श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 15 (श्लोकरहित)

                                      श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 15(श्लोकरहित)


       सम्पूर्ण श्रीमद्भागवद्गीता में श्रीकृष्ण की शिक्षा आत्मा को पहचानने की प्रक्रिया को ही समझाती है, वह भी अलग अलग रूपको के माध्यम से तो कभी सीधे सीधे। एक व्यक्ति की सांसारिक पहचान उसके शरीर, मन और विवेक से निर्धारित होती है किंतु उस एक व्यक्ति के लिए उसकी वास्तविक पहचान उसके आत्मस्वरूप यानी उसके सेल्फ में निहित होती है जिसे उसे समझना है और जिसे समझे बिना वह स्वयं की स्थिति को समझ ही नहीं सकता है। श्रीमद्भागवद्गीता इसी ज्ञान को व्यक्ति को देने की शिक्षा है।
         अब पुनः एक ज्ञात से अज्ञात को समझाया गया है। और इस बार इसे वृक्ष का उदाहरण दे कर समझाया गया है। 

संसार को और संसार के साथ व्यक्ति के सम्बंध को समझाने के लिए वृक्ष की उपमा ली गई है। संसार की तुलना पीपल के बृक्ष से करते हुए जो समझाया गया है उसके अनुसार यह संसार नित्य होते हुए भी नित्य परिवर्तनशील है। इसका मूल परमात्मा की तरफ जाता है और इसके पत्तों को वेद की संज्ञा दी गई है। ध्यान देने योग्य बात है कि पत्तों से बृक्ष का पोषण होता है और यही काम संसार में वेद यानी ज्ञान का भी है। इस प्रकार ज्ञान इस संसार का ही वह ज्ञान है जो इसे पोषण भी देता है और ईश्वर से इसके सम्बन्धों को परिभाषित भी करता है। 


संसार और संसार में मनुष्य की स्थिति को समझाने हेतु संसार की तुलना वृक्ष (पीपल वृक्ष) से की गई है और इसी क्रम में समझाया गया है कि वृक्ष की शाखाओं को व्यक्ति की भिन्न भिन्न योनियों के रूप में समझा जा सकता है। ऊपर जाती शाखें सत्वगुण से प्रोत उच्च योनियों को इंगित करती हैं जबकि नीचे की तरफ जाती शाखाएँ तमोगुणी योनियों का प्रतीक हैं।  गुणों के अनुरूप ही व्यक्ति की योनि निर्धारित होती हैं। मात्र मुनष्य योनि में जन्म ले लेने से कोई बड़ा नहीं हो जाता है, बल्कि बड़ा तब होता है जब गुण बड़े हों यानी सत्वगुण सबसे ज्यादा हो, तब रजोगुण हों और तमोगुण अधम नीच योनियों का जन्मदाता होता है।
     इसी प्रकार कपोलें रूप, रस , रंग, गन्ध और स्पर्श को व्यक्त करती इंद्रियाँ सदृश्य हैं। कपोलें से नई शाखें निकलती हैं और इन्द्रियों से नित्य नई नई विषयभोगों की इक्षा आती है।
      मूल भूमि से बंधा होता है। मूल ही वृक्ष को टिका कर रखता हस। यही कामनाओं औए इक्षाओं का हाल होता है। व्यक्ति की कामनायें उसे उन कामनाओं की पूर्ति हेतु संसार से बाँध कर रखते हैं । यही कामनायें व्यक्ति को संसार में रत रखती हैं और उसे संसार से उखड़ने से रोकती हैं।


