धम्मपद

मन

मन का बहुत ही महत्व है क्योंकि हमारा संसार हमारे मब से हीं हमें समझ में आता है। मन हीं वह महान सारथी है जो हमें सही रास्ते पर भी ले जाता है और वही हमें गलत रास्ते पर भी ले जाता है। मन के हारे हार है, मन के जीते जीत। सो मन को वश में रखना सबसे जरूरी है। मन से हीं सद्विचार निकलते हैं और दुर्विचार भी। यदि मन नियंत्रित है तो सद्विचारों का आगमन मन में होता है और यदि अनियंत्रित है तो फिर दुर्विचार हमें गलत रास्ते पर ले कर चले जाते हैं। हर विचार कर्म में उतरने के पहले मन में आता है। सो यदि मन में अच्छे विचार आएं तो कर्म भी अच्छा होगा हीं और यदि मन में गलत विचार आते हैं तो कर्म भी गलत हीं होंगे। जैसे ही मन में कोई बुरा विचार आता है, मन उद्वेलित हो उठता है, ऐसा लगता है मानो कोई तूफान सा चल रहा हो मन में। बेचैनी का जन्म होता है और मन चंचल भी हो उठता है। क्रोध, लोभ, ईर्ष्या, हिंसा, बदले की भावना, अनाचार, वासना आदि ऐसे ही विचार हैं जो मन को उद्वेलित कर देते हैं। जिन विचारों से मन उद्वेलित होता है वे विचार मन को अशांत कर देते हैं, और उस स्थिति में हमारे कर्म भी उत्तेजना वाले ही होते हैं। इसके विपरीत ऐसे विचार भी होते हैं जिनसे मन में प्रसन्नता, प्रफुल्लता, शांति की स्थिति आती है और तब मन से संचालित हमारे कर्म भी संयत होते हैं। सो यदि कर्मों को बांधना है, सद्कर्म के मार्ग पर चलना है तो सबसे पहले मन को काबू में करना सीखें।


वैर


हमारे जीवन में ऐसा बहुत कुछ होते रहता है जो हमारे मन के अनुकूल नहीं होता है। कई बार तो ऐसा होता है कि किसी व्यक्ति के द्वारा हमारा अपमान कर दिया जाता है अथवा हमारे लिए बुरे वचनों का प्रयोग किया जाता है अथवा हमपर क्रोध व्यक्त किया जाता है। हम अपने प्रति ऐसा गलत व्यवहार होने पर हमारे मन में उस गलत करने वाले के प्रति बैर का भाव जन्म लेता है। इस बैर के वशीभूत होकर हम भी उस गलत व्यवहार करने वाले के प्रति वैसा ही व्यवहार करना चाहते हैं। जैसे हमारे मन में ऐसी भावना आती है हमारा मन उद्वेलित हो उठता है और उस व्यक्ति को हम कुछ बोलें या करें उसके पूर्व हमारे अपने मन में ही उत्तेजना घर कर जाती है और हमारा साम्य अस्थिर हो जाता है अर्थात हम किसी दूसरे को हानि पहुँचावें उसके पूर्व हमारा मन हमें ही हानि पहुँचा देता है। ऐसी स्थिति में हम भी उसी व्यक्ति की तरह व्यवहार करते हैं जैसे उस दूसरे व्यक्ति ने हमारे साथ व्यवहार किया था जिससे हम दुखित अथवा उत्तेजित हो गए थे।  तो यह तय है कि हमारा व्यवहार अब हमारी प्रतिक्रिया स्वरूप उस व्यक्ति को दुखी या अस्थिर कर देगा और प्रतिक्रिया स्वरूप वह व्यक्ति बैर भाव से फिर व्यवहार करेगा। अर्थात वैर का अंतहीन सिलसिला चल पड़ेगा। इससे स्पष्ट है कि बैर से बैर नही कट सकता  है।
         इसके विपरीत यदि हम अपने प्रति व्यक्त किये गए बैर को अस्वीकार करें और बैर की प्रतिक्रिया न दें तो हमारा साम्य विचलित नहीं होगा और उस दूसरे व्यक्ति का वैर निष्प्रभावी होकर अपना हिंसक असर खो बैठेगा।


