श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16
परिचय
श्रीमद्भागवद्गीता के नवम अध्याय में आसुरी और दैवी सम्पद की चर्चा की गई है। सम्पूर्ण जगत त्रिगुणात्मक प्रकृति से हीं बना हुआ है। ये तीन गुण हैं-सत्वगुण, रजोगुण एवं तमोगुण। इन्हीं गुणों के आपसी अनुपात पर जगत और उसके अवयवों का व्यवहार निर्भर करता है। व्यक्ति भी इन्हीं तीन गुणों के अनुपात के अनुसार अपना स्वभाव रखता है। संसार में आकर , संसार से मोक्ष की प्राप्ति व्यक्ति के प्रयासों पर ही निर्भर करता है। मोक्ष प्राप्ति को हम सरलतम ढंग से यूँ समझ सकते हैं कि व्यक्ति को स्वयं में सत्वगुण को प्रभावकारी बनाना होता है। इसी को और सरल ढंग से हम समझ सकते हैं कि जब सत्वगुण प्रदर्शित करने वाले व्यवहारगत गुणों की वृद्धि होती है तो व्यक्ति मोक्ष की तरफ बढ़ता है। सत्वगुण सम्पन्न व्यवहारहत गुणों को ही इस अध्याय में दैवी सम्पद कहा गया है और जो कुछ इसके विपरीत है वह तमोगुण सम्पन्न गुण है जो आसुरी सम्पद कहलाता है। प्रत्येक व्यक्ति में तीन गुण यानी सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण होते हीं हैं। सो प्रत्येक व्यक्ति में दैवी और आसुरी सम्पद से युक्त होता है। और इनदोनों में प्रभाव को लेकर व्यक्ति के अंदर बराबर ही संघर्ष चलते रहता है। यही प्रत्येक व्यक्ति का अपना महाभारत है। प्रत्येक व्यक्ति स्वयं में कुरुक्षेत्र है। जब उसके अंदर सत्वगुण प्रभावी होता है तो दैवी सम्पद में वृद्धि होती है और व्यक्ति अध्यात्म यानी स्वयं के ज्ञान के साथ मोक्ष की तरफ प्रवृत्त होता है और इसके विपरीत अवस्था में संसार के दुखों से बंधे जाता है।
सो अगर हम चाहते हैं कि हम दुखों से हमेशा के लिए मुक्त होकर मोक्ष के मार्ग पर चलें तो हमें अपने व्यवहार में इन दैवी सम्पदाओं की वृद्धि करनी चाहिए। हो सकता है कि जन्म से हममे इनमें से कुछ गुण हों और जो नहीं हों उनको अभ्यास से प्राप्त करना चाहिए। इस अभ्यास में निरन्तर स्वध्याय, चिंतन, सत्संग , गुरुभक्ति आदि सम्मिलित हैं। स्वयं अध्ययन करके, उन शिक्षाओं पर चिंतन कर के , अच्छे और योग्य लोगों के संसर्ग में रहकर के, अच्छे लोगों को अपना गुरु मानकर के हम इन गुणों को सीख सकते हैं, अपना सकते हैं और सन्मार्गी हो सकते हैं।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 1
श्रीभगवानुवाच
अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः।
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्॥ ।।1।।
श्री भगवान बोले- भय का सर्वथा अभाव, अन्तःकरण की पूर्ण निर्मलता, तत्त्वज्ञान के लिए ध्यान योग में निरन्तर दृढ़ स्थिति (परमात्मा के स्वरूप को तत्त्व से जानने के लिए सच्चिदानन्दघन परमात्मा के स्वरूप में एकी भाव से ध्यान की निरन्तर गाढ़ स्थिति का ही नाम 'ज्ञानयोगव्यवस्थिति' समझना चाहिए) और सात्त्विक दान (गीता अध्याय 17 श्लोक 20 में जिसका विस्तार किया है), इन्द्रियों का दमन, भगवान, देवता और गुरुजनों की पूजा तथा अग्निहोत्र आदि उत्तम कर्मों का आचरण एवं वेद-शास्त्रों का पठन-पाठन तथा भगवान् के नाम और गुणों का कीर्तन, स्वधर्म पालन के लिए कष्टसहन और शरीर तथा इन्द्रियों के सहित अन्तःकरण की सरलता।
अभी तक हमने श्रीमद्भागवद्गीता में जो प्रशिक्षण प्राप्त किया है उसे समझने में, उसे दैनिक जीवन से जोड़ने में कभी कभी बुद्धि के स्तर पर कठिनाई आ सकती है। इसीलिए अब आगे कल से हम सोलहवें अध्याय में हम देखेंगे कि किस प्रकार श्रीमद्भागवद्गीता की शिक्षाओं को हम व्यवहार के स्तर पर अपना सकते हैं। तो आइए, कल से हम सोलहवें अध्याय का प्रशिक्षण प्रारम्भ करें। अब हम समझते हैं कि वे कौन से व्यवहारगत गुण है। जिनको अपनाने से हम ज्ञान और कल्याण के मार्ग पर अग्रसर होते हैं। इन गुणों को ही दैवी गुण कहते हैं।
1.भय का सर्वथा अभाव अर्थात निर्भयता
जब मन में भय होता है तो आगे बढ़ने की प्रवृत्ति बाधित होता है। भय के कई कारण हैं, जैसे मोह, अज्ञानता, भेद,किसी सरोच सत्ता में विश्वास का होना,अभाव।
भय का सीधा सम्बन्ध किसी से जुड़ाव से होता है। जितना अधिक जुड़ाव होता है उसे खोने का भय उतना ही अधिक होता है। भेद का अर्थ है कि जब हमें लगता है कि हम दूसरे से अलग हैं, ईश्वर से अलग हैं तो उस दूसरे से हमें भी होता है। जब हममें खुद से बड़ी सत्ता का भरोसा होता है तो भी समाप्त हो जाता है।
भय से मुक्ति आवश्यक है। भय के कारणों से मुक्त होने का मार्ग वैराग्य (dispassion) से होकर जाता है। वैराग्य सीधे भय को तो नहीं मरता है लेकिन वैराग से मोह अज्ञानता और भय समाप्त होते हैं। इसी प्रकट ज्ञान भेद का अभाव और विश्वास और समर्पण होने से भी भय समाप्त होता है। भय तभी समाप्त होता है जब यह जानते हैं कि हम वास्तव में कौन हैं।
2.मन की शुद्धता
मन की शुद्धता का परिचायक है कि मन बिना किसी बाहरी कारण के प्रसन्नता का अनुभव करे। काम, क्रोध, लाभ, मोह, अहंकार और ईर्ष्या और इनसे जनित भाव में को अशांत करते हैं। मन में जिज्ञासा से भी मन को शांति मिलती है।मन की शुद्धि श्रवण, अध्ययन, चिंतन, प्रेम, स्नेह से आती है ।इस अवस्था में मन प्रसन्न होता है।
3.ध्यानयोग
स्वयं के विषय में और स्वयं का ईश्वर के साथ के सम्बन्धों को जानना। यह ज्ञान ज्ञानी के साथ संसर्ग और स्वध्याय से आता है। और जब ज्ञान को अपने अनुभव से जानते हैं तो यह योग होता है। सो मन में जिज्ञासा से ज्ञानयोग की प्राप्ति होती है।
4.सात्विक दान
दान का अर्थ है कि जो हमारे पास है, जैसे धन, बुद्धि, ज्ञान, बल, आदि को अपने परिवेश के साथ साझा करना। सो आपने कितना दिया यह मायने नहीं रखता बल्कि किस मंशा से साझा किया यह महत्वपूर्ण है। दान की प्रवृत्ति मोह, लोभ , क्रोश आदि से मुक्त करती है।
5.दमः
दम का अर्थ है अपने इन्द्रियों पर नियंत्रण होना। अनियंत्रित इंद्रियाँ मन और शरीर दोनों को भटकाती रहती हैं और क्रोध, लोभ, ईर्ष्या, वासना, काम, हिंसा, असत्य भाषण आदि को जन्म देती रहती हैं सो इनपर विवेक का लगाम होना अति आवश्यक है।
6.यज्ञ
यज्ञ का अर्थ है सम्पूर्णता पर न्योछावर(sacrifice/offering) करना। सम्पूर्णता की भलाई के लिए अर्पित करना ही यज्ञ है। जब हम कुछ लोगों के साथ कुछ साझा करते हैं तो दान कहलाता है लेकिन जब सम्पूर्णता के कल्याण हेतु कुछ अर्पित करते हैं(जैसे प्रार्थना, पूजा) तब यह यज्ञ कहलाता है।
7.स्वध्याय
