श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 परिचय

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 परिचय

"मैं कौन हूँ?"
यह प्रश्न बहुत ही जटिल है और इसी का उत्तर देती है श्रीमद्भागवद्गीता। सोलह पाठ खत्म होते होते श्रीमद्भागवद्गीता की मूल शिक्षाओं का प्रशिक्षण पूरा हो गया है। इन सोलह अध्यायों में हम सीखते हैं कि , "में कौन हूँ" और यह भी सीखते हैं कि "मैं" यानी स्वयं को पाने का मार्ग क्या है।
   स्वयं को नहीं जान पाने से व्यक्ति को अपने जीवन में तो परेशानी का सामना करना ही पड़ता है, साथ ही समष्टि भी प्रभावित होती है और इस संसार का स्वरूप भी प्रभावित होता है। इस "मैं कौन हूँ" का उत्तर शास्त्रों में है। अर्थात उन महान मनीषियों के अध्ययन और उनके चिंतन में है। उनके द्वारा अनुभूत ज्ञान का संग्रह हैं शास्त्र। इन शास्त्रों के अध्ययन, श्रवण, चिंतन, मनन और उनके अभ्यास से हम जान पाते हैं कि हमारे वो मार्ग कौन से हैं जिनपर चलकर हम स्वयं को पा सकते हैं। सभी को इन शास्त्रों पर भरोसा होना चाहिए और उनपर श्रद्धा के साथ हमारा अध्ययन होना चाहिए।
   स्वयं के सम्बंध में बोध के लिए अनिवार्य है कि हमारे मन का भ्रम दूर हो और मस्तिष्क शांत और निर्लेप अवस्था में रहे। मन का शांत होना ही आत्मावलोकन की पहली सीढ़ी होती है। मन की शांति से तात्पर्य यह नहीं है कि मन सो जाएं। बल्कि पूर्ण जागृत अवस्था में मन का शांत होना जरूरी है। यह अवस्था ही ध्यान कहलाती है जब मन शांत होता है, सभी भ्रमों से , सभी बन्धनों से, सभी परिणामों से , मुक्त होकर मात्र स्वयं पर केंद्रित होता है। 
      तो क्या ध्यान की यह अवस्था सहसा ही प्राप्त की जा सकती है । जी नहीं। इस ध्यान की अवस्था तक की यात्रा कर्मयोग, भक्तियोग और ज्ञानयोग से होते हुए होती है। इनमें से किसी को त्यागने से ध्यान तक पहुँचना सम्भव नहीं होता है। इन्हीं मार्गों की सम्यक जानकारी हमें शास्त्रों से और सयोग्य शिक्षकों से मिलती है। इसीलिए सोलहवें अध्याय के अंत में शस्त्र रीति से व्यवहार करने पर बल दिया गया है। यह शास्त्र रीति पारिवारिक परम्पराओं और सांसारिक चलन से इतर योग के मूल तत्व से हमें अवगत कराती ताकि हम इन मार्गों पर चलकर ध्यान की अवस्था तक पहुँच सकें जँहा हम समझ जाते हैं कि हम कौन हैं , और इस दृश्य और अदृश्य संसार से हमारा क्या सम्बन्ध है।

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