श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 1

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 1

श्रीभगवानुवाच
अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः।
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्‌॥ ।।1।।

श्री भगवान बोले- भय का सर्वथा अभाव, अन्तःकरण की पूर्ण निर्मलता, तत्त्वज्ञान के लिए ध्यान योग में निरन्तर दृढ़ स्थिति (परमात्मा के स्वरूप को तत्त्व से जानने के लिए सच्चिदानन्दघन परमात्मा के स्वरूप में एकी भाव से ध्यान की निरन्तर गाढ़ स्थिति का ही नाम 'ज्ञानयोगव्यवस्थिति' समझना चाहिए) और सात्त्विक दान (गीता अध्याय 17 श्लोक 20 में जिसका विस्तार किया है), इन्द्रियों का दमन, भगवान, देवता और गुरुजनों की पूजा तथा अग्निहोत्र आदि उत्तम कर्मों का आचरण एवं वेद-शास्त्रों का पठन-पाठन तथा भगवान्‌ के नाम और गुणों का कीर्तन, स्वधर्म पालन के लिए कष्टसहन और शरीर तथा इन्द्रियों के सहित अन्तःकरण की सरलता।
अभी तक हमने श्रीमद्भागवद्गीता में जो प्रशिक्षण प्राप्त किया है उसे समझने में, उसे दैनिक जीवन से जोड़ने में कभी कभी बुद्धि के स्तर पर  कठिनाई आ सकती है। इसीलिए अब आगे कल से हम सोलहवें अध्याय में हम देखेंगे कि किस प्रकार श्रीमद्भागवद्गीता की शिक्षाओं को हम व्यवहार के स्तर पर अपना सकते हैं।  तो आइए, कल से हम सोलहवें अध्याय का प्रशिक्षण प्रारम्भ करें। अब हम समझते हैं कि वे कौन से  व्यवहारगत गुण है। जिनको अपनाने से हम ज्ञान और कल्याण के मार्ग पर अग्रसर होते हैं। इन गुणों को ही दैवी गुण कहते हैं।

1.भय का सर्वथा अभाव अर्थात निर्भयता
        जब मन में भय होता है तो आगे बढ़ने की प्रवृत्ति  बाधित होता है। भय के कई कारण हैं, जैसे मोह, अज्ञानता, भेद,किसी सरोच सत्ता में  विश्वास का होना,अभाव। 
    भय का सीधा सम्बन्ध किसी से जुड़ाव से होता है। जितना अधिक जुड़ाव होता है उसे खोने का भय उतना ही अधिक होता है। भेद का अर्थ है कि जब हमें लगता है कि हम दूसरे से अलग हैं, ईश्वर से अलग हैं तो उस दूसरे से हमें भी होता है।  जब हममें खुद से बड़ी सत्ता का भरोसा होता है तो भी समाप्त हो जाता है।
भय से मुक्ति आवश्यक है। भय के  कारणों से मुक्त होने का मार्ग वैराग्य (dispassion) से होकर जाता है। वैराग्य सीधे भय को तो नहीं मरता है लेकिन वैराग से मोह अज्ञानता और भय समाप्त होते हैं। इसी प्रकट ज्ञान भेद का अभाव और विश्वास और समर्पण होने से भी भय समाप्त होता है। भय तभी समाप्त होता है जब यह जानते हैं कि हम वास्तव में कौन हैं।

2.मन की शुद्धता
     मन की शुद्धता का परिचायक है कि मन बिना किसी बाहरी कारण के प्रसन्नता का अनुभव करे। काम, क्रोध, लाभ, मोह, अहंकार और ईर्ष्या और इनसे जनित भाव में को अशांत करते हैं। मन में जिज्ञासा से भी मन को शांति मिलती है।मन की शुद्धि श्रवण, अध्ययन, चिंतन, प्रेम, स्नेह से आती है ।इस अवस्था में मन प्रसन्न होता है। 

3.ध्यानयोग 
     स्वयं के विषय में और स्वयं का ईश्वर के साथ के सम्बन्धों को जानना। यह ज्ञान ज्ञानी के साथ संसर्ग और स्वध्याय से आता है। और जब ज्ञान को अपने अनुभव से जानते हैं तो यह योग होता है। सो मन में जिज्ञासा से ज्ञानयोग की प्राप्ति होती है।

4.सात्विक दान
    दान का अर्थ है कि जो हमारे पास है, जैसे धन, बुद्धि, ज्ञान, बल, आदि को अपने परिवेश के साथ साझा करना। सो आपने कितना दिया यह मायने नहीं रखता बल्कि किस मंशा से साझा किया यह महत्वपूर्ण है। दान की प्रवृत्ति मोह, लोभ , क्रोश आदि से मुक्त करती है।

5.दमः
    दम का अर्थ है अपने इन्द्रियों पर नियंत्रण होना। अनियंत्रित इंद्रियाँ मन और शरीर दोनों को भटकाती रहती हैं और क्रोध, लोभ, ईर्ष्या, वासना, काम, हिंसा, असत्य भाषण आदि को जन्म देती रहती हैं सो इनपर विवेक का लगाम होना अति आवश्यक है।

6.यज्ञ 
    यज्ञ का अर्थ है सम्पूर्णता पर न्योछावर(sacrifice/offering) करना। सम्पूर्णता की भलाई के लिए अर्पित करना ही  यज्ञ है। जब हम कुछ लोगों के साथ कुछ साझा करते हैं तो दान कहलाता है लेकिन जब सम्पूर्णता के कल्याण हेतु कुछ अर्पित करते हैं(जैसे प्रार्थना, पूजा) तब यह यज्ञ कहलाता है।
   7.स्वध्याय
         नियमित रूप से  स्वयम अध्ययन करना, उनपर चिंतन करना, उनपर मनन करना। स्वध्याय जब तप के साथ होता है तब उसका परिणाम ज्यादा होता है। 

   8.तप
       तप का अर्थ है एकाग्रता, अपनी ऊर्जा को सञ्चित कर एकी भाव से एक उद्देश्य की प्राप्ति में लगाना। इसका एक उद्देश्य यह भी होता है कि हम स्वयं के बारे में जाने। और स्वयं के वास्तविक प्रकृति को अनुभव करना।
  9. स्पष्टवादिता
           भावना, सोच, कर्म और आचरण में एकरूपता होना  और उसमें स्वयं भी भरोसा होना चाहिए तब इसे स्पष्टवादिता कहते हैं। ऐसा एकीकृत व्यक्ति ही सन्मार्ग पर चलने के लायक होता है।

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