श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 9 एवं 10
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 9 एवं 10
सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत।
ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्युत॥ ।।9।।
हे अर्जुन! सत्त्वगुण सुख में लगाता है और रजोगुण कर्म में तथा तमोगुण तो ज्ञान को ढँककर प्रमाद में भी लगाता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 10
रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत।
रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा॥ ।।10।।
हे अर्जुन! रजोगुण और तमोगुण को दबाकर सत्त्वगुण, सत्त्वगुण और तमोगुण को दबाकर रजोगुण, वैसे ही सत्त्वगुण और रजोगुण को दबाकर तमोगुण होता है अर्थात बढ़ता है।
प्रत्येक मनुष्य में प्रकृति के तीनों गुण, सत्वगुण, रजोगुण सुर तमोगुण होते हैं जो व्यक्ति की प्रकृति को उसके चेतना यानी पुरुष से बांधते हैं। व्यक्ति की प्रवृति इन तीन गुणों की आनुपातिक बहुलता पर निर्भर करता है। जिस गुण की बहुलता होती है उसी के अनुसार व्यक्ति का आचरण होता है। किंतु कोई भी व्यक्ति एक ही गुण से नहीं बंधा होता है बल्कि उसमें होते तो तीनों गुण हैं लेकिन कोई एक बहुलता में होता है। साथ ही यह भी ध्यान देने योग्य तथ्य है कि अलग अलग समय पर एक ही व्यक्ति के ये तीन गुण अलग अलग बहुलता में होते हैं। यानी कोई व्यक्ति सदा एक ही गुण से नहीं बंधा होता है। किंतु व्यक्ति की प्रवृत्ति इस पर निर्भर करती है कि वह कितने समय किस गुण के प्रभाव में होता है।
जब व्यक्ति में सत्वगुण की बहुलता होती है और अन्य गुण अनुपात में कम होते हैं तो उस समय व्यक्ति बिना किसी बाहरी कारण के भी मन की शांत अवस्था और उस शांत मन में सुख का अनुभव करता है। सत्वगुण के प्रभाव से व्यक्ति का मन शांत होता है।(वह ट्रांक्विलिटी की अवस्था में होता है) । कोलाहल से दूर होकर मन प्रसन्नता का अनुभव करता है किंतु उसे यह प्रसन्नता किसी बाहरी चीज से नहीं मिलती है, बल्कि मन की शांत अवस्था से मिलती है। कहा भी जाता है कि यह अवस्था सुख-शांति की होती है यानी आंतरिक शांति सुख का कारण होती है। यह अवस्था भी व्यक्ति की प्रकृति को उसके चेतना से बाँधती ही है क्योंकि व्यक्ति सुख को स्वयं से अलग समझता है जिसे प्राप्त करना उसका लक्ष्य होता है और इस कारण वह सुख से बन्धन महसूस करता है।
जब व्यक्ति के अंदर रजोगुण की बहुलता होती है तो इक्षाओं और कामनाओं की उतपत्ति होती है। व्यक्ति अपने ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों के द्वारा इन कामनाओं की पूर्ति के लिए उद्द्यत होता है। परिणाम में व्यक्ति क्रियाशील होता है, जब रजोगुण की प्रचुरता होती है।
इन दोनों के विपरीत तमोगुण की बहुलता की स्थिति में व्यक्ति आलस्य और प्रमाद से भर जाता है। इस अवस्था में ज्ञान का अभाव हो जाता है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति सोने उद्देश्यों से भी अनजाना होता है। उसके अंदर लापरवाही का भाव होता है। सो वह न तो मन में शांति ही महसूस कर पाता है और न ही इक्षाओं की पूर्ति के लिए इन्द्रियों से क्रियाशील हो पाता है है।
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