श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 20
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 20
जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते॥ ।।20।।
यह पुरुष शरीर की उत्पत्ति के कारणरूप इन तीनों गुणों को उल्लंघन करके जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था और सब प्रकार के दुःखों से मुक्त हुआ परमानन्द को प्राप्त होता है।
गुणों के सम्बंध में जब समझ प्राप्त होती है तब गुणों से मुक्ति का मार्ग दिखता है। गुणों से मुक्ति ही चैतन्य की प्राप्ति होती है। मनुष्य का शरीर जिन तत्वों से बना होता है वे हैं बुद्धि, अहंकार और मन तथा पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच भूत, पाँच इन्द्रियों के विषय। इस प्रकार इन तेईस तत्त्वों का पिण्ड रूप यह स्थूल शरीर प्रकृति से उत्पन्न होने वाले गुणों का ही कार्य है, इसलिए इन तीनों गुणों को इसी की उत्पत्ति का कारण कहा है।
इन सभी की अभिव्यक्ति गुणों के कारण ही होती है। सुख दुख, रोग, कष्ट, हर्ष विषाद आदि जितने तरह के अनुभव हैं ये सब शरीर, मन, बुद्धि और विवेक की अवस्थाएँ भर हैं जो गुणों से व्यक्त होती हैं परंतु इनमें से कोई मेरा नहीं है यानी इनमें से कोई मेरी आत्मा का नहीं है । ये सब गुणों के माध्यम से शरीर, मन, बुद्धि और विवेक से जुड़े होते हैं चेतना से नहीं। शरीर तो मात्र पिंड भर है। अंधेरे में उपलब्ध वस्तु का कोई अस्तित्व नहीं होता है किंतु जब उस अंधेरे में एक प्रकाशपुंज उस वस्तु पर गिरता है तो उस वस्तु का जिसका अँधेरे में कोई अस्तित्व नहीं था प्रकाश पड़ते उसका अस्तित्व सामने आ जाता है। इसी प्रकार शरीर का तब तक कोई अस्तित्व नहीं होता है जब तक उसे चेतना की प्राप्ति नहीं होती है। जैसे प्रकाश वह वस्तु नहीं होती है जिसे वह प्रकाशित कर जिसे वह अस्तित्व प्रदान कर रही होती है लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि प्रकाश और वस्तु एक ही है। लेकिन यदि वह वस्तु न भी रहे तो भी प्रकाश तो रहेगा ही। उस वस्तु के अपने गुण हैं जो प्रकाश की उपस्थिति में सामने आते हैं। भिन्न भिन्न वस्तुओं के भिन्न भिन्न गुण हैं और ये सभी एक तरह के प्रकाश की वजह से सामने आते हैं। प्रकाश का अपना कोई गुण उन वस्तुओं की उपस्थिति का, उनकेव रूप रंग आकार कोई कारण नहीं बनता है। यही तो इस शरीर के साथ है। शरीर की प्रकृति में गुण हैं लेकिन सभी शरीरों में एक ही चेतना है यानी समस्त प्रकृति में पुरुष तो एक ही है। इसका कोई गुण नहीं। बस प्रकाश की भाँति यह हमारी प्रकृति के गुणों को सामने ला देता है और हम चेतना को ही अपनी प्रकृति औए उसका गुण समझने की भूल कर बैठते हैं। सो हमें गुणों से मुक्त होकर उस मूल पुरुष को पाना होता है जो सभी प्रकृति को उनके गुणों सहित हमारे समक्ष उद्घाटित करता है। और यह तभी होता है जब हम अपने अस्तित्व से गुणों को पूर्णतः हटा पाने में सक्षम होते हैं। तब हम एकमात्र पुरुष के रूप में स्वयं को पाते हैं।
यह सब समझ कर पाने के लिए निरन्तर अभ्यास और अभ्यास जनित उन्नति की आवश्यकता होती है अन्यथा अधिकांश बार तो हम ऊपर चढ़कर फिर नीचे फिसल आते हैं।
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