नियमित रूप से स्वयम अध्ययन करना, उनपर चिंतन करना, उनपर मनन करना। स्वध्याय जब तप के साथ होता है तब उसका परिणाम ज्यादा होता है।
8.तप
तप का अर्थ है एकाग्रता, अपनी ऊर्जा को सञ्चित कर एकी भाव से एक उद्देश्य की प्राप्ति में लगाना। इसका एक उद्देश्य यह भी होता है कि हम स्वयं के बारे में जाने। और स्वयं के वास्तविक प्रकृति को अनुभव करना।
9. स्पष्टवादिता
भावना, सोच, कर्म और आचरण में एकरूपता होना और उसमें स्वयं भी भरोसा होना चाहिए तब इसे स्पष्टवादिता कहते हैं। ऐसा एकीकृत व्यक्ति ही सन्मार्ग पर चलने के लायक होता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 2
अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम्।
दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम्॥
मन, वाणी और शरीर से किसी प्रकार भी किसी को कष्ट न देना, यथार्थ और प्रिय भाषण (अन्तःकरण और इन्द्रियों के द्वारा जैसा निश्चय किया हो, वैसे-का-वैसा ही प्रिय शब्दों में कहने का नाम 'सत्यभाषण' है), अपना अपकार करने वाले पर भी क्रोध का न होना, कर्मों में कर्तापन के अभिमान का त्याग, अन्तःकरण की उपरति अर्थात् चित्त की चञ्चलता का अभाव, किसी की भी निन्दादि न करना, सब भूतप्राणियों में हेतुरहित दया, इन्द्रियों का विषयों के साथ संयोग होने पर भी उनमें आसक्ति का न होना, कोमलता, लोक और शास्त्र से विरुद्ध आचरण में लज्जा और व्यर्थ चेष्टाओं का अभाव।
10.अहिंसा
मन, वचन, कर्म से न तो स्वयम का और न ही किसी दूसरे को किसी तरह की हानि पहुँचाना ही अहिंसा है। इसमें व्यक्ति अपने कर्मों से, या अपनी वाणी से या अपनी सोच से न तो अपने को और न ही किसी अन्य को कोई हानि, पीड़ा, कष्ट , प्रताड़ना पहुँचाता है या ऐसा करने की सोचता भी नहीं है।
11.सत्य
मन , वचन और कर्म से सत्य भाषण और सत्य व्यवहार को करना।
12.आक्रोध
क्रोध का नहीं होना। क्रोध के प्रत्युत्तर में भी क्रोध होता है जिससे हर तरह की नकारत्मकता फैलती है लेकिन यदि क्रोध नहीं किया जाए तो आता हुआ क्रोध या जो क्रोध दूसरे के द्वारा व्यक्त भी किया जाता है वह निष्पतभावि हो जाता है।
13.त्याग
जो कुछ अतिरिक्त है अथवा नकारात्मक है, बुरा है उसे छोड़ देना ही त्याग है।
14.शांति
मन की शांति का होना अति आवश्यक है। मन से कामना, भय, मोह, क्रोध, ईर्ष्या, लोभ आदि के निवारण से शांति मिलती है।
15.कुटिलता का अभाव
कुटिलता का अभाव होना, किसी के प्रति कलुषित भावना या इस कुटिल भाव युक्त वाणी का न होना। दूसरों की कमियों को किसी गलत मंशा से व्यक्त नहीं करना।
16.दया
सभी जीवों के प्रति करुणा का होना। इसका अर्थ है अन्य जीव के कष्ट और पीड़ा को समाप्त करने की इक्षा का होना और इस हेतु प्रयास करना। कर्म में करुणा और प्रेम का होना ही दया है।
17.अलोलुप
सम्बद्धता का अभाव औए उससे जनित लाभ के लोभ का अभाव का होना। इन्द्रियों के सुख की इक्षा का अभाव ही अलोलुप होना है।
18.भद्रता
बात व्यवहार में शालीनता का होना।
19.नम्रता
लोगों को आपकी क्षमताओं और उपलब्धियों पर ध्यान देने की कोशिश न करने या न करने की गुणवत्ता।
20.मन की चपलता का अभाव
आपकी राय या आपकी भावनाओं को अचानक और बिना किसी अच्छे कारण के बदलने की संभावना का निराकरण ही मन की कलपता का अभाव है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 3
तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहोनातिमानिता।
भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत॥ ।।3।।
तेज (श्रेष्ठ पुरुषों की उस शक्ति का नाम 'तेज' है कि जिसके प्रभाव से उनके सामने विषयासक्त और नीच प्रकृति वाले मनुष्य भी प्रायः अन्यायाचरण से रुककर उनके कथनानुसार श्रेष्ठ कर्मों में प्रवृत्त हो जाते हैं), क्षमा, धैर्य, बाहर की शुद्धि (गीता अध्याय 13 श्लोक 7 की टिप्पणी देखनी चाहिए) एवं किसी में भी शत्रुभाव का न होना और अपने में पूज्यता के अभिमान का अभाव- ये सब तो हे अर्जुन! दैवी सम्पदा को लेकर उत्पन्न हुए पुरुष के लक्षण हैं।
21.तेज
व्यक्ति के व्यक्तित्व में जो ओज, ऊर्जा, जोश, उत्साह स्पष्टतः प्रकट रहता है वह उसका तेज है जो उसके अंदुरुनी और मानसिक शक्ति का द्योतक होता है। जब व्यक्ति सत्य, ईमान, अहिंसा, ज्ञान जैसे गुणों से लैस होता है और उसमें आत्मविश्वास होता है तो उसका तेज उसके व्यक्तित्व से झलकता है।
22.क्षमा
शक्ति होने के बावजूद दंड नहीं देना, बल्कि क्रोध, घृणा, हिंसा को छोड़कर गलती करने वाले को अन्य को उसकी गलती के लिए दण्ड नहीं देना। क्षमा अतीत से नहीं चिपके रहने का गुण है। ध्यान रहे कि क्षमा सहनशीलता नहीं है बल्कि व्यक्ति की वह क्षमता है जिसके कारण व्यक्ति हिंसा, क्रोध और घृणा रहित होकर दूसरे के द्वारा किये गए अपराध के लिए उस दूसरे को दंडित न कर उसे सुधनरे का अवसर देती है।
23.धृति अर्थात दृढ़ता
तमाम तरह के शारीरिक और मानसिक थकावट, बाधा, अवरोध, कठिनाई आदि के बावजूद उत्साह के साथ लक्ष्य की तरफ बढ़ते रहने की दृढ़ता। इसकी ऊर्जा व्यक्ति को किसी बाहरी तत्व से नहीं प्राप्त होती है बल्कि इसकी ऊर्जा हमें स्वयं से, अपने अंदर से प्राप्त होती है। धृति ही तप का स्रोत है और तप से एकाग्रता आती है, ध्यान लगता है और ध्यान से ज्ञान की प्राप्ति होती है।
24.शौच या शुष्टता
शरीर के साथ साथ मन, वचन, कर्म की शुद्धता भी परम् महत्व की होती है। मन वाणी और कर्म की शुद्धता के लिए इन्द्रिय संयम की अनिवार्यता होती है। व्यक्ति को न तो मन से, न ही बोली से , न ही कर्म से, न ही सोच से मैला होना चाहिए । किसी के प्रति अभद्र या कठोर वचन बोलने से अपना मन पहले दुखी होता है। साथ ही यह भी ध्यान रहे कि हर स्थिति या भाव को व्यक्त करने के लिए जब हम कठोर वचनों का ही प्रयोग करते हों तब जब वास्तविक रूप से कठोर परिस्थिति का सामना होता है तब उसे परिभाषित करने और उसका सामना करने के लिए हमारे अंदर कोई विवेक ही शेष नहीं रह जाता है।
25.अद्रोह, घृणा का अभाव
असहनशीलता क्रोध, नापसन्द, ईर्ष्या से प्रारम्भ हुई भावनाएँ घृणा तक पहुँच जाती हैं और यह घृणा असहनशीलता, क्रोध, नापसन्दगी, ईर्ष्या को और अंततः गलत रास्ते पर चलने की प्रवृत्ति को, हिंसा को आत्मनियन्त्रण के अभाव को , बुद्धिहीनता और अविवेक को , आवेश को बढ़ाती भी हैं। सो घृणा का अभाव होना ही चाहिए। सो क्रोध और क्रोध जनित भाव व्यक्ति के नियंत्रण में होने चाहिए।
26.अतिमानिता अथवा अभिमान का अभाव
