श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 (श्लोक रहित)

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 (श्लोकरहित)

परिचय

"मैं कौन हूँ?"
यह प्रश्न बहुत ही जटिल है और इसी का उत्तर देती है श्रीमद्भागवद्गीता। सोलह पाठ खत्म होते होते श्रीमद्भागवद्गीता की मूल शिक्षाओं का प्रशिक्षण पूरा हो गया है। इन सोलह अध्यायों में हम सीखते हैं कि , "में कौन हूँ" और यह भी सीखते हैं कि "मैं" यानी स्वयं को पाने का मार्ग क्या है।
   स्वयं को नहीं जान पाने से व्यक्ति को अपने जीवन में तो परेशानी का सामना करना ही पड़ता है, साथ ही समष्टि भी प्रभावित होती है और इस संसार का स्वरूप भी प्रभावित होता है। इस "मैं कौन हूँ" का उत्तर शास्त्रों में है। अर्थात उन महान मनीषियों के अध्ययन और उनके चिंतन में है। उनके द्वारा अनुभूत ज्ञान का संग्रह हैं शास्त्र। इन शास्त्रों के अध्ययन, श्रवण, चिंतन, मनन और उनके अभ्यास से हम जान पाते हैं कि हमारे वो मार्ग कौन से हैं जिनपर चलकर हम स्वयं को पा सकते हैं। सभी को इन शास्त्रों पर भरोसा होना चाहिए और उनपर श्रद्धा के साथ हमारा अध्ययन होना चाहिए।
   स्वयं के सम्बंध में बोध के लिए अनिवार्य है कि हमारे मन का भ्रम दूर हो और मस्तिष्क शांत और निर्लेप अवस्था में रहे। मन का शांत होना ही आत्मावलोकन की पहली सीढ़ी होती है। मन की शांति से तात्पर्य यह नहीं है कि मन सो जाएं। बल्कि पूर्ण जागृत अवस्था में मन का शांत होना जरूरी है। यह अवस्था ही ध्यान कहलाती है जब मन शांत होता है, सभी भ्रमों से , सभी बन्धनों से, सभी परिणामों से , मुक्त होकर मात्र स्वयं पर केंद्रित होता है। 
      तो क्या ध्यान की यह अवस्था सहसा ही प्राप्त की जा सकती है । जी नहीं। इस ध्यान की अवस्था तक की यात्रा कर्मयोग, भक्तियोग और ज्ञानयोग से होते हुए होती है। इनमें से किसी को त्यागने से ध्यान तक पहुँचना सम्भव नहीं होता है। इन्हीं मार्गों की सम्यक जानकारी हमें शास्त्रों से और सयोग्य शिक्षकों से मिलती है। इसीलिए सोलहवें अध्याय के अंत में शस्त्र रीति से व्यवहार करने पर बल दिया गया है। यह शास्त्र रीति पारिवारिक परम्पराओं और सांसारिक चलन से इतर योग के मूल तत्व से हमें अवगत कराती ताकि हम इन मार्गों पर चलकर ध्यान की अवस्था तक पहुँच सकें जँहा हम समझ जाते हैं कि हम कौन हैं , और इस दृश्य और अदृश्य संसार से हमारा क्या सम्बन्ध है।

भावार्थ

जब शास्त्रों के अध्ययन को धर्म मार्ग के अनुसरण का प्रमाण कहा जाता है तो फिर यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि बहुत सारे लोग तो ऐसे भी होते हैं जो या तो शास्त्रों का अध्ययन ही नहीं करते या करते भी हैं तो समझते नहीं। लेकिन इनमें से बहुतेरे मनुष्य ऐसे भी तो होते हैं जो भले शास्त्रों से या उनकी शिक्षाओं से अनभिज्ञ हों लेकिन मन में गहरी आस्था रखकर , भरोसा रखकर कर्म करते हैं। ये लोग परम्पराओं से मिली विरासत के अनुसार उन परम्पराओं पर विश्वास कर उनके अनुसार कर्म करते हैं। तो ऐसे व्यक्तियों को किस श्रेणीं में रखना चाहिए-सात्विक या राजसी या तामसिक। इसी प्रश्न को अर्जुन भी करते हैं।

     व्यक्ति के कर्म दो कारकों से निर्धारित होते हैं, एक है उसका स्वभाव और दूसरा है उसका शास्त्रीय अध्ययनअर्थात उसके अपने प्रयास से सीखे समझे ज्ञान से।
   जब व्यक्ति सिर्फ स्वभाव से संचालित होता है, अर्थात जब वह प्रयास कर शास्त्रों का अध्ययन कर ज्ञान नहीं अर्जित कर लेता है तब उसके कर्म उसकी स्वाभावगत आस्था (अर्थात श्रद्धा) से निर्धारित होते हैं। इसका तातपर्य है कि उसके स्वभाव के अनुसार जो उसके दृष्टिकोण को निर्धारित करता है वही उसके कर्मों को निर्धारित भी करता है। 
      अब प्रश्न उठता है कि यह स्वभावगत श्रद्धा या आस्था  की प्रवृत्ति क्या होती है। सम्पूर्ण संसार तीन गुणों , सत्व, रजो और तमो गुण के पारस्परिक संयोग से बना होता है। इन तीन गुणों के पारस्परिक अनुपात से व्यक्ति का स्वभाव , उसका दृष्टिकोण निर्धारित होता है। यह सत्य है कि व्यक्ति अपने इस जन्मजात स्वभाव में शास्त्रीय अध्ययन और उसके अनुभव से परिवर्तन ला सकता है किंतु मूल रूप से उसका स्वभाव, उसकी आस्था, उसकी श्रद्धा हर स्थिति में सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण के पारस्परिक अनुपात पर निर्भर है। अर्थात उसकी श्रद्धा इन तीन गुणों के अनुसार तीन तरह की हो सकती है।
         प्रतेक व्यक्ति की एक आस्था होती है यानी प्रतेक व्यक्ति का अपना कुछ विश्वास होता ही है जो उसके स्वभाव के अनुसार ही होता है। यँहा आस्था अथवा विश्वास का सम्बंध किसी धर्म, पन्थ या सम्प्रदाय से नहीं है बल्कि उसके दृष्टिकोण और उसकी मान्यताओं से इसका सम्बन्ध है। ऐसा नहीं है कि हर बात के लिए हर व्यक्ति प्रमाण ही खोजे। कई ऐसी चीजें होती हैं जो व्यक्ति  अपने स्वभावगत आस्था के कारण उसे सही या गलत मान लेता है। यह स्वभावगत आस्था उसकी मूल प्रवृत्ति के अनुरूप होती है जो स्वयं तीन गुणों के परस्पर अनुपात पर निर्भर करती है। श्रद्धा और स्वभाव  एक दूसरे पर निर्भर करते हैं और दोनों ही एक दूसरे को प्रभावित करते हैं। और यही दोनों मिलकर व्यक्ति के व्यवहार को निरूपित भी करते हैं। फिर चाहे धर्म के मार्ग का अनुसरण हो या कुछ अन्य। 
    लेकिन हमें ध्यान रखना चाहिए कि मनुष्य जीवन में स्वभाव और उसके अनुरूप की श्रद्धा अथवा आस्था और श्रद्धा के अनुरूप स्वभाव यह परिवर्तनीय भी है क्योंकि जीवन के अनुभव, शास्त्रों का अध्ययन और सत्पुरुषों की संगत से इनमें परिवर्तन भी होता है।

