श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 23
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 23
उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते।
गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते॥ ।।23।।
जो साक्षी के सदृश स्थित हुआ गुणों द्वारा विचलित नहीं किया जा सकता और गुण ही गुणों में बरतते (त्रिगुणमयी माया से उत्पन्न हुए अन्तःकरण सहित इन्द्रियों का अपने-अपने विषयों में विचरना ही 'गुणों का गुणों में बरतना' है) हैं- ऐसा समझता हुआ जो सच्चिदानन्दघन परमात्मा में एकीभाव से स्थित रहता है एवं उस स्थिति से कभी विचलित नहीं होता है।
गुणातीत व्यक्ति यह समझता है कि प्रकृति में सारी क्रियाएँ चलती रहेंगी लेकिन वह यह बात भी समझता है कि जो कुछ हो रहा होता है उसमें उसका कोई योगदान नहीं है बल्कि सब कुछ तीन गुणों के परस्पर संयोग से घटित हो रहा है । गुणों के इस संयोग से वह स्वयं को अलग रखता है यानी भले वह गुणों की परस्पर क्रियाओं के बीच रहता है लेकिन गुणों से अछूता रहता है। वह मात्र द्रष्टा होता है। गुणों के प्रभाव से न तो वह उत्साहित होता है न ही हतोत्साहित। वह जानता है कि वह है तब भी यह सब संसार में चलता रहेगा, वह नहीं है तब भी यह सब होते रहेगा। यानी वह जानता है कि वह इन घट रही घटनाओं का कर्ता वह नहीं है बल्कि गुण हैं और गुण उससे अलग हैं।
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