अभिमान होने पर व्यक्ति स्वयं को अन्य से बड़ा समझने लगता है और अपने इस अभिमान को बनाये रखने के लिए उसके लिए जरूरी हो जाता है कि वह स्वयं को चापलूसों से घिरा रखे।ऐसा व्यक्ति स्वयं के अस्तित्व के लिए सदा दूसरों पर निर्भर करता है। अभिमान की रक्षा दूसरों को नीचा दिखाने से ही होती है। सो व्यक्ति में अभिमान का अभाव और विनम्रता की प्रचुरता होनी ही चाहिए।दरअसल प्रत्येक व्यक्ति अपने स्व के कारण स्वतः महान है ।जरूरत होती है प्रत्येक व्यक्ति को अपने दैवी गुणों को पहचानने और उनको माँजने की।
ये सब दैवी सम्पदा हैं , दैवी धन हैं जो हमारे अंदर हैं जिनके अभाव में हम वास्तव में दरिद्र और असक्त होते हैं। इन गुणों के अभाव में व्यक्ति जीवन में आगे बढ़ने में असमर्थ होता है। बाहरी उपलब्धियों के बावजूद यदि ये सम्पदा नहीं हैं तो फिर व्यक्ति वास्तव में दरिद्र ही नहीं बल्कि बहुत ही कमजोर भी है। इन गुणों का निरन्तर अभ्यास करने से मन के अंदर व्याप्त दुर्गुण दूर होते हीं हैं साथ ही व्यक्ति दैवी मार्ग पर अग्रसर होकर मोक्ष यानी निष्काम भाव से कर्म में प्रवृत्त होता है। इन्हीं गुणों के निरन्तर अभ्यास से व्यक्ति ईश्वरत्व को प्राप्त करता है। जब व्यक्ति मन , वचन और कर्म से इन गुणों का अपने व्यवहार में अनुसरण करता है तब उसके मन में असीम शांति और प्रफुलता का अनुभव होता है और और जिस ऊर्जा का संचार होता है उसके बल पर वह आने परिवेश को भी आह्लादित करता है। इन्हीं गुणों के आज के सामाजिक जीवन में कॉमन गुड की संज्ञा दी जाती है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 4
दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च।
अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम्॥ ।।4।।
हे पार्थ! दम्भ, घमण्ड और अभिमान तथा क्रोध, कठोरता और अज्ञान भी- ये सब आसुरी सम्पदा को लेकर उत्पन्न हुए पुरुष के लक्षण हैं।
दैवी गुणों के विपरीत जो है वही आसुरी गुण हैं जो संक्षेप में दम्भ, घमण्ड, अभिमान , क्रोध, कठोरता एव अज्ञान हैं।
दम्भ
दम्भ यानी पाखंड। अर्थात व्यक्ति वास्तव में दैवी गुणों से रहित होते हुए भी यह प्रदर्शित करता है कि वह दैवी गुणों से युक्त है।इससे उस व्यक्ति के अंदर भी भ्रम यानी dellusion का जन्म होता है। ऐसा व्यक्ति दूसरों का जान बूझकर नुकसान करता है। ऐसा व्यक्ति वास्तव में कलुषित, हिंसक, होते हुए भी गलत मंशा से लोगों के सामने यह दिखाता है कि वह बहुत विनम्र है, सत्य भाषण करने वाला है, सात्विक व्यवहार करने वाला है। ऐसा नकारात्मक गुणों को सही दिखाने के लिए करते हैं । जबकि यदि नकारात्मकता को पहचान कर उसे दूर करने का प्रयास करने वाला अपनी नकारत्मकता से छुटकारा पा लेता है।
दर्प अर्थात घमण्ड
स्वयं को श्रेष्ठ समझना और इसी के अनुरूप व्यवहार करना घमण्ड या दर्प है जिसके वशीभूत होकर व्यक्ति स्वयं को अपनी आर्थिक हैसियत, पारिवारिक पृष्ठभूमि, पद आदि के बल पर बड़ा और दूसरों को तुक्ष समझता है।
अतिमासन अथवा अभिमान
स्वयं को महान मानने की प्रवृत्ति का होना अतिमान /अभिमान कहलाता है। स्वयं को उच्च मानना और यह भाव रखना कि दूसरे लोग उसकी उच्चता के अनुसार उससे व्यवहार करें। ऐसा व्यक्त आत्मकेंद्रित होता है।
क्रोध
ऐसा व्यक्ति यह अपेक्षा करता है कि दूसरे लोग हमेशा उसी के अनुरूप रहें अन्यथा वह क्रोधित हो उठता है। क्रोध का सीधा सम्बन्ध इस बात से होता है कि वह व्यक्ति चाहता है कि हमेशा सभी चीजें उसी की इक्षा के अनुसार हो। यह क्रोध बुद्धि और विवेक, सोचने-समझने की क्षमता को समाप्त कर देता है और व्यक्ति को सोच के स्तर पर भी हिंसक बना देता है।
कठोरता अर्थात कठोर वचन का प्रयोग करना
कठोर वाणी बोलकर इससे दूसरों को हमेशा दुख पहुँचाने की प्रवृत्ति होना। ऐसा व्यक्ति क्रोध, ईर्ष्या जैसी प्रवृत्तियों में जीवन व्यतीत करता है और हिंसक होता है।
अज्ञानता
स्वयं और ईश्वर से अनजान होना, जीवन और उसके लक्ष्य से अनजान बने रहना ही अज्ञानता है। अज्ञानता ही सभी आसुरी सम्पदाओं का कारण है।
ये सभी लक्षण व्यक्ति के अधार्मिक अथवा आसुरी होने के कारण होते हैं और उसे गलत मार्ग पर ले जाने वाले होते हैं।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 5
दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता।
मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव॥ ।।5।।
दैवी सम्पदा मुक्ति के लिए और आसुरी सम्पदा बाँधने के लिए मानी गई है। इसलिए हे अर्जुन! तू शोक मत कर, क्योंकि तू दैवी सम्पदा को लेकर उत्पन्न हुआ है।
दैवी और आसुरी सम्पदाओं में फर्क यह है कि जँहा आसुरी सम्पदाएँ व्यक्ति को इस संसार से बांधे रहती हैं वहीं दैवी सम्पद व्यक्ति को संसार के बंधनों से छुड़ाकर उनकोऔर आगे मुक्ति की तरफ ले जाती हैं। ऐसा इसलिए होता क्योंकि आसुरी सम्पदाएँ सांसारिक चीजों से बन्धन और उनके प्रति मोह से निकलती हैं। हमारे अंदर सांसारिक चीजों, फिर चाहे वो भौतिक हों या अभौतिक के प्रति गहरा लगाव होता है जिसके कारण उनके लिए मोह, लोभ, क्रोध, ईर्ष्या आदि भाव हमारे मन में बने रहते हैं और इन भावों के अनुरूप ही हम कर्म करते करते उनसे और गहराई से बंधते जाते हैं।
इसके विपरीत जब इन बन्धनों से हमारा लगाव कम होते होते समाप्ति की तरफ अग्रसर होता है तब इनके प्रति हमारा लोभ, क्रोध, ईर्ष्या आदि के भाव समाप्त होते हैं और दैवी सम्पद बढ़ते जाते हैं। मूल चीज यह है कि हम स्वयं को सांसारिक चीजों से जितना बांधेंगे आसुरी सम्पदाएँ उतनी ही बढ़ेंगी और इनसे स्वयं को जितना विरागी करेंगे हमारी दैवी सम्पदाएँ बढ़ेंगी।
दरअसल व्यक्ति में ये दोनों ही होते हैं। जब व्यक्ति स्वध्याय , सत्संग, ज्ञान, कर्म, ध्यान और वैराग्य के अभ्यास से स्वयं को सांसारिक बन्धन से मुक्त करते जाता है तब उसके अंदर दैवी गुण बढ़ते जाते हैं। हम सभी को कभी निराश नहीं होना चाहिए क्योंकि हम सभी ही ऐसा करने में सक्षम हैं और मुक्ति की तरफ बढ़ सकते हैं।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 6
द्वौ भूतसर्गौ लोकऽस्मिन्दैव आसुर एव च।
दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ में श्रृणु॥ ।।6।।
हे अर्जुन! इस लोक में भूतों की सृष्टि यानी मनुष्य समुदाय दो ही प्रकार का है, एक तो दैवी प्रकृति वाला और दूसरा आसुरी प्रकृति वाला। उनमें से दैवी प्रकृति वाला तो विस्तारपूर्वक कहा गया, अब तू आसुरी प्रकृति वाले मनुष्य समुदाय को भी विस्तारपूर्वक मुझसे सुन।