      व्यक्तियों की श्रद्धा तीन प्रकार की होती है और उनके कर्म भी उन्हीं के अनुसार निर्धारित होते हैं। अपने आचरण, अपने व्यवहार से हम जान सकते हैं कि हम वस्तुतः किस श्रद्धा/आस्था के व्यक्ति हैं।
      जब व्यक्ति के अंदर दैवी गुण प्रबल होते हैं तो उस तरह का व्यक्ति दया, क्षमा, सत्य, अहिंसा आदि से सज्जित आचरण करता है। ऐसा व्यक्ति स्वयं में तो इन प्रकार के गुणों वाला तो होता ही है, साथ ही अपने व्यवहार में भी इन्हीं प्रकार के गुणों वाले व्यक्तियों को सम्मान भी देता है, महत्व भी देता है यानी उसका व्यक्तिगत जीवन और सामाजिक व्यवहार इन्हीं दैवी गुणों से संचालित होते हैं। ऐसा व्यक्ति सात्विक श्रद्धा वाला होता है। ऐसा व्यक्ति यदि शास्त्रों का अध्ययन नहीं भी किया होता है तब भी वह उत्तम श्रेणी का होता है और वह सन्मार्ग पर चलते हुए सर्वोच्च पद प्राप्त करता है।
        दूसरे प्रकार के व्यक्ति में चंचलता अधिक होती है, उसे ज्ञान से अधिक बल, सत्ता और धन पर भरोसा होता है और वह अपने जीवन के कार्यकलापों में इन्हीं तत्वों को हमेशा अधिक महत्व देता है। यँहा तक कि यदि कोई व्यक्ति ज्ञानी और धन-बल सम्पन्न है भी तो भी ऐसा व्यक्ति उस ज्ञानी के ज्ञान से नहीं बल्कि उसके धन-बल से अधिक प्रभावित होता है। ऐसा व्यक्ति सन्तोष नहीं कर हमेशा अपने प्रभाव में विस्तार के लिए इक्षुक बना रहकर आचरण करता है, और इस प्रकार के व्यक्ति की श्रद्धा राजसी श्रद्धा कहलाती है। ऐसे व्यक्ति के लिए सन्मार्ग पर चलने के लिए जरूरी होता है कि वह शास्त्रों का अध्ययन करे, सत्संग करे और अपने दृष्टिकोण में सुधार लावे।
      तीसरे प्रकार के व्यक्ति वे हैं जो हिंसा, असत्य, लोभ जैसे अन्य  आसुरी गुणों के भरोसे जीवन व्यतीत करते हैं और ऐसे व्यक्ति हमेशा समाज को हानि पहुँचा कर आगे बढ़ना चाहते हैं। आसुरी गुणों की प्रचुरता वाले ऐसे लोग तामसी श्रद्धा वाले होते हैं। बिना शास्त्रों के अध्ययन, बिना सुयोग्य गुरु और सत्संग के ऐसे लोग कभी सन्मार्ग पर नहीं आते हैं।
        यह सत्य है कि प्रत्येक व्यक्ति में ये तीनों गुण होते हैं परंतु उनकी श्रद्धा, उनकी आस्था और तदनुरूप उनका स्वभाव और आचरण उनके इन तीन गुणों के आपसी अनुपात पर निर्भर करता है।

 व्यक्ति की श्रद्धा उसके कर्म से परिलक्षित होती है। जिसकी जैसी श्रद्धा होती है उसका कर्म भी वैसा ही होता है। 
      श्रद्धा के अनुरूप ही मन में विचारों का जन्म होता है और वे विचार जो मन में जन्म लेते हैं कर्मों में रूपांतरित होकर सामने आते हैं।
       जिस व्यक्ति की श्रद्धा राजसी -तामसिक प्रवृत्ति वाली होती है उसके मन में दम्भ, अहंकार, इक्षाएँ और लगाव के भाव तीव्र होते हैं। इनके कारण उनमें घोर आसक्ति के भाव होते हैं और इनके प्रभाव में ऐसे व्यक्ति बिना सही गलत की चिंता किये , बिना नियम कायदों की फिक्र किये मात्र अपनी इक्षा की पूर्ति पर केंद्रित रहते हैं और इसके लिए ही अपनी पूरी एकाग्रता से कर्म करते हैं। ऐसे लोगों के मन में मात्र अपनी कामना पूर्ति ही प्रबल होती है जिसके सम्मुख उनके लिए सभी नियम, सभी तौर तरीके गौण होते है । ऐसे लोग अपनी आसक्ति से बंधे होकर इस दम्भ और अहंकार में होते हैं कि वे जो मान्यता रखते हैं मात्र वही सही है और इसकी पूर्ति के लिए वे घोर प्रयास वही करते हैं जबकि शास्त्र विधि युक्त कर्मों के लिए उनके मन में तनिक भी श्रद्धा नहीं होती है। उनके समस्त गम्भीर और मेहनती प्रयास मात्र और मात्र अपनी आसक्ति के भावों से उतपन्न इक्षाओं की पूर्ति के लिए होती है , भले इसके लिए शास्त्र विधान का उल्लंघन हो या अन्य का नुकसान हो।

