श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 6

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 6

द्वौ भूतसर्गौ लोकऽस्मिन्दैव आसुर एव च।
दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ में श्रृणु॥ ।।6।।

हे अर्जुन! इस लोक में भूतों की सृष्टि यानी मनुष्य समुदाय दो ही प्रकार का है, एक तो दैवी प्रकृति वाला और दूसरा आसुरी प्रकृति वाला। उनमें से दैवी प्रकृति वाला तो विस्तारपूर्वक कहा गया, अब तू आसुरी प्रकृति वाले मनुष्य समुदाय को भी विस्तारपूर्वक मुझसे सुन।

संसार मे प्राणियों की दो ही श्रेणी होती है , एक जिनमें दैवी गुणों की प्रचुररता होती है और दूसरे वे जिनमें आसुरी गुणों की प्रचुरता होती है। प्रत्येक मनुष्य में ये दोनों गुण होते हैं लेकिन इन गुणों का अनुपात सभी में भिन्न होता है तथा साथ ही सभी में इनको पहचानने की क्षमता भी अलग अलग होती है। हममें कौन से गुण अधिकता में हैं और हमें किन गुणों को अपनाने चाहिए यह तभी सम्भव होता है जब हम इन दोनों तरह के गुणों को पहचान पाने में सक्षम होते हैं। दैवी गुणों का विस्तृत परिचय प्राप्त करने के उपरांत आइये हम आसुरी गुणों को समझे।

Comments

Popular posts from this blog

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 35

Geeta Chapter 3.1

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14. परिचय