श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 27
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 27
ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च।
शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च॥ ।।27।।
क्योंकि उस अविनाशी परब्रह्म का और अमृत का तथा नित्य धर्म का और अखण्ड एकरस आनन्द का आश्रय मैं हूँ।
व्यक्ति के जीवन में गुणों की भूमिका को जानने के बाद और यह जानने के बाद कि इन गुणों से आगे बढ़कर चलने से व्यक्ति ब्रह्मलीन की अवस्था को प्राप्त करता है यह जानना भी आवश्यक है कि आखिर व्यक्ति को इस प्रयास की आवश्यकता क्या है। दरअसल व्यक्ति को अपने गुणों पर और उनके प्रभावों पर जीत हासिल करने पर जो पद प्राप्त होता है वह ईश्वरीय पद हीं है। और इसका महत्व इस वजह से क्योंकि इसी अवस्था में नित्य धर्म, उस स्थिति का जिसमें अजरता होती है, जिसमें समस्त ज्ञान भी होता और जिस अवस्था में प्राप्त आनंद बिना किसी कारण के अखण्ड होता है वह प्राप्त होता है। जब व्यक्ति अपने सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण से आगे निकल जाता है तो उसका नाश शरीर की मृत्यु के बाद भी नहीं होता है, उसके समस्त कर्म और आचरण धर्म अनुरूप होते हैं और उसके आननद का कोई बाहरी कारण नहीं होता अपितु वह इस अवस्था में सिर्फ आनंदित ही हो पाता है , दुख उसे हो ही नहीं सकते हैं।
इस प्रकार इस अध्याय में गुण, उनके प्रभाव और उनसे मुक्ति का मार्ग और मुक्ति के बाद कि अवस्था का सम्पूर्ण विवरण मिल जाता है।
दरअसल गुणातीत होने का तात्पर्य है कि व्यक्ति गुणों और उनके प्रभाव से स्वयं को मुक्त कर ले। अति सामान्य भाषा में समझने तो इसका तात्पर्य है कि व्यक्ति बाहरी प्रभावों से मुक्त होकर अपने भावों और भावनाओं पर नियंत्रण रखना सीख ले। यह कई तरह से हो सकता है, ज्ञान मार्ग से, कर्मयोग से और भक्तियोग से भी। भक्ति का विशेष उल्लेख यँहा किया गया है। वस्तुतः भक्ति में मन एक मात्र आराध्य पर टिक जाता है और यह समझने लगता है कि जो कुछ है वह तो उसके आराध्य का प्रसाद मात्र है, सो कुछ भी न तो बुरा है न अच्छा बल्कि जैसा है बस है। इस भाव में व्यक्ति की कलुषित भावनाएँ स्वतः नष्ट हो जाती हैं और उसके अंदर अपने आराध्य की भक्ति के कारण मात्र प्रेम, क्षमा, सेवा, सत्य , अहिंसा जैसे भाव ही रह जाते हैं। यहीं तो पहुँचना है।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायांयोगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे गुणत्रयविभागयोगो नामचतुर्दशोऽध्यायः
Comments
Post a Comment