संसार मे प्राणियों की दो ही श्रेणी होती है , एक जिनमें दैवी गुणों की प्रचुररता होती है और दूसरे वे जिनमें आसुरी गुणों की प्रचुरता होती है। प्रत्येक मनुष्य में ये दोनों गुण होते हैं लेकिन इन गुणों का अनुपात सभी में भिन्न होता है तथा साथ ही सभी में इनको पहचानने की क्षमता भी अलग अलग होती है। हममें कौन से गुण अधिकता में हैं और हमें किन गुणों को अपनाने चाहिए यह तभी सम्भव होता है जब हम इन दोनों तरह के गुणों को पहचान पाने में सक्षम होते हैं। दैवी गुणों का विस्तृत परिचय प्राप्त करने के उपरांत आइये हम आसुरी गुणों को समझे।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 7
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः।
न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते॥ ।।7।।
आसुर स्वभाव वाले मनुष्य प्रवृत्ति और निवृत्ति- इन दोनों को ही नहीं जानते। इसलिए उनमें न तो बाहर-भीतर की शुद्धि है, न श्रेष्ठ आचरण है और न सत्य भाषण ही है।
आसुरी प्रकृति तमोगुण की प्रचुरता का परिणाम होती है जिसमें तमोगुण के लक्षण
बड़े प्रभावी ढंग से सामने आते हैं। हम क्रम से इनको इस प्रकार समझ सकते हैं-
1.जब मनुष्य में आसुरी प्रकृति का बोल बाला होता है तब वह मनुष्य अज्ञानता से भरा रहता है और वह यह नहीं समझ सकता है कि उसे क्या करना चाहिए अर्थात उसकी प्रवृत्ति क्या होनी चाहिए और उसे क्या नहीं करना चाहिए अर्थात उसकी निवृत्ति क्या होनी चाहिए। इस अवस्था में व्यक्ति इन्द्रियों के बेलगाम इक्षाओं का दास मात्र होता है जिनकी पूर्ति के लिए वह बुरा से बुरा कर्म करने के लिए भी तत्पर होता है। वह व्यक्ति मन, वचन और कर्म में शुद्धता के अभाव से ग्रस्त होकर व्यवहार करता है। ऐसे में उसका आचरण दुराचरण बनकर रह जाता है और वह अज्ञानता के वश में हुए सत्य से भगता है। ऐसे में वह अपने बल , बुद्धि का उपयोग लोगों को नुकसान करने के लिए करता है।
जब व्यक्ति यही नहीं समझ पाए कि उसे क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए तो फिर आप उस व्यक्ति से कुछ सही करने की अपेक्षा भी कैसे कर सकते हैं। ऐसे में तो व्यक्ति अपनी इन्द्रियों की इक्षाओं की पूर्ति में ही लगा रहा कर कर्म करेगा जो निश्चित ही अस्तयगामी और दुराचार प्रकृति के होंगे। जब व्यक्ति अपने जीवन के लक्ष्य से अनजान होता है तो फिर उसके प्रयास भटकाव वाले ही होते हैं।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 8
असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्।
अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम्॥ ।।8।।
वे आसुरी प्रकृति वाले मनुष्य कहा करते हैं कि जगत् आश्रयरहित, सर्वथा असत्य और बिना ईश्वर के, अपने-आप केवल स्त्री-पुरुष के संयोग से उत्पन्न है, अतएव केवल काम ही इसका कारण है। इसके सिवा और क्या है?
2.जिन व्यक्तियों को आसुरी प्रकृति का समझा जाता है उनका अन्य लक्षण होता है कि ऐसे लोग मानते हैं कि इस संसार में कुछ भी सत्य नहीं है बल्कि सब कुछ लाभ-हानि के समीकरण से संचालित होता है। ऐसे लोग यह मानते हैं कि सब कुछ वैसा ही होता है जैसा मनुष्यों की इक्षाएँ और वासनाएँ चाहती हैं । उनके अनुसार संसार में ऐसा नहीं है कि कोई ईश्वर है जो इसे संचालित करता है। ये लोग अच्छाई को नकारते हुए मात्र कामनाओं की पूर्ति को ही परम् लक्ष्य मानते हैं और उसी के अनुरूप उनकी बुद्धि भी होती है और कर्म भी।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 9
एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः।
प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः॥ ।।9।।
इस मिथ्या ज्ञान को अवलम्बन करके- जिनका स्वभाव नष्ट हो गया है तथा जिनकी बुद्धि मन्द है, वे सब अपकार करने वाले क्रुरकर्मी मनुष्य केवल जगत् के नाश के लिए ही समर्थ होते हैं।
3. प्रत्येक व्यक्ति का अपना एक दृष्टिकोण होता है। वह एक खास तरह से स्वयं के बारे में , इस संसार के बारे में और ईश्वर के बारे में एक धारणा रखता है। जब व्यक्ति की धारणा उसके आसुरी स्वभाव से प्रभावित होती है तब वह व्यक्ति स्वार्थ और कामनाओं के अँधेरे में पड़ जाता है और उसकी भ्रष्ट हुई बुद्धि कोई भी विवेकपूर्ण निर्णय लेने में सक्षम नहीं होती है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति मात्र अपने स्वार्थ सिद्धि और अपने कामनाओं और इक्षाओं को पूरा करने हेतु किसी के विरुद्ध किसी भी स्तर तक चला जाता है जिसमें वह अपने ही परिवेश का भी नाश कर देने से नहीं हिचकिचाता है। स्वार्थ, लोभ, असत्य, हिंसा, दुराचरण आदि ही इस तरह के व्यक्ति के संचालक होते हैं जो नाशकारी होते हैं।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 10
काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः।
मोहाद्गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः॥
वे दम्भ, मान और मद से युक्त मनुष्य किसी प्रकार भी पूर्ण न होने वाली कामनाओं का आश्रय लेकर, अज्ञान से मिथ्या सिद्धांतों को ग्रहण करके भ्रष्ट आचरणों को धारण करके संसार में विचरते हैं।
4. आसुरी प्रवृत्ति के व्यक्ति कभी न समाप्त होने वाली कामनाओं और इक्षाओं से भरे रहते हैं। वे सदा किसी न किसी कामना के अधीन होते हुए उसकी पूर्ति के प्रयास में लगे रहते हैं। इन कामनाओं की पूर्ति के क्रम में वे यह भी नहीं सोचते हैं कि उनके इक्षा पूर्ति के कर्मों से कई अन्य लोगों और भौतिक संसाधनों की कितनी क्षति हो रही होती है। बिना इन सब की परवाह किये ऐसे व्यक्ति अपनी कामनाओं की पूर्ति के लिए पूरे जीवन काल में लगे रहते हैं।
ऐसे लोग दम्भ यानी पाखण्ड, मान यानी अहंकार और मद यानी अभिमान, और मोह से भरे रहते हैं। ऐसे लोग नकारात्मक दृष्टिकोण वाले होते हैं। ऐसे लोगों की जीवन दृष्टि हमेशा ही असत्य और नकारात्मक सिधान्तो से प्रभावित रहती है। ऐसे लोगों के संकल्प समाज के भलाई के विपरीत तमाम तरह की गलत चीजों, मान्यताओं से भरे रजते हैं। उनकी सोच जीवन भर उनके जीवन को गलत रास्ते पर ही ले जाती रहती है। ऐसे लोग स्वयं के जीवन को और दूसरों के जीवन को भी नकारात्मक रूप से प्रभावित करते रहते हैं जिसके कारण समाज में व्यापक र्रूप से गलत चीजों को बढ़ावा मिलता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 11
चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः।
कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः॥ 11।।
