श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 4

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 4

दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च।
अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम्‌॥ ।।4।।


हे पार्थ! दम्भ, घमण्ड और अभिमान तथा क्रोध, कठोरता और अज्ञान भी- ये सब आसुरी सम्पदा को लेकर उत्पन्न हुए पुरुष के लक्षण हैं।

         दैवी गुणों के विपरीत जो है वही आसुरी गुण हैं जो संक्षेप में दम्भ, घमण्ड, अभिमान , क्रोध, कठोरता एव अज्ञान हैं। 

दम्भ
     दम्भ यानी पाखंड। अर्थात व्यक्ति वास्तव में दैवी गुणों से रहित होते हुए भी यह प्रदर्शित करता है कि वह दैवी गुणों से युक्त है।इससे उस व्यक्ति के अंदर भी भ्रम यानी dellusion का जन्म होता है। ऐसा व्यक्ति दूसरों का जान बूझकर नुकसान करता है। ऐसा व्यक्ति वास्तव में कलुषित, हिंसक, होते हुए भी गलत मंशा से लोगों के सामने यह दिखाता है कि वह बहुत विनम्र है, सत्य भाषण करने वाला है, सात्विक व्यवहार करने वाला है। ऐसा नकारात्मक गुणों को सही दिखाने के लिए करते हैं । जबकि यदि नकारात्मकता को पहचान कर उसे दूर करने का प्रयास करने वाला अपनी नकारत्मकता से छुटकारा पा लेता है।

दर्प अर्थात घमण्ड
   स्वयं को श्रेष्ठ समझना और इसी के अनुरूप व्यवहार करना घमण्ड या दर्प है जिसके वशीभूत होकर व्यक्ति स्वयं को अपनी आर्थिक हैसियत, पारिवारिक पृष्ठभूमि, पद आदि के बल पर बड़ा और दूसरों को तुक्ष समझता है।

अतिमासन अथवा अभिमान
    स्वयं को महान मानने की प्रवृत्ति का होना अतिमान /अभिमान कहलाता है। स्वयं को उच्च मानना और यह भाव रखना कि दूसरे लोग उसकी उच्चता के अनुसार उससे व्यवहार करें। ऐसा व्यक्त आत्मकेंद्रित होता है।

क्रोध
    ऐसा व्यक्ति यह अपेक्षा करता है कि दूसरे लोग हमेशा उसी के अनुरूप रहें अन्यथा वह क्रोधित हो उठता है। क्रोध का सीधा सम्बन्ध इस बात से होता है कि वह व्यक्ति चाहता है कि हमेशा सभी चीजें उसी की इक्षा के अनुसार हो। यह क्रोध बुद्धि और विवेक, सोचने-समझने की क्षमता को समाप्त कर देता है और व्यक्ति को सोच के स्तर पर भी हिंसक बना देता है। 

    कठोरता अर्थात कठोर वचन का प्रयोग करना
        कठोर वाणी बोलकर इससे दूसरों को हमेशा दुख पहुँचाने की प्रवृत्ति होना। ऐसा व्यक्ति क्रोध, ईर्ष्या जैसी प्रवृत्तियों में जीवन व्यतीत करता है और हिंसक होता है।

    अज्ञानता
        स्वयं और ईश्वर से अनजान होना, जीवन और उसके लक्ष्य से अनजान बने रहना ही अज्ञानता है। अज्ञानता ही सभी आसुरी सम्पदाओं का कारण है।

ये सभी लक्षण व्यक्ति के अधार्मिक अथवा आसुरी होने के कारण होते हैं और उसे गलत मार्ग पर ले जाने वाले होते हैं।





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