श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 18
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 18
ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः।
जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः॥ ।।18।।
सत्त्वगुण में स्थित पुरुष स्वर्गादि उच्च लोकों को जाते हैं, रजोगुण में स्थित राजस पुरुष मध्य में अर्थात मनुष्य लोक में ही रहते हैं और तमोगुण के कार्यरूप निद्रा, प्रमाद और आलस्यादि में स्थित तामस पुरुष अधोगति को अर्थात कीट, पशु आदि नीच योनियों को तथा नरकों को प्राप्त होते हैं।
जैसी मति वैसी गति। जिस प्रकार की प्रवृत्ति होती है व्यक्ति के जीवन की उपब्धि भी वैसी ही होती है। सत्वगुण व्यक्ति को उच्च पद देता है , जबकि रजोगुणी व्यक्ति सामान्य मनुष्य ही बना रह जाता है और तमोगुण की अधिकता के प्रभाव में व्यक्ति का जीवन अधोगामी हो जाता है। विचारवान, बुद्धिमान विवेकी, मोहमुक्त व्यक्ति सांसारिक जीवन जीते हुए भी संसार के अवगुणों से मुक्त होता है जिसे महामानव, साधु, सज्जन आदि कहते हैं । जो व्यक्ति मोह पाश में बंधा हुआ है वह मोह जनित कामनाओं की पूर्ति में ही हमेशा चंचल हुआ औसत दर्जे का व्यक्ति बना जीवन व्यतीत करता है। लेकिन अज्ञान, प्रमाद, आलस्य आदि में डूबे हुए व्यक्ति में तो व्यक्ति होने के लक्षण ही समाप्त हो जाते हैं।
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