श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 19
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 19
नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति।
गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति॥ ।।19।।
जिस समय दृष्टा तीनों गुणों के अतिरिक्त अन्य किसी को कर्ता नहीं देखता और तीनों गुणों से अत्यन्त परे सच्चिदानन्दघनस्वरूप मुझ परमात्मा को तत्त्व से जानता है, उस समय वह मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है
श्रीमद्भागवद्गीता के तेरहवें और चौदहवें अध्याय में बताया गया है कि किस प्रकार प्रकृति और पुरुष(क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ) एक दूसरे से बन्धे होते हैं। पुरुष यानी चेतना मूल रूप से साक्षी मात्र है। प्रकृति गुणों से युक्त होतो है। ये तीन गुण होते हैं, सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण। प्रकृति में सारा कुछ इन्हीं तीन गुणों के कारण घटित होता रहता है। पुरुष बस बना हुआ इन घट रही चीजों का द्रष्टा मात्र होता है अपने मूल रूप में। लेकिन जब प्रकृति से पुरुष का मेल होता है तो यही पुरुष अपनी द्रष्टा की भूमिका को गँवा देता है और गुणों और उनके कारण उतपन्न होने वाले परिणामों को भोगने लगता है। उस पुरुष को, उस चेतना को गुण जनित हर्ष, विषाद, सुख दुख आदि अपने साथ घटित होते लगते हैं। पुरुष द्रष्टा से भोक्ता हो जाता है। प्रकृति के गुणों और उनके परिणामों की परत पुरुष यानी चेतना पर चढ़ जाती है। जिस क्षेत्रज्ञ को क्षेत्र का ज्ञाता होना चाहिए था वही क्षेत्रज्ञ उस क्षेत्र का भागीदार बन जाता है। यही कारण है कि पुरुष को उसके मूल रूप में आने के लिए इन गुणों और गुण फलों से मुक्त होना होता है और इसे ही सनातन धर्म की भाषा में मोक्ष कहते हैं।
अब प्रश्न उठता है कि पुरुष प्रकृति के साथ बना रहकर भी प्रकृति के गुणों से मुक्त हो तो कैसे हो। इसके लिए आवश्यक है कि व्यक्ति प्रकृति के तीनों गुणों और उनके कारणों और उनके फलों को पहले समझे। इसी समझ के बूते वह अभ्यास द्वारा गुणों के सोपान को चढ़ते चढ़ते गुणातीत होता है यानी गुणों से मुक्त होता है। बिना गुणों, उनके कारणों और उनके परिणाम को जाने व्यक्ति तमोगुण से रजोगुण और रजोगुण से सत्वगुण की यात्रा पूरी नहीं कर सकता है। दरअसल अभ्यास की यह पूरी प्रक्रिया एक तरह से छानने (फिल्टरेशन) की प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति एक एक कर अपने गुणों से मुक्त होता है। सर्वप्रथम उसे सबसे अनुपयोगी गुणों से मुक्त होना होता है और शनैः शनैः वह एक एक कर सभी गुणों और उनके प्रभावों से मुक्त होता है।
जब हम कुछ करते हैं तो उस कार्य के साथ हमारा इंटेलक्ट भी जुड़ जाता है और हम उस कार्य के प्रति सचेत हो जाते हैं यानी हमारी चेतना भी उससे जुड़ जाती है। इसके कारण हमें लगता है कि ये कार्य हम कर रहें हैं, मैं कर रहा हूँ। जैसे ही मैं का भाव आता है हमारा अहंकार जागृत हो उठता है। ऐसे में हमारी भिन्न भिन्न भावनाएँ भी उस कार्य से जुड़ जाती हैं। हम तुलना करना शुरू कर देते हैं। इस प्रकार जो कार्य हो रहा है उससे हमारी चेतना जुड़ जाती है और इस बन्धन की वजह से हम प्रकृति से बन्ध जाते हैं। वह कार्य जो स्वाभाविक रूप से होता उससे हमारी चेतना के जुड़ जाने के कारण उसपर हम उस कार्य से ऐसे बन्ध जाते हैं मानो हमी उसे कर रहें हों।
इस बन्धन से मुक्त होने का मार्ग है कि हमारी चेतना इन घट रहे कार्यों से जुड़े नहीं बल्कि निरपेक्ष भाव से बिना किसी बन्धन के(बिना जजमेंटल हुए) कर्मों को होता हुआ देखे। यानी मात्र द्रष्टा भाव से बना रहे, साक्षी रहे। साक्षी को अपना इंटेलक्ट इन कर्मों से जुड़ने न दे। उदाहरण के तौर पर साँस का चलना ले सकते हैं। जब हम मात्र साँस के आने जाने पर ध्यान केंद्रित करते हैं तो एक एक कर हमारे गुण हमारे अंदर आते जाते हैं। धीरे धीरे अभ्यास पूर्वक हम उनसे खुद को मुक्त करें ।जब हम मात्र इस बात से अवगत हो जाते हैं कि कर्म अपनी मति और गति से हो रहें हैं , उनमें मेरा कोई योगदान नहीं है , हम तो बस उन कर्मों के साक्षी मात्र हैं तो उस अवस्था में हम जो साक्षी मात्र हैं वही ईश्वर है जो बिना प्रकृति से बन्धे मात्र द्रष्टा है, साक्षी है।
दरअसल हम जो कुछ ""मैं"" ""मेरा"" अनुभव कर रहे होते हैं वह हमारी चेतना का गुणों से जुड़ने के कारण ही होता है । गुणों से मुक्त जो स्व की चेतना होती है उसी अवस्था में व्यक्ति ईश्वर के साथ हो जाता है । यही अवस्था अहम ब्रह्मास्मि की है।
Comments
Post a Comment