श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 5
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 5
दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता।
मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव॥ ।।5।।
दैवी सम्पदा मुक्ति के लिए और आसुरी सम्पदा बाँधने के लिए मानी गई है। इसलिए हे अर्जुन! तू शोक मत कर, क्योंकि तू दैवी सम्पदा को लेकर उत्पन्न हुआ है।
दैवी और आसुरी सम्पदाओं में फर्क यह है कि जँहा आसुरी सम्पदाएँ व्यक्ति को इस संसार से बांधे रहती हैं वहीं दैवी सम्पद व्यक्ति को संसार के बंधनों से छुड़ाकर उनकोऔर आगे मुक्ति की तरफ ले जाती हैं। ऐसा इसलिए होता क्योंकि आसुरी सम्पदाएँ सांसारिक चीजों से बन्धन और उनके प्रति मोह से निकलती हैं। हमारे अंदर सांसारिक चीजों, फिर चाहे वो भौतिक हों या अभौतिक के प्रति गहरा लगाव होता है जिसके कारण उनके लिए मोह, लोभ, क्रोध, ईर्ष्या आदि भाव हमारे मन में बने रहते हैं और इन भावों के अनुरूप ही हम कर्म करते करते उनसे और गहराई से बंधते जाते हैं।
इसके विपरीत जब इन बन्धनों से हमारा लगाव कम होते होते समाप्ति की तरफ अग्रसर होता है तब इनके प्रति हमारा लोभ, क्रोध, ईर्ष्या आदि के भाव समाप्त होते हैं और दैवी सम्पद बढ़ते जाते हैं। मूल चीज यह है कि हम स्वयं को सांसारिक चीजों से जितना बांधेंगे आसुरी सम्पदाएँ उतनी ही बढ़ेंगी और इनसे स्वयं को जितना विरागी करेंगे हमारी दैवी सम्पदाएँ बढ़ेंगी।
दरअसल व्यक्ति में ये दोनों ही होते हैं। जब व्यक्ति स्वध्याय , सत्संग, ज्ञान, कर्म, ध्यान और वैराग्य के अभ्यास से स्वयं को सांसारिक बन्धन से मुक्त करते जाता है तब उसके अंदर दैवी गुण बढ़ते जाते हैं। हम सभी को कभी निराश नहीं होना चाहिए क्योंकि हम सभी ही ऐसा करने में सक्षम हैं और मुक्ति की तरफ बढ़ सकते हैं।
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