     जब व्यक्ति के अंदर तामसी गुणों की प्रचुरता होती है तब उसका स्वभाव आसुरी प्रवृत्ति वाला होता है। ऐसा व्यक्ति हिंसा, असत्य, अत्याचार, अनाचार, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या आदि से युक्त स्वभाव वाला होता है और अपने इस स्वभाव से दूसरे लोगों को पीड़ा देता है। 
    लेकिन यँहा ध्यान देने वाली बात यह है कि इस प्रकार के स्वभाव वाला व्यक्ति भले दूसरों को नुकसान पहुँचाने की नीयत से कर्म करता है, लेकिन वह पहले अपना नुकसान करता है और तब दूसरों का नुकसान कर पाता है। बिना स्वयं को नुकसान दिए, बिना स्वयं को पीड़ा दिए कोई भी व्यक्ति दूसरों का नुकसान नहीं कर सकता है, दूसरों को पीड़ा नहीं दे सकता है। जब भी आसुरी स्वभाव वाला व्यक्ति किसी दुसरे की हानि करना चाहता है तो इसकी अनिवार्यता है कि वह पहले अपनी हानि कर ले।
 मान लें कि एक व्यक्ति  किसी अन्य की हत्या कर देता है। यह कैसे सम्भव होता है? पहले तो उस व्यक्ति के मन में दूसरे के लिए क्रोध और घृणा युक्त भाव होता है। ये भाव उसके मन को अस्थिर कर देते हैं, उसकी प्रेम , दया और  क्षमा जैसी भावनाओं को समाप्त कर देते हैं, उसकी बुद्धि और उसके विवेक को हत्या जैसे कृत्य के दुष्परिणामों के लिए सोचने समझने से रोक देते हैं। ऐसे में क्रोध युक्त व्यक्ति का विवेक, उसकी बुद्धि पहले नष्ट होती है और तभी वह दूसरे व्यक्ति की हत्या के लिए उद्यत हो पाता है।
     इस प्रकार आसुरी स्वभाव का व्यक्ति स्वयं को भी कष्ट देता है। अब हम इस सत्य को भी ध्यान में रखें कि सभी व्यक्ति एक ही परम सत्ता के स्वरूप हैं यानी सभी में एक ही परमात्मा है। इस प्रकार किसी को दिया जाने वाला कष्ट उस परमात्मा को दिया जाने वाला ही कष्ट है। इस प्रकार आसुरी व्यक्ति न सिर्फ स्वयं को और दूसरों को बल्कि परम् पिता परमेश्वर को भी कष्ट देता है अपने आचरण से।

     साधना के क्रमशः चार सोपान होते हैं-
    1.आहार
    2.यज्ञ
    3.तप
    4.दान
और ये चारों व्यक्ति के स्वभाव के अनुसार तीन तीन प्रकार के होते हैं यानी सात्विक, राजसी और तामसिक।
      अर्थात व्यक्ति की तीन प्रकार की प्रवृत्तियों के अनुसार ये चारों सोपान होते हैं। इस प्रकार हम व्यक्ति के आहार, यज्ञ, तप और दान से समझ सकते हैं कि व्यक्ति किस प्रकार के साधना वाला है। इन चारों सोपानों को क्रमशः सात्विक प्रवृत्ति का कर हम साधना के चरम पर पहुँच सकते हैं।
      दरअसल ये चार सोपान वे मार्ग हैं जिनके माध्यम से हम अपने अन्तःकरण की शुद्धि कर उत्तम से उत्तम हो सकते हैं। आहार, यज्ञ, तप और दान के मार्ग से चलकर व्यक्ति अपने परम लक्ष्य को हासिल कर सकता है। ये वे व्यवहारिक साधन हैं जिनके द्वारा हम मोक्ष के लक्ष्य को प्राप्त करते हैं। जैसे जैसे हम अपने इन चार साधनाओं को परिमार्जित कर सात्विक बनाते जाते हैं वैसे वैसे हम स्वयं को प्राप्त करने के लक्ष्य के समीप पहुँचते जाते हैं।
     सो यह आवश्यक है कि व्यक्ति इन चार सोपानों के अनुसार अपनी प्रवृत्ति को पहचान कर अपने में सुधार कर सके।
    तो इसके लिए आवश्यक है कि हम इन चारों सोपानों के जो तीन तीन प्रकार हैं , सात्विक, राजसी और तामसिक उनके लक्षणों को समझें।

        साधना से सात्विक गुणों की वृद्धि होती है और इस हेतु जिन चार सोपानों का जिक्र किया जाता है , उनमें पहला आहार है। आहार का तातपर्य है जो हम मुख से भोजन ग्रहण करते हैं। व्यापक सन्दर्भ में आहार के  अर्थ में  वो सब कुछ आ जाते हैं जो हम ग्रहण करते हैं, फिर चाहे वह भोजन हो, श्रवण हो, दृश्य हो, विचार हो या कुछ और।
      जो व्यक्ति सात्विक प्रवृत्ति के होते हैं वे भोजन में वैसे खाद्य पदार्थ का सेवन करते हैं जो रसयुक्त, स्वादयुक्त होते हैं, जो स्वास्थवर्धक होते हैं, आयु औए बल दायक होते हैं और जिनको खा कर तृप्ति प्राप्त होती है। 
   इसी प्रकार सात्विक प्रवृत्ति के व्यक्ति उन्हीं चीजों को ग्रहण करते हैं जो मन को और विचार को शांति और सुख देते हैं तथा उनमें ऐसे गुणों को मजबूत करते हैं जिनसें उनकी प्रवृत्ति उत्तम बनी रहती है।

    राजसी प्रवृत्ति के लोग अतिमहत्वाकांक्षी होते हैं और अपनी महत्वाकांक्षा से मोहवश बंधे होते हैं सो इन महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए अत्यंत चलायमान होते हैं, हर अच्छा बुरा कर्म करने के लिए उद्द्यत होते हैं और क्रोध और लोभ युक्त होते हैं और इस हेतु हिंसा का भी मार्ग पकड़ने से नहीं हिचकते हैं। ऐसे लोग अपने स्वभाव के अनुरूप ऐसा आहार पसन्द करते हैं जो कड़वे, खट्टे, लवणयुक्त, बहुत गरम, तीखे, रूखे, दाहकारक और दुःख, चिन्ता तथा रोगों को उत्पन्न करने वाले होते हैं। और मात्र भोज्य पदार्थों में ही उनकी ऐसी रुचि नहीं होती है बल्कि हर  चीज जो वे अपने शरीर और मन के लिए ग्रहण करते हैं इसी प्रकार से कामोत्तेजक और बेचैनी देने वाले होते हैं। 

