श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 17

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 17

सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च।
प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च॥ ।।17।।

सत्त्वगुण से ज्ञान उत्पन्न होता है और रजोगुण से निःसन्देह लोभ तथा तमोगुण से प्रमाद  और मोह होते हैं और अज्ञान भी होता है।

इस सत्य को हम ऐसे भी समझ सकते हैं कि गुणों का हमारी प्रवृत्ति पर क्या असर होता है। गुणों के प्रभाव से ही व्यक्ति की प्रवृत्ति बनती है। सो व्यक्ति को अपने उत्थान के प्रयास में गुणों के प्रभाव की समझ अवश्य होनी चाहिये। जब व्यक्ति के अंदर सत्वगुण बढ़ता है तो अन्य दोनों गुणों का प्रभाव कमतर हो जाता है और व्यक्ति माया, मोह , लोभ , लालच, ईर्ष्या, क्रोध, घृणा, ईर्ष्या आदि से दूर होकर ज्ञान और वैराग्य की तरफ बढ़ता है। वैराग्य का अर्थ मोह और मोह जनित प्रवृत्तोयों से मुक्ति है।
     यदि व्यक्ति के अंदर रजोगुण बढ़े और अन्य गुण घटें तो व्यक्ति में कामनाओं और इक्षाओं वाली प्रवृत्ति बढ़ती है जो व्यक्ति को कामी, लोभी, ईर्ष्यालु,  द्वेष करने वाला बनाती है जिससे व्यक्ति असत्य और हिंसा भी करता है।
       और जब तमोगुण की बढ़ोतरी होती है तब आलस्य, प्रमाद, क्रियाशीलता से भागने,  की प्रवृत्ति होती है। इस स्थिति में व्यक्ति अन्वेषण और प्रयास से भागता है और ज्ञान के प्रति अभिरुचि का अभाव होने लगता है।
     गुणों के इन प्रभावों को समझने से व्यक्ति को अपनी प्रवृत्ति निर्माण में सहयाता मिलती है।

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