श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 15 श्लोक 8
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 15 श्लोक 8
शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः।
गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात्॥ ।।8।।
वायु गन्ध के स्थान से गन्ध को जैसे ग्रहण करके ले जाता है, वैसे ही देहादिका स्वामी जीवात्मा भी जिस शरीर का त्याग करता है, उससे इन मन सहित इन्द्रियों को ग्रहण करके फिर जिस शरीर को प्राप्त होता है- उसमें जाता है।
जीव की यात्रा एक शरीर तक सीमित नहीं होता है। व्यक्ति के सञ्चित और अर्जित संस्कार देह त्याग से खत्म नहीं होते हैं बल्कि जीव के देह त्याग के पश्चात ये एक शरीर से दूसरे शरीर तक की यात्रा कर नए देह में , नए जीवन में प्रवेश करता है। इसका तातपर्य क्या है? इसका तातपर्य है कि जीवन एक शरीर तक सीमित नहीं होता है। मृत्यु जीवन का अंत नहीं बल्कि एक शरीर का अवसान मात्र है। लेकिन एक जीवन में हम जो भी करते हैं उनसे जो संस्कार प्राप्त होते हैं वे समाप्त नहीं होते हैं। यह तथ्य जीव के जीवन का आधार आत्मा के होने का परिचायक है।
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