श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 22 एवं 23
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 22 एवं 23
एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः।
आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम्॥ ।।22।।
यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः।
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्॥ ।।23।।
हे अर्जुन! इन तीनों नरक के द्वारों से मुक्त पुरुष अपने कल्याण का आचरण करता है इससे वह परमगति को जाता है अर्थात् मुझको प्राप्त हो जाता है।
जो पुरुष शास्त्र विधि को त्यागकर अपनी इच्छा से मनमाना आचरण करता है, वह न सिद्धि को प्राप्त होता है, न परमगति को और न सुख को ही।
श्रीमद्भागवद्गीता में व्यक्ति को यह समझाया गया है कि किस तरह की प्रवृत्ति होने और किस प्रकार का आचरण करने से व्यक्ति को परम् पद प्राप्त होता है अर्थात उसे मुक्ति मिलती है और किस प्रकार का आचरण करने और कौन सी प्रवृत्ति होने पर व्यक्ति का पतन होता है। पहले को दैवी सम्पद कहा गया है जो परम् पद और सुख देने वाला होता है जबकि दूसरे को आसुरी सम्पद कहा गया है जिसकी वजह से न तो सुख और शांति ही मिलती है और न ही उसका कल्याण ही होता है। यानी आसुरी सम्पद के वाहक को न तो राम मिलते हैं और न ही माया। सुख और शांति के अभाव में व्यक्ति का पतन निश्चित हो जाता है। तमाम तरह के भौतिक संसाधनों को इकट्ठा कर लेने के बाद भी, हर तरह से , यानी धन, बल, जन से परिपूर्ण हो कर भी जरूरी नही कि व्यक्ति के मन में सुख हो हीं, शांति हो हीं। आखिर ऐसा होता क्यों है?
श्रीमद्भागवद्गीता में बारम्बार इसे समझाया गया है। मूल रूप से द्वितीय अध्याय में इसे सर्वप्रथम निरूपित किया गया है और सोलहवें अध्याय में फिर से कहा गया है कि काम, क्रोध और लोभ नरक के द्वार हैं यानी इनके होने से व्यक्ति का पतन होता है और व्यक्ति नीच कोटि का बन जाता है। इन नरकगामी आसुरी सम्पदाओं के कारण व्यक्ति का विवेक मर जाता है, उसके भाव कलुषित हो जाते हैं और कर्म दुराचारी। इसे विस्तृत रूप से समझने के लिए हम द्वितीय अध्याय के प्रासंगिक अंश को फिर से देखते हैं जो निम्न प्रकार से है--
"" अब श्रीकृष्ण इन्द्रियों में आसक्ति के कारण व्यक्ति के पतन की प्रक्रिया को भी समझाते हैं। उन्होंने बहुत ही आसान तरीके से समझाया है कि इन्द्रियों के राग रस में डूबे रहने के कारण किस प्रकार मनुष्य का पतन होता है। यह बहुत ही स्वाभाविक सी बात है कि हम जिस चीज के बारे में बहुत चिंतन करते हैं उनके प्रति हमारे मन में आसक्ति का भाव जन्म लेता है। वाह्य संसार की अनुभूति इन्द्रियों यानी सेंसेज के माध्यम से ही होती है । खुद से बाहर की विषयों वस्तुओं और व्यक्तियों में जब हम आनंद और सुख की खोज करते हैं तो हम निरन्तर उनकी ही सोच में लगे रहते हैं, व यदि हम उन अनुभूतियों में डूबते हैं तो उनके प्रति एक लगाव भी उत्पन्न होता है। हम उस विषय, वस्तु, व्यक्ति के बारे में जिनसे हम सुख और आनंद की अपेक्षा करते हैं खुश और प्रसन्न होते रहते हैं। जैसे यदि हमको लगता है कि फलाना पद मिल जाने से अथवा फलाना वस्तु मिल जाने से अथवा फलाना व्यक्ति के मिल जाने से अथवा इतना धन हो जाने से हमें बहुत आनंद मिलेगा तो हम निरन्तर उसी के बारे में चिंतन करते रहते हैं। यँहा तक कि उसके वास्तविक प्राप्ति के पूर्व ही हम मात्र उसके मिलने की कल्पना कर के ही खुश होते रहते हैं और उसी में डूबे रहते हैं, उसी के चिंतन और ध्यान में लगे रहते हैं।