लेकिन एक बात जो अति महत्वपूर्ण है वह है कि संसार और संसार के साथ व्यक्ति के सम्बन्धों कों समझाने के लिए वृक्ष की उपमा दी गई है। व्यक्ति का कर्तव्य यह नहीं है कि वह इस प्रकार के वृक्ष को खोजने लगे। दरअसल संसार तो नित्य उपस्थित है किंतु यह नित्य परिवर्तनशील है । हम स्वप्न देखते हैं। स्वप्न होते तो हैं किंतु वे वास्तव में होते नहीं हैं और हम उन्हें पाते नहीं हैं। 
      तो फिर हम इस संसार रूपी वृक्ष का क्या करें? तो समझें कि इस नित्य परिवर्तनशील संसार से मुक्त कैसे हों। मुक्ति का मार्ग वैराग्य से गोकर जाता है। और वैराग्य क्या है? वैराग्य है संसार से इतर स्वयं पर केंद्रित होकर आत्म स्वरूप को पहचानना। किंरु जब तक कामाएँ हैं वे कामनायें हमें संसार में कर्मों के माध्यम से लिपट रखती हीं हैं।सो इन कामनाओं से मुक्ति ही वह शास्त्र है जिसके द्वारा व्यक्ति संसार रूपी वृक्ष को काटकर उससे मुक्त होता है। 


संसार को वृक्ष के रूप में हमने समझा। और ततपश्चात यह भी समझा है कि इस वृक्ष से कैसे पार पाना है। कामनाओं से उपजे कर्म हमें वृक्ष की जड़ों की तरह संसार से बाँध कर रखती है। सो जैसे जैसे कामनाओं पर हमारा नियंत्रण होते जाता है हमारे कर्म भी नियंत्रित होते जाते हैं और यही वैराग्य की तरफ बढ़ना होता है। जब कामनाओं से मुक्ति मिल जाती है तो वैराग्यव की अवस्था आ जाती है। 
      वैराग्य प्राप्ति के बाद क्या? वैराग्य प्राप्ति के बाद हमें स्वयं की  आत्मा की तरफ लौटना होता है। यही हमें उस परम पिता के पास ले जाता है जो इस संसार का नियामक है। अपने स्व में लौटने का अर्थ है अपने ध्यान को अपनी परम् चेतना पर टिकाना जो हमारा सम्बन्ध परमेश्वर से जोड़ता है। हमारी चेतना जब आत्म केंद्रित नहीं रहकर बाहर भागती है हम संसार की कामनाओं से बँधते हैं लेकिन जब कामनाओं से मुक्त होकर हम आत्मकेंद्रित होते हैं तो संसार में रहकर भी संसार से मुक्त हो कर उस  चैतन्य के प्रति सजग हो जाते हैं जो इस संसार का निमित्त है। यह सब कुछ हमारी चेतना की अवस्था पर निर्भर करता है और चैतन्य के प्रति हमारी आत्मचेतना हमें संसार चक्र से मुक्त करती है।