तथा वे मृत्युपर्यन्त रहने वाली असंख्य चिन्ताओं का आश्रय लेने वाले, विषयभोगों के भोगने में तत्पर रहने वाले और 'इतना ही सुख है' इस प्रकार मानने वाले होते हैं।
निरन्तर इक्षाओं के अधीन बने रहने और उन्हीं की पूर्ति के प्रयास में लगे रहने का कारण ऐसे व्यक्तियों का मन हमेशा भिन्न भिन्न प्रकार की चिंता में डूबा में डूबा रहता है। इसके कारण ये लोग बराबर तनाव में रहते हैं। तनाव और चिंता के कारण ऐसे लोगों की न तो मानसिक अवस्था और न ही शारीरिक स्थिति ही सही रह पाती है। उनकी ये चिन्ताएँ और तनाव मृत्यु पर्यंत बनी रहती है। ऐसे व्यक्ति के जीवन का परम लक्ष्य मात्र और मात्र इन्द्रियों से जनित सुख को ही प्राप्त करना होता है। यही एक मात्र लक्ष्य होता है उनके जीवन का। ऐसे लोगों की समस्या है कि ये लोग पूर्ति हो चूकी इक्षाओं से सुख नहीं प्राप्त कर पाते बल्कि वे तो हमेशा उन इक्षाओं की पूर्ति के लिए ही बेचैनी में रह जाते हैं जिनकी पूर्ति अभी नहीं हुई है। चूँकि ऐसे लोगों के पास हमेशा ही इक्षाएँ बची रहती हैं सो ये हमेशा ही दुखी ही बने रह जात्ते हैं। सो इक्षापूर्ती भी इनको सुखी नहीं कर पाती। ये लोग ही कहा करते हैं कि ग्लास आधा खाली है जबकि आधे खाली ग्लास को आधा भरा समझने वाला ज्यादा सुखी रहता है। जीवन तो हमेशा आधे भरे ग्लास की तरह ही रहता है सो आधा खाली की सोच रखकर जो लोग परेशान, बेचैन रहते हैं वे पूरी जिंदगी असन्तुष्ट और दुखी ही रह जाते हैं। इक्षाएँ जितनी ज्यादा होंगी जीवन में उतनी ही इक्षाएँ बिना पूर्ति हुए बनी रहेंगी। इन लोगों के लिए जीवन का एकमात्र अर्थ कामनाओं/ इक्षाओं की पूर्ति का ही नाम है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 12
आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः।
ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्चयान्॥ ।।12।।
वे आशा की सैकड़ों फाँसियों से बँधे हुए मनुष्य काम-क्रोध के परायण होकर विषय भोगों के लिए अन्यायपूर्वक धनादि पदार्थों का संग्रह करने की चेष्टा करते हैं।
जब इक्षाएँ अनंत होती है तो उनकी पूर्ति दे सम्बंधित आशाएँ भी अंतहीन हो जाती हैं। अपनी इन्हीं उम्मीदों को पूरा करने के लिए आसुरी प्रकृति के व्यक्ति हर प्रयास करते हैं।ऐसी स्थिति में यदि कोई बाधा आती है तो इन इक्षाओं की पूर्ति के लिए क्रोध का आना भी स्वाभाविक होता है। जँहा इक्षाएँ होंगी वँहा उम्मीद भी होगी ही और बढ़ा आने पर क्रोध भी होगा हीं। ऐसे लोगों के जीवन का एकमात्र लक्ष्य भोगों से सुख की प्राप्ति करनी होती है सो इनके द्वारा धन का अर्जन और संग्रहण भी इन्हीं भोगों के लिए होता है। ऐसे लोग धन का अर्जन और संग्रहन पर कल्याण की भावना से नहीं करते हैं, उनका लक्ष्य लोक कल्याण नहीं होता है । वे लोग अपने संग्रहित किये गए धन से किसी के लिए कोई भला काम नहीं करते हैं बल्कि इस धन का उपयोग इन्द्रिय जनित भोगों की पूर्ति भर के लिए करते हैं।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 13
इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम्।
इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम्॥ ।।13।।
वे सोचा करते हैं कि मैंने आज यह प्राप्त कर लिया है और अब इस मनोरथ को प्राप्त कर लूँगा। मेरे पास यह इतना धन है और फिर भी यह हो जाएगा।
ऐसे लोगों के लोभ का कोई अंत नहीं है। उनके द्वारा धनसंचय कर अपनी इक्षाओं की पूर्ति कर लेने का तीव्र लोभ होता है। एक इक्षा की पूर्ति हुई नहीं कि दूसरी इक्षा को पूरी करने में लग जाते हैं।।पूरे जीवन उनके लिए धनसंचय करना और उस धन से अपनी अंतहीन इक्षाओं को पूरा करना ही उनका ही उनका एक मात्र लक्ष्य होता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 14
असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि।
ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी॥ ।।14।।
वह शत्रु मेरे द्वारा मारा गया और उन दूसरे शत्रुओं को भी मैं मार डालूँगा। मैं ईश्वर हूँ, ऐश्र्वर्य को भोगने वाला हूँ। मै सब सिद्धियों से युक्त हूँ और बलवान् तथा सुखी हूँ।
धन के साथ साथ ऐसे व्यक्ति को अपने बल का भी घमण्ड हो जाता है। लेकिन ऐसे व्यक्ति बल का उपयोग अपने वैरियों को हानि पँहुचा कर लाभ उठाने का होता है। उनको लगता है कि वे अपने धन -संपदा और बल के बदौलत सभी को हरा देंगे और संसार के सभी ऐश्वर्य, सभी सुख सुविधा उनके भोगने के लिए है। इस अहंकार में चूर ये व्यक्ति को यह भ्रम होता है कि संसार की समस्त उपलब्धियाँ उसी की है। ऐसे व्यक्ति में क्रोध और अहंकार भरा हुआ होता है तथा इसी के कारण ऐसे व्यक्ति को न तो कोई सुख मिलता है और न हीं कोई शांति। इन लोगों को लगता है कि वे भोगों और शक्ति के बल पर सुखी हो रहें हैं लेकिन क्रोध और अहंकार में चंचल चित्त को सुख और शांति प्राप्त नहीं हो पाती है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 15 एवं 16 एवं 17
आढयोऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया।
यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः॥ ।।15।।
अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः।
प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ॥ ।।16।।
आत्मसम्भाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः।
यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम्॥ ।।17।।
मैं बड़ा धनी और बड़े कुटुम्ब वाला हूँ। मेरे समान दूसरा कौन है? मैं यज्ञ करूँगा, दान दूँगा और आमोद-प्रमोद करूँगा। इस प्रकार अज्ञान से मोहित रहने वाले तथा अनेक प्रकार से भ्रमित चित्त वाले मोहरूप जाल से समावृत और विषयभोगों में अत्यन्त आसक्त आसुरलोग महान् अपवित्र नरक में गिरते हैं।
वे अपने-आपको ही श्रेष्ठ मानने वाले घमण्डी पुरुष धन और मान के मद से युक्त होकर केवल नाममात्र के यज्ञों द्वारा पाखण्ड से शास्त्रविधिरहित यजन करते हैं