जिन विषयों पर बहुत चिंतन करते हैं उनसे लगाव हो जाता है। इस लगाव से उन विषयों के प्रति कामना का जन्म होता है हमारे मब में । हम अपनी खुशी, अपने आनंद, और सुख के लिए उन इक्षित वस्तुओं , विषयों आदि पर निर्भर हो जाते हैं और उनके बिना हम अपने सुख की कल्पना भी नहीं कर पाते। हमें लगता है कि यदि वो हमें नहीं मिला तो हस्रा अस्तित्व ही मिट जाएगा। हम इस हद तक उसमें दुबे रहते हैं कि जागृत से लेकर सुप्त अवस्था तक बिना सचेष्ट प्रयास के ही उनका ध्यान करते रहते हैं। हमें पता भी नहीं चलता कि कब हम उसकी सोच में , उसके ध्यान में डूब गए और दुब जाते हैं। हमारा ध्यान यानी MEDITATION उसी में लग जाता है क्योंकि हमारा उसी में लगाव होता है। हम उसी वस्तु, विषय, व्यक्ति में समाधिस्थ हो जाते हैं क्योकि उसी में हमें सुख मिलता है।
जब किसी विषय, वस्तु या व्यक्ति से आकर्षित होकर उसी में डूब जाते हैं तो उस विषय, वस्तु या व्यक्ति पर अपनी अधिकारिकता की भी इक्षा करते हैं, चाहते है कि वह हमारे पास हो हमेशा, हमारा ही अधिकार रहे उसपर। इस कामना का क्या परिणाम होता है, अब हम इसे समझने की कोशिश करें
1.मोह
हम जिसके प्रति कामना रखते हैं उससे बन्ध जाते हैं, उसके बिना हम अपनी कल्पना भी नहीं करते, उसके बिना हम सुख की उम्मीद भी नहीं करते। इससे हमें उस विषय, वस्तु, व्यक्ति, घटना आदि के प्रति मोह हो जाता है।
2.लोभ
यदि हमारी कामना पूरी होती है तो हम उसमें और उलझते हैं, चाहते हैं कि ये सुख हमें हमेशा प्राप्त होता रहे। तब हम अपनी कामना पूर्ति के लिए अपने अतीत, वर्तमान और भविष्य तीनों से बन्ध जाते हैं, हम स्वयम इनसे मुक्त नहीं होना चाहते। यह बन्धन हमें हर वो जायज नाजयाज कर्म करते हैं जिससे कामना पूर्ति हो सके। यही लोभ है, अधिक से अधिक के लिए , बार बार प्राप्ति के लिए लोभ हमें प्रेरित करता है, सो काम का बन्धन, उसकी पूर्ति लोभ को जन्म देता है। और मिल जाये, बार बार मिल जाये।
3.क्रोध
यदि कामना पूर्ति की दिशा में बाधा उत्पन्न होती है तो पहले चिड़चिड़ापन होता है हमारे मन में जो बढ़ते बढ़ते क्रोध में बदल जाता है। कामना और उसकी पूर्ति के बीच जितना गहरा लगाव होता है अर्थात जिस चीज को हम जितनी तीव्रता से प्राप्त करना चाहते हैं उसकी पूर्ति में अत्यल्प बाधा पर भी हम उतनी ही तीवता से प्रतिक्रिया भी देते हैं अर्थात हमारा क्रोध भी उतना ही तीव्र होता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि काम और क्रोध एक दूसरे के पूरक हो जाते हैं, जँहा काम होगा क्रोध भी स्वतः ही उपस्थित हो जाएगा। बिना क्रोध के काम हो नहीं सकता। इस क्रोध के कई रूप हैं, यथा क्रोध, निराशा, चिड़चिड़ाहट, झल्लाहट, घृणा आदि। इस प्रकार काम कई तरह के नकारात्मक भावों को जन्म देता है।
4.ईष्या
इस कामना के अन्य परिणाम भी होते हैं।
यदि हमारी कामना की पूर्ति तो हो गई लेकिन किसी अन्य की कामना की पूर्ति अधिक हुई तो भी हमें समस्या होती है, हमारे अंदर उस व्यक्ति के जिसकी कामना की अधिक पूर्ति हुई है उससे ईष्या होती है हमें कि उसे अधिक क्यों मिला। हम जिसके जितने करीब होते हैं उसके प्रति हमारी ईर्ष्या की भावना भी उतनी ही तीव्र होती है।
5.
