श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 14

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 14

देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम्‌।
ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते॥ 14।।

देवता, ब्राह्मण, गुरु (यहाँ 'गुरु' शब्द से माता, पिता, आचार्य और वृद्ध एवं अपने से जो किसी प्रकार भी बड़े हों, उन सबको समझना चाहिए।) और ज्ञानीजनों का पूजन, पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा- यह शरीर- सम्बन्धी तप कहा जाता है।

आहार और यज्ञ-कर्म के पश्चात तीसरा सोपान तप का होता है । तप का अर्थ है पूरी चेष्टा के साथ अपनी समस्त एकाग्रता को एक जगह लक्षित कर अपनी समस्त ऊर्जा को एक विशेष उद्देश्य की प्राप्ति के लिए लगाना। इसमें विचलन के लिए कोई स्थान नहीं होता है। यह तप तीन स्तरों पर किया जाता है , शरीर, वाणी और मन के स्तर पर जिन्हें क्रमशः शारीरिक, वाचिक और मानसिक तप कहा जाता है और ये तीन तप में से प्रत्येक तप सात्विक, राजसिक और तामसिक प्रवृत्ति वाले होते हैं।
         शरीर सम्बंधित तप में शरीर को सम्पूर्ण एकाग्रता के साथ उसकी समस्त चेष्टाओं का केंद्र एक रखा जाता है और  शरीर को , उसके सभी अंगों को एक तारतम्य में रखते हुए यज्ञ कर्मों में लगाया जाता है यानी सम्पूर्ण शरीर को अपने गुरुजनों, (यहाँ 'गुरु' शब्द से माता, पिता, आचार्य और वृद्ध एवं अपने से जो किसी प्रकार भी बड़े हों, उन सबको समझना चाहिए।) , विद्वान जनों, की सेवा में लगाना चाहिए। यही सेवा उनकी पूजा है। यह सेवा पूर्ण समर्पण के साथ, बिना किसी प्रतिदान या बिना किसी अपेक्षा के , बिना किसी भेद और लालच के , शरीर को वासनाओं से बचाते हुए और बिना कोई हिंसा किये किये जाने चाहिए। जब शरीर की चेष्टाएँ इन सब से परिपूर्ण होती हैं , जब शरीर इन सब के साथ एकाग्र भाव से सेवा रत हो तब कहा जाता है कि व्यक्ति शरीर सम्बंधित तप कर रहा है। इस प्रकार स्पष्ट है कि जब व्यक्ति अपने कल्याण की कामना करता है , जब व्यक्ति मोक्ष की अपेक्षा करता है, जब व्यक्ति इस तरह के लक्ष्य विशेष को हासिल करना चाहता है तब उसे सबसे पहले अपनी शारीरिक चेष्टाओं से उस लक्ष्य के प्रति समर्पित होना होता है और शरीर से एकाग्र , संयमित और अहिंसक होकर यज्ञ कर्मों में प्रवृत्त होना होता है।

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