श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 15 श्लोक 1
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 15 श्लोक 1
ऊर्ध्वमूलमधः शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्॥ ।।1।।
श्री भगवान बोले- आदिपुरुष परमेश्वर रूप मूल वाले और ब्रह्मारूप मुख्य शाखा वाले जिस संसार रूप पीपल वृक्ष को अविनाशी ।इस वृक्ष का मूल कारण परमात्मा अविनाशी है तथा अनादिकाल से इसकी परम्परा चली आती है, इसलिए इस संसार वृक्ष को 'अविनाशी' कहते हैं कहते हैं, तथा वेद जिसके पत्ते कहे गए हैं, उस संसार रूप वृक्ष को जो पुरुष मूलसहित सत्त्व से जानता है, वह वेद के तात्पर्य को जानने वाला है। ।
संसार को और संसार के साथ व्यक्ति के सम्बंध को समझाने के लिए वृक्ष की उपमा ली गई है। संसार की तुलना पीपल के बृक्ष से करते हुए जो समझाया गया है उसके अनुसार यह संसार नित्य होते हुए भी नित्य परिवर्तनशील है। इसका मूल परमात्मा की तरफ जाता है और इसके पत्तों को वेद की संज्ञा दी गई है। ध्यान देने योग्य बात है कि पत्तों से बृक्ष का पोषण होता है और यही काम संसार में वेद यानी ज्ञान का भी है। इस प्रकार ज्ञान इस संसार का ही वह ज्ञान है जो इसे पोषण भी देता है और ईश्वर से इसके सम्बन्धों को परिभाषित भी करता है।
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