श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 15 श्लोक 4
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 15 श्लोक 4
ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः।
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी॥ ।।4।।
उसके पश्चात उस परम-पदरूप परमेश्वर को भलीभाँति खोजना चाहिए, जिसमें गए हुए पुरुष फिर लौटकर संसार में नहीं आते और जिस परमेश्वर से इस पुरातन संसार वृक्ष की प्रवृत्ति विस्तार को प्राप्त हुई है, उसी आदिपुरुष नारायण के मैं शरण हूँ- इस प्रकार दृढ़ निश्चय करके उस परमेश्वर का मनन और निदिध्यासन करना चाहिए।
संसार को वृक्ष के रूप में हमने समझा। और ततपश्चात यह भी समझा है कि इस वृक्ष से कैसे पार पाना है। कामनाओं से उपजे कर्म हमें वृक्ष की जड़ों की तरह संसार से बाँध कर रखती है। सो जैसे जैसे कामनाओं पर हमारा नियंत्रण होते जाता है हमारे कर्म भी नियंत्रित होते जाते हैं और यही वैराग्य की तरफ बढ़ना होता है। जब कामनाओं से मुक्ति मिल जाती है तो वैराग्यव की अवस्था आ जाती है।
वैराग्य प्राप्ति के बाद क्या? वैराग्य प्राप्ति के बाद हमें स्वयं की आत्मा की तरफ लौटना होता है। यही हमें उस परम पिता के पास ले जाता है जो इस संसार का नियामक है। अपने स्व में लौटने का अर्थ है अपने ध्यान को अपनी परम् चेतना पर टिकाना जो हमारा सम्बन्ध परमेश्वर से जोड़ता है। हमारी चेतना जब आत्म केंद्रित नहीं रहकर बाहर भागती है हम संसार की कामनाओं से बँधते हैं लेकिन जब कामनाओं से मुक्त होकर हम आत्मकेंद्रित होते हैं तो संसार में रहकर भी संसार से मुक्त हो कर उस चैतन्य के प्रति सजग हो जाते हैं जो इस संसार का निमित्त है। यह सब कुछ हमारी चेतना की अवस्था पर निर्भर करता है और चैतन्य के प्रति हमारी आत्मचेतना हमें संसार चक्र से मुक्त करती है।
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