गुणातीत का लक्षण और गुणातीत होने का मार्ग

गुणातीत का लक्षण और गुणातीत होने का मार्ग


जब यह स्पष्ट है कि गुणों से आगे जाकर यानी गुणों से ऊपर उठकर अर्थात गुणों से मुक्त होकर ही व्यक्ति आत्मा को यानी अपनी चेतना से मिल पाता है, पुरुष प्रकृति से भिन्न स्वयम को पुनः स्थापित कर पाता है तो जो बहुत स्वाभाविक प्रश्न तो उठते हीं हैं मन में कि
1.जो व्यक्ति प्रकृति से भिन्न मात्र पुरुष की स्थिति वाला होता है यानी उसमें गुण नहीं रह जाते हैं मात्र उसकी चेतना यानी आत्मा ही होता है वैसे व्यक्ति को पहचानने के क्या लक्षण होते हैं?

2.ऐसे व्यक्ति का आचरण यानी व्यवहार कैसा होता है?

3.और वो कौन सी विधि है जिससे यह अवस्था प्राप्त की जा सकती है?

        इन प्रश्नों का उत्तर पाकर ही व्यक्ति गुणों से मुक्त होने के मार्ग पर बढ़ सकता है। ध्यान रहे कि इसी तरह का प्रश्न अध्याय 2 में स्थितप्रज्ञ व्यक्ति के सम्बन्ध में भी पूछा गया है और वँहा भी इसपर चर्चा हुई है।


गुणातीत व्यक्ति उस  व्यक्ति को कहते हैं जो सभी गुणों की उपस्थिति या अनुपस्थिति से अप्रभावित होता है। ऐसा व्यक्ति
 सत्त्वगुण के कार्यरूप प्रकाश यानी अन्तःकरण और इन्द्रियादि को आलस्य का अभाव होकर जो एक प्रकार की चेतनता को, 
और रजोगुण के कार्यरूप प्रवृत्ति को 
तथा तमोगुण के कार्यरूप मोह यानी निद्रा और आलस्य आदि की बहुलता से अन्तःकरण और इन्द्रियों में चेतन शक्ति के लय होने  को 
भी न तो प्रवृत्त होने पर उनसे द्वेष करता है और न निवृत्त होने पर उनकी आकांक्षा करता है। 
        इस प्रकार का व्यक्ति जो  एक सच्चिदानन्दघन परमात्मा में ही नित्य, एकीभाव से स्थित हुआ इस त्रिगुणमयी माया के प्रपंच रूप संसार से सर्वथा अतीत हो गया है, उस गुणातीत पुरुष के अभिमानरहित अन्तःकरण में तीनों गुणों के कार्यरूप प्रकाश, प्रवृत्ति और मोहादि वृत्तियों के प्रकट होने और न होने पर किसी काल में भी इच्छा-द्वेष आदि विकार नहीं होते हैं।
          ऐसा नहीं है कि गुणों से पार हुए व्यक्ति के जीवन से गतिविधियाँ समाप्त हो जाती हैं। उसके जीवन में तीनों गुण अपना अपना कार्य उस व्यक्ति की ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों के द्वारा करते रहते हैं। लेकिन वह व्यक्ति इन गुणों और उनके कार्यों में लिप्त नहीं होता है बल्कि उनसे पूरी तरह से अलग रहता है। जो कुछ उसके मन , बुद्धि, विवेक और शरीर से हो रहा है उनके प्रति उसे न तो कोई मोह होता है न ही दुराव बल्कि वह तो इन कार्यों को इन्द्रियों की स्वाभाविक गति मानकर उन्हें होते हुए देखता भर है।

गुणातीत व्यक्ति यह समझता है कि प्रकृति में सारी क्रियाएँ चलती रहेंगी लेकिन वह यह बात भी समझता है कि जो कुछ हो रहा होता है उसमें उसका कोई योगदान नहीं है बल्कि सब कुछ तीन गुणों के परस्पर संयोग से घटित हो रहा है । गुणों के इस संयोग से वह स्वयं को अलग रखता है यानी भले वह गुणों की परस्पर क्रियाओं के बीच रहता है लेकिन गुणों से अछूता रहता है। वह मात्र द्रष्टा होता है। गुणों के प्रभाव से न तो वह उत्साहित होता है न ही हतोत्साहित।  वह जानता है कि वह है तब भी यह सब संसार में चलता रहेगा, वह नहीं है तब भी यह सब होते रहेगा। यानी वह जानता है कि वह इन घट रही घटनाओं का कर्ता वह नहीं है बल्कि गुण हैं और गुण उससे अलग हैं। 

