श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 7

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 7

प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः।
न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते॥ ।।7।।

आसुर स्वभाव वाले मनुष्य प्रवृत्ति और निवृत्ति- इन दोनों को ही नहीं जानते। इसलिए उनमें न तो बाहर-भीतर की शुद्धि है, न श्रेष्ठ आचरण है और न सत्य भाषण ही है।

आसुरी प्रकृति तमोगुण की प्रचुरता का परिणाम होती है जिसमें तमोगुण के लक्षण
 बड़े प्रभावी ढंग से सामने आते हैं। हम क्रम से इनको इस प्रकार समझ सकते हैं-

1.जब मनुष्य में आसुरी प्रकृति का बोल बाला होता है तब वह मनुष्य अज्ञानता से भरा रहता है और वह यह नहीं समझ सकता है कि उसे क्या करना चाहिए अर्थात उसकी प्रवृत्ति क्या होनी चाहिए और उसे क्या नहीं करना चाहिए अर्थात उसकी निवृत्ति क्या होनी चाहिए। इस अवस्था में व्यक्ति इन्द्रियों के बेलगाम इक्षाओं का दास मात्र होता है जिनकी पूर्ति के लिए वह बुरा से बुरा कर्म करने के लिए भी तत्पर होता है। वह व्यक्ति मन, वचन और कर्म में शुद्धता के अभाव से ग्रस्त होकर व्यवहार करता है। ऐसे में उसका आचरण दुराचरण बनकर रह जाता है और वह अज्ञानता के वश में हुए सत्य से भगता है। ऐसे में वह अपने बल , बुद्धि का उपयोग लोगों को नुकसान करने के लिए करता है। 
जब व्यक्ति यही नहीं समझ पाए कि उसे क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए तो फिर आप उस व्यक्ति से कुछ सही करने की अपेक्षा भी कैसे कर सकते हैं। ऐसे में तो व्यक्ति अपनी इन्द्रियों की इक्षाओं की पूर्ति में ही लगा रहा कर कर्म करेगा जो निश्चित ही अस्तयगामी और दुराचार प्रकृति के होंगे। जब व्यक्ति अपने जीवन के लक्ष्य से अनजान होता है तो फिर उसके प्रयास भटकाव वाले ही होते हैं।

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