श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 25
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 25
मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः।
सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः सा उच्यते॥ ।।25।।
जो मान और अपमान में सम है, मित्र और वैरी के पक्ष में भी सम है एवं सम्पूर्ण आरम्भों में कर्तापन के अभिमान से रहित है, वह पुरुष गुणातीत कहा जाता है।
जब व्यक्ति यह समझता है कि उसके कर्म और उसकी क्रिया-प्रतिक्रिया मात्र गुणों की अभिव्यक्ति भर है और उसकी चेतना को इससे कोई लेना देना नहीं है तो ऐसी स्थिति में व्यक्ति यह समझता है कि उससे जो भी कार्य हो रहें हैं वे मात्र उसके गुणों की अवस्था के द्योतक भर हैं तब वह व्यक्ति इस दर्प से मुक्त रहता है कि वह कर्ता है। उसे पता होता है कि इन्द्रियाँ स्वाभाविक रूप से गुणों की अवस्था को अभिव्यक्त कर रहीं हैं। ऐसी स्थिति में व्यक्ति को किसी भी कार्य में न तो सम्मान का अनुभव होता है और न हीं अपमान का। साथ ही उसके लिए न तो कोई प्रिय है न अप्रिय, बल्कि सबों के लिए वह सम्भाव में ही रहता है।
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