घमंड.यदि हमारी कामना की अन्य की कामना से अधिक पूर्ति होती है तो हमारे अंदर घमंड का भाव आता है। हमने उससे ज्यादा पा लिया।
वस्तुतः घमंड और ईर्ष्या साथ साथ चलते हैं। एक तरफ वैसे लोग होते हैं जिनकी हमसे अधिक कामना की पूर्ति हुई होती है, उनसे हम ईर्ष्या करते हैं, दूसरी तरफ वे लोग होते हैं जिनसे अधिक हमारी कामना की पूर्ति हुई होती है, हम उनके प्रति अपने अंदर घमंड का भाव भी रखते हैं। इस प्रकार हम एक साथ ईर्ष्या और घमंड दोनों में जीते हैं।
इस तरह हमारे सेल्फ की यात्रा के छह प्रमुख शत्रु हैं
1.काम
2.मोह
3.क्रोध
4.लोभ
5.ईर्ष्या
6.घमंड
और ये पाँच यानी मोह, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या और घमंड पहले यानी काम की ही सन्तति होते हैं अर्थात प्रथम शत्रु काम है यानी संगत है , परिणाम का बन्धन है।
अब हम देखते हैं कि इनका परिणाम क्या निकलता है।
1.क्रोध की कई अभिव्यक्ति होती है, जैसे व्यक्ति दूसरे को हानि करने या खुद को हानि पहुँचाने की कोशिश कर सकता है , निराशा में जा सकता है, आदि। मतलब ये है कि क्रोध के समय व्यक्ति ये नहीं समझ पाता कि क्या करना सही है क्या करना गलत है और न दूसरे ही अनुमान कर पाते हैं कि क्रोधित व्यक्ति कौन सा कदम उठाएगा। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि उसकी बुद्धि मूढ़ हो जाती है, क्रोध की वजह से वह विवेक से काम नहीं कर पाता। विवेक से सोचने की क्षमता जाती रहती है।
2. क्रोध से दिग्भर्मित विवेक से स्मृति भी साथ छोड़ देती है। हम जीवन में बहुत कुछ सीखते रहते हैं, समाजिक और व्यवसायिक जीवन में हमें बहुत सारा ज्ञान मिलते रहता है जो हमारी स्मृति में सुरक्षित रहता है और उस तरह की परिस्थिति आने पर वही स्मृति हमारे सुरक्षित ज्ञान को क्रियाशील कराकर हमसे सही कार्य करा लेती है। हमने अगर सीखा है कि हमें अपने से बड़ों को प्रणाम करना चाहिए तो अगर कोई बड़ा सामने आता है तो वही स्मृति हमें प्रेरित करती है कि हम तुरत उन्हें प्रणाम करें। यदि किसी चिकित्सक ने सीखा है कि शल्यचिकित्सा कैसे की जाती है तो रोगी के बीमारी के दूर करने के लिए वह चिकित्सक अपनी उसी स्मृति के कारण उसका इलाज कर पाता है। लेकिन क्रोध की अवस्था में यह स्मृति साथ छोड़ देती है। क्रोधित मन के जेहन में सीखा हुआ ज्ञान रहता तो है लेकिन वो क्रोध से अस्थिर हुए दिमाग से बाहर आकर हमारे कार्य में नहीं बदल पाता और क्रोध की अवस्था बीतने पर याद आता है कि अरे हम तो ये जानते ही थे, हमें याद ही नहीं आया। इस प्रकार क्रोध की अवस्था में विवेक और स्मृति दोनों साथ छोड़ देते हैं जिसके कारण हम सही काम नहीं कर पाते।
