श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 26
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 26
मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते।
स गुणान्समतीत्येतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते॥ ।।26।।
और जो पुरुष अव्यभिचारी भक्ति योग (केवल एक सर्वशक्तिमान परमेश्वर वासुदेव भगवान को ही अपना स्वामी मानता हुआ, स्वार्थ और अभिमान को त्याग कर श्रद्धा और भाव सहित परम प्रेम से निरन्तर चिन्तन करने को 'अव्यभिचारी भक्तियोग' कहते हैं) द्वारा मुझको निरन्तर भजता है, वह भी इन तीनों गुणों को भलीभाँति लाँघकर सच्चिदानन्दघन ब्रह्म को प्राप्त होने के लिए योग्य बन जाता है।
गुणों से और उनके प्रभावों से पार पाने का एक मार्ग भक्ति भी है। ऐसी भक्ति जिसमें अपने आराध्य पर अटल भरोसा होता है, जिसके प्रति श्रद्धा सर्वोपरि होता है और जिससे अटूट प्रेम होता है। भक्त के अंदर न तो कोई अभिमान होता है , न ही उसे आराध्य से कोई स्वार्थ ही होता है। जब व्यक्ति परम् समर्पण की स्थिति में आ जाता है तो फिर उसके सारे स्वार्थ, उसका समस्त अभिमान समाप्त हो जाता है और वह तब बिना किसी कारण के ही आराध्य पर अटूट विश्वास और उनके प्रति अगाध श्रद्धा और प्रेम रखने लगता है। तब न तो उसके अंदर गुणों का कोई असर रह जाता है और न उन गुणों के परिणाम का। यही अवस्था तो गुणातीत की अवस्था होती है। और यही परम् ब्रह्म यानी आराध्य में विलीन होकर "अहम ब्रह्नस्मि" की अवस्था होती है।
Comments
Post a Comment