नश्वर संसार
    यह संसार नश्वर है यानी जो कुछ इस संसार में आया है उसे समाप्त होना ही है। चूँकि संसार नित्य नश्वर है सो यह नित्य परिवर्तनशील भी है।
      हमें जो कुछ प्राप्त होता वह समाप्त होता ही है। यह जीवन भी इसी प्रकार नश्वर है। जब सब कुछ नश्वर ही है तो फिर किसी व्यक्ति या वस्तु से लगाव कैसा और क्यों? क्यों तब भोगों और कामनाओं में लिप्त होना? यह महत्वपूर्ण प्रश्न है सभी लोगों के लिए। जब संसार नश्वर है तो कामों, भोगों और इक्षाओं में लिप्त रहने वाला अज्ञानी है और जो नश्वरता और परिवर्तनशीलता को सनातन सत्य समझ कर उनसे लिप्त नहीं होता है वही ज्ञानी है।

काम भोग
       कुछ लोग दिन रात राग में जीवन व्यतीत करना अपने जीवन का लक्ष्य मानते हैं। ऐसे लोग निरन्तर राग रंग में लिप्त रहते है, काम भोगों की पूर्ति में लगे रहते हैं, ऐसे लोग अपने इन्द्रियों की इक्षाओं के अधीन बने रहकर आचरण करते हैं, भोजन पर इनका कोई नियंत्रण नहीं होता है, और ऐसे लोग अलसी प्रवृत्ति के होते हैं जो उद्योग परिश्रम से भागते हैं। ऐसे लोग निरन्तर पतनगामी ही होते हैं।
  इसके विपरीत आचरण करने वाले लोग स्वयं का भी कल्याण करते हैं और समाज का भी कल्याण करते हैं।

साधु

इस संसार में ऐसे लोग होते हैं जिनका इंद्रियाँ उनके बस में नहीं होती हैं और वे मात्र अपनी कामनाओं और इक्षाओं के अधीन हुए रहते हैं। ऐसे लोग साधु सन्यासियों सा लाल-गेरुआ वस्त्र पहनकर , दादी बाल बढ़ाकर स्वयं को साधु संत होने का भ्रम लोगों को देते हैं और इस प्रकार सीधे साढ़े धर्मपरायण लोगों को ठगने का काम करते हैं। इसके विपरीत साधु सन्यासी सा लाल-गेरुआ वस्त्र के वास्तविक अधिकारी वही होते हैं जिनका अपनी इन्द्रियों और उनकी चेष्टाओं पर पूरा नियंत्रण होता है।


मन की चंचलता
मन की चंचलता इन्द्रियों के अनियंत्रित होने के कारण होतो है। जब मनुष्य बारम्बार इन्द्रीयजनित सुखों को अनुभव करना चाहता है तो उसकी कर्मेन्द्रियाँ भी उसी के अनुरूप व्यवहार करती हैं और निरन्तर अनंत इक्षाओं की पूर्ति में लगी रहती हैं। नतीजा होता है कि मन हमेशा चंचल रहता है। 
  इससे विपरीत यदि इन्द्रियों पर नियंत्रण हो और इक्षाएँ अनिवार्य आवश्यकताओं तक सीमित रहे तो मन चंचल नहीं होता है


सुख और पुण्य

जब मन में ढेरों कामनाएँ और इक्षाएँ बन होती हैं तो उनकी पूर्ति के लिए मनुष्य ढेरों ऐसे कर्म करता है जो उचित नहीं है जैसे झूठ बोलना, दूसरों को ठगना, अनाचार और अत्याचार करना , हिंसा करना आदि। इस कारण से उस मनुष्य को कहीं शांति नही मिलती है।  इस तरह के व्यक्ति को जब जब ये स्मरण होता है कि उसके कर्म गलत थे, पाप मयी थे तो और भी सन्तप्त होता है।
   लेकिन जो पूण्य कर्म करता है यानी धैर्य रखता है, भय से दूर रहता है, मोह से बचता है, इक्षाओं पर नियंत्रण रखता है, इन्द्रिय सुखों को कम से कम मानते देता है, लोभ, असत्य, हिंसा आदि से बाहर रहता है तो वैसा मनुष्य आने कर्मों और उनके परिणामों में हमेशा ही सुख का अनुभव करता है। ऐसा व्यक्ति अपने कर्मों को शुभ समझकर बार बार प्रसन्न होता है।

आचरण और व्यवहार
     प्रायः ऐसा देखा जाता है कि लोग धर्म ग्रंथों का खूब पठन पाठन किया करते हैं लेकिन उन धर्म ग्रंथों की शिक्षाओं को जब व्यवहार में उपयोग में लाने का अवसर होता है तो वे हीं लोग इससे पीछे हट जाते हैं। और वही सब कर्म करते हैं जो उन ग्रंथों ने वर्जित किया है। सो जो शिक्षाएँ आचरण में नहीं ढलती तो फिर व्यक्ति सन्मार्ग पर नहीं चल पाता है।
    इसके विपरीत ऐसे लोग जो भले ही धर्म ग्रंथों का थोड़ा हीं अध्ययन करते हैं लेकिन मोह, भ्रम, लोभ, ईर्ष्या, असत्य, हिंसा, दम्भ आदि से दूर रहते हैं और इन्द्रियों से जनित इक्षाएँ जिनपर हावी नहीं होती हैं और यदि वे लोग अपने आचरण में शुचिता बरतते हैं वही लोग सन्मार्ग पर अग्रसर होते हैं।