3.क्रोध से नष्ट स्मृति व्यक्ति के बुद्धि को समाप्त कर देता है। बुद्धि और विवेक स्मृति के आधार पर ही काम करते हैं। स्मृति में संचित ज्ञान यदि समय पर कार्यरूप में नहीं बदल पाता है तो फिर बुद्धि विवेक बेकार के हथियार हो जाते हैं। हमारे पास बहुत ज्ञान का भंडार हो सकता है लेकिन क्रोध की अवस्था में नष्ट हुए स्मृति के कारण यदि यह ज्ञान स्मृति में नहीं रह जाता है तो बुद्धि उसे कार्यरूप में नहीं बदल पाती। इस प्रकार क्रोध से मूढ़ हुए विवेक के कारण नष्ट हुई स्मृति बुद्धि का उपयोग नहीं कर पाती और सारा का सारा ज्ञान धरा का धरा रह जाता है।
4. अब जब क्रोध के कारण इस अवस्था में व्यक्ति पहुँच जाता हैं तो कोई भी लक्ष्य प्राप्त करने में असमर्थ हो जाता है और उसका पतन निश्चित हो जाता है।
इस प्रकार हम देखते कि कामना से वशीभूत व्यक्ति की क्या हालत होती है। इस तरह काम के जाल में फँसा व्यक्ति पतनशील होकर आत्मपथ से विलग हो जाता है। यही व्यक्ति अयोग्य, नीच प्रकृति का कहा जाता है। यह व्यक्ति कुछ भी करने के लायक नहीं होता है।
जीवन के प्रत्येक स्थिति में हम इसे अनुभव करते है। ऐसी स्थिति खुद से बाहर खुशी तलाशने से होती है। जब भी हम अपने सुख शांति और आनंद के लिए बाह्य वस्तुओं पर निर्भर करते रहेंगे हमारा पतन अवश्यम्भावी होगा, तरह तरह के लोभ , हिंसा, निराशा आदि बने रहेंगे। तमाम भौतिक उपलब्धि भी हमें उस स्थिति में सुख चैन नहीं दे सकेंगे। हर काल में कामनाओं से बन्धने का यही फलाफल होता है कि इंसान हमेशा नीच से नीच हरकत पर उतरते रहता है। यह बन्धन हमें जीवन में जीवन के लक्ष्यों को प्राप्त नहीं होने देता है, हम आत्मपथ से विमुख तमाम भौतिक सुख सुविधा के बावजूद दुखी और असन्तुष्ट ही रहते हैं, हमारी खुशी, और हमारे सुख क्षणिक ही रह जाते हैं।""
सो निश्चित ही इस नियत शिक्षा को त्यागकर इसके विपरीत आचरण करता है उसका पतन अवश्यम्भावी होता है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि जीवन में यदि हम सन्मार्ग पर चलना चाहते हैं, स्थाई रूप से सुख और शांति को पाना चाहते हैं तो मोह मुक्त जीवन जीने की इस शिक्षा को अवनावें, अपने अंदर के दैवी सम्पदाओं को बढ़ावें और आसुरी सम्पदाओं का दमन करते करते स्वयं को उनके प्रभाव से मुक्त कर लें। इस अवस्था में व्यक्ति का कर्म उसका कर्तव्य कर्म ही होता है। बिना मोह के, बिना बन्धन के, बिना लोभ के व्यक्ति वही कर्म करता है जो उसे अपने कर्तव्य के अनुसार करना है। फिर उसके प्रेम और संघर्ष में कोई अंतर नहीं रह जाता है क्योंकि उसका प्रेम और उसका संघर्ष दोनों किसी अपेक्षा से किये कर्म नहीं होते हैं बल्कि उसकी स्थिति के अनुसार वे ही नियत कर्म होते हैं उसके।
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