जो व्यक्ति गुणों के प्रभाव में होता है वह स्वयं को गुणों  और उनके प्रभाव से आँकता है। उसे लगता है कि जो कुछ हो रहा है वह सब उससे सम्बन्धित है। वह अपनी पहचान को गुणों और उनके परिणामों के दर्पण में देखता है।
   किन्तु हमें ध्यान रखना चाहिए कि प्रकाश का अस्तित्व वस्तु पर निर्भर नहीं करता है। यह सही है कि जब प्रकाश पुन्ज किसी वस्तु पर पड़ता है तो वस्तु दिखती है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं हुआ कि वह वस्तु प्रकाश के अस्तित्व का कारण है। प्रकाश तो है हीं बस हमें उसका भान नहीं हो रहा होता है। जैसे कोइ वस्तु उसके मार्ग में पड़ता है हमें लगता है कि प्रकाश दिख रहा है। यही भ्रम है जो सत्य को सामने नहीं आने देता है। पुरुष प्रकृति से भिन्न है और प्रकृति के बिना भी उसका अस्तित्व उसी तरह से है। बस होता यह है कि पुरुष की उपस्थिति से प्रकृति का रूप रंग सामने आ जाता है। लेकिन इसका तातपर्य यह नहीं है कि प्रकृति के कारण पुरुष का अस्तित्व है। 
        गुणातीत व्यक्ति समझता है कि जो गुण और उसके प्रभाव व्यक्त हो रहें हैं वे उसके पुरुष भाग के कारण नहीं हैं बल्कि पुरुष भाग यानी चेतना की उपस्थिति के कारण गुण और गुणों के प्रभाव परिलक्षित हो रहें हैं। इसी कारण से गुणों से पार हुआ व्यक्त सुख और दुख में समान रहता है, मिट्टी, पत्थर और स्वर्ण को समान समझता है, प्रिय और अप्रिय दोनों के प्रति एकी भाव से रहता है और अपनी निंदा और स्तुति से उसपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। उसे ज्ञात होता है कि ये सब कुछ उसके नहीं हैं बल्कि गुणों के हैं और वह मात्र उनको घटित होते देखने का अधिकारी है।
      
जब व्यक्ति यह समझता है कि उसके कर्म और उसकी क्रिया-प्रतिक्रिया मात्र गुणों की अभिव्यक्ति भर है और उसकी चेतना को इससे कोई लेना देना नहीं है तो ऐसी स्थिति में व्यक्ति यह समझता है कि उससे जो भी कार्य हो रहें हैं वे मात्र उसके गुणों की अवस्था के द्योतक भर हैं तब वह व्यक्ति इस दर्प से मुक्त रहता है कि वह कर्ता है। उसे पता होता है कि इन्द्रियाँ स्वाभाविक रूप से गुणों की अवस्था को अभिव्यक्त कर रहीं हैं। ऐसी स्थिति में व्यक्ति को किसी भी कार्य में न तो सम्मान का अनुभव होता है और न हीं अपमान का। साथ ही उसके लिए न तो कोई प्रिय है न अप्रिय, बल्कि सबों के लिए वह सम्भाव में ही रहता है।

गुणों से और उनके प्रभावों से पार पाने का एक मार्ग भक्ति भी है। ऐसी भक्ति जिसमें अपने आराध्य पर अटल भरोसा होता है,  जिसके प्रति श्रद्धा सर्वोपरि होता है और जिससे अटूट प्रेम होता है। भक्त के अंदर न तो कोई अभिमान होता है , न ही उसे आराध्य से कोई स्वार्थ ही होता है। जब व्यक्ति परम् समर्पण की स्थिति में आ जाता है तो फिर उसके सारे स्वार्थ, उसका समस्त अभिमान समाप्त हो जाता है और वह तब बिना किसी कारण के ही आराध्य पर अटूट विश्वास और उनके प्रति अगाध श्रद्धा और प्रेम रखने लगता है। तब न तो उसके अंदर गुणों का कोई असर रह जाता है और न उन गुणों के परिणाम का। यही अवस्था तो गुणातीत की अवस्था होती है। और यही परम् ब्रह्म यानी आराध्य में विलीन होकर "अहम ब्रह्नस्मि" की अवस्था होती है।

व्यक्ति के जीवन में गुणों की भूमिका को जानने के बाद और यह जानने के बाद कि इन गुणों से आगे बढ़कर चलने से व्यक्ति ब्रह्मलीन की अवस्था को प्राप्त करता है यह जानना भी आवश्यक है कि आखिर व्यक्ति को इस प्रयास की आवश्यकता क्या है। दरअसल व्यक्ति को अपने गुणों पर और उनके प्रभावों पर जीत हासिल करने पर जो पद प्राप्त होता है वह ईश्वरीय पद हीं है। और इसका महत्व इस वजह से क्योंकि इसी अवस्था में नित्य धर्म, उस स्थिति का जिसमें अजरता होती है, जिसमें समस्त ज्ञान भी होता और जिस अवस्था में प्राप्त आनंद बिना किसी कारण के अखण्ड होता है वह प्राप्त होता है। जब व्यक्ति अपने सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण से आगे निकल जाता है तो उसका नाश शरीर की मृत्यु के बाद भी नहीं होता है, उसके समस्त कर्म और आचरण धर्म अनुरूप होते हैं और उसके आननद का कोई बाहरी कारण नहीं होता अपितु वह इस अवस्था में सिर्फ आनंदित ही हो पाता है , दुख उसे हो ही नहीं सकते हैं।
      दरअसल गुणातीत होने का तात्पर्य है कि व्यक्ति गुणों और उनके प्रभाव से स्वयं को मुक्त कर ले। अति सामान्य भाषा में समझने तो इसका तात्पर्य है कि व्यक्ति बाहरी प्रभावों से मुक्त होकर अपने भावों और भावनाओं पर नियंत्रण रखना सीख ले। यह कई तरह से हो सकता है, ज्ञान मार्ग से, कर्मयोग से और भक्तियोग से भी। भक्ति का विशेष उल्लेख यँहा किया गया है। वस्तुतः भक्ति में मन एक मात्र आराध्य पर टिक जाता है और यह समझने लगता है कि जो कुछ है वह तो उसके आराध्य का प्रसाद  मात्र है, सो कुछ भी न तो बुरा है न अच्छा बल्कि जैसा है बस है। इस भाव में व्यक्ति की कलुषित भावनाएँ स्वतः नष्ट हो जाती हैं और उसके अंदर अपने आराध्य की भक्ति के कारण मात्र प्रेम, क्षमा, सेवा, सत्य , अहिंसा जैसे भाव ही रह जाते हैं। यहीं तो पहुँचना है।
    




      



        

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