अप्रमाद
     मनुष्यो  के जीवन में प्रमाद का बहुत ही महत्व है। जब व्यक्ति अपनी इक्षाओं के आधीन उनकी पूर्ति में लिप्त होकर भोग विलास में ही सुख प्राप्त करता है तो वह प्रमाद के वश में होता है और ऐसे मनुष्य के जीवन का कोई अर्थ नहीं होता है क्योंकि वह तो सदा ही अपने लिए भोगों को जुटाने में ही और उन्हीं के लिए उन्हीं में जीने के व्यसन से ग्रस्त होता है। ऐसा प्रमादी मनुष्य मृत जैसा ही है।
   इसके विपरीत जो लोग प्रमाद से ऊपर उठ जाते हैं वे भोगों से नहीं बंधते हैं और वे स्वार्थवश भोगों की लिप्सा से लिप्त नहीं होते हैं,  सो सदा ही जीवित सदृश्य होते हैं। जो ज्ञानी है वह अप्रमादी हो कर जीवन जीता है।

यश

इस जीवन में यश उसी को मिलता है जो धर्म के अनुसार आचरण करता है। धर्म के अनुसार आचरण कौन करता है? जो मनुष्य प्रमाद से स्वयं को दूर रखता है यानी जो भोग लिप्सा में लिप्त होकर कर्म नहीं करता है , जो साहसी होता है, जो उद्योगी होता है, जिसकी बुद्धि स्थिर होती है वही यशस्वी होता है।
 लेकिन जो मनुष्य प्रमाद में लिप्त है वह मूर्ख है क्योंकि न तो उसका आचरण ही धर्म अनुकूल होता है और न ही वह साहसी होता है, न उद्योगी, न ही स्थिर बुद्धि और चित्त वाला। ऐसा मूर्ख व्यक्ति तो घड़ी घड़ी अपने इन्द्रियों और उनकी इक्षाओं के लिए बारम्बार प्रमाद में लोटता है।
     इसीलिए इन्द्रियों के अधीन होकर भोगों में लिप्त होने और प्रमाद रत होने से मन अशांत और उद्वेलित होता है। सो इन सब से दूर होकर जो ध्यान करता है वही शांति, समृद्धि और यश का भागी बनता है।

चित्त
       चित्त अति चंचल होता है और बार बार हमारे ध्यान और संकल्पों को भटकाते रहता है जिसके प्रभाव के कारण मनुष्य अच्छे कर्मों पर एकाग्र नहीं हो पाता है। चंचल चित्त की प्रकृति ही है कि वह मनुष्य का ध्यान को बारम्बार भोग और प्रमाद की ओर खींचें, उसी में डुबोये और इन्द्रियों के लगाम को तोड़ डाले। इस कारण मनुष्य अनंत कामनाओं की पूर्ति के लिए बुरा से बुरा काम भी करने के लिए तैयार हो जाये।
     सो यह जरूरी है कि बुद्धिमान व्यक्ति को चित्त पर पूरा नियंत्रण हो, वह उसका दमन कर उसपर अपना अधिकार रखे न कि उसी के अधिकार में आ जाये।
      संयमित चित्त वाले को ही सुख मिलता है और उसी व्यक्ति का चित्त सुखदायी होता है। इसके विपरीत जिसका चित्त स्थिर नहीं , जिसके चित्त में सुख नहीं उससे बुद्धि की अपेक्षा नहीं की जा सकती है क्योंकि अस्थिर चित्त का व्यक्ति अस्थिर मन का भी स्वामी होता है और वह इतनी इक्षाओं में भटकता रहता है कि एक जगह टिक कर  ध्यानमग्न हो ही नहीं सकता है। 
   लेकिन जिसका चित्त स्थिर है वह पाप पुण्य से  मुक्त है और सो उसे न तो कोई भय है न ही लोभ।


जो व्यक्ति दूसरों के दोष को देखने में व्यस्त रहता है उसे अपने दोषों को देखने का समय नहीं मिलता है। सो व्यक्ति को चाहिए कि वह आने दोषों को देखे।

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