श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 24
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 24
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥ ।।24।।
इससे तेरे लिए इस कर्तव्य और अकर्तव्य की व्यवस्था में शास्त्र ही प्रमाण है। ऐसा जानकर तू शास्त्र विधि से नियत कर्म ही करने योग्य है।
व्यक्ति के लिए कौन सा कर्म करने योग्य है और कौन सा नहीं इसका वर्णन श्रीकृष्ण के द्वारा अर्जुन के भ्रम को दूर करने हेतु दूसरे अध्याय में विस्तृत रूप से किया गया है। करने वाले कर्म ऐसे हैं जिनको करने से व्यक्ति स्वयं का तो भला करता हीं है साथ ही समाज का भी भला करता है। इन्हीं कर्मों को यँहा सोलहवें अध्याय में दैवी सम्पदा कहा गया है। इन कर्मों को करने से व्यक्ति भ्रम से दूर होता है और मोह, लोभ, क्रोध, ईर्ष्या आदि के वशीभूत होकर अपने कर्तव्यों को नहीं करता है। इस मार्ग पर चलने से उसका मन स्वक्ष होता है, बुद्धि और विवेक भी बिना किसी बाहरी दबाव के सही निर्णय लेने की स्थिति में होते हैं। ऐसा करने से व्यक्ति जिस मार्ग पर अग्रसर होता है वही उसकी मुक्ति का मार्ग है अर्थात उसके वे गुण जिनसे उसकी अज्ञानता समाप्त होती है, उसे मोह, भ्रम, लोभ, क्रोध, ईर्ष्या आदि से मुक्ति मिलती है वे उसे जो स्थिति देते हैं उसे ही परम् पद कहते हैं जिसमें व्यक्ति किसी अन्य बाहरी प्रभाव से कुछ नहीं करता है बल्कि वही करता है जो उसका उसकी स्थिति में उसका कर्म हैं।
इसके विपरीत नहीं करने वाले कर्म वे हैं जो आसुरी सम्पदाओं के प्रभाव में किये जाते हैं अर्थात जो माया, मोह, क्रोध, लोभ आदि के वश में होकर किये जाते हैं। इन आसुरी गुणों के प्रभाव में व्यक्ति अपने कर्तव्य के अनुसार निर्णय नहीं लेता हस बल्कि वह इन गुणों के प्रभाव वश निर्णय लेता है जो उसे न और न हीं समाज को सुख और शांति देते हैं।
इन बातों की समझ व्यक्ति में जिन माध्यमों से मिलती है उन्हें शास्त्र कहा गया है। व्यक्ति के ज्ञान को महान पुस्तकों में संजो कर रखा गया होता है, जिनका अध्ययन करने, श्रवण करने, उनपर विचार और मंथन करने और उनको आत्मसात करने और उनको व्यवहार में लाने से व्यक्ति सन्मार्गी कर्म जो उसके कर्तव्य के अनुरूप होते हैं करता है। सो हमें अपने कर्तव्य निर्वहन के लिए यही मार्ग चुनना चहिये।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्नीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन दैवासुरसम्पद्विभागयोगो नाम षोडशोऽध्यायः
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