श्रीमद्भागवद्गीता के दूसरे अध्याय से लगातार बार बार व्यक्ति के स्थायी मुक्ति का मार्ग सुझाया गया है । यह शिक्षा बार बार अलग अलग शब्दावली में अलग अलग अलग रूपकों के माध्यम से दी गई है। कँही पण्डित, तो कँही स्थितप्रज्ञ कहा गया है। कभी कर्मयोग, कभी ज्ञानयोग, कभी भक्तियोग तो कभी गुणों के द्वारा भी यही एक बात समझाई गई है कि कैसे व्यक्ति स्थाई रूप से दुखों से मुक्त हो कर आत्म अवस्थित हो सकता है। आत्मा में अवस्थित होना ही परमात्मा की प्राप्ति का मार्ग बतलाया गया है। यानी यदि व्यक्ति स्वयं को पहचान लेता है तो परमात्मा को पा लेता है।
इस पन्द्रहवें अध्याय में भी यही समझाया गया है और पुनः वैराग और समर्पण को मुक्ति का मार्ग बतलाया गया है । इस मार्ग पर कैसे चलें इसे स्पष्ट करते हुए कहा गया है कि  मान और मोह से मुक्ति, सँगतदोष से आजादी, अध्यात्म के अनुसरण, कामनाओं से मुक्ति और द्वंदात्मक युग्मों से मुक्ति वे कदम हैं जिनको उठाने से वैराग और समर्पण का मार्ग पकड़ में आता है जो आत्मसाक्षात्कार तक ले जाता है जँहा व्यक्ति परमात्मा में विलीन हो जाता है।
    मोह भ्रम है और मान अपने ईगो का पैमाना यानी स्केल है। देह, मन और बुद्धि से हम जो प्राप्त करते हैं हम खुद को उसी के अनुरूप आँकते है और यदि कोई हमारे उस आकलन का अतिक्रमण कर हमें कम आँकता है तो हम आहत होते हैं या क्रोधित होते हैं। मोह से हम अपने इसी आकलन से बंधकर रह जाते हैं और उसके आगे नहीं देख पाते और नहीं समझ पाते हैं कि हम मात्र मन , बुद्धि और शरीर भर नहीं है बल्कि इनसे आगे भी हमारी चेतना है जिसे हमें पाना है। सो व्यक्ति को चाहिए कि वह भ्रम के जाल से बाहर आकर मान-अपमान से ऊपर उठे।
    संगत में प्रेम और अपेक्षा का योग होता है। अपेक्षाएं हमें वासना, क्रोध, ईर्ष्या, आदि से बांधती हैं और प्रेम दूषित हो जाता है, समर्पण नष्ट हो जाता है। सो व्यक्ति को संगदोष यानी अपेक्षाओं से मुक्त प्रेम करने का अभ्यास करना चाहिए।
     कामनाएँ व्यक्ति को उनकी पूर्ति के लिए कर्मों से बाँधती हैं और इक्षाओं की पूर्ति होने या नहीं होने से व्यक्ति लोभ, क्रोध, ईर्ष्या, हिंसा आदि में लिप्त होता है। सो कर्मफल से मुक्त कर्मों को करने का अभ्यास करना चाहिए।
     अध्यात्म आत्मज्ञान का मार्ग है यानी वह ज्ञान जो स्वयम को पहचानने का है और व्यक्ति को इसके अनुसरण का अभ्यास करना चाहिए। 
     द्वंदात्मक युग्म वे गुण हैं जो विपरीत होते हुए भी साथ साथ होते हैं, जैसे पाप-पुण्य, सुख-दुख, हार-जीत, आदि। इन द्वंदात्मक युग्मों में व्यक्ति को समान भाव रखने का अभ्यास करना चाहिए।
     ये वे मार्ग हैं जिनपर चलकर व्यक्ति वैराग्य की तरफ बढ़ता है और समर्पण के साथ आत्मसाक्षात्कार की तरफ बढ़ता है।

इस प्रकार वैराग्य और समर्पण के मार्ग पर चलता हुआ व्यक्ति जिस स्थिति को प्राप्त करता है वही ईश्वरत्व है। यानी माया, मोह, इक्षा, द्वंद्व, को त्याग कर प्रेम और अध्यात्म के मार्ग चलने वाला व्यक्ति संसार के कर्म बन्धन से मुक्त होकर ईश्वरत्व यानी परम् पद को प्राप्त करता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि ईश्वर की प्राप्ति कँही बाहरी दुनिया में नहीं है और अति सरल भाषा में कहें तो यही की जिसने स्वयं के सत्य को पा लिया वही ईश्वर को पा लिया। यँहा सूर्य और चंद्रमा की स्थिति भी गौण है यानी इस स्थिति को किसी अन्य बाहरी तरीके से नहीं देखा जाना जा सकता है। एक ही मार्ग है जिसे कहा गया है।


प्राणी ईश्वर का ही रूप है, ईश्वर का ही एक प्रतिरूप है। यह शिक्षा सभी प्राणियों को एक सूत्र में पिरोती है। इस संसार में जीवों में कोई भेद नहीं होता है। सभी समान रूप से समान हैं और यह शिक्षा भेदों को मिटाती है।