ज्ञान से रहित मूर्ख व्यक्ति जिसकी प्रवृत्ति आसुरी होती है उसे अपने धन और परिवार की पृष्ठभूमि पर बड़ा ही गर्व होता है। उसे लगता है कि उसके धन और कुटुम्ब के आगे सभी तुक्ष हैं। इस तरह के व्यक्ति के द्वारा यदि यज्ञ, और दान जैसे कर्म किये भी जाते हैं तो उनमें भी उसका अहंकार ही होता है। उसे इस बात का भ्रम होता है कि वह अपने धन और जन के बल पर जो पूजा पाठ, यज्ञ , दान आदि कर रहा है वह बहुत ही उत्तम है, अतुलनीय है और ऐसा कर के वह दूसरों पर उपकार कर रहा है। इस तरह से उसके वे कर्म जो पूण्य सदृश्य होते हैं वे भी उसे मोह से नहीं निकाल पाते हैं क्योंकि उसके अंदर तो अहंकार बना रहता है जो उसके मोह को नष्ट नहीं होने देता है। फलस्वरूप वह भ्रम में पड़ा रहा जाता है। उनका तथाकथिय धर्म का आचरण पाखण्ड से अधिक कुछ नहीं होता है जिससे वे दूसरों को तो ठगते ही हैं स्वयं को भी ठगा करते हैं। उनके द्वारा किया जाने वाला कर्म दिखावे के लिए सद्कर्म होता है जबकि सच्चाई यह होती है कि उनके इस दिखावे के उद्देश्य स्वयं को औरों से श्रेष्ठ और अन्य को नीचा दिखाना होता है। यह मात्र आसुरी प्रवृत्ति का ही परिचायक है। कई धनी मानी लोग, कई स्वयम्भू सन्त जो अपने पीछे भक्तों की भीड़ लगाकर तरह तरह से उनको अपने दिखावे के प्रदर्शन से मोहित करने की कोशिश करते हैं और स्वयं को ईश्वर बताकर लोगों को उसी मूर्खता में धकेलते हैं। ये लोग कँही से धर्म का भला नहीं कर रहे होते हैं बल्कि धर्म के नाम पर लोगों को अज्ञानी और अकर्मण्य बनाते हैं।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 18
अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः।
मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः॥ ।।18।।
वे अहंकार, बल, घमण्ड, कामना और क्रोधादि के परायण और दूसरों की निन्दा करने वाले पुरुष अपने और दूसरों के शरीर में स्थित मुझ अन्तर्यामी से द्वेष करने वाले होते हैं।
पूर्व में हीं यह बात श्रीकृष्ण के द्वार कही गई है कि दम्भ, घमण्ड और अभिमान तथा क्रोध, कठोरता और अज्ञान से आसुरी गुण उपजते हैं। इन्हीं आसुरी गुणों की वजह से व्यक्ति इस तरह का बर्ताव करता है जैसा कि ऊपर कहा गया है। जब व्यक्ति दूसरों को तुक्ष समझ कर उनके साथ दम्भ, घमण्ड, अभिमान क्रोध, आदि से व्यवहार करता है तब वह अन्य प्राणियों को अपने से भिन्न तो समझता ही है साथ ही अपनी अज्ञानता भी प्रकट करता है। वह नहीं समझ पाता है कि प्रत्येक प्राणी ईश्वर का ही प्रतिरूप है सो वह स्वयं भी किसी अन्य प्राणी से भिन्न नहीं है। दूसरों का अपमान करने वाला इस प्रकार स्वयं ईश्वर का ही अपमान कर रहा होता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 19 एवं 20
तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान्।
क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु॥ ।।19।।
आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि।
मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम्॥ ।।20।।
उन द्वेष करने वाले पापाचारी और क्रूरकर्मी नराधमों को मैं संसार में बार-बार आसुरी योनियों में ही डालता हूँ। हे अर्जुन! वे मूढ़ मुझको न प्राप्त होकर ही जन्म-जन्म में आसुरी योनि को प्राप्त होते हैं, फिर उससे भी अति नीच गति को ही प्राप्त होते हैं अर्थात् घोर नरकों में पड़ते हैं।
अहंकार, दम्भ, क्रोध, अज्ञान जैसे आसुरी गुणों जिन्हें हम आम बोल चाल की भाषा में दुर्गुण कहते हैं के कारण व्यक्ति का आचरण ईश्वर से विमुख होते जाता है और ऐसे व्यक्ति निरन्तर गलत कार्यो में रमे रहकर अपने भविष्य को भी अंधकारमय करते जाते हैं। बारम्बार ऐसे आचरण के करने के कारण वह व्यक्ति व्याकुल हुआ रहता है, उसके निर्णय हमेशा चंचल होते हैं, वह किसी की अच्छी बात सुनने -मानने को तैयार नही। होता है और अपने आचरण से हमेशा लोगों को दुख देता है जिसके कारण स्वयं भी हमेशा अस्थिर रहा करता है। ऐसी स्थिति में ऐसा व्यक्ति अपने भविष्य में और भी नीच प्रवृत्ति को अपनाता है और मनुष्यों से अपेक्षित व्यवहार भी इससे नहीं हो पाता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 21
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्॥
काम, क्रोध तथा लोभ- ये तीन प्रकार के नरक के द्वार आत्मा का नाश करने वाले अर्थात् उसको अधोगति में ले जाने वाले हैं। अतएव इन तीनों को त्याग देना चाहिए।
प्रत्येक मनुष्य में दैवी और आसुरी दोनों तरह के गुण होते हैं। लेकिन जब आसुरी गुण ज्यादा प्रभावी होते हैं तो व्यक्ति का पतन होता है। मूल रूप से तीन गुना ऐसे हैं जो व्यक्ति को पतन के मार्ग पर ले जाते हैं। ये हैं काम, क्रोध और लोभ। काम अर्थात इक्षाओं से वशीभूत व्यक्ति इनकी पूर्ति के लिए तरह तरह के अनाचार में प्रवृत्त होता है। पूर्ति होने पर और कि इक्षा से लोभ का जन्म होता है औए पूर्ति नहीं होने की स्थिति में क्रोध उपजता है और इन परिस्थितियों में व्यक्ति हर तरह के अनाचार और व्यभिचार का अनुसरण करता है। इसी कारण से इन तीनों को, काम, क्रोध और लोभ को नरक का द्वार कहा जाता है। शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा के स्तर पर व्यक्ति पतन्गामी हो जाता है।
जिस व्यक्ति को पतन से बचना है उसे इन तीन दुर्गुणों से मुक्त होना ही होता है अन्यथा मुक्ति सम्भव नहीं है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 22 एवं 23
एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः।
आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम्॥ ।।22।।
यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः।
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्॥ ।।23।।
हे अर्जुन! इन तीनों नरक के द्वारों से मुक्त पुरुष अपने कल्याण का आचरण करता है इससे वह परमगति को जाता है अर्थात् मुझको प्राप्त हो जाता है।
जो पुरुष शास्त्र विधि को त्यागकर अपनी इच्छा से मनमाना आचरण करता है, वह न सिद्धि को प्राप्त होता है, न परमगति को और न सुख को ही।
श्रीमद्भागवद्गीता में व्यक्ति को यह समझाया गया है कि किस तरह की प्रवृत्ति होने और किस प्रकार का आचरण करने से व्यक्ति को परम् पद प्राप्त होता है अर्थात उसे मुक्ति मिलती है और किस प्रकार का आचरण करने और कौन सी प्रवृत्ति होने पर व्यक्ति का पतन होता है। पहले को दैवी सम्पद कहा गया है जो परम् पद और सुख देने वाला होता है जबकि दूसरे को आसुरी सम्पद कहा गया है जिसकी वजह से न तो सुख और शांति ही मिलती है और न ही उसका कल्याण ही होता है। यानी आसुरी सम्पद के वाहक को न तो राम मिलते हैं और न ही माया। सुख और शांति के अभाव में व्यक्ति का पतन निश्चित हो जाता है। तमाम तरह के भौतिक संसाधनों को इकट्ठा कर लेने के बाद भी, हर तरह से , यानी धन, बल, जन से परिपूर्ण हो कर भी जरूरी नही कि व्यक्ति के मन में सुख हो हीं, शांति हो हीं। आखिर ऐसा होता क्यों है?