        तामसी प्रवृत्ति के लोग ज्ञान रहित, अलसी और क्रोध, मोह, निराशा युक्त होते हैं। ऐसे व्यक्ति उन्हीं चीजों को ग्रहण करना चाहते हैं जो उनके इन तामसिक वृत्तियों को बढ़ाता हो। यह बात उनके लिए भोज्य पदार्थों के साथ साथ अन्य सभी ग्राह्य चीजों पर लागू होती है यथा, बोली, विचार, गंध आदि।
     सो तामसी वृत्ति के व्यक्ति  वैसा भोजन पसन्द करते हैं जो अधपका, रसरहित, दुर्गन्धयुक्त, बासी और उच्छिष्ट है तथा जो अपवित्र भी है। इस प्रकार का भोजन आलस, प्रमाद, रुग्णता, को जन्म देने वाला होता है।
      आहार स्वभाव के अनुसार होता है, जैसी जिसकी प्रवृत्ति होती है उसी के अनुसार उसका आहार भी होता है। यँहा आहार में भोज्य/पेय पदार्थों के साथ साथ वे सभी चीजें जैसे आचार, व्यवहार, विचार, सोच, विवेक आदि से जुड़ी सभी चीजें सम्मिलित होती हैं जिनको हम ग्रहण करते हैं। सो साधना के पहले चरण में व्यक्ति अपने आहार के अनुसार अपनी प्रवृत्ति को पहचान कर अपनी प्रवृति में सुधार करता है। तामसी से राजसी और राजसी से सात्विक प्रवृति की तरफ खुद को ले जा सकता है। यह व्यक्ति के अपने वश में होता है कि वह तामसी/राजसी गुणों से स्वयं को निकाल कर सात्विक गुणों से परिपूर्ण करे और मोक्ष के रास्ते बढ़े।

          व्यक्ति के द्वारा परम् अवस्था को प्राप्त करने के लिए जिन उपायों को करना चाहिए उसके अनुसार व्यक्ति को क्रमशः तामसिक से राजसी और राजसी से सात्विक प्रवृत्तियों की ओर बढ़ना चाहिए। इस व्यक्ति को स्वयं की वर्तमान अवस्था किबफचन करना आवश्यक है और तदुपरांत उसे क्रमशः आगे बढ़ना चाहिए। क्रम में पहला सोपान आहार का है जिसे पहचान कर और उसमें आवश्यक सुधार कर व्यक्ति क्रमशः आगे बढ़ सकता है।
     दूसरा सोपान यज्ञ का है। यज्ञ का अर्थ है कि हम श्रद्धा भाव से जो कर्म करते हैं। यज्ञ भी सात्विक, राजसी और तामसिक होते हैं। 
      जो व्यक्ति सात्विक प्रवृत्ति का होता है वह जब कर्म करता है तो उसमें कर्मयोग का भाव होता है यानी वह अपनी स्थिति के अनुसार , अपने स्वधर्म के अनुसार अपने कर्म करता है। वह किसी लोभ या किसी अन्य प्रेरणा के वशीभूत होकर कर्म नहीं करता है बल्कि वह जो कर्म करता है वह इसलिए करता है कि वही कर्म करना उसके स्वाभिक प्रवृत्ति के अनुसार उसका कर्तव्य होता है। साथ ही वह कर्मफल से भी मुक्त होता है यानी वह कर्मफल से आसक्त नहीं होता है बल्कि जो भी फल प्राप्त होता है उसे वह प्रसाद भाव से स्वीकार करता है। जब वह कर्म करता है तो उसे अपने कर्म में श्रद्धा होती है , उसे विश्वास होता है। इस प्रकार से कर्म करने वाला व्यक्ति सात्विक वृत्ति का होता है और इसी को सात्विक यज्ञ कहा जा है । इस प्रकार सात्विक वृत्ति का व्यक्ति सात्विक यज्ञ करता हुआ, सात्विक कर्म करता हुआ न तो कर्म से बन्धता है न ही कर्मफल से। 
     
      राजसी प्रवृत्ति के व्यक्ति अपने कर्म और उसके फल से मोह रखते हैं। कर्म और कर्मफल से मोह के द्वारा बंधे होने के कारण उनके कर्मों में लोभ, ईर्ष्या, क्रोध, हिंसा आदि का वास होता है और वे जब भी कर्म करते हैं कर्मफल को लक्षित कर ही करते हैं। इसीलिए उनके कर्मों में पाखण्ड अथवा दम्भ दिखता है और यही क्रम राजसी यज्ञ कहे जाते हैं। वे लोक कल्याण का भी कोई कार्य करेंगे तो दिखावेंगे कि वे काम तो लोक कल्याण का कर रहें हैं किन्तु वास्तव में उस कर्म के पीछे उनकी मंशा होती है कि उनका यश बढ़े और इससे कुछ भौतिक लाभ भी होता रहे जो स्पष्टतः पाखण्ड है क्योंकि उनका लोक कल्याणकारी कार्य तो दिखावे के लिए है और असल उद्देश्य तो यश कमाना है। इसी प्रकार ऐसे लोग चूँकि अपनी स्वाभाविक वृत्ति के अनुसार कोई लोककल्याणकारी कार्य तो कर नहीं रहे हैं सो ये अहंकार पूर्वक प्रचार करते और करवाते हैं कि वे इतने परोपकारी हैं। इसी प्रकार ऐसे व्यक्ति  लो जब लक्षित हासिल नहीं होता तो कई तरह का प्रपंच और हिंसा करने से भी नहीं हिचकते हैं। ये लोग साधन की शुचिता पर नहीं जाते हैं।

          और जब व्यक्ति बिना किसी नियम कायदे के मनमानी ढंग से काम करे, बिना कृतज्ञता के, अर्थात बिना अपने परिवेश के अनुगृहीत हुए-(किसी कार्य को करने में कई लोगों का सहयोग होता है किंतु उनके प्रति बिना अनुगृहीत हुए कर्म करना), सारे उपलब्धियों का श्रेय स्वयं ले ले, बिना कर्म के मर्म के समझे, बिना कर्म में श्रद्धा/विश्वास के कर्मों को करे तो इस कर्म को तामसिक कर्म कहा जाता है।

        आहार और यज्ञ-कर्म के पश्चात तीसरा सोपान तप का होता है । तप का अर्थ है पूरी चेष्टा के साथ अपनी समस्त एकाग्रता को एक जगह लक्षित कर अपनी समस्त ऊर्जा को एक विशेष उद्देश्य की प्राप्ति के लिए लगाना। इसमें विचलन के लिए कोई स्थान नहीं होता है। यह तप तीन स्तरों पर किया जाता है , शरीर, वाणी और मन के स्तर पर जिन्हें क्रमशः शारीरिक, वाचिक और मानसिक तप कहा जाता है और ये तीन तप में से प्रत्येक तप सात्विक, राजसिक और तामसिक प्रवृत्ति वाले होते हैं।
         शरीर सम्बंधित तप में शरीर को सम्पूर्ण एकाग्रता के साथ उसकी समस्त चेष्टाओं का केंद्र एक रखा जाता है और  शरीर को , उसके सभी अंगों को एक तारतम्य में रखते हुए यज्ञ कर्मों में लगाया जाता है यानी सम्पूर्ण शरीर को अपने गुरुजनों, (यहाँ 'गुरु' शब्द से माता, पिता, आचार्य और वृद्ध एवं अपने से जो किसी प्रकार भी बड़े हों, उन सबको समझना चाहिए।) , विद्वान जनों, की सेवा में लगाना चाहिए। यही सेवा उनकी पूजा है। यह सेवा पूर्ण समर्पण के साथ, बिना किसी प्रतिदान या बिना किसी अपेक्षा के , बिना किसी भेद और लालच के , शरीर को वासनाओं से बचाते हुए और बिना कोई हिंसा किये किये जाने चाहिए। जब शरीर की चेष्टाएँ इन सब से परिपूर्ण होती हैं , जब शरीर इन सब के साथ एकाग्र भाव से सेवा रत हो तब कहा जाता है कि व्यक्ति शरीर सम्बंधित तप कर रहा है। इस प्रकार स्पष्ट है कि जब व्यक्ति अपने कल्याण की कामना करता है , जब व्यक्ति मोक्ष की अपेक्षा करता है, जब व्यक्ति इस तरह के लक्ष्य विशेष को हासिल करना चाहता है तब उसे सबसे पहले अपनी शारीरिक चेष्टाओं से उस लक्ष्य के प्रति समर्पित होना होता है और शरीर से एकाग्र , संयमित और अहिंसक होकर यज्ञ कर्मों में प्रवृत्त होना होता है।

