श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 11
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 11
अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते।
यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः॥ 11।।
जो शास्त्र विधि से नियत, यज्ञ करना ही कर्तव्य है- इस प्रकार मन को समाधान करके, फल न चाहने वाले पुरुषों द्वारा किया जाता है, वह सात्त्विक है।
व्यक्ति के द्वारा परम् अवस्था को प्राप्त करने के लिए जिन उपायों को करना चाहिए उसके अनुसार व्यक्ति को क्रमशः तामसिक से राजसी और राजसी से सात्विक प्रवृत्तियों की ओर बढ़ना चाहिए। इस व्यक्ति को स्वयं की वर्तमान अवस्था का आकलन करना आवश्यक है और तदुपरांत उसे क्रमशः आगे बढ़ना चाहिए। क्रम में पहला सोपान आहार का है जिसे पहचान कर और उसमें आवश्यक सुधार कर व्यक्ति क्रमशः आगे बढ़ सकता है।
दूसरा सोपान यज्ञ का है। यज्ञ का अर्थ है कि हम श्रद्धा भाव से जो कर्म करते हैं। यज्ञ भी सात्विक, राजसी और तामसिक होते हैं।
जो व्यक्ति सात्विक प्रवृत्ति का होता है वह जब कर्म करता है तो उसमें कर्मयोग का भाव होता है यानी वह अपनी स्थिति के अनुसार , अपने स्वधर्म के अनुसार अपने कर्म करता है। वह किसी लोभ या किसी अन्य प्रेरणा के वशीभूत होकर कर्म नहीं करता है बल्कि वह जो कर्म करता है वह इसलिए करता है कि वही कर्म करना उसके स्वाभिक प्रवृत्ति के अनुसार उसका कर्तव्य होता है। साथ ही वह कर्मफल से भी मुक्त होता है यानी वह कर्मफल से आसक्त नहीं होता है बल्कि जो भी फल प्राप्त होता है उसे वह प्रसाद भाव से स्वीकार करता है। जब वह कर्म करता है तो उसे अपने कर्म में श्रद्धा होती है , उसे विश्वास होता है। इस प्रकार से कर्म करने वाला व्यक्ति सात्विक वृत्ति का होता है और इसी को सात्विक यज्ञ कहा जा है । इस प्रकार सात्विक वृत्ति का व्यक्ति सात्विक यज्ञ करता हुआ, सात्विक कर्म करता हुआ न तो कर्म से बन्धता है न ही कर्मफल से।
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