जीव की यात्रा एक शरीर तक सीमित नहीं होता है। व्यक्ति के  सञ्चित और अर्जित संस्कार देह त्याग से खत्म नहीं होते हैं बल्कि जीव के देह त्याग के पश्चात ये एक शरीर से दूसरे शरीर तक की यात्रा कर नए देह में , नए जीवन में प्रवेश करता है। इसका तातपर्य क्या है? इसका तातपर्य है कि जीवन एक शरीर तक सीमित नहीं होता है। मृत्यु जीवन का अंत नहीं बल्कि एक शरीर  का अवसान मात्र है। लेकिन एक जीवन में हम जो भी करते हैं उनसे जो संस्कार प्राप्त होते हैं वे समाप्त नहीं होते हैं। यह तथ्य जीव के जीवन का आधार आत्मा के होने का परिचायक है। 



मन और इन्द्रियों का प्राणियों के जीवन में बहुत ही महत्व है क्योंकि यह मन एयर इंद्रियाँ ही हैं जिनके माध्यम से प्राणी संसार की अनुभूति करता है और इन्हीं से विवेक को विकसित करता है और ज्ञान को आत्मसात करता है और विवेक और ज्ञान के सहारे कर्म करता हुआ इन्द्रियों के प्रभाव से स्वयम को मुक्त भी करता है।।


विवेक और ज्ञान ही व्यक्ति का उद्धारक होता है क्योंकि इन्हीं के माध्यम से व्यक्ति स्वयम को जान पाता है। स्वयं को पाने के लिए कोई नियत समय या उम्र नहीं है बल्कि ज्ञान और विवेक के माध्यम से व्यक्ति जीवन के किसी भी पड़ाव पर स्वयं के सत्य को प्राप्त कर सकता है।


स्वयं को जानना और अपनी आत्मा को प्राप्त करना किसके लिए सम्भव होता है? श्रीमद्भागवद्गीता में बारम्बार इस प्रश्न को उठाया जाता रहा है और हर बार एक ही मार्ग बतलाया जाता है भले ही कहने समझाने के तरीके में भिन्नता होती है। वह एकमात्र मार्ग के कुछ अनिवार्य तत्व हैं। पहला तो यह कि व्यक्ति के मन से अन्य सारी इक्षाएँ समाप्त हो चुकी हो और मात्र अपनी आत्मा और उसी के सहारे सहारे परमात्मा से जुड़ने की इक्षा शेष रह गई हो। दूसरा कि उसे वैराग्य मार्ग की जानकारी हो ताकि वह अपने जीवन में ही समस्त बन्धनों से मुक्त होकर एक ही लक्ष्य के प्रति समर्पित होकर रहे। और तीसरा यह कि यह मार्ग वह स्वयं समर्पित होकर चुने न कि किसी बाहरी लोभ लालच, भय, दबाव आदि से।
जब तक कोई व्यक्ति इन शर्तों को पूरा नहीं करता है उसे अपनी आत्मा और तदुपरांत परमात्मा की प्राप्ति नहीं हो सकती है।