शरीर के पश्चात वाणी सम्बन्धी तप आता है जो शारीरिक तप से ज्यादा सूक्ष्म है। वाणी के द्वारा व्यक्ति स्वयं को अभिव्यक्त करता है और इस प्रकार वाणी व्यक्ति के मन, बुद्धि, विवेक की अभिव्यक्ति है। इसके साथ ही वाणी मन, बुद्धि और विवेक को प्रभावित भी करती है। जब भी व्यक्ति कुछ भी बोलने के लिए उद्द्यत होता है तो उसके पूर्व उसके मन में उसकी बुद्धि और विवेक के अनुरूप विचार जन्म लेते हैं और भावनाओं का प्रवाह होता है और वही सब व्यक्ति की वाणी से अभिव्यक्त होते हैं। जैसे यदि आप किसी को गाली देते हैं तो उसके पूर्व आपके अंदर उस व्यक्ति/स्थिति के विरुद्ध क्रोध और घृणा के भाव जन्म लेते हैं जो आपको विचलित करते हैं, उद्वेलित करते हैं जिसके अधीन होकर आपका विवेक दिग्भ्रमित होता है और बुद्धि भटकती है। नतीजन आप कटु वचन बोलते हैं। फिर ये कटु वचन जो सुनता है उसका भी साम्य विचलित होता है और वह भी आवेश अथवा अवसाद के भाव में आ जाता है। इसके ठीक विपरीत प्रभाव मृदु वचन के होते हैं। इसी लिए वाणी के सयम को वाचिक तप का दर्जा दिया गया है।
           वाचिक तप में वाणी ऐसी होनी चाहिए कि वह उद्वेग न पैदा करे, सत्य हो, प्रिय हो, हितकारी हो। इन चारों का सदा मिश्रण करना और उनका सही सही प्रयोग करना हमेशा, हर स्थिति में सरल नहीं होता है सो यह उच्च स्तर के स्वध्याय और अभ्यास से आता है। हम देखते हैं कि अक्सर इन चार तत्वों के तालमेल के अभाव में हम परिस्थितियों से प्रभावित होकर अनाप शनाप बोल जाते हैं लेकिन यदि उच्च स्तर के ज्ञान का अभ्यास पूर्वक स्वध्याय किया जाय, तो हमारी वाणी में सत्य भी होगा, वह प्रिय ढंग से अभिव्यक्त भी होगी, उसमें सामने वाले का हित भी समाहित होगा और वह न तो बोलने वाले और न सुनने वाले में उद्वेग का संचार ही करेगी।

