श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 15
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 15
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥ 15।।
जो उद्वेग न करने वाला, प्रिय और हितकारक एवं यथार्थ भाषण है (मन और इन्द्रियों द्वारा जैसा अनुभव किया हो, ठीक वैसा ही कहने का नाम 'यथार्थ भाषण' है।) तथा जो वेद-शास्त्रों के पठन का एवं परमेश्वर के नाम-जप का अभ्यास है- वही वाणी-सम्बन्धी तप कहा जाता है।
शरीर के पश्चात वाणी सम्बन्धी तप आता है जो शारीरिक तप से ज्यादा सूक्ष्म है। वाणी के द्वारा व्यक्ति स्वयं को अभिव्यक्त करता है और इस प्रकार वाणी व्यक्ति के मन, बुद्धि, विवेक की अभिव्यक्ति है। इसके साथ ही वाणी मन, बुद्धि और विवेक को प्रभावित भी करती है। जब भी व्यक्ति कुछ भी बोलने के लिए उद्द्यत होता है तो उसके पूर्व उसके मन में उसकी बुद्धि और विवेक के अनुरूप विचार जन्म लेते हैं और भावनाओं का प्रवाह होता है और वही सब व्यक्ति की वाणी से अभिव्यक्त होते हैं। जैसे यदि आप किसी को गाली देते हैं तो उसके पूर्व आपके अंदर उस व्यक्ति/स्थिति के विरुद्ध क्रोध और घृणा के भाव जन्म लेते हैं जो आपको विचलित करते हैं, उद्वेलित करते हैं जिसके अधीन होकर आपका विवेक दिग्भ्रमित होता है और बुद्धि भटकती है। नतीजन आप कटु वचन बोलते हैं। फिर ये कटु वचन जो सुनता है उसका भी साम्य विचलित होता है और वह भी आवेश अथवा अवसाद के भाव में आ जाता है। इसके ठीक विपरीत प्रभाव मृदु वचन के होते हैं। इसी लिए वाणी के सयम को वाचिक तप का दर्जा दिया गया है।
वाचिक तप में वाणी ऐसी होनी चाहिए कि वह उद्वेग न पैदा करे, सत्य हो, प्रिय हो, हितकारी हो। इन चारों का सदा मिश्रण करना और उनका सही सही प्रयोग करना हमेशा, हर स्थिति में सरल नहीं होता है सो यह उच्च स्तर के स्वध्याय और अभ्यास से आता है। हम देखते हैं कि अक्सर इन चार तत्वों के तालमेल के अभाव में हम परिस्थितियों से प्रभावित होकर अनाप शनाप बोल जाते हैं लेकिन यदि उच्च स्तर के ज्ञान का अभ्यास पूर्वक स्वध्याय किया जाय, तो हमारी वाणी में सत्य भी होगा, वह प्रिय ढंग से अभिव्यक्त भी होगी, उसमें सामने वाले का हित भी समाहित होगा और वह न तो बोलने वाले और न सुनने वाले में उद्वेग का संचार ही करेगी।
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