श्रीमद्भागवद्गीता में बारम्बार इसे समझाया गया है। मूल रूप से द्वितीय अध्याय में इसे सर्वप्रथम निरूपित किया गया है और सोलहवें अध्याय में फिर से कहा गया है कि काम, क्रोध और लोभ नरक के द्वार हैं यानी इनके होने से व्यक्ति का पतन होता है और व्यक्ति नीच कोटि का बन जाता है। इन नरकगामी आसुरी सम्पदाओं के कारण व्यक्ति का विवेक मर जाता है, उसके भाव कलुषित हो जाते हैं और कर्म दुराचारी। इसे विस्तृत रूप से समझने के लिए हम द्वितीय अध्याय के प्रासंगिक अंश को फिर से देखते हैं जो निम्न प्रकार से है--
"" अब श्रीकृष्ण इन्द्रियों में आसक्ति के कारण व्यक्ति के पतन की प्रक्रिया को भी समझाते हैं। उन्होंने बहुत ही आसान तरीके से समझाया है कि इन्द्रियों के राग रस में डूबे रहने के कारण किस प्रकार मनुष्य का पतन होता है। यह बहुत ही स्वाभाविक सी बात है कि हम जिस चीज के बारे में बहुत चिंतन करते हैं उनके प्रति हमारे मन में आसक्ति का भाव जन्म लेता है। वाह्य संसार की अनुभूति इन्द्रियों यानी सेंसेज के माध्यम से ही होती है । खुद से बाहर की विषयों वस्तुओं और व्यक्तियों में जब हम आनंद और सुख की खोज करते हैं तो हम निरन्तर उनकी ही सोच में लगे रहते हैं, व यदि हम उन अनुभूतियों में डूबते हैं तो उनके प्रति एक लगाव भी उत्पन्न होता है। हम उस विषय, वस्तु, व्यक्ति के बारे में जिनसे हम सुख और आनंद की अपेक्षा करते हैं खुश और प्रसन्न होते रहते हैं। जैसे यदि हमको लगता है कि फलाना पद मिल जाने से अथवा फलाना वस्तु मिल जाने से अथवा फलाना व्यक्ति के मिल जाने से अथवा इतना धन हो जाने से हमें बहुत आनंद मिलेगा तो हम निरन्तर उसी के बारे में चिंतन करते रहते हैं। यँहा तक कि उसके वास्तविक प्राप्ति के पूर्व ही हम मात्र उसके मिलने की कल्पना कर के ही खुश होते रहते हैं और उसी में डूबे रहते हैं, उसी के चिंतन और ध्यान में लगे रहते हैं।
जिन विषयों पर बहुत चिंतन करते हैं उनसे लगाव हो जाता है। इस लगाव से उन विषयों के प्रति कामना का जन्म होता है हमारे मब में । हम अपनी खुशी, अपने आनंद, और सुख के लिए उन इक्षित वस्तुओं , विषयों आदि पर निर्भर हो जाते हैं और उनके बिना हम अपने सुख की कल्पना भी नहीं कर पाते। हमें लगता है कि यदि वो हमें नहीं मिला तो हस्रा अस्तित्व ही मिट जाएगा। हम इस हद तक उसमें दुबे रहते हैं कि जागृत से लेकर सुप्त अवस्था तक बिना सचेष्ट प्रयास के ही उनका ध्यान करते रहते हैं। हमें पता भी नहीं चलता कि कब हम उसकी सोच में , उसके ध्यान में डूब गए और दुब जाते हैं। हमारा ध्यान यानी MEDITATION उसी में लग जाता है क्योंकि हमारा उसी में लगाव होता है। हम उसी वस्तु, विषय, व्यक्ति में समाधिस्थ हो जाते हैं क्योकि उसी में हमें सुख मिलता है।
जब किसी विषय, वस्तु या व्यक्ति से आकर्षित होकर उसी में डूब जाते हैं तो उस विषय, वस्तु या व्यक्ति पर अपनी अधिकारिकता की भी इक्षा करते हैं, चाहते है कि वह हमारे पास हो हमेशा, हमारा ही अधिकार रहे उसपर। इस कामना का क्या परिणाम होता है, अब हम इसे समझने की कोशिश करें
1.मोह
हम जिसके प्रति कामना रखते हैं उससे बन्ध जाते हैं, उसके बिना हम अपनी कल्पना भी नहीं करते, उसके बिना हम सुख की उम्मीद भी नहीं करते। इससे हमें उस विषय, वस्तु, व्यक्ति, घटना आदि के प्रति मोह हो जाता है।
2.लोभ
यदि हमारी कामना पूरी होती है तो हम उसमें और उलझते हैं, चाहते हैं कि ये सुख हमें हमेशा प्राप्त होता रहे। तब हम अपनी कामना पूर्ति के लिए अपने अतीत, वर्तमान और भविष्य तीनों से बन्ध जाते हैं, हम स्वयम इनसे मुक्त नहीं होना चाहते। यह बन्धन हमें हर वो जायज नाजयाज कर्म करते हैं जिससे कामना पूर्ति हो सके। यही लोभ है, अधिक से अधिक के लिए , बार बार प्राप्ति के लिए लोभ हमें प्रेरित करता है, सो काम का बन्धन, उसकी पूर्ति लोभ को जन्म देता है। और मिल जाये, बार बार मिल जाये।
3.क्रोध
यदि कामना पूर्ति की दिशा में बाधा उत्पन्न होती है तो पहले चिड़चिड़ापन होता है हमारे मन में जो बढ़ते बढ़ते क्रोध में बदल जाता है। कामना और उसकी पूर्ति के बीच जितना गहरा लगाव होता है अर्थात जिस चीज को हम जितनी तीव्रता से प्राप्त करना चाहते हैं उसकी पूर्ति में अत्यल्प बाधा पर भी हम उतनी ही तीवता से प्रतिक्रिया भी देते हैं अर्थात हमारा क्रोध भी उतना ही तीव्र होता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि काम और क्रोध एक दूसरे के पूरक हो जाते हैं, जँहा काम होगा क्रोध भी स्वतः ही उपस्थित हो जाएगा। बिना क्रोध के काम हो नहीं सकता। इस क्रोध के कई रूप हैं, यथा क्रोध, निराशा, चिड़चिड़ाहट, झल्लाहट, घृणा आदि। इस प्रकार काम कई तरह के नकारात्मक भावों को जन्म देता है।
4.ईष्या
इस कामना के अन्य परिणाम भी होते हैं।
यदि हमारी कामना की पूर्ति तो हो गई लेकिन किसी अन्य की कामना की पूर्ति अधिक हुई तो भी हमें समस्या होती है, हमारे अंदर उस व्यक्ति के जिसकी कामना की अधिक पूर्ति हुई है उससे ईष्या होती है हमें कि उसे अधिक क्यों मिला। हम जिसके जितने करीब होते हैं उसके प्रति हमारी ईर्ष्या की भावना भी उतनी ही तीव्र होती है।
5.