मन के शुद्धिकरण की प्रक्रिया को मानसिक तप कहते हैं। तप यानी तपाना अथवा तपना अर्थात ऊष्मा का संचरण करना। इस संचरण से मन का  शुद्धिकरण होता है। यह कैसे होता है?
 मन सम्बन्धी तप का तातपर्य है कि मन में प्रसन्नता हो, साम्य स्थिति हो, गूढनेस का भाव हो, मन का निग्रह हो यानी मन पर इन्द्रियों का अधिपत्य न हो, दृष्टिकोण में कोई पतित भाव न हो।
    मन शांत हो, प्रसन्न हो। यह कैसे होगा? यह सम्भव होता है स्वध्याय से, भले लोगों की संगति से, उनकी बातों के अनुसरण से, स्वचिन्तन से। प्रत्येक व्यक्ति अपने मन की अवस्था के लिए स्वयं उत्तरदायी होता है। यदि मन हर बाहरी कारकों से प्रभावित होता रहे तो फिर मन की चंचलता मन को शांत, सौम्य और प्रसन्न नहीं बनने दे सकती है। मन का बहुत ही महत्व है क्योंकि हमारा संसार हमारे मब से हीं हमें समझ में आता है। मन हीं वह महान सारथी है जो हमें सही रास्ते पर भी ले जाता है और वही हमें गलत रास्ते पर भी ले जाता है। मन के हारे हार है, मन के जीते जीत। सो मन को वश में रखना सबसे जरूरी है। मन से हीं सद्विचार निकलते हैं और दुर्विचार भी। यदि मन नियंत्रित है तो सद्विचारों का आगमन मन में होता है और यदि अनियंत्रित है तो फिर दुर्विचार हमें गलत रास्ते पर ले कर चले जाते हैं। हर विचार कर्म में उतरने के पहले मन में आता है। सो यदि मन में अच्छे विचार आएं तो कर्म भी अच्छा होगा हीं और यदि मन में गलत विचार आते हैं तो कर्म भी गलत हीं होंगे। जैसे ही मन में कोई बुरा विचार आता है, मन उद्वेलित हो उठता है, ऐसा लगता है मानो कोई तूफान सा चल रहा हो मन में। बेचैनी का जन्म होता है और मन चंचल भी हो उठता है। क्रोध, लोभ, ईर्ष्या, हिंसा, बदले की भावना, अनाचार, वासना आदि ऐसे ही विचार हैं जो मन को उद्वेलित कर देते हैं। जिन विचारों से मन उद्वेलित होता है वे विचार मन को अशांत कर देते हैं, और उस स्थिति में हमारे कर्म भी उत्तेजना वाले ही होते हैं। इसके विपरीत ऐसे विचार भी होते हैं जिनसे मन में प्रसन्नता, प्रफुल्लता, शांति की स्थिति आती है और तब मन से संचालित हमारे कर्म भी संयत होते हैं। सो यदि कर्मों को बांधना है, सद्कर्म के मार्ग पर चलना है तो सबसे पहले मन को काबू में करना सीखें। 
प्रसन्नता का कोई कारण नहीं होना चाहिए। मात्र कर्म को कर्मयोग के माध्यम से करने से मन को प्रसन्नता मिलती है। इस मन की प्रसन्नता की कोई शर्त नहीं होती। सो कर्मों को करने के भाव को कर्मयोग में अधिष्ठापित रखें। 
    मन की यह अवस्था में उद्वेग नहीं होता, उत्तेजना नहीं होती बल्कि इसमें असीम शांति होती है जो ध्यान की अवस्था से आती है। 
       मन में अच्छे विचारों का प्रवाह मन को सौम्य बनाते हैं। इसके लिए सचेत होकर विचारों का चयन करना होता है। इसकी झलक व्यक्ति के वाह्य अभिव्यक्ति से मिल जाती है। ऐसे व्यक्ति शांत, प्रसन्न , एकाग्र अभिव्यक्ति का होता है न कि बाहरी कारकों से बार बार विचलित होते रहता है। यह उसके हृदय के अच्छे विचारों के कारण होता है। 
   मन का मौन भी मानसिक तप का अनिवार्य भाग है। मन को शान्त रखना होता है अर्थात मन में विचारों के अनावश्यक प्रवाह को रोकना होता है। मन निरन्तर वार्ता की अवस्था में रहता है। किंतु जब मन को स्वयं पर केंद्रित करते हैं तो शनैः शनैः शांत होते जाता है। मन के उद्वेग को, मन के अतीत और भविष्य में विचरने की आदत को रखना होता है और यह अवस्था ध्यान से आती है। 
     मन को भटकाने का कार्य हमारी इन्द्रियाँ करती हैं जो हमारा सम्पर्क बाहरी संसार से कराती हैं। सो मन का निग्रह अनिवार्य है। संसार से हमारा संम्पर्क हमारी इंद्रियों के माध्यम से होता है। आँख, कान, नाक, जिव्हा और त्वचा से हम संसार के सम्पर्क में आते है  और इन सम्पर्कों के कारण ही हम प्रतिक्रिया देते है । यही प्रतिक्रिया विकार को जन्म देती है। जैसे किसी का स्पर्श हमें। ममत्व या वासना देता है। फिर उस ममत्व या वासना से सम्बद्धता के कारण हम उस सम्पर्क को अधिक से अधिक चाहने लगते हैं। इससे लोभ उतपन्न होता है और लोभ की पूर्ति के लिए हम येन केन प्रकारेण प्रयास करते हैं। इस कारण से हम गलत मार्ग पर भी चल देते हैं। इसी प्रकार कोई बात हम सुनते हैं। मान लीजिये कि हमने कोई शब्द सुना। सुनते ही मन ने उस शब्द का विश्लेषण कर पहचाना कि यह शब्द गाली का है। बस क्या है , हम उस शब्द की प्रतिक्रिया में। गुस्से में आते हैं। फिर हम भी गाली देते हैं या हिंसा करते हैं या बल नही है तो निराश होकर रह जाते हैं।
       इस प्रकार ध्यान हमारी मदद करता है कि हम पहचान सकें कि किस प्रकार सम्बद्धता के कारण हम प्रतिक्रिया कर देते हैं और मन में विकारों को जन्म लेने देते हैं। ये विकार हमारी साम्यावस्था को विचलित कर देते हैं।

           सिर्फ प्रतिक्रिया की प्रक्रिया के दौरान ही विकारों से नहीं निपटना होता है, बल्कि यदि वास्तव में हम अपने अंदर से विकारों को समाप्त कर एक बेहतर इंसान बनना चाहते हैं तो हमें यह समझना होगा कि जब भी हम कोई कर्म करते हैं तो हमारे लिए जरुरी होता है कि हम इस बात की पर्याप्त सावधानी बरतें कि हमारे मन में वैसे कोई विकार जन्म न लें जिनसे हमारे अंदर क्रोध, ईर्ष्या, लोभ, आदि विचारों का जन्म हो। ध्यान रखे कि यदि हम किसी को गाली देने का उपक्रम करेंगे तो उस व्यक्ति को गाली देने के पूर्व हमें स्वयं के विचारों को दुषित करना होगा। इससे हम स्वयं को पहले विचलित करते हैं तभी दूसरे के प्रति विकार युक्त आचरण कर पाते हैं। यदि हम ऐसा करते हैं तो दूसरे का अहित करने के पूर्व हमें खुद का अहित करना पड़ता है जो किसी भी तरह से एक बुद्धिमानी का निर्णय नही हो सकता है।
       हमारा दृष्टिकोण भी शुद्ध होना चाहिए। जब हम अन्य के साथ समव्यव्हार में होते हैं तो हमारे अंदर क्रोध, ईर्ष्या, चिड़चिड़ापन, लोभ आदि भाव नहीं होने चाहिए यानी हमें विकारों से मुक्त होना चाहिए। की अनुभूतियों पर केंद्रित करना होता है। शांत मन से प्रकृति के नियमों को अपने ऊपर घटित होते देखना होता है। यह तब दिखता है जब हमारा ध्यान स्वयं पर शान्ति से टिक गया हो। जो अनुभूति हो रही हो बस उसका मन के स्तर से निरीक्षण करना होता है, उंसके साथ कोई छेड़ छाड़ नहीं करनी होती है। स्वयं पर केंद्रित होकर देखते रहें कि प्रकृति के नियमों के द्वारा आपके अंदर किस सत्य को प्रकट किया जा रहा है। जो प्रकट हो रहा है उसे ही देखना है। उसपर अपने किसी पूर्वाग्रह का कोई लेप नहीं चढाना है। स्वयं के बारे में प्रकट हो रही सच्चाई को उसी रूप में जानना और स्वीकारना है। मन आपका है तो फिर सच्चाई दूसरे की क्यों जानना। धर्म का आचरण हमें करना सीखना है तो फिर ध्यान में किसी अन्य को क्यों लाना, दूसरे की खासियतों से हमारा क्या भला होने वाला है। सो शांत मन से स्वयं को देखते जाना है, स्वयं के बारे में जो जो प्रकट होते जा रहा है, उसे उसी तरह , बिना किसी मिलावट के , बिना किसी अपराध बोध के देखते समझते शांत भाव से स्वीकार करना है।  बस एकाग्रता भी आती जाएगी और मन का मैल भी निकलता जाएगा। जैसे जैसे मन का मैल उतरेगा वैसे वैसे मन पर धर्माचरण का प्रभाव होते जाएगा। बिना मन का मैल हटाये, पूर्व से बैठे धूल को साफ किये धर्माचरण का प्रभाव उसपर नहीं आता है। यह अभ्यास की चीज है। एक दिन में नही होगा, बारम्बार अभ्यास से होगा।
ये जो तीन तरह के तप हैं, शारीरिक, वाचिक और मानसिक ये अलग अलग नहीं किये जाते हैं बल्कि तीनों एक दूसरे के पूरक हैं और जब व्यक्ति तप के लिए स्वयं को प्रस्तुत करता है तो इसका अर्थ है कि वह तीनों तप एक साथ कर रहा है। यदि इनमें से कोई एक नहीं किया जाता है तो फिर वह तप होता ही नहीं है। 
       तप की इस प्रक्रिया में व्यक्ति को श्रद्धा और अटूट विश्वास का होना जरूरी है। यदि यह भरोसा नहीं है कि मन, वाणी और शरीर को नियत तरीके से तपाना है तब तप नहीं हो सकता है क्योंकि तब तप के लिए जो भी श्रम किया जाता है वह निरर्थक होता है।
    और जब  व्यक्ति स्वभावतः और कर्तव्य के अधीन होकर बिना किसी फलाफल की इक्षा के तप में प्रवृत्त होता है यानी तप में प्रवृत्त व्यक्ति के मन में तप की क्रिया के प्रति कोई आसक्ति नहीं होती है बल्कि कर्तव्य भाव होता है यानी उसे प्रतीत होता है कि उसे अपने जीवन में तप कर ही आगे जाना है और इसके पीछे फल के प्रति कोई लोभ या आसक्ति नहीं होती है तो वह तप सात्विक तप कहलाता है। यानी जब तप कर्मयोग के भाव से होता है तो वह सात्विक तप होता है।

