श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 15 श्लोक 5

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 15 श्लोक 5

निर्मानमोहा जितसङ्गदोषाअध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसञ्ज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्‌॥ ।।5।।

जिनका मान और मोह नष्ट हो गया है, जिन्होंने आसक्ति रूप दोष को जीत लिया है, जिनकी परमात्मा के स्वरूप में नित्य स्थिति है और जिनकी कामनाएँ पूर्ण रूप से नष्ट हो गई हैं- वे सुख-दुःख नामक द्वन्द्वों से विमुक्त ज्ञानीजन उस अविनाशी परम पद को प्राप्त होते हैं।

श्रीमद्भागवद्गीता के दूसरे अध्याय से लगातार बार बार व्यक्ति के स्थायी मुक्ति का मार्ग सुझाया गया है । यह शिक्षा बार बार अलग अलग शब्दावली में अलग अलग अलग रूपकों के माध्यम से दी गई है। कँही पण्डित, तो कँही स्थितप्रज्ञ कहा गया है। कभी कर्मयोग, कभी ज्ञानयोग, कभी भक्तियोग तो कभी गुणों के द्वारा भी यही एक बात समझाई गई है कि कैसे व्यक्ति स्थाई रूप से दुखों से मुक्त हो कर आत्म अवस्थित हो सकता है। आत्मा में अवस्थित होना ही परमात्मा की प्राप्ति का मार्ग बतलाया गया है। यानी यदि व्यक्ति स्वयं को पहचान लेता है तो परमात्मा को पा लेता है।
इस पन्द्रहवें अध्याय में भी यही समझाया गया है और पुनः वैराग और समर्पण को मुक्ति का मार्ग बतलाया गया है । इस मार्ग पर कैसे चलें इसे स्पष्ट करते हुए कहा गया है कि  मान और मोह से मुक्ति, सँगतदोष से आजादी, अध्यात्म के अनुसरण, कामनाओं से मुक्ति और द्वंदात्मक युग्मों से मुक्ति वे कदम हैं जिनको उठाने से वैराग और समर्पण का मार्ग पकड़ में आता है जो आत्मसाक्षात्कार तक ले जाता है जँहा व्यक्ति परमात्मा में विलीन हो जाता है।
    मोह भ्रम है और मान अपने ईगो का पैमाना यानी स्केल है। देह, मन और बुद्धि से हम जो प्राप्त करते हैं हम खुद को उसी के अनुरूप आँकते है और यदि कोई हमारे उस आकलन का अतिक्रमण कर हमें कम आँकता है तो हम आहत होते हैं या क्रोधित होते हैं। मोह से हम अपने इसी आकलन से बंधकर रह जाते हैं और उसके आगे नहीं देख पाते और नहीं समझ पाते हैं कि हम मात्र मन , बुद्धि और शरीर भर नहीं है बल्कि इनसे आगे भी हमारी चेतना है जिसे हमें पाना है। सो व्यक्ति को चाहिए कि वह भ्रम के जाल से बाहर आकर मान-अपमान से ऊपर उठे।
    संगत में प्रेम और अपेक्षा का योग होता है। अपेक्षाएं हमें वासना, क्रोध, ईर्ष्या, आदि से बांधती हैं और प्रेम दूषित हो जाता है, समर्पण नष्ट हो जाता है। सो व्यक्ति को संगदोष यानी अपेक्षाओं से मुक्त प्रेम करने का अभ्यास करना चाहिए।
     कामनाएँ व्यक्ति को उनकी पूर्ति के लिए कर्मों से बाँधती हैं और इक्षाओं की पूर्ति होने या नहीं होने से व्यक्ति लोभ, क्रोध, ईर्ष्या, हिंसा आदि में लिप्त होता है। सो कर्मफल से मुक्त कर्मों को करने का अभ्यास करना चाहिए।
     अध्यात्म आत्मज्ञान का मार्ग है यानी वह ज्ञान जो स्वयम को पहचानने का है और व्यक्ति को इसके अनुसरण का अभ्यास करना चाहिए। 
     द्वंदात्मक युग्म वे गुण हैं जो विपरीत होते हुए भी साथ साथ होते हैं, जैसे पाप-पुण्य, सुख-दुख, हार-जीत, आदि। इन द्वंदात्मक युग्मों में व्यक्ति को समान भाव रखने का अभ्यास करना चाहिए।
     ये वे मार्ग हैं जिनपर चलकर व्यक्ति वैराग्य की तरफ बढ़ता है और समर्पण के साथ आत्मसाक्षात्कार की तरफ बढ़ता है।

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