आत्मसाक्षात्कार का मार्ग जानने के उपरांत उस मार्ग पर चलने वाले पथिक को ईश्वर की अनुभूति समस्त जगत में व्याप्त होती है। उस व्यक्ति को संसार की हर विभूति में ईश्वरीय उपस्थिति का अनुभव होता है। सूर्य के प्रकाश और तेज, चन्द्रमा की शीतलता और तेज , पृथ्वी और पृथ्वी पर उपस्थित समस्त प्राणियों, जीवों और वनस्पतियों में उसे एक समान ईश्वरीय अनुभूति होती है। जीवन की सार्थकता को अपने स्व में पहचानने और पाने वाले को हर चर और अचर में एक ही ईश्वर के उपस्थिति का ज्ञान होता है। संसार की हर जानी और अन्जानी  विभूति ईश्वर के कारण है और उन्हीं की उपस्थिति को बताती और अनुभव कराती है।
       प्राणियों के श्वास में भी ईश्वर का ही वास है और उसकी क्रियायँ जिससे उसे जीवित रहने की ऊर्जा मिलती है यानी पाचन वह भी ईश्वर ही है। ईश्वर ही प्राणी की स्मृति, उसका ज्ञान और बुद्धि विवेक भी है और वही एकमात्र जानने योग्य ज्ञान भी।
      इस प्रकार हम देखते हैं कि प्राणियों से दूरस्थ स्थित सूर्य चन्द्रमा से लेकर  पृथ्वी पर उसके समीप की अग्नि और उससे भी समीप उसका अपना श्वास से लेलर उसकी दैहिक और मानसिक सभी क्रियाओं और उसके समस्त ज्ञान ईश्वर की ही देन हैं। इस प्रकार हम समझते हैं कि ईश्वर और कँही नहीं बल्कि हमारे ही अंदर है और उसे समझने पाने का मार्ग भी हम ही हैं और लक्ष्य भी हम ही हैं। अपने प्रत्येक क्षमता और अपने से बाहर के प्रत्येक विभूति के लिए ईश्वर का कृतज्ञ होकर हम अपने स्व यानी अपनी आत्मा को पहचान पा सकते हैं और समझ सकते हैं कि हम वह नहीं हैं जो हमारी दुनियादारी है बल्कि हम वो हैं जिसे ईश्वर ने अपने अंश के रूप में गढ़ा है और इसलिए हमारा परम् कर्तव्य है कि हम अपने उस स्वरूप को प्राप्त करें जो ईश्वरीय है और जिसे पाना ही ईश्वर के साथ एकाकार होना है।
    व्यक्ति के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य होता है कि वह स्वयं को जान समझ पाए। सामान्य तौर पर व्यक्ति स्वयं को शरीर, मन बुद्धि और विवेक से बना एक पिंड समझता है लेकिन इससे वह तय नहीं कर पाता है कि वह अपनी पूर्णता को कैसे प्राप्त कर सके। श्रीमद्भागवद्गीता के भिन्न भिन्न अध्यायाओं में भिन्न भिन्न तरीके से इस प्रश्न का उत्तर दिया गया है। सबका मूल तत्व एक ही है कि व्यक्ति अपने स्व के स्तर पर समान है और उस सूक्ष्म स्तर पर वह ईश्वरत्व से पूर्ण है। किंतु इस सत्य तक पहुँचने का मार्ग उसे सूझता नहीं है तो हर बार अलग अलग तरीके से उसे वैराग्य यानी मोह, माया, संगत आदि से ऊपर उठकर आत्मसमर्पण से ईश्वर की शरण में जाने का ही पाठ पढ़ाया गया है। प्रश्न उठता है कि इस मार्ग से पहुंचेगे कैसे। सो व्यक्ति ईश्वर को अपने से भिन्न किसी सत्ता को समझता है। उसे लगता है कि ईश्वर उससे बाहर कँही और रहता है। इसी हेतु उसे स्वयं से बहुत दूर सूर्य , चन्द्रमा से लेकर पहाड़, नदी आदि सभी बाहरी तत्वों में ईश्वर की उपस्थिति का ज्ञान दिया गया है। किंतु जैसे जैसे व्यक्ति स्वयं के समीप आता है उसे ज्ञात होता है कि ईश्वर तो उसके भीतर ही है बस जरूरत है उन विभूतियों को जिनको वह बाहर खोज रहा होता है उन्हें स्वयं के अंदर खोजने की। जब उन विभूतियों को जो सत्य, अहिंसा, प्रेम, समर्पण, दया , क्षमा , प्रकाश, शीतलता , तेज, ताप आदि को इंगित करते हैं उनको अपने अंदर पाते जाता है उसे ईश्वरत्व की प्राप्ति होते जाती है। जब तक वह बाहर के भरोसे रहता है तब तक उसके लिए ईश्वर दूर की सत्ता होती है लेकिन जब वह स्वयं के अंदर के भरोसे होता है तब उसे स्वयं में ईश्वरीय प्रकाश की , ईश्वरीय सत्ता की अनुभूति प्रकट होने लगती है।