           कई बार व्यक्ति किसी लोभवश तप के लिए प्रवृत्त होता है। उसका सारा श्रम स्वयं के मान, सत्कार प्राप्त करने के लिए होता है और चाहता है कि अन्य लोग उसकी महत्ता को स्वीकार कर उसका सम्मान करें। कई बार किसी अन्य स्वार्थ सिद्धि उसका लक्ष्य होता है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति सदा ही फल के लिए चिंतित बना रहता है। इस प्रकार के तप को राजस तप कहा जाता है जिसमें मन की शुद्धि का स्थान नहीं होता है, बल्कि इसके उलट मन में स्वार्थ और लोभ की अशुद्धि बनी रहती है सो इससे मिलने वाला फल भी क्षणिक प्रभाव और क्षणिक सुख देने वाला होता है।

           सात्विक तप में तपस्वी का लक्ष्य साधना द्वारा स्वयं का शुद्धिकरण करना होता है। सात्विक तप में कर्मफल के प्रति कोई आसक्ति नहीं होती है किंतु राजस तप में व्यक्ति साधना के द्वारा स्वयं का मान सम्मान, स्वयं की प्रसिद्धि और स्वयं का प्रभाव लोगों पर बढ़ाना चाहता है सो कर्मफल के प्रति उसकी गहरी आसक्ति होती है। इन सब के विपरीत तामसिक तप में व्यक्ति का उद्देश्य न तो स्वयं का शुद्धिकरण होता है और न ही स्वयं का महत्व बढाने की लालसा बल्कि तामसिक तपस में व्यकि मूर्खतावश स्वयं को कष्ट देता है , मन वचन और शरीर तीनों स्तर पर ताकि वह दूसरे को हानि पहुँचा सके। इस तामसिक तप में व्यक्ति अपने मन , वाणी और शरीर से ऐसे कर्म करता है जो भले श्रम साध्य हों लेकिन वे स्वयं को तो पीड़ा देते ही हैं उनका उद्देश्य दूसरे के साथ छल भाव से उनकी हानि करना होता है। ऐसे तप से किसी का भला नहीं होता है बल्कि सभी का नुकसान ही किया जाता है।

          अपने श्रम से अर्जित की गई सम्पत्ति का एक अंश व्यक्ति को निश्चित ही सुपात्र को दान में देना चाहिए। यह साधना का चौथा सोपान है। व्यक्ति का अर्जन मात्र उसी के श्रम का परिणाम नहीं होता है बल्कि उसमें उसके समाज और परिवेश का भी महत्वपूर्ण योगदान होता है। व्यक्ति समाज के प्रति अपने इस ऋण को दान के माध्यम से चुकाता है। 
        जब व्यक्ति बिना किसी प्रतिदान की अपेक्षा किये यानी बिना बदले में किसी लाभ की अपेक्षा किये दान दे तो वही श्रेष्ठ है क्योंकि तब दान व्यापार नहीं है। लेकिन दान देते समय इस बात का ध्यान दिया जाना चाहिए कि दान देने का समय, स्थान और जिसे दान दिया जा रहा है वे उपयुक्त हैं अन्यथा दान का परिणाम दान प्राप्त करने अथवा/ और देने वाले  के लिए विध्वंशकारी भी हो सकता है। अगर इन सावधानियों को ध्यान में रखकर दान किया जाता है तो यह दान सात्विक होता है।   

बहुत बार दान के पीछे की मंशा लाभ या लोभ की होती है। ऐसे व्यक्ति दान इसलिए करते हैं कि उन्हें बदले में कुछ लाभ प्राप्त हो जैसे उनका परलोक सुधरे या उनको इसी संसार में यश और प्रतिष्ठा मिले, लोग उनको बड़ा आदमी समझें इत्यादि। इसी प्रकार कई बार लोभ की मंशा से भी लोग दान देते हैं जैसे चन्दा आदि देना। 
   इस प्रकार के दान में स्वार्थ की भावना होती है, बदले में कुछ पाने की इक्षा होती है सो इस प्रकार के दान से मन का शुद्धिकरण नहीं होता है क्योंकि मन हमेशा फल की प्राप्ति पर टिका हुआ होता है और बेचैन रहता है। इसे राजस दान कहा जाता है।

       दान का तीसरा स्वरूप है तामसी दान। सात्विक दान कर्तव्य के रूप में किया जाता है बिना किसी अपेक्षा के। सात्विक दान के पीछे की भावना यह होती है कि हमें अपने किसी लाभ के लोभ से नहीं और न हीं किसी की हानि की लालसा से दान करना है बल्कि हमें दान करना ही है क्योंकि ऐसा करना ही कर्तव्य है।राजसी दान अपने लाभ के लोभ से किया जाता है । लेकिन जब व्यक्ति के मन में खुद के लाभ के लोभ से भी बड़ा लोभ किसी की हानि का लोभ होता है तब दान के नाम पर किया गया दान कर्म तामसी दान होता है जिसमें बिना स्थान, और समय का विचार किये ही ऐसे व्यक्ति को दान दिया जाता है जो दान की वस्तु को प्राप्त करने योग्य न हो अर्थात जो दान पाकर उस दान का उपयोग अनाचार, अत्याचार को फैलाने में करे तो यह दान तामसी दान कहा जाता है।