घमंड.यदि हमारी कामना की अन्य की कामना से अधिक पूर्ति होती है तो हमारे अंदर घमंड का भाव आता है। हमने उससे ज्यादा पा लिया।
वस्तुतः घमंड और ईर्ष्या साथ साथ चलते हैं। एक तरफ वैसे लोग होते हैं जिनकी हमसे अधिक कामना की पूर्ति हुई होती है, उनसे हम ईर्ष्या करते हैं, दूसरी तरफ वे लोग होते हैं जिनसे अधिक हमारी कामना की पूर्ति हुई होती है, हम उनके प्रति अपने अंदर घमंड का भाव भी रखते हैं। इस प्रकार हम एक साथ ईर्ष्या और घमंड दोनों में जीते हैं।
इस तरह हमारे सेल्फ की यात्रा के छह प्रमुख शत्रु हैं
1.काम
2.मोह
3.क्रोध
4.लोभ
5.ईर्ष्या
6.घमंड
और ये पाँच यानी मोह, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या और घमंड पहले यानी काम की ही सन्तति होते हैं अर्थात प्रथम शत्रु काम है यानी संगत है , परिणाम का बन्धन है।
अब हम देखते हैं कि इनका परिणाम क्या निकलता है।
1.क्रोध की कई अभिव्यक्ति होती है, जैसे व्यक्ति दूसरे को हानि करने या खुद को हानि पहुँचाने की कोशिश कर सकता है , निराशा में जा सकता है, आदि। मतलब ये है कि क्रोध के समय व्यक्ति ये नहीं समझ पाता कि क्या करना सही है क्या करना गलत है और न दूसरे ही अनुमान कर पाते हैं कि क्रोधित व्यक्ति कौन सा कदम उठाएगा। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि उसकी बुद्धि मूढ़ हो जाती है, क्रोध की वजह से वह विवेक से काम नहीं कर पाता। विवेक से सोचने की क्षमता जाती रहती है।
2. क्रोध से दिग्भर्मित विवेक से स्मृति भी साथ छोड़ देती है। हम जीवन में बहुत कुछ सीखते रहते हैं, समाजिक और व्यवसायिक जीवन में हमें बहुत सारा ज्ञान मिलते रहता है जो हमारी स्मृति में सुरक्षित रहता है और उस तरह की परिस्थिति आने पर वही स्मृति हमारे सुरक्षित ज्ञान को क्रियाशील कराकर हमसे सही कार्य करा लेती है। हमने अगर सीखा है कि हमें अपने से बड़ों को प्रणाम करना चाहिए तो अगर कोई बड़ा सामने आता है तो वही स्मृति हमें प्रेरित करती है कि हम तुरत उन्हें प्रणाम करें। यदि किसी चिकित्सक ने सीखा है कि शल्यचिकित्सा कैसे की जाती है तो रोगी के बीमारी के दूर करने के लिए वह चिकित्सक अपनी उसी स्मृति के कारण उसका इलाज कर पाता है। लेकिन क्रोध की अवस्था में यह स्मृति साथ छोड़ देती है। क्रोधित मन के जेहन में सीखा हुआ ज्ञान रहता तो है लेकिन वो क्रोध से अस्थिर हुए दिमाग से बाहर आकर हमारे कार्य में नहीं बदल पाता और क्रोध की अवस्था बीतने पर याद आता है कि अरे हम तो ये जानते ही थे, हमें याद ही नहीं आया। इस प्रकार क्रोध की अवस्था में विवेक और स्मृति दोनों साथ छोड़ देते हैं जिसके कारण हम सही काम नहीं कर पाते।
3.क्रोध से नष्ट स्मृति व्यक्ति के बुद्धि को समाप्त कर देता है। बुद्धि और विवेक स्मृति के आधार पर ही काम करते हैं। स्मृति में संचित ज्ञान यदि समय पर कार्यरूप में नहीं बदल पाता है तो फिर बुद्धि विवेक बेकार के हथियार हो जाते हैं। हमारे पास बहुत ज्ञान का भंडार हो सकता है लेकिन क्रोध की अवस्था में नष्ट हुए स्मृति के कारण यदि यह ज्ञान स्मृति में नहीं रह जाता है तो बुद्धि उसे कार्यरूप में नहीं बदल पाती। इस प्रकार क्रोध से मूढ़ हुए विवेक के कारण नष्ट हुई स्मृति बुद्धि का उपयोग नहीं कर पाती और सारा का सारा ज्ञान धरा का धरा रह जाता है।
4. अब जब क्रोध के कारण इस अवस्था में व्यक्ति पहुँच जाता हैं तो कोई भी लक्ष्य प्राप्त करने में असमर्थ हो जाता है और उसका पतन निश्चित हो जाता है।
इस प्रकार हम देखते कि कामना से वशीभूत व्यक्ति की क्या हालत होती है। इस तरह काम के जाल में फँसा व्यक्ति पतनशील होकर आत्मपथ से विलग हो जाता है। यही व्यक्ति अयोग्य, नीच प्रकृति का कहा जाता है। यह व्यक्ति कुछ भी करने के लायक नहीं होता है।
जीवन के प्रत्येक स्थिति में हम इसे अनुभव करते है। ऐसी स्थिति खुद से बाहर खुशी तलाशने से होती है। जब भी हम अपने सुख शांति और आनंद के लिए बाह्य वस्तुओं पर निर्भर करते रहेंगे हमारा पतन अवश्यम्भावी होगा, तरह तरह के लोभ , हिंसा, निराशा आदि बने रहेंगे। तमाम भौतिक उपलब्धि भी हमें उस स्थिति में सुख चैन नहीं दे सकेंगे। हर काल में कामनाओं से बन्धने का यही फलाफल होता है कि इंसान हमेशा नीच से नीच हरकत पर उतरते रहता है। यह बन्धन हमें जीवन में जीवन के लक्ष्यों को प्राप्त नहीं होने देता है, हम आत्मपथ से विमुख तमाम भौतिक सुख सुविधा के बावजूद दुखी और असन्तुष्ट ही रहते हैं, हमारी खुशी, और हमारे सुख क्षणिक ही रह जाते हैं।""
सो निश्चित ही इस नियत शिक्षा को त्यागकर इसके विपरीत आचरण करता है उसका पतन अवश्यम्भावी होता है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि जीवन में यदि हम सन्मार्ग पर चलना चाहते हैं, स्थाई रूप से सुख और शांति को पाना चाहते हैं तो मोह मुक्त जीवन जीने की इस शिक्षा को अवनावें, अपने अंदर के दैवी सम्पदाओं को बढ़ावें और आसुरी सम्पदाओं का दमन करते करते स्वयं को उनके प्रभाव से मुक्त कर लें। इस अवस्था में व्यक्ति का कर्म उसका कर्तव्य कर्म ही होता है। बिना मोह के, बिना बन्धन के, बिना लोभ के व्यक्ति वही कर्म करता है जो उसे अपने कर्तव्य के अनुसार करना है। फिर उसके प्रेम और संघर्ष में कोई अंतर नहीं रह जाता है क्योंकि उसका प्रेम और उसका संघर्ष दोनों किसी अपेक्षा से किये कर्म नहीं होते हैं बल्कि उसकी स्थिति के अनुसार वे ही नियत कर्म होते हैं उसके।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 24
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥ ।।24।।
इससे तेरे लिए इस कर्तव्य और अकर्तव्य की व्यवस्था में शास्त्र ही प्रमाण है। ऐसा जानकर तू शास्त्र विधि से नियत कर्म ही करने योग्य है।
व्यक्ति के लिए कौन सा कर्म करने योग्य है और कौन सा नहीं इसका वर्णन श्रीकृष्ण के द्वारा अर्जुन के भ्रम को दूर करने हेतु दूसरे अध्याय में विस्तृत रूप से किया गया है। करने वाले कर्म ऐसे हैं जिनको करने से व्यक्ति स्वयं का तो भला करता हीं है साथ ही समाज का भी भला करता है। इन्हीं कर्मों को यँहा सोलहवें अध्याय में दैवी सम्पदा कहा गया है। इन कर्मों को करने से व्यक्ति भ्रम से दूर होता है और मोह, लोभ, क्रोध, ईर्ष्या आदि के वशीभूत होकर अपने कर्तव्यों को नहीं करता है। इस मार्ग पर चलने से उसका मन स्वक्ष होता है, बुद्धि और विवेक भी बिना किसी बाहरी दबाव के सही निर्णय लेने की स्थिति में होते हैं। ऐसा करने से व्यक्ति जिस मार्ग पर अग्रसर होता है वही उसकी मुक्ति का मार्ग है अर्थात उसके वे गुण जिनसे उसकी अज्ञानता समाप्त होती है, उसे मोह, भ्रम, लोभ, क्रोध, ईर्ष्या आदि से मुक्ति मिलती है वे उसे जो स्थिति देते हैं उसे ही परम् पद कहते हैं जिसमें व्यक्ति किसी अन्य बाहरी प्रभाव से कुछ नहीं करता है बल्कि वही करता है जो उसका उसकी स्थिति में उसका कर्म हैं।
इसके विपरीत नहीं करने वाले कर्म वे हैं जो आसुरी सम्पदाओं के प्रभाव में किये जाते हैं अर्थात जो माया, मोह, क्रोध, लोभ आदि के वश में होकर किये जाते हैं। इन आसुरी गुणों के प्रभाव में व्यक्ति अपने कर्तव्य के अनुसार निर्णय नहीं लेता हस बल्कि वह इन गुणों के प्रभाव वश निर्णय लेता है जो उसे न और न हीं समाज को सुख और शांति देते हैं।
इन बातों की समझ व्यक्ति में जिन माध्यमों से मिलती है उन्हें शास्त्र कहा गया है। व्यक्ति के ज्ञान को महान पुस्तकों में संजो कर रखा गया होता है, जिनका अध्ययन करने, श्रवण करने, उनपर विचार और मंथन करने और उनको आत्मसात करने और उनको व्यवहार में लाने से व्यक्ति सन्मार्गी कर्म जो उसके कर्तव्य के अनुरूप होते हैं करता है। सो हमें अपने कर्तव्य निर्वहन के लिए यही मार्ग चुनना चहिये।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्नीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन दैवासुरसम्पद्विभागयोगो नाम षोडशोऽध्यायः
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