यह संसार दो प्रकार के पुरुषों से बना होता है, एक है क्षर पुरुष और दूसरा है अक्षर पुरुष। पुरुष वो है जो पुर यानी शरीर/महल/किला/शहर में रहता है। यँहा क्षर और अक्षर पुरुष का विभाजन समझने के लिए पूर्व में वर्णित प्रकृति और पुरुष, परा और अपरा प्रकृति , क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ, प्रकृति और चेतना को समझना होगा।इन्हीं युग्मों को यँहा क्षर और अक्षर पुरुष कहा गया है। एक जो पदार्थ है, निरन्तर परिवर्तनशील, वही क्षर है, प्रकृति है, माया है, अपरा प्रकृति है, क्षेत्र और जो नित्य अपरिवर्तनीय है वही अक्षर है, पुरुष है, परा प्रकृति है, क्षेत्रज्ञ है , चेतना है। इन्हीं युग्मों से संसार का निर्माण होता है। देखने के लिए तो संसार में अनेकों जीव हैं, लेकिन प्रत्येक में यही दो हैं। इस प्रकार हम अनेक से एक कि तरफ की यात्रा करते हैं, सत्य को समझने के लिए। वर्तमान में हम अनेक को मात्र दो में पाते हैं और अंततः एक की प्राप्ति ही ज्ञान प्राप्ति का लक्ष्य है। और दोनों एक दूसरे पर निर्भर हैं। पदार्थ/अपरा प्रकृति/प्रकृति/माया/क्षेत्र/क्षर की समझ चेतना पर निर्भर है। यदि चेतना का अभाव है, यदि पुरुष/परा प्रकृति/क्षेत्रज्ञ/अक्षर नहीं हो तो फिर क्षर की समझ ही नहीं होगी। इसी प्रकार चेतना/पुरुष/अक्षर/परा प्रकृति अपने अनुभवों के लिए क्षर पर निर्भर है जिसके अभाव में चेतना शून्य में विचरती है। लेकिन यह अक्षर पुरुष इन अनुभवों से दूषित नहीं होता है। जब क्षर के अनुभवों से अक्षर दूषित होता है तो उस समय सभी कुछ अलग अलग प्रतीत होते हैं , अनेक का भान होता है। लेकिन अनेक से एक की यात्रा में अनेक से दो की समझ का पड़ाव अति महत्वपूर्ण है क्योंकि यंही से एकात्म की यात्रा यानी स्व की प्राप्ति के लिए  अंतिम यात्रा प्रारम्भ होती है।



अनेक से दो तक की यात्रा पूरी करने के उपरांत व्यक्ति को एकमात्र सत्य की यात्रा करनी है। सम्पूर्ण संसार को क्षर और अक्षर में समझने के उपरांत हमें यह भी समझना होता है कि यह क्षर अक्षर से भिन्न नहीं है बल्कि उसी अक्षर में समाहित है। क्षर प्रकृति सिर्फ जानने या देखने योग्य ही नहीं है बल्कि वह तो स्वयं ही उस ज्ञान अथवा दृष्टि का ही अंश है क्योंकि जब तक वह ज्ञान नहीं है, जब तक वह द्रष्टा ही नहीं है तो फिर जानने योग्य या देखने योग्य कँहा से हो सकती है। और इस प्रकार हमारा मूल अस्तित्व कँही शून्य में नहीं विचर रहा होता है बल्कि वह तो हमारे ही अंदर अंतर्निहित है। सर्वप्रथम हम किसी दूरस्थ स्थित शक्ति को अपना स्वामी, अपना प्रभु समझ कर उससे अलग रह कर उसकी आराधना करते हैं। तब परमात्मा क्षर और अक्षर से भी अलग सत्ता होती है हमारे लिए। फिर हमें ज्ञान होता है कि प्रभु तो कण कण में विद्यमान हैं और तब हमें ज्ञान होता है कि प्रभु तो हमारे भीतर भी हैं, हमारे सम्पूर्ण अस्तित्व में हैं। तब ईश्वर हमारे लिए और समीप होते हैं लेकिन फिर भी हम ईश्वर को स्वयं से भिन्न सत्ता के रूप में हीं स्वीकारते हैं। किन्तु जब इस सत्य का ज्ञान होता है कि हमारी परम् चेतना ही हमारा ईश है तब हमें ज्ञात होता है कि ईश्वर कोई अन्य नहीं हम स्वयं है लेकिन तब यह स्वयं का भाव मिट चुका होता है। न तो हमारा कुछ है और न ही हमारा पराया कुछ है। सब कुछ हममे है और हम सब कुछ में हैं। ईश्वर के साथ यही संयोग हमारे अहम को ईश्वर में विलीन कर देता है तब सम्पूर्ण दृश्य और अदृश्य जगत ईश्वरमयी हो जाता है, न कोई हमसे अलग है और न हम किसी से अलग हैं। यही परमात्मा हमारे तीनों लोकों, हमारी जागृत, स्वप्न और सुसुप्त अवस्था का नियामक होता है। तब न कोई जानने योग्य , न कोई जानने वाला और न कोई जानना अलग अलग रह जाते हैं बल्कि सभी एक परम् आत्मा में समाहित हमारे स्व में विलीन हो जाते हैं।


