य अभिव्यक्ति से मिल जाती है। ऐसे व्यक्ति शांत, प्रसन्न , एकाग्र अभिव्यक्ति का होता है न कि बाहरी कारकों से बार बार विचलित होते रहता है। यह उसके हृदय के अच्छे विचारों के कारण होता है।
मन का मौन भी मानसिक तप का अनिवार्य भाग है। मन को शान्त रखना होता है अर्थात मन में विचारों के अनावश्यक प्रवाह को रोकना होता है। मन निरन्तर वार्ता की अवस्था में रहता है। किंतु जब मन को स्वयं पर केंद्रित करते हैं तो शनैः शनैः शांत होते जाता है। मन के उद्वेग को, मन के अतीत और भविष्य में विचरने की आदत को रखना होता है और यह अवस्था ध्यान से आती है।
मन को भटकाने का कार्य हमारी इन्द्रियाँ करती हैं जो हमारा सम्पर्क बाहरी संसार से कराती हैं। सो मन का निग्रह अनिवार्य है। संसार से हमारा संम्पर्क हमारी इंद्रियों के माध्यम से होता है। आँख, कान, नाक, जिव्हा और त्वचा से हम संसार के सम्पर्क में आते है और इन सम्पर्कों के कारण ही हम प्रतिक्रिया देते है । यही प्रतिक्रिया विकार को जन्म देती है। जैसे किसी का स्पर्श हमें। ममत्व या वासना देता है। फिर उस ममत्व या वासना से सम्बद्धता के कारण हम उस सम्पर्क को अधिक से अधिक चाहने लगते हैं। इससे लोभ उतपन्न होता है और लोभ की पूर्ति के लिए हम येन केन प्रकारेण प्रयास करते हैं। इस कारण से हम गलत मार्ग पर भी चल देते हैं। इसी प्रकार कोई बात हम सुनते हैं। मान लीजिये कि हमने कोई शब्द सुना। सुनते ही मन ने उस शब्द का विश्लेषण कर पहचाना कि यह शब्द गाली का है। बस क्या है , हम उस शब्द की प्रतिक्रिया में। गुस्से में आते हैं। फिर हम भी गाली देते हैं या हिंसा करते हैं या बल नही है तो निराश होकर रह जाते हैं।
इस प्रकार ध्यान हमारी मदद करता है कि हम पहचान सकें कि किस प्रकार सम्बद्धता के कारण हम प्रतिक्रिया कर देते हैं और मन में विकारों को जन्म लेने देते हैं। ये विकार हमारी साम्यावस्था को विचलित कर देते हैं।
सिर्फ प्रतिक्रिया की प्रक्रिया के दौरान ही विकारों से नहीं निपटना होता है, बल्कि यदि वास्तव में हम अपने अंदर से विकारों को समाप्त कर एक बेहतर इंसान बनना चाहते हैं तो हमें यह समझना होगा कि जब भी हम कोई कर्म करते हैं तो हमारे लिए जरुरी होता है कि हम इस बात की पर्याप्त सावधानी बरतें कि हमारे मन में वैसे कोई विकार जन्म न लें जिनसे हमारे अंदर क्रोध, ईर्ष्या, लोभ, आदि विचारों का जन्म हो। ध्यान रखे कि यदि हम किसी को गाली देने का उपक्रम करेंगे तो उस व्यक्ति को गाली देने के पूर्व हमें स्वयं के विचारों को दुषित करना होगा। इससे हम स्वयं को पहले विचलित करते हैं तभी दूसरे के प्रति विकार युक्त आचरण कर पाते हैं। यदि हम ऐसा करते हैं तो दूसरे का अहित करने के पूर्व हमें खुद का अहित करना पड़ता है जो किसी भी तरह से एक बुद्धिमानी का निर्णय नही हो सकता है।
हमारा दृष्टिकोण भी शुद्ध होना चाहिए। जब हम अन्य के साथ समव्यव्हार में होते हैं तो हमारे अंदर क्रोध, ईर्ष्या, चिड़चिड़ापन, लोभ आदि भाव नहीं होने चाहिए यानी हमें विकारों से मुक्त होना चाहिए। की अनुभूतियों पर केंद्रित करना होता है। शांत मन से प्रकृति के नियमों को अपने ऊपर घटित होते देखना होता है। यह तब दिखता है जब हमारा ध्यान स्वयं पर शान्ति से टिक गया हो। जो अनुभूति हो रही हो बस उसका मन के स्तर से निरीक्षण करना होता है, उंसके साथ कोई छेड़ छाड़ नहीं करनी होती है। स्वयं पर केंद्रित होकर देखते रहें कि प्रकृति के नियमों के द्वारा आपके अंदर किस सत्य को प्रकट किया जा रहा है। जो प्रकट हो रहा है उसे ही देखना है। उसपर अपने किसी पूर्वाग्रह का कोई लेप नहीं चढाना है। स्वयं के बारे में प्रकट हो रही सच्चाई को उसी रूप में जानना और स्वीकारना है। मन आपका है तो फिर सच्चाई दूसरे की क्यों जानना। धर्म का आचरण हमें करना सीखना है तो फिर ध्यान में किसी अन्य को क्यों लाना, दूसरे की खासियतों से हमारा क्या भला होने वाला है। सो शांत मन से स्वयं को देखते जाना है, स्वयं के बारे में जो जो प्रकट होते जा रहा है, उसे उसी तरह , बिना किसी मिलावट के , बिना किसी अपराध बोध के देखते समझते शांत भाव से स्वीकार करना है। बस एकाग्रता भी आती जाएगी और मन का मैल भी निकलता जाएगा। जैसे जैसे मन का मैल उतरेगा वैसे वैसे मन पर धर्माचरण का प्रभाव होते जाएगा। बिना मन का मैल हटाये, पूर्व से बैठे धूल को साफ किये धर्माचरण का प्रभाव उसपर नहीं आता है। यह अभ्यास की चीज है। एक दिन में नही होगा, बारम्बार अभ्यास से होगा।
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