श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 24

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 24

समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः।
तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः॥ ।।24।।


जो निरन्तर आत्म भाव में स्थित, दुःख-सुख को समान समझने वाला, मिट्टी, पत्थर और स्वर्ण में समान भाव वाला, ज्ञानी, प्रिय तथा अप्रिय को एक-सा मानने वाला और अपनी निन्दा-स्तुति में भी समान भाव वाला है।

जो व्यक्ति गुणों के प्रभाव में होता है वह स्वयं को गुणों  और उनके प्रभाव से आँकता है। उसे लगता है कि जो कुछ हो रहा है वह सब उससे सम्बन्धित है। वह अपनी पहचान को गुणों और उनके परिणामों के दर्पण में देखता है।
   किन्तु हमें ध्यान रखना चाहिए कि प्रकाश का अस्तित्व वस्तु पर निर्भर नहीं करता है। यह सही है कि जब प्रकाश पुन्ज किसी वस्तु पर पड़ता है तो वस्तु दिखती है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं हुआ कि वह वस्तु प्रकाश के अस्तित्व का कारण है। प्रकाश तो है हीं बस हमें उसका भान नहीं हो रहा होता है। जैसे कोइ वस्तु उसके मार्ग में पड़ता है हमें लगता है कि प्रकाश दिख रहा है। यही भ्रम है जो सत्य को सामने नहीं आने देता है। पुरुष प्रकृति से भिन्न है और प्रकृति के बिना भी उसका अस्तित्व उसी तरह से है। बस होता यह है कि पुरुष की उपस्थिति से प्रकृति का रूप रंग सामने आ जाता है। लेकिन इसका तातपर्य यह नहीं है कि प्रकृति के कारण पुरुष का अस्तित्व है। 
        गुणातीत व्यक्ति समझता है कि जो गुण और उसके प्रभाव व्यक्त हो रहें हैं वे उसके पुरुष भाग के कारण नहीं हैं बल्कि पुरुष भाग यानी चेतना की उपस्थिति के कारण गुण और गुणों के प्रभाव परिलक्षित हो रहें हैं। इसी कारण से गुणों से पार हुआ व्यक्त सुख और दुख में समान रहता है, मिट्टी, पत्थर और स्वर्ण को समान समझता है, प्रिय और अप्रिय दोनों के प्रति एकी भाव से रहता है और अपनी निंदा और स्तुति से उसपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। उसे ज्ञात होता है कि ये सब कुछ उसके नहीं हैं बल्कि गुणों के हैं और वह मात्र उनको घटित होते देखने का अधिकारी है।

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