         व्यक्ति के कल्याणार्थ जिन चार सोपानों की चर्चा की गई है उनको सात्विक, राजसी और तामसिक भाव में बाँटा गया है । अब प्रश्न उठता है कि वो कौन सी विधि है जिस विधि से कर्म को करने से ये कर्म सात्विक भाव के होते हैं। करने योग्य इन चारों कर्मों को सात्विक भाव से करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। लेकिन मोक्ष मृत्यु उपरांत प्राप्त होने वाली स्थिति नहीं है और न हीं कर्मकांडों के आश्रय की अवस्था है। वास्तविकता यह है कि मोक्ष बन्धनों से मुक्ति की अवस्था की स्थिति है। व्यक्ति स्वयं को शरीर, मन , बुद्धि , विवेक से बना हुआ समझता है और इस स्थिति में व्यक्ति अपने शरीर के आयतन और उसके पदार्थ, और बुद्धि एवं विवेक की सीमा के अधीन अपने को उतना भर ही समझता है जितने तक उसका ईगो उसे समझाता है। लेकिन यह तथ्य सत्य के परे है। दरअसल प्रत्येक जीव परमात्मा का अंश है। प्रत्येक जीव अपरिमित परमात्मा की ही अभिव्यक्ति भर होता है। जब व्यक्ति अपनी सीमा से बाहर निकलकर अपरिमित परमात्मा से युक्त होता है तब वह अपनी वास्तविक स्थिति को प्राप्त होता है और यह वास्तविक स्थिति शरीर, मन, बुद्धि, विवेक और ईगो की सीमा को समाप्त कर देने से प्राप्त होती है। इस अवस्था में व्यक्ति समस्त भेदो को समाप्त कर समस्त चर-अचर संसार को परमात्मा का स्वरूप समझकर उसके साथ एकाकार हो जाता है। लेकिन यह पहेली अभी भी बनी हुई है कि बन्धन कटे तो कैसे कटे।
       इस हेतु कर्म करने की विधि को ईश्वर के नाम से जोड़कर समझाया गया है। यह है ॐ तत सत। जब भी कोई कर्म प्रारम्भ करें ॐ के रूप में ईश्वर का स्मरण करें। यानी व्यक्ति को चाहिए कि कर्म को वह ईश्वरीय निदेश समझ कर करे न कि स्वयं की सन्तुष्टि हेतु करे। जब इस भाव से व्यक्ति कर्म में प्रवृत्त होता है तो उसे कर्म करने का मान नहीं होता है, उसके कर्ता होने का दम्भ जाते रहता है और कर्तव्य भाव से कर्म में वह प्रवृत्त होता है। समस्त संसार को ईश्वरीय अंश के रूप में समझने वाले के लिए कोई भी कर्म स्वार्थ सिद्धि का साधन नहीं रह जाता है और ॐ यानी परमात्मा का स्मरण कर कर्म प्रारम्भ करने से यही भाव कर्म में परिलक्षित भी होता है। इस स्थिति में व्यक्ति कर्मों में सात्विक भाव से प्रवेश करता है। जब व्यक्ति कर्म में यानी इन चार में से किसी भी क्रिया को करने लगता है तो उस समय भी उसे इसी परमात्मा का यानी तत् का स्मरण होना चाहिए। अगर स्मरण में ईश्वर की  भवना बैठी है तो फिर कर्म करने के भाव में यह सत्य उद्घाटित होता है कि हम जो कर रहें हैं उसे ईश्वर को समर्पित करने के उद्देश्य से कर रहें हैं। जब परमात्मा को समर्पित करने के भाव से व्यक्ति कर्म करता है तो उसे ज्ञात होता है कि कर्मों की शुचिता बनाये रखनी है और उनको किसी भी राजसी या तामसी भाव से भ्रष्ट नहीं होने देना है। तब उसके कर्म सेवा बन जाते हैं। ऐसा इसीलिए होता है क्योंकि कर्तव्यबोध और ईश्वरीय निदेश समझकर कर्मों को करने से और कर्मों को ईश्वर के प्रति समर्पित करने के भाव से कर्म सात्विक गुणों को लिए सम्पन्न होते हैं।
      यह सम्पूर्ण संसार ईश्वर का ही अंश है सो कर्म में प्रवृत्त व्यक्ति के भाव में संसार सत्यभाव में अवस्थिय होता है और न केवल सत भाव में होता है बल्कि शुभ भी होता है। प्रत्येक कण, प्रत्येक घड़ी शुभ है क्योंकि सब में परमात्मा का अंश है। तो फिर कर्म करने में समस्त सजीव और निर्जीव के प्रति व्यक्ति का भाव निश्चित ही सद्भाव का होना ही चाहिए, तभी उसके कर्म , चाहे वो यज्ञ हो, तप हो, दान हो अच्छे माने जाएंगे। कर्म करने के इसी भाव के कारण कर्म , चाहे जो कर्म हो सात्विक हो पाता है और इस भाव के साथ कोई भी व्यक्ति चाहे वह किसी भी श्रेणी का हो कर के अपनी सीमित सीमा को तोड़कर अपरिमित ब्रह्म में युक्त हो सकता है।
      इस प्रकार हम देखते हैं कि जो कर्म नियत हैं अर्थात जिनको करना ही हमारा कर्तव्य है, उन कर्मों को ईश्वरीय निदेश मानकर, ईश्वर को समर्पित कर , उनको  सत अर्थात ईश्वर का ही अंश समझकर और उनको शुभ मानते हुए  उनके प्रति सद्भाव रखकर  और साथ ही बिना उन कर्मों और कर्मफल से सम्बद्ध हुए  करने से वे कर्म सात्विक कहे जाते हैं और उनको करने से  कोई भी व्यक्ति ब्रह्म से युक्त हो सकता है।
     इस प्रकार प्रतेक कर्म का कर्मफल उसके करने की श्रद्धा यानी ईश्वर पर भरोसा रखकर करने पर निर्भर करती है। सो कर्म को और कर्मफल को ईश्वरीय निदेश और प्रसाद समझकर करने से उसमें सात्विकता आती ही है और यही मार्ग है सात्विक भाव से कर्म करने का ।
      बिना श्रद्धा के किया हुआ हवन, दिया हुआ दान एवं तपा हुआ तप और जो कुछ भी किया हुआ शुभ कर्म है- वह समस्त 'असत्‌'- इस प्रकार कहा जाता है, इसलिए वह न तो इस लोक में लाभदायक है और न मरने के बाद ही।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्री कृष्णार्जुनसंवादे श्रद्धात्रयविभागयोगो नाम सप्तदशोऽध्याय : ।। 17।।



         




      
      

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