श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 3
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 3
तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहोनातिमानिता।
भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत॥ ।।3।।
तेज (श्रेष्ठ पुरुषों की उस शक्ति का नाम 'तेज' है कि जिसके प्रभाव से उनके सामने विषयासक्त और नीच प्रकृति वाले मनुष्य भी प्रायः अन्यायाचरण से रुककर उनके कथनानुसार श्रेष्ठ कर्मों में प्रवृत्त हो जाते हैं), क्षमा, धैर्य, बाहर की शुद्धि (गीता अध्याय 13 श्लोक 7 की टिप्पणी देखनी चाहिए) एवं किसी में भी शत्रुभाव का न होना और अपने में पूज्यता के अभिमान का अभाव- ये सब तो हे अर्जुन! दैवी सम्पदा को लेकर उत्पन्न हुए पुरुष के लक्षण हैं।
21.तेज
व्यक्ति के व्यक्तित्व में जो ओज, ऊर्जा, जोश, उत्साह स्पष्टतः प्रकट रहता है वह उसका तेज है जो उसके अंदुरुनी और मानसिक शक्ति का द्योतक होता है। जब व्यक्ति सत्य, ईमान, अहिंसा, ज्ञान जैसे गुणों से लैस होता है और उसमें आत्मविश्वास होता है तो उसका तेज उसके व्यक्तित्व से झलकता है।
22.क्षमा
शक्ति होने के बावजूद दंड नहीं देना, बल्कि क्रोध, घृणा, हिंसा को छोड़कर गलती करने वाले को अन्य को उसकी गलती के लिए दण्ड नहीं देना। क्षमा अतीत से नहीं चिपके रहने का गुण है। ध्यान रहे कि क्षमा सहनशीलता नहीं है बल्कि व्यक्ति की वह क्षमता है जिसके कारण व्यक्ति हिंसा, क्रोध और घृणा रहित होकर दूसरे के द्वारा किये गए अपराध के लिए उस दूसरे को दंडित न कर उसे सुधनरे का अवसर देती है।
23.धृति अर्थात दृढ़ता
तमाम तरह के शारीरिक और मानसिक थकावट, बाधा, अवरोध, कठिनाई आदि के बावजूद उत्साह के साथ लक्ष्य की तरफ बढ़ते रहने की दृढ़ता। इसकी ऊर्जा व्यक्ति को किसी बाहरी तत्व से नहीं प्राप्त होती है बल्कि इसकी ऊर्जा हमें स्वयं से, अपने अंदर से प्राप्त होती है। धृति ही तप का स्रोत है और तप से एकाग्रता आती है, ध्यान लगता है और ध्यान से ज्ञान की प्राप्ति होती है।
24.शौच या शुष्टता
शरीर के साथ साथ मन, वचन, कर्म की शुद्धता भी परम् महत्व की होती है। मन वाणी और कर्म की शुद्धता के लिए इन्द्रिय संयम की अनिवार्यता होती है। व्यक्ति को न तो मन से, न ही बोली से , न ही कर्म से, न ही सोच से मैला होना चाहिए । किसी के प्रति अभद्र या कठोर वचन बोलने से अपना मन पहले दुखी होता है। साथ ही यह भी ध्यान रहे कि हर स्थिति या भाव को व्यक्त करने के लिए जब हम कठोर वचनों का ही प्रयोग करते हों तब जब वास्तविक रूप से कठोर परिस्थिति का सामना होता है तब उसे परिभाषित करने और उसका सामना करने के लिए हमारे अंदर कोई विवेक ही शेष नहीं रह जाता है।
25.अद्रोह, घृणा का अभाव
असहनशीलता क्रोध, नापसन्द, ईर्ष्या से प्रारम्भ हुई भावनाएँ घृणा तक पहुँच जाती हैं और यह घृणा असहनशीलता, क्रोध, नापसन्दगी, ईर्ष्या को और अंततः गलत रास्ते पर चलने की प्रवृत्ति को, हिंसा को आत्मनियन्त्रण के अभाव को , बुद्धिहीनता और अविवेक को , आवेश को बढ़ाती भी हैं। सो घृणा का अभाव होना ही चाहिए। सो क्रोध और क्रोध जनित भाव व्यक्ति के नियंत्रण में होने चाहिए।
26.अतिमानिता अथवा अभिमान का अभाव
अभिमान होने पर व्यक्ति स्वयं को अन्य से बड़ा समझने लगता है और अपने इस अभिमान को बनाये रखने के लिए उसके लिए जरूरी हो जाता है कि वह स्वयं को चापलूसों से घिरा रखे।ऐसा व्यक्ति स्वयं के अस्तित्व के लिए सदा दूसरों पर निर्भर करता है। अभिमान की रक्षा दूसरों को नीचा दिखाने से ही होती है। सो व्यक्ति में अभिमान का अभाव और विनम्रता की प्रचुरता होनी ही चाहिए।दरअसल प्रत्येक व्यक्ति अपने स्व के कारण स्वतः महान है ।जरूरत होती है प्रत्येक व्यक्ति को अपने दैवी गुणों को पहचानने और उनको माँजने की।
ये सब दैवी सम्पदा हैं , दैवी धन हैं जो हमारे अंदर हैं जिनके अभाव में हम वास्तव में दरिद्र और असक्त होते हैं। इन गुणों के अभाव में व्यक्ति जीवन में आगे बढ़ने में असमर्थ होता है। बाहरी उपलब्धियों के बावजूद यदि ये सम्पदा नहीं हैं तो फिर व्यक्ति वास्तव में दरिद्र ही नहीं बल्कि बहुत ही कमजोर भी है। इन गुणों का निरन्तर अभ्यास करने से मन के अंदर व्याप्त दुर्गुण दूर होते हीं हैं साथ ही व्यक्ति दैवी मार्ग पर अग्रसर होकर मोक्ष यानी निष्काम भाव से कर्म में प्रवृत्त होता है। इन्हीं गुणों के निरन्तर अभ्यास से व्यक्ति ईश्वरत्व को प्राप्त करता है। जब व्यक्ति मन , वचन और कर्म से इन गुणों का अपने व्यवहार में अनुसरण करता है तब उसके मन में असीम शांति और प्रफुलता का अनुभव होता है और और जिस ऊर्जा का संचार होता है उसके बल पर वह आने परिवेश को भी आह्लादित करता है। इन्हीं गुणों के आज के सामाजिक जीवन में कॉमन गुड की संज्ञा दी जाती है।
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