यह उत्तम परुष क्षर और अक्षय से भी परे होता है औए इन दोनों का स्रोत होता है। इसी वजह से यह पुरूषोत्तम है। यह पुरुषोत्तम पुरुष कोई और नहीं यही सभी का स्व है। इसे अपने अक्षर अथवा चेतना से स्वयं के अंदर ही पाया जा सकता है। चेतना जब शरीर, बुद्धि और विवेक से परे होती है और अपने शुद्धतम अवस्था में ही मूल चेतना होती है और तभी मूल स्व को पहचानी है जो उत्तमपुरुष कहलाता है। सम्पूर्ण चेष्टा और ज्ञान इसी स्व से आते हैं, इसी परम् चेतना से आते हैं। यही पुरूषोत्तम व्यक्ति की वास्तविकता है जो उसके शरीर, बुद्धि, विवेक और समस्त इन्द्रियों के परे कलुषित अवस्था में है और जिसे सम्पूर्ण संसार के प्रति पूर्ण प्रेम से पाया जाता है। जब समपर्ण, श्रद्धा और ध्यान का योग होता है और व्यक्ति अपने क्षर प्रकृति से लिपट अपनी अक्षर चेतना को अलग कर उसे शुद्ध अवस्था में देखता और अनुभव करता है तो वही उसका उत्तम पुरुष की अवस्था है जो समस्त ज्ञान का स्रोत भी होता है।


संसार से मोक्ष किसे मिलता है अर्थात संसार में रहकर भी संसार के बंधनों से कौन मुक्त होता है? जो व्यक्ति संसार को क्षर और अक्षर पुरुष के युग्म से परे अपने स्व को पाता है और समझता है कि उसका वास्तविक अस्तित्व उस उत्तम पुरुष का है जो संसार को क्षर और अक्षर के संयोग से आगे यह समझता है कि ये दोनों भी एक ही परम् के अंग है और जो परम् पुरुष अर्थात पुरूषोत्तम उसके मूल स्व का ही अंश है वही इस मोक्ष को प्राप्त करता है। वह पुरुष और प्रकृति से मुक्त होकर उत्तम पुरुष की श्रेणी को प्राप्त हुआ होता है। श्रद्धा, भक्ति और ध्यान के योग से निष्काम कर्मयोगी ही इस अवस्था को प्राप्त करता है। वह पुरुष सर्वज्ञाता है और उसके जीवन में मात्र एक स्व का ही महत्व होता है सो वह निरन्तर उसी एक परम् आत्मा के ध्यान में रहता है। वह व्यक्ति अपने शरीर, बुद्धि, विवेक से परे सम्पूर्ण संसार को एक स्व का ही विस्तार मानता है और इस प्रकार सम्पूर्ण संसार को एक परमात्मा की ही अभिव्यक्ति मानता है। यही ईश्वर का भजन है।

       इस प्रकार जीवन के रहस्य को समझने वाला ही ज्ञानी और परम् मोक्ष प्राप्त व्यक्ति होता है। इस प्रकार स्व को सही सही समझने वाला ही मोक्ष को प्राप्त होता है।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन संवादे पुरुषोत्तमयोगो नाम पञ्